‘एक राष्ट्र – एक चुनाव’: मजबूत लोकतंत्र एवं प्रशासनिक दक्षता के लिए यही अनुकूल समय है


Posted in:
22 Jun, 2026
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22 Jun, 2026

हर सोच का एक उद्देश्य होता है। जब-जब किसी ज्वलंत विषय की चर्चा, परिचर्चा परिवारों में होने लगे तो इस बात को समझने में देरी नहीं होनी चाहिए कि यह चर्चा पूरे समाज की चर्चा है, देश के अंदर पनप रहे किसी आवश्यक विषय की चर्चा है। पिछले कुछ समय से जिस तरह से देश लगातार निर्वाचन प्रक्रिया से गुजर रहा है उसने लोगों को अब जिस मुद्दे पर सोचने पर विवश किया है, वह देश में लगातार निरंतर हो रहे चुनाव प्रक्रिया का विषय है जिस पर अब देशवासियों ने सोचना शुरू कर दिया है। भारत में अक्सर कहा जाता है कि देश लगातार कैम्पेन मोड में रहता है और हर वर्ष देश के किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं और अब देशवासी भी इस बात पर सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि इस चुनावी प्रक्रिया से कैसे निजात प्राप्त हो।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के सक्षम, कुशल नेतृत्व का ही परिणाम है कि अब चुनाव व्यवस्था में नीतिगत एवं योजनाबद्ध फैसलों से आवश्यक बदलाव किये जा रहे हैं

देश के अंदर अब ‘एक राष्ट्र – एक चुनाव’ के विषय पर मजबूती से आगे बढ़ने का सही समय आ गया है। भाजपा ने अपने संकल्प को जन-जन का आंदोलन बनाने का प्रयास भी आरम्भ कर दिया है। यह सिर्फ भाजपा का ही नहीं बल्कि देश में एक ऐतिहासिक राजनीतिक स्थिरता के संकल्प को पूरा करने का एक स्वर्ण अवसर होगा। प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय लोकतन्त्र में नये अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। इनके नेतृत्व में वैभवशाली भारत, गौरवशाली भारत, संपन्न भारत, समृद्ध भारत और शक्तिशाली भारत का निर्माण हो रहा है। सरकार की जन कल्याण नीतियों में मिली सफलताओं से देश आज भारत के उज्ज्वल भविष्य का जयघोष कर रहा है। देश के करोड़ों लोगों के जीवन बदलने वाली प्रगति के दरवाजे खुल रहे हैं। यह सब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के सक्षम, कुशल नेतृत्व का ही परिणाम है कि अब चुनाव व्यवस्था में नीतिगत एवं योजनाबद्ध फैसलों से आवश्यक बदलाव किये जा रहे हैं। लगातार लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम और पंचायत चुनाव देश की विकासगति पर बड़ा ब्रेक बनते जा रहे हैं। देश के सुशासन और नीतिगत निर्णय लेने में चुनाव कई मायनों में प्रभावित कर रहे हैं। सरकार चाह कर भी आमतौर पर कड़े फैसले लेने में अपने आप को असमर्थ महसूस करती है। इसीलिए अब यह विषय जनता के दरबार में पहुंचकर एक जनमत तैयार कर, संकीर्ण राष्ट्र सोच से ऊपर उठकर भविष्य की दशा-दिशा बदलने वाले ऐतिहासिक पहल की ओर बढ़ चला है। ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ को अब जन भागीदारी मिशन का साथ मिल गया है जिससे नए भविष्य को संवारने का लक्ष्य प्राप्त हो सके।

सरकार द्वारा विचाराधीन ‘एक राष्ट्र – एक चुनाव’ का उद्देश्य देश के चुनाव लागत को कम करने के लिए देश के सभी स्तर के चुनावों को एक साथ एक ही दिन या एक विशिष्ट समय सीमा के भीतर एक साथ चुनाव कराना है। इसका मुख्य उद्देश्य चुनाव लागत को कम करना तो है ही साथ में समय का भी सही उपयोग हो सके। इस उद्देश्य को विधि और न्याय मंत्री ने भारत के संविधान में संशोधन करने के लिए 17 दिसम्बर (2024) को लोकसभा में ‘संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024’ पेश किया। इस विधेयक को 19 दिसम्बर 2024 को संयुक्त संसदीय समिति के विचार के लिए भेजा गया। भारत की स्वतंत्रता के बाद शुरुआती कुछ समय आम चुनाव राज्य विधानसभा चुनावों के साथ ही हुए थे व यह प्रथा वर्ष 1967 तक जारी रही, लेकिन कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले ही भंग होने के कारण वर्ष 1968 और 1969 में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था बाधित हो गई। भारत के विधि विभाग ने चुनावी कानूनों में सुधार पर अपनी 170वीं रिपोर्ट में यह टिप्पणी की थी कि “हर साल और बेमौसम चुनाव कराने के इस चक्र को समाप्त किया जाना चाहिए; हमें उस स्थिति में वापस लौटने का प्रयास करना होगा जहां लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित किए जाते थे। लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए पांच साल में एक बार चुनाव हों।” भारत में एक चुनाव कराने पर उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट जो वर्ष 2024 में जारी की गई थी, ने इस परिकल्पना को लागू करने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की। इसकी सिफारिशों को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 18 दिसम्बर 2024 को स्वीकार कर लिया, जो चुनावी सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति को इस बारे 21,500 से अधिक प्रतिक्रियाएं भी प्राप्त हुईं, जिसमें 80% एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में थे।

वित्तीय अनुशासन ही ‘विकसित भारत’ की नींव का मुख्य बिन्दु है। लोकतंत्र को अनावश्यक खर्च, बार-बार होने वाले चुनाव और राजनीतिक अस्थिरता की बेड़ियों से मुक्त करने की जरूरत महसूस होने लगी है। एक साथ चुनाव कराने के लिए वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री ने चुनाव कराने के विषय पर मजबूत तर्क प्रस्तुत किया था। वर्ष 2017 में नीति आयोग द्वारा एक साथ चुनाव पर वर्किंग पेपर भी तैयार किया गया था तथा 2018 में कानून आयोग ने कहा था कि एक साथ चुनाव कराने की संभावना के लिए कम से कम पाँच संवैधानिक बदलावों की आवश्यकता होगी। देश के सामने लगातार चुनावी मोड से केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सरकारी कर्मचारी के साथ शिक्षकों, मतदाताओं, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों सभी प्रमुख हितधारकों को भी प्रभावित करता है। आचार संहिता लागू होने से उस चुनाव राज्य में सरकारी गतिविधियों के स्थगित होने के कारण नीतिगत घाटा बना रहता है। यही नहीं बार बार चुनाव होने के कारण जाति, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय मुद्दे हावी रहते हैं। इतना ही नहीं चुनावी मोड से शासन के दीर्घकालीन नीति लक्ष्यों की प्राप्ति कठिन हो जाती है। जनता भी इस प्रक्रिया के कारण उदासीन माहौल में रहती है तथा स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों में भी इसका व्यापक असर देखने को मिलता है।

इसमें कोई शक नहीं कि ‘एक राष्ट्र – एक चुनाव’ एक बेहतर विकल्प हो सकता है। जो भी चुनौतियां इस विषय में आएंगी, उससे निपटने के लिए एक बेहतर सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होगी। इन चुनौतियों से निपटने के लिए व संवैधानिक परिवर्तन के लिए राष्ट्र को देश ही नहीं दुनिया में अपने अनुभव का डंका बजाने वाले प्रधानमंत्री मोदी जी का सुझाव व विचार व्यापक प्रभावशाली सिद्ध होगा

इसमें कोई शक नहीं कि ‘एक राष्ट्र – एक चुनाव’ एक बेहतर विकल्प हो सकता है। जो भी चुनौतियां इस विषय में आएंगी, उससे निपटने के लिए एक बेहतर सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होगी। इन चुनौतियों से निपटने के लिए व संवैधानिक परिवर्तन के लिए राष्ट्र को देश ही नहीं दुनिया में अपने अनुभव का डंका बजाने वाले प्रधानमंत्री मोदी जी का सुझाव व विचार व्यापक प्रभावशाली सिद्ध होगा। प्रधानमंत्री की इस महत्वाकांक्षी सोच का ‘मूल’ उनकी मंशा का आधार देश में ‘कल्याणकारी राज्य’ की सफल स्थापना ही है।

{लेखक भाजपा शिक्षक प्रकोष्ठ (हिमाचल) के सह संयोजक हैं}