“भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह हमारी समग्र संस्कृति की समृद्ध विरासत को महत्व दे और उसका संरक्षण करे।”
— भारत का संविधान
भारत मूर्त विरासत के सबसे बड़े भंडारों में से एक है, जहां प्रागैतिहासिक काल से लेकर औपनिवेशिक काल तक के स्मारक, स्थल और पुरावशेष मिलते हैं। हांलाकि एएसआई, राज्य पुरातत्व विभाग और इनटैक जैसे विभिन्न संगठनों ने इस विरासत के कुछ हिस्सों का दस्तावेजीकरण किया है, लेकिन बहुत कुछ बिखरा हुआ या अलिखित है। एकीकृत डेटाबेस के न होने से अनुसंधान, संरक्षण और प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी मुद्दे पर निर्मित विरासत, स्थलों और पुरावशेषों का व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण करने के लिए स्मारक और पुरावशेषों पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमएमए) शुरू किया गया था। मानकीकृत दस्तावेज़ीकरण, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और जन जागरूकता के माध्यम से एनएमएमए का मकसद भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को सुनिश्चित करते हुए एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाना है।
स्मारकों और पुरावशेषों पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमएमए)
वर्ष 2007 में स्थापित एनएमएमए भारत की निर्मित विरासत और पुरावशेषों के डिजिटलीकरण और दस्तावेज़ीकरण के लिए ज़िम्मेदार है। इसने स्मारकों और पुरावशेषों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर संकलित करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
एनएमएमए की प्रमुख उपलब्धियां
पुरातन वस्तुओं का डिजिटलीकरण: 12,34,937 पुरावशेषों का डिजिटलीकरण किया गया है, जिसमें एएसआई संग्रहालयों/मंडलों/शाखाओं से 4,46,068 और अन्य संस्थानों से 7,88,869 पुरावशेष शामिल हैं।
निर्मित विरासत और स्थल: 11,406 स्थलों और स्मारकों का दस्तावेजीकरण किया गया है।
एनएमएमए के प्रमुख उद्देश्य
बेहतर प्रबंधन और अनुसंधान के लिए निर्मित विरासत, स्मारकों और पुरावशेषों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना और उसका दस्तावेज़ीकरण करना।
केंद्रीय, राज्य, निजी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में पुरावशेषों का एक समान दस्तावेज़ीकरण सुनिश्चित करना।
सांस्कृतिक विरासत संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाना।
राज्य विभागों, स्थानीय निकायों, संग्रहालयों, गैर सरकारी संगठनों और विश्वविद्यालयों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण प्रदान करना।
डिजिटलीकरण के मुख्य दिशा-निर्देश
राष्ट्रीय डिजिटल डेटाबेस बनाने के लिए एनएमएमए ने समान दस्तावेज़ीकरण के लिए मानक तय किए हैं:
निर्मित विरासत/स्थलों (द्वितीयक स्रोतों से) की तस्वीरें अनकंप्रेस्ड टिफ प्रारूप (300 डीपीआई रिज़ॉल्यूशन) में होनी चाहिए।
पुरावशेषों की तस्वीरें अनकंप्रेस्ड टिफ प्रारूप (300 डीपीआई) में ली जानी चाहिए। यदि तस्वीरें एनईएफ/आरएडब्ल्यू प्रारूप में ली गई हैं, तो उन्हें बिना किसी बदलाव के टिफ में परिवर्तित किया जाना चाहिए।
लघु चित्रों की तस्वीरें या तो टिफ (300 डीपीआई) में उपयुक्त पृष्ठभूमि के साथ ली जा सकती हैं या स्कैन की जा सकती हैं।
डिजिटल स्पेस में भारतीय विरासत (आईएचडीएस) अनुसंधान
आईएचडीएस पहल का मकसद केवल दस्तावेज़ीकरण की सीमाओं से आगे जाकर भारत की विरासत को संरक्षित करने और साझा करने के लिए आधुनिक डिजिटल तकनीकों का उपयोग करना है। आईएचडीएस का प्रमुख उद्देश्य निम्न है:
भारतीय सांस्कृतिक संपत्तियों पर जोर देते हुए डिजिटल विरासत प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान को बढ़ावा देना।
अंतर्विषयी अनुसंधान में मदद करने के लिए मल्टीमीडिया विरासत संसाधनों के लिए भंडारण, संरक्षण और वितरण तंत्र की स्थापना करना।
विरासत संरक्षण में डिजिटल प्रौद्योगिकियों की भूमिका
3डी स्कैनिंग, वर्चुअल रियलिटी, कंप्यूटर विज़न और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे डिजिटल उपकरणों ने विरासत संरक्षण के स्वरूप को बदल दिया है। ये प्रौद्योगिकियां निम्नलिखित की अनुमति देती हैं:
पांडुलिपियों, स्मारकों और कलाकृतियों के उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले डिजिटल अभिलेखागार का निर्माण।
खत्म हो चुकीं या क्षतिग्रस्त विरासत संरचनाओं का वर्चुअल पुनर्निर्माण।
शिक्षा और पर्यटन के लिए इंटरैक्टिव अनुभव।
निष्कर्ष
भारत की सांस्कृतिक विरासत का डिजिटलीकरण और दस्तावेज़ीकरण, इसके संरक्षण और पहुंच के लिए बेहद ज़रूरी है। स्मारक और पुरावशेषों पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमएमए) अभिलेखों को मानकीकृत करके, हितधारकों को प्रशिक्षित करके और जन जागरूकता को बढ़ावा देकर इस प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रौद्योगिकी और सहयोग की मदद से एनएमएमए यह सुनिश्चित करता है कि भारत की विशाल विरासत का व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकरण और संरक्षण हो सके और इसे अनुसंधान और शिक्षा के लिए उपलब्ध कराया जा सके। एक एकीकृत और व्यापक डेटाबेस न केवल इनके संरक्षण में सहायता करेगा, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करेगा।

