आप जब तक सुनेंगे, तब तक मैं बोलूंगा

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टल जी… यह नाम जो कोई भी सुनता है या बोलता है उसके मन में इस विराट व्यक्तित्व के प्रति बहुत ही गहरी छाप बन जाती है। व्यक्तित्व ऐसा जिन्होंने अपने कृतित्व से किसी भी पद से बड़ा खुद के कद को रखा। कवि के रूप में खुलकर कविताएं लिखीं। पत्रकार के रूप में काम किया तो राष्ट्रहित के लिए लिखते रहे। संघ प्रचारक के रूप में काम किया तो समाज के लिए समर्पित रहे। राजनेता के रूप में काम किया तो देश के लिए समर्पित रहे। और जीवन में जब ऐसा भी क्षण आया कि सत्ता का त्याग करना है, जोड़-तोड़ की राजनीति नहीं करनी है तो बिना एक क्षण गवाए तत्काल उसका परित्याग किया। अटल जी, अटल जी थे। सदैव अटल, सर्वदा अटल। यह मेरा सौभाग्य है कि अटल जी के साथ कई कार्यक्रमों में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। जब भी अटल जी की इस स्मृतियों को याद करता हूं; उनकी यह बात कानों में गूंजती है।

“संजय, संगठन में हमेशा कार्यकर्ता बनकर रहना। कार्यकर्ताओं के बल पर ही संगठन खड़ा रहता है। यह याद रखना कि जनसेवा ही हम सबका प्रमुख कार्य है।”

अटल जी की ये पंक्तियां मानो समाज के हर वर्ग के लिए हैं, हर कार्यकर्ता के लिए हैं। उन्हीं के जीवन की तरह शाश्वत और अटल है। ऐसा नहीं है कि अटल जी ने इन बातों को सिर्फ कहा। अटल जी ने खुद भी इन बातों को आत्मसात किया।

श्रद्धेय अटल जी की कई स्मृतियां जुड़ी हुई हैं, जिसमें यह लगता है कि अटल जी कोई देवपुरुष थे, जिन्होंने इतनी सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। कार्यकर्ताओं के लिए खड़े रहे और कार्यकर्ताओं का हौसला भी बढ़ाते रहे।

रांची से गुमला जाते वक्त अटल जी ने सड़क के किनारे एक झोपड़ीनुमा घर के पास गाड़ी रुकवाई और सीधे अंदर चले गए। घर की महिला से मां कहकर संबोधित किया। अपना परिचय दिया और कुछ खिलाने का आग्रह किया। घर की महिलाओं ने रोटी, भुजिया, प्याज और हरी मिर्च अटल जी को खिलाई

बात 1980 की है, जब अटल जी दक्षिणी छोटानागपुर के दौरे पर आए थे। पिस्का मोड, रांची में स्थित गुरुद्वारा में मत्था टेका और अपनी यात्रा शुरू की। उस यात्रा में मैं उनके साथ था। रांची से गुमला जाते वक्त अटल जी ने सड़क के किनारे एक झोपड़ीनुमा घर के पास गाड़ी रुकवाई और सीधे अंदर चले गए। घर की महिला से मां कहकर संबोधित किया। अपना परिचय दिया और कुछ खिलाने का आग्रह किया। घर की महिलाओं ने रोटी, भुजिया, प्याज और हरी मिर्च अटल जी को खिलाई। यह वह संस्मरण है, जो यह बताता है कि किस कदर अटल जी आम जनमानस से जुड़ते थे।

1981 में प्रयागराज में भाजपा युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अधिवेशन था। हम सब वहां गए हुए थे। अधिवेशन समाप्त होने के बाद मैं रांची लौट आया। यहां पहुंचने पर दैनिक अखबार रांची एक्सप्रेस में पढ़ा कि अटल जी रांची में हैं। तब वह संसदीय समिति के साथ रांची आए हुए थे। मैं उनसे मिलने जेल मोड पर स्थित सर्किट हाउस (जो अब अर्जुन मुंडा जी का आवास है) वहां पहुंचा। अटल जी के साथ रांची एक्सप्रेस के तत्कालीन संपादक श्री बलबीर दत्त और रांची के पूर्व विधायक श्री ननी गोपाल मित्रा बैठे हुए थे। मैंने उनसे आग्रह किया कि रांची में एक सभा की जाए। अटल जी ने कहा इतनी जल्दी सभा कैसे हो सकती है? कल मुझे हावड़ा निकलना है। मैंने उनसे फिर अनुरोध किया कि रांची के लोग आपको सुनना चाहते हैं। अपने मुस्कान के साथ अटल जी ने सहमति दे दी। दूसरे दिन रात 8:00 बजे हावड़ा जाने की ट्रेन थी और दोपहर के 3:00 बजे सभा करनी थी। मैं खुद ऑटो बुक करके इस सभा के प्रचार प्रसार में लग गया। ठीक 3:00 बजे बारी पार्क मैदान, (जहां अभी नगर निगम का कार्यालय है) में सभा शुरू हुई। अटल जी ने भाषण देना शुरू किया। इतने कम समय की तैयारी में लोगों का जो हुजूम उमड़ा था, वह आज भी मेरी आंखों के सामने है। अटल जी ने अभी आधा भाषण दिया था और भीषण बारिश होने लगी। मैंने अटल जी के लिए छाता लगाया, उन्होंने छाता हटाने को कहा। अटल जी ने अपने ही अंदाज में कहा— “आप जब तक भीगेंगे, मैं भी तब तक भीगूंगा। आप जब तक सुनेंगे तब तक मैं भी बोलूंगा।”
अटल जी की इन पंक्तियों ने उस भीषण बारिश में जनता के उत्साह को कई गुना बढ़ा दिया। जनता तालियां बजाती रहीं, अटल जी बोलते रहे। सभा की समाप्ति के बाद बगल में स्थित उपायुक्त कार्यालय में अटल जी ने कपड़े बदले और फिर हावड़ा के लिए रवाना हो गए।

एक बार पुनः 1983 में अटल जी का सान्निध्य मिला। संगठन संचालन के लिए सहयोग निधि लेना था। रांची को 1 लाख 21 हजार रुपए का लक्ष्य दिया गया था। तब आरिफ करीम रांची भाजपा के अध्यक्ष हुआ करते थे और राजेंद्र अग्रवाल कोषाध्यक्ष।

कुल मिलाकर कहूं तो अटल जी का विराट व्यक्तित्व सिर्फ किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व नहीं है। उनका जीवन एक पुस्तक है, जिसमें हमें हर क्षेत्र के लिए सीखने की प्रेरणा मिलती है। समझने का अवसर मिलता है और जीवन में आगे बढ़ाने के लिए रास्ते दिखते हैं। इसलिए सामान्यजनों से, कार्यकर्ताओं से सबसे मेरा यही आग्रह है कि जीवन में जब भी निराशा छाए, अटल जी की कविताओं को पढ़िए। अटल जी के भाषणों को सुनिए

नियत तिथि तक राशि जमा नहीं हो पाई। राजेंद्र अग्रवाल जी ने अपनी नई एंबेसडर का बेच दी और तब 1 लाख, 21 हजार के लक्ष्य को पूरा किया। इसी दिन एक बार फिर हमने अटल जी की सभा की। अटल जी भाषण देने आए, लगभग 1 घंटे भाषण देने के बाद अटल जी चुप हो गए। उन्होंने अपने विनोद स्वभाव से कहा कि जितना आपने राशन दिया है, मैंने उतना भाषण दिया है। फिर उसके बाद पुनः अटल जी ने भाषण देना शुरू किया। हम सबने वह राशि जमा कर अटल जी को दी।

एक बार फिर अटल जी अपनी यात्रा पर रांची आए और लोहरदगा, गुमला और सिमडेगा के लिए रवाना हुए। वहां से भी संगठन के लिए निधि संग्रह हुआ। लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष कड़िया मुंडा जी, पूर्व मंत्री स्व. ललित उरांव जी, लाल राजेंद्र नाथ शाहदेव जी के साथ रांची के लिए निकले। बीच रास्ते में अटल जी ने गाड़ी रुकवाई और पैदल चलने लगे। कड़िया मुंडा जी ने उन्हें रोका और कहा कि गाड़ी में पैसा रखा हुआ, ऐसे पैदल चलना ठीक नहीं है। अटल जी ने कहा— कोई दिक्कत नहीं, हम पैदल चलेंगे। लगभग आधे घंटे तक पैदल चलते रहे और रात में बसिया पहुंचे। वहां पहुंचने पर ललित उरांव जी ने कहा कि एक सभा करते हैं। तब तक उसे क्षेत्र में यह खबर आ गई थी कि अटल जी आए हुए हैं। फिर रात के लगभग 9:00 बजे के लगभग सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र में, जहां कोई संसाधन नहीं था; वहां पर सभा हुई और 500 से 600 लोग सभा में मौजूद रहे।

यह अटल जी का व्यक्तित्व था। यह उनके करिश्माई व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि वो जहां भी जाते थे; लोग उनसे जुड़ जाते थे।

1996 में अटल जी सेवा सदन अस्पताल के प्रथम तल का उद्घाटन करने आए। उन्होंने उद्घाटन के बाद लोगों को संबोधित किया और कहा कि मैं आपको यह शुभकामना और आशीर्वाद नहीं दे सकता कि आपका अस्पताल खूब फले-फूले। परंतु आपसे यह अपेक्षा जरूर रखूंगा कि आप सेवाभाव से काम करें। सबके स्वस्थ रहने के लिए काम करें। यह अपेक्षा मेरी आपसे है।

कुल मिलाकर कहूं तो अटल जी का विराट व्यक्तित्व सिर्फ किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व नहीं है। उनका जीवन एक पुस्तक है, जिसमें हमें हर क्षेत्र के लिए सीखने की प्रेरणा मिलती है। समझने का अवसर मिलता है और जीवन में आगे बढ़ाने के लिए रास्ते दिखते हैं। इसलिए सामान्यजनों से, कार्यकर्ताओं से सबसे मेरा यही आग्रह है कि जीवन में जब भी निराशा छाए, अटल जी की कविताओं को पढ़िए। अटल जी के भाषणों को सुनिए। उन्होंने कविताएं ऐसी लिखीं, जो कालजयी बन गई। भाषण ऐसे दिए, जो दस्तावेज बन गए। वे कालजयी कविताएं और उनके भाषण हमें अपने जीवन में, समाज की सेवा में और राष्ट्र की सेवा के कई मार्ग दिखाएंगे।

युग पुरुष अटल जी को शत-शत नमन।

                                        (लेखक रक्षा राज्य मंत्री हैं)