भारत सितारों पर पहुंचा और उनकी रोशनी को लेकर घर लौटा

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     केरल का एक शांत मछवारों का गांव ‘थुंबा’, यहां भारत की अंतरिक्ष यात्रा एक चर्च के प्रांगण से प्रक्षेपित रॉकेटों के साथ शुरू हुई थी और लोगों ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन देश इन ऊंचाइयों को छू लेगा, जहां आज हम पहुंचे हैं। वह शांत संकल्प का समय था, जब सितारों तक पहुंचने का सपना सीमित साधनों लेकिन असीम महत्वाकांक्षा के साथ पोषित किया गया था। आज, वह सपना एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में परिपक्व हो गया है और जब हम नरेन्द्र मोदी सरकार के ग्यारह साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं, तो आज भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अधिक साहसिक, समावेशी और आम नागरिकों के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ महसूस होता है। यह परिवर्तन केवल रॉकेट एवं उपग्रहों के बारे में नहीं है – यह लोगों जीवन के बारे में है। यह बताता है कि कैसे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी चुपचाप हमारी दिनचर्या में प्रवेश कर गई है, जिसके परिणामस्वरूप दूरदराज के गांव के किसानों से लेकर डिजिटल कक्षा में छात्रों को इसका लाभ मिल रहा है।

प्रधानमंत्री श्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और अंतरिक्ष विभाग के रणनीतिक नेतृत्व में भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को विकास यात्रा में योगदान देने, नागरिकों के सशक्तीकरण एवं नये अवसरों के तौर पर पुन: परिभाषित किया है। 2014 से शुरू किए गए सुधारों ने नए आयाम खोले हैं। 2020 में IN-SPACe के निर्माण ने निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी, जिससे नवाचार की लहर उठी। आज, 300 से अधिक स्पेसटेक स्टार्टअप उपग्रह बना रहे हैं, लॉन्च वाहन डिजाइन कर रहे हैं और कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और नेविगेशन की सेवा करने वाले एप्लिकेशन विकसित कर रहे हैं। ये स्टार्टअप न केवल तकनीक बना रहे हैं, बल्कि वे रोजगार भी पैदा कर रहे हैं, खासकर टियर 2 और टियर 3 शहरों में युवा इंजीनियरों और उद्यमियों के लिए नये अवसर बन रहे हैं।

2014 से शुरू किए गए सुधारों ने नए आयाम खोले हैं। 2020 में IN-SPACe के निर्माण ने निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति दी, जिससे नवाचार की लहर उठी। आज, 300 से अधिक स्पेसटेक स्टार्टअप उपग्रह बना रहे हैं, लॉन्च वाहन डिजाइन कर रहे हैं और कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और नेविगेशन की सेवा करने वाले एप्लिकेशन विकसित कर रहे हैं

उदारीकृत नीति ने अंतरिक्ष सेवाओं को अधिक किफायती और सुलभ बना दिया है, जिससे उन्नत प्रौद्योगिकी का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंच रहा है। भारत के उपग्रह अब मौसम पूर्वानुमान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे किसानों को अधिक सटीकता के साथ अपनी बुवाई और कटाई चक्र की योजना बनाने में मदद मिलती है। बाढ़-ग्रस्त क्षेत्रों में उपग्रह डेटा प्रारंभिक चेतावनी और आपदा प्रतिक्रिया को कारगर बना रहे है, जिससे जीवन और आजीविका को लाभ मिलता है। चक्रवातों और सूखे के दौरान रिमोट सेंसिंग अधिकारियों को नुकसान की तैयारी और उसे कम करने में मदद करती है। ग्रामीण क्लीनिकों में उपग्रह कनेक्टिविटी द्वारा संचालित टेलीमेडिसिन सेवाएं अब शहरी अस्पतालों के डॉक्टरों को दूरदराज के क्षेत्रों में रोगियों के साथ जुड़ने और उन्हें परामर्श प्रदान करने में सहायक सिद्ध हो रहे है, जिससे स्वास्थ्य सेवा की खाई कम हुई है। सैटेलाइट बैंडविड्थ द्वारा समर्थित ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म दूरदराज के गांवों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।

भारत का स्वदेशी जीपीएस नेटवर्क, NavIC सिस्टम, अब वाहनों में नेविगेशन, ट्रेनों और जहाजों पर नजर रखने और यहां तक कि मछुआरों को सुरक्षित रूप से किनारे पर वापस लाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उपग्रह के माध्यम से किसानों को मिट्टी की नमी, फसल के स्वास्थ्य और कीटों के संक्रमण की निगरानी करने में मदद मिल रही है, जिससे बेहतर निर्णय और बेहतर पैदावार संभव हो पाती है। ये अमूर्त लाभ नहीं हैं— ये लाखों लोगों के जीवन में वास्तविक लाभ हैं। पिछले दशक में लॉन्च किए गए मिशनों ने वैश्विक ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। मंगलयान अपने पहले प्रयास में ही मंगल पर पहुंच गया, जिसने भारत की इंजीनियरिंग उत्कृष्टता साबित हुई। चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरा, ऐसा क्षेत्र जहां पानी होने का अनुमान है और इसके रोवर ने ऐसे प्रयोग किए जो भविष्य के चंद्र मिशनों के लिए मददगार होंगे। आदित्य-एल1 सौर तूफानों का अध्ययन कर रहा है, जिससे वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष के मौसम और संचार प्रणालियों और बिजली ग्रिड पर इसके प्रभाव को समझने में मदद मिल रही है। 2027 के लिए निर्धारित गगनयान मिशन, भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजेगा लेकिन चालक दल की उड़ान से पहले ही यह मिशन नई पीढ़ी को प्रेरित कर रहा है।

अंतरिक्ष यात्रियों का प्रशिक्षण, सुरक्षा प्रणालियों का विकास, तथा बिना चालक दल के परीक्षण उड़ानें प्रभावशाली असर पैदा कर रही है – अनुसंधान को बढ़ावा दे रही हैं, प्रतिभाओं को आकर्षित कर रही हैं, तथा राष्ट्रीय गौरव का निर्माण कर रही हैं। भविष्य को देखते हुए भारत 2035 तक अपना स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की योजना बना रहा है। पहला मॉड्यूल 2028 में लॉन्च होने की उम्मीद है तथा

भविष्य को देखते हुए भारत 2035 तक अपना स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की योजना बना रहा है। पहला मॉड्यूल 2028 में लॉन्च होने की उम्मीद है तथा अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग की हाल की सफलता ने इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों को सिद्ध किया है। यह स्टेशन दीर्घकालिक निवास तथा अनुसंधान की अनुमति देगा, जिससे गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण तथा अंतरग्रहीय मिशनों के लिए द्वार खुलेंगे

अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग की हाल की सफलता ने इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों को सिद्ध किया है। यह स्टेशन दीर्घकालिक निवास तथा अनुसंधान की अनुमति देगा, जिससे गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण तथा अंतरग्रहीय मिशनों के लिए द्वार खुलेंगे। इन बढ़ती महत्वाकांक्षाओं का समर्थन करने के लिए भारत अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान (एनजीएलवी) विकसित कर रहा है, जो 30,000 किलोग्राम वजन को पृथ्वी की निचली कक्षा में ले जाने में सक्षम है। इसमें पुन: प्रयोज्य चरण तथा मॉड्यूलर प्रणोदन प्रणाली होगी, जिससे अंतरिक्ष तक पहुंच अधिक किफायती तथा टिकाऊ होगी।

प्रक्षेपणों की बढ़ती आवृत्ति को संभालने और वाणिज्यिक मिशनों का समर्थन करने के लिए श्रीहरिकोटा में एक तीसरा लॉन्च पैड और तमिलनाडु में एक नया स्पेसपोर्ट बनाया जा रहा है। नासा के साथ निसार मिशन पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र और प्राकृतिक खतरों की निगरानी करेगा। जापान के साथ लूपेक्स मिशन एक भारी रोवर के साथ चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों का पता लगाएगा। ये साझेदारियां एक विश्वसनीय वैश्विक अंतरिक्ष साझेदार के रूप में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को दर्शाती हैं। लेकिन अंतरिक्ष केवल अन्वेषण के बारे में नहीं है— यह जिम्मेदारी के बारे में भी है। हजारों उपग्रहों के पृथ्वी की परिक्रमा करने के साथ अंतरिक्ष मलबा एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। इसरो का अंतरिक्ष स्थिति जागरूकता कार्यक्रम वास्तविक समय में मलबे की निगरानी करता है, टकराव से बचने और अंतरिक्ष गतिविधियों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए रणनीति विकसित करता है। देश के हर कोने में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का प्रभाव दिखाई देता है।

आदिवासी और दूरदराज के इलाकों में सैटेलाइट इंटरनेट के माध्यम से डिजिटल समावेशन का लाभ पहुंचाया जा रहा है। यह एक शांत क्रांति हैं— जो बिना किसी दिखावे के जीवन को प्रभावित करते हैं। जैसाकि हम अगले दशक की ओर देख रहे हैं, तो हमारा लक्ष्य भी स्पष्ट हैं: 2040 तक एक चालक दल के साथ चंद्रमा पर उतरना, एक पूरी तरह से कार्यात्मक अंतरिक्ष स्टेशन और वैश्विक अंतरिक्ष नवाचार में नेतृत्वकर्ता की भूमिका। ये केवल सपने नहीं हैं— ये उस राष्ट्र के लिए रणनीतिक अनिवार्यताएं हैं जिसने हमेशा समाज को बदलने के लिए विज्ञान की शक्ति में विश्वास किया है। थुंबा के साइकिल शेड से लेकर अंतरिक्ष की कक्षा में डॉकिंग तक, भारत की अंतरिक्ष यात्रा कल्पनाशीलता और अथक प्रयास से प्रेरित रही है। यह एक ऐसी यात्रा है जो हर नागरिक, हर वैज्ञानिक, हर कल्पनाशील व्यक्ति को छूती है और जैसा कि हम मोदी सरकार के सफल ग्यारह सालों का जश्न मना रहे हैं, तो हम उस राष्ट्र को भी नमन करते हैं, जो वास्तव में सितारों तक पहुंचा और उनकी रोशनी को लेकर घर वापिस लौटा।

(लेखक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री हैं।)