कर्तृत्वशील नेतृत्व : पुण्यश्लोक अहिल्याबाई और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

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    आज के संदर्भ में कहना है तो पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर स्त्री-नीत सुशासन और विकास यानी Women led Good Governance and Development की सबसे शक्तिशाली प्रतीक थीं। हमारे प्रधानमंत्री अगर आज स्त्री-नीत विकास की बात करते हैं तो उनकी सोच का सुस्पष्ट प्रतिबिंब अहिल्याबाई होलकर के जीवन और कार्य में मिलता है।

भारत में जिन्होंने वीरता का परिचय दिया, पराक्रम दिखाया, संघर्ष किया, राज-काज कुशलतापूर्वक सम्हाला ऐसी महारानियों की लंबी सूची है। ऐसी नारी-रत्न देश के उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम में भी आसानी से मिलती हैं। मगर एक ही महिला नेत्री में भारतीय मूल्यों की रक्षा का दृढ़ संकल्प हो, वीरता और पराक्रम के साथ-साथ रणनीति का आकलन भी हो और लोकसेवा का व्रत लेकर आजन्म काम करने का एक जूनून भी हो यह प्राय: नहीं दिखायी देता। अहिल्याबाई होलकर उन विरले व्यक्तित्वों में से थीं जिनमें प्रतिभा, पराक्रम और परमार्थ-साधना की त्रिवेणी के अनोखे संगम का साक्षात्कार मिलता है।

पुण्यश्लोक अहिल्याबाई का नाम लेते ही स्मरण होता है मंदिर निर्माण के उनके राष्ट्रव्यापी और ऐतिहासिक कार्य का। देश के लगभग सभी प्रदेशों में अहिल्याबाई के बनाये मंदिर तीर्थस्थलों की रौनक बने हैं

सामान्यत: यह मानने की प्रवृत्ति होती है कि इतिहास काल की महान हस्तियों की महानता उनके अपने काल से जुड़ी होती है और उस काल तक ही सीमित होती है। कई बार माना जाता है कि आज उन महान विभूतियों का अनुकरण असंभव है। मगर अहिल्याबाई की सोच इतनी शाश्वत थी, उनका दृष्टिकोण इतना कालजयी था कि आज भी उनके विचार प्रासंगिक हैं। उल्लेखनीय हैं कि 300 वर्ष पूर्व जन्मी अहिल्याबाई ने जो सोचा, जो नीतियां अपनायीं और जो कार्य किया उसी से ही प्रेरणा पाकर हमारे प्रधानमंत्री जी आज अपना दायित्व निभा रहे हैं। लोकहितकारी सोच और कार्य की भारतीय शासनकर्ताओं की परंपरा को अहिल्याबाई ने समृद्ध किया और आज उन्हीं के दिखाए मार्ग पर चलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी उसे और अधिक प्रभावी और शक्तिशाली करने के मिशन में जुटे हैं। विशुद्ध लोक कल्याण का समान अधिष्ठान यही इस परंपरा का प्रारंभ बिंदु है। प्रधानमंत्री जी का राष्ट्र-प्रथम का संदेश और अहिल्याबाई की ‘राज रयत का’ की सोच दोनों के केंद्र में लोकहित सर्वोपरि की धारणा ही हैं।

पुण्यश्लोक अहिल्याबाई का नाम लेते ही मंदिर निर्माण के उनके राष्ट्रव्यापी और ऐतिहासिक कार्य का स्मरण होता है और देश के लगभग सभी प्रदेशों में अहिल्याबाई के बनाये मंदिर तीर्थस्थलों की रौनक बने हैं। यह मंदिर निर्माण केवल एक वास्तु प्रकल्प नहीं था। यह प्रतिकार का आत्मविश्वास और अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के दृढ़ संकल्प का प्रतीक चिह्न था। उनकी सर्व भारतीय दृष्टि और उनकी संरचना निर्माण के माध्यम से लोकसेवा का संकल्प, इन दोनों की मिसाल थी उनका मंदिर निर्माण अभियान। आज मोदी जी भी उन्हीं के नक्शे कदम पर जा रहे हैं। काशी-विश्वनाथ मंदिर हो या अयोध्या का पुनर्निर्मित राम मंदिर, दोनों में केवल भगवान के मूर्तियों की ही नहीं, मगर एक दृष्टि से देखे तो राष्ट्र चेतना की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है। आज प्रधानमंत्री जी की अपनी प्रभावरेखा का इतना विस्तार हो चुका है कि अबू धाबी जैसे शहर में भी एक ऐसा भव्य मंदिर बन गया है जिसकी किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

अहिल्याबाई ने नदियों के किनारे घाट बनाये, मोदी जी ने रिवर फ्रंट के प्रकल्प निर्माण किए। देवी अहिल्या बाई ने अपनी शासन-व्यवस्था के अंतर्गत पहली बार जल संधारण विभाग बनाया। प्रधानमंत्री जी ने भी स्वाधीनता के बाद इतने लंबे समय से विभिन्न 28 विभागों में विभाजित जल शक्ति का विषय एकात्म दृष्टि से सोचकर, सभी को सम्मिलित करते हुए एक नया और बृहद जल शक्ति मंत्रालय का निर्माण किया। अहिल्याबाई ने मंदिरों के साथ-साथ जलाशयों, तालाबों और जल-कुंडों का निर्माण किया। आज प्रधानमंत्री मोदी जी अमृत सरोवर योजना के माध्यम से जन-सहभागिता के सहारे उसी प्रयास में लगे हुए हैं। होलकर-राज में कृषि के साथ कृषि उद्यमों को बढ़ावा दिया जाता था। आज मोदी जी के शासनकाल में भी कृषि उद्यमों और अनाज प्रक्रिया उद्योगों को बहुत प्रोत्साहन दिया जा रहा है। किसान को अपनी उपज कहीं भी बेचने की स्वाधीनता होनी चाहिए। इसके प्रति जिस तरह से अहिल्याबाई आग्रही थीं, ठीक उसी तरह प्रधानमंत्री मोदी जी का भी वहीं नीतिगत दृष्टिकोण रहा है।

देवी अहिल्याबाई ने निर्धन किसानों को सरकारी जमीन वितरित की थी। मगर उन पर यह भी बंधन डाला था कि वह अपने अपने खेत के किनारे नौ फलदार वृक्षों के पौधे लगाये और उसके फल स्वयं के लिए रखे जबकि 11 अन्य फलदार वृक्षों के पौधे लगाकर उसके फल सरकारी भंडार में जमा करें।

कुशल प्रशासक के नाते इस तरह की योजना के सफल क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने अहिल्याबाई ने इस संदर्भ में एक क़ानून बनाया जिसका नाम था नौ-ग्यारह का क़ानून! आज प्रधानमंत्री मोदी जी की परिकल्पना से साकार ‘एक पेड़ -मां के नाम’ अभियान का बल भी नौ-ग्यारह क़ानून की तरह आखिरकार धरती का वृक्ष आच्छादन बढ़ाने पर ही तो है।

देवी अहिल्याबाई जानती थीं कि प्रजा की खुशहाली का रास्ता मज़बूत अर्थव्यवस्था से होकर गुज़रता है। इसी दृष्टि से उन्होंने अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाया और पहले की अपेक्षा यह आकार उनके कार्यकाल में 40 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ा और मज़बूत अर्थव्यवस्था विकसित हुई। आज प्रधानमंत्री मोदी जी के कार्यकाल में भी भारत की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा है और वह विश्व की अर्थव्यवस्थाओं में 11वें स्थान से आगे निकलकर पांचवें स्थान पर आ पहुंची है। किसानों, कारीगरों तथा अपने राज्य के सभी

देवी अहिल्याबाई जानती थीं कि प्रजा की खुशहाली का रास्ता मज़बूत अर्थव्यवस्था से होकर गुज़रता है। इसी दृष्टि से उन्होंने अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाया और पहले की अपेक्षा यह आकार उनके कार्यकाल में 40 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ा और मज़बूत अर्थव्यवस्था विकसित हुई

वंचित समूहों के विकास के लिए अहिल्याबाई ने अपने प्रयासों में कुछ भी कसर नहीं छोड़ी थी। आज हम देखते हैं कि गुजरात में गिफ्ट सिटी जैसी व्यवस्था बनाकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार वृद्धि की गति को बढ़ावा दिया जा रहा हैं। अहिल्याबाई ने भी अपने राज्य के अंतर्गत आज के महाराष्ट्र के संभाजीनगर जिले में अंबाड तहसील के अंतर्गत एक कारीगर-कॉलोनी निर्माण की थी और कारीगरी के विकास के लिए आवश्यक सभी सुविधाएं भी वहीं पर उपलब्ध करायी थीं। वह अपने राज्य के कारीगरों को कम ब्याज में ऋण भी उपलब्ध कराती थीं। मोदी जी के सरकार की विश्वकर्मा योजना और अहिल्याबाई के ज़माने का कारीगर कालोनी का निर्माण एक समान सोच के दो भिन्न रूप मात्र हैं।

देवी अहिल्याबाई होलकर अपने राज्य के अंदर जो वंचित समूह हैं उन्हें न्याय मिले इसलिए बहुत अधिक आग्रही थीं। अपनी रयत की मुख्य धारा में जनजातीय समुदाय भी सम्मिलित हो इसलिए उन्होंने तरह-तरह के प्रयास किए। वर्तमान में पूर्वोत्तर भारत की बोडो या ब्रू, चकमा जैसी जनजातियां विकास की मुख्य धारा का अंग बने या फिर छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के जनजाति समुदाय नक्सल प्रभाव से मुक्त हो इस हेतु से जो प्रयास मोदी-सरकार कर रही है वह काफ़ी कुछ देवी अहिल्याबाई की नेतृत्व शैली से मेल खानेवाले हैं।

मालवे की महारानी अहिल्याबाई कहती थीं कि स्नान से शरीर-शुद्धि, ध्यान से मन-शुद्धि और दान से धन-शुद्धि संभव होती है। प्रधानमंत्री मोदी जी सोच, इस संदेश में अंतर्निहित विरासत को मज़बूत करनेवाली सोच है। मोदी-सरकार का स्वच्छ-भारत अभियान, अन्तरराष्ट्रीय योग दिन की परिस्थापना और पीएम केयर से लेकर तरह-तरह के उपायों से ‘सबका प्रयास’ साधने पर उनका बल क्या अहिल्याबाई की विरासत को जीवंत रखनेवाले ही प्रयास नहीं हैं?

कहते हैं कि दो महान विभूतियों की तुलना सामान्यत: नहीं करनी चाहिए। मगर यह भी कहा जाता है कि ग्रेट मेन (और इसमें कोई स्त्री -पुरुष अंतर नहीं हैं) थिंक अलाइक। इसी नजरिये से देखेंगे तो ध्यान में आता है कि दोनों के लिए अपनी प्रजा के हित से बढ़कर और कुछ भी नहीं था। पति निधन के पश्चात् सती जाने की तैयारी करनेवाली अहिल्याबाई ने अपना निर्णय बदला अपनी प्रजा के हित को साधने के लिए। वर्तमान में हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी जब अपनी हर दीपावली सीमा पर खड़े जवानों के साथ बिताते हैं, या फिर अपनी माता के निधन के बाद वह तत्काल उसी दिन अपने कामों में निमग्न हो जाते हैं; उनके यह सारे उदाहरण दोनों की सोच की समानता को दर्शानेवाले ही हैं। दोनों विभूतियों ने अपनी प्रजा को हमेशा यह एहसास दिलाया हैं कि उनकी चिंता करनेवाला कोई तो व्यक्ति शिखर नेतृत्व में बैठी हुआ है। कोई अचरज नहीं कि आधार का यह विश्वास तत्कालीन प्रजा के मन में भी था और आज की जनता के अंदर भी है।

पुण्यश्लोक अहिल्याबाई के बारे में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जो कहा हैं, वह स्मरण करने लायक हैं। अटलजी ने कहा था, “देवी अहिल्याबाई उन नारी रत्नों में से थी, जिन पर भारत गर्व करता है। उनके जीवन में कई ऐसे गुण थे जिनका अनुकरण करना देशवासियों के लिये आवश्यक है।

अहिल्याबाई होलकर का नाम हमारे देश के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक पावन नाम की तरह अंकित है। अहिल्याबाई दैवीय गुणों का मानवीय रूप थीं। उनमें देशभक्ति तथा जन-कल्याण की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वे धर्मपरायण, न्याय-प्रिय तथा कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ सद्चरित्रता, विनम्रता तथा करुणा की देवी थीं| उन्होंने सभी धर्मों और जातियों के प्रति हमेशा बराबर तथा आदर की दृष्टि रखी। देवी अहिल्याबाई ने मध्यकाल की सामाजिक कुरीतियों का डटकर विरोध किया तथा अपने राज्य के असामाजिक तत्वों पर विजय पाकर राज्य में शांति की स्थापना की। उन्होंने अपने शासनकाल में कभी भी अन्याय, पक्षपात और क्रूरता की इजाजत नहीं दी। हम सभी को विशेषकर हमारे युवावर्ग को उनके आदर्शों, कार्यों और विचारों से शिक्षा लेकर राष्ट्र के निर्माण में योगदान देना चाहिए।”

कितना अच्छा संयोग है कि यह वर्ष एक ओर पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर जी की 300 वीं जन्म जयंती का वर्ष है, तो दूसरी ओर अटल बिहारी वाजपेयी जी की जन्मशताब्दी का भी हैं। इस प्रेरणा पर्व में अहिल्याबाई जैसी महान नेत्री का स्मरण हमें मां भारती की सेवा के पथ पर और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है।

(लेखक भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)