जलस्रोतों की जननी अहिल्याबाई
भारत भूमि को तीर्थ रूप में देखने, पानी का मूल्य समझाने के लिए जन्मी थीं वे। अहिल्याबाई होल्कर ने बिहार के गया में सन 1787 में विष्णुपद मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। मंदिर का वही स्वरूप अब भी है। यह मंदिर फल्गु नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। 30 मीटर ऊंचे इस मंदिर की यह फोटो ब्रिटिश एल्गिन द्वारा सन 1895 में ली गई थी।

अहिल्याबाई का ताम्रपत्र
मेवाड़-मराठा संबंध अनेक रंग लिए हैं। महाराणा को कई मांगे माननी पड़ी। संधियां कूटनीतिक थीं लेकिन आत्मिक भाव को स्थापित किया गया। होलकर रानी पुण्य श्लोक अहल्याबाई को मेवाड़ के महाराणा अरसिंह ने बहन मानकर कांचली जैसे परिधान के रूप में तीन गांव दिए। इनके आसपास के खेड़ों सहित ये गांव अभी चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित हैं :
1. बिनोता,
2. केली, और
3. टाटरमाला
इसके लिए तत्कालीन परंपरा के अनुसार ग्रामदान का ताम्रपत्र जारी किया गया। यह 25 मार्च 1771 ई. सोमवार को जारी हुआ और अभी इंदौर के संग्रहालय में प्रदर्शित है। उस समय मेवाड़ी ऐसी भाषा थी जो राजकीय दस्तावेजों में प्रयुक्त होती थी और संधि, उपहार, दान के दस्तावेज, पत्राचार आदि में काम आती थी। इसका मेवाड़ी भाषा में पाठ इस प्रकार है :
☘️श्री रामो जयति
श्री गणेस प्रसादातु श्री एकलिंग प्रसादातु
(राजकीय मुद्रा : भाले का चिह्न) सही
महाराजाधिराज महाराणा श्री अरसिंह जी आदेसातु अहेल्या बाई हुलकर कस्य गाम ३ तीन खेड़ा सुदी थे हि बेन जाणे कांचली री आड़े अखरा ग्रास मया कीदो है, लागत वीलगत सरब सुदी, सो दरबार थी कणी वात री चोलण व्हेगा नहीं, म्हा रा बेटा पोता ई गाम उतारेगा नहीं, उतारे जणी हे श्री एकलिंगनाथ री आण है
वीगत___
१. गाम वीनोतो, गाम केली
गाम टाटरमालो,
प्रतिदुवे श्री हजूर रा, हुकुम थी लीखत पचोली गीरधर लाल गुलाबोत संवत १८२७ विर्षे चेत सुदी ९.
संदर्भ :
* मेवाड़ का इतिहास (जे. के. ओझा)
* भारतीय इतिहास के स्रोत (स्वर्णपत्र, रजतपत्र एवं ताम्रपत्र : श्रीकृष्ण ‘जुगनू’) लोकमाता अहल्याबाई (नेहा भांडारकर)

मल्हार राव होलकर की छतरी

सन् 1766 में महारानी अहिल्या बाई होलकर ने महान मराठा सरदार के सम्मान में बनाई थी।
यह अपनी सुंदर नक्काशी और शानदार वास्तुकला के साथ अलग है। यह इंदौर में होलकर शासकों के छतरियों के पैटर्न के समान है जो फूलों और पत्ती के पैटर्न के साथ सजावटी रूप से नक्काशीदार है।
मराठा शैली छतरी शिखर गुंबद और कमान के एक सुंदर मिश्रण का प्रतिनिधित्व करती है, जिस पर कलश को बहुत ही आकर्षक तरीके से बनाया गया है। छतरी की पहली मंजिल आकर्षक चित्रों से सजाए गया एक स्तंभित हॉल है।
अहिल्याबाई का शिलालेख
शिवपूजा में सदा निरत रहनेवाली भगवती स्वरूपा अहिल्या बाई का एक अभिलेख मित्रवर श्री राज्यपाल शर्मा (झालावाड़) ने भिजवाया है। यह जाम गेट महू के द्वार पर लगा है और देवनागरी के स्पष्टाक्षरों में संस्कृत भाषा में लिखा गया है। इसमें संवत लिखने में ही दो श्लोकों का प्रयोग किया गया है। विक्रम और शक दोनों ही संवतों का प्रयोग किया गया है, विक्रम संवत 1847 के माघ मास की 13वीं तिथि को इसको लिखा गया है। द्वार की प्रशंसा में मनोहर शब्द मात्र लिखा गया है।
मूलपाठ इस प्रकार है :
श्री।
श्रीगणेशाय नम:।।
स्वस्ति श्रीविक्रमार्कस्य संमत्
1847 सप्ताब्धिनागभू:
शाके 1712 युग्मकुसप्तैक मिते
दुर्मति वत्सरे।।१।।

माघे शुक्ल त्रयोदश्यां पुष्यर्क्षे
बुधवासरे।। सुषा (स्नुषा) मल्लारि रावस्य
खंडेरावस्य वल्लभा।। 2।।
शिवपूजापरां नित्यं ब्रह्मप्याधर्म तत्परा।
अहल्याख्य बबंधेदं मार्ग द्वार सुशोभनम्।। 3।।
18वीं शताब्दी के अंत में एक अंग्रेज द्वारा बनाया गया देवी अहिल्याबाई होलकर का दुर्लभ लिथोग्राफ
हर नाम से जुड़ा है इंदौर शहर के इतिहास का कोई पन्ना
इंद्रेश्वर से इंदौर और सूबेदार मल्हार राव होलकर के नाम से बना मल्हारगंज कोई भी शहर बनता है, वहां रहनेवाले लोगों से उनके व्यवहार और उनके काम से। होलकर स्टेट की राजधानी बनने के बाद 204 वर्षों में इंदौर ने कई उतार-चढ़ाव देखें। यहां कई गली-मोहल्ले चौराहे बने और आबाद हुए। इनके नाम कैसे पड़े इसकी रोचक जानकारी पेश है। सरस्वती नदी के समीप इंद्रेश्वर मंदिर जो भगवान शिव का मंदिर है, इसी से इंदौर के नाम से उत्पत्ति हुई। यह सफर इंद्रेश्वर से शुरू होते-होते इंद्रपुरी और इंदूर से इंदौर होने तक का है।
उल्लेखनीय है कि सर्वप्रथम इंदूर शब्द का प्रयोग देवी अहिल्याबाई होलकर ने किया, जिसमें मराठी का असर दिखता है। युद्ध में भाग लेने के लिए मराठा फौज इंद्रेश्वर मंदिर के पास अपना डेरा डालती थी, क्योंकि यहां पर्याप्त मात्रा में अनाज पानी था। इस समय इंदौर के जमींदार यहां से लगान वसूलते थे। देवी अहिल्याबाई होल्कर के समय इंदौर की राजधानी महेश्वर हुआ करती थी जो बाद में महाराजा जसवंत राव होलकर प्रथम ने इसे अस्थायी तौर पर भानपुरा स्थानांतरित किया था। 1818 में यहां से राजधानी इंदौर लाई गई और इंदौर राज्य की याने होलकर रियासत की राजधानी इंदौर बनी। शांत, सुंदर पानी से लबरेज, घने जंगलों से घिरा हुआ इंदौर अब महज सीमेंट कांक्रीट का जंगल बनकर रह गया है। शहर के विभिन्न गली-मोहल्लों के नाम मुख्यत: राजा-महाराजाओं, उनकी पत्नी, संतानों, सूबेदारों, विशिष्ट व्यक्तियों या किसी जाति विशेष के व्यवसाय के नाम पर रखे गए हैं।
शहर के प्रसिद्ध इतिहासकार जफर अंसारी ने अपने शोध में इंदौर के 120 नामों को खोज निकाला है। जो जल्द ही एक पुस्तक की शक्ल में सामने आएगी। गौरतलब है कि इन जानकारियों के साथ सैकड़ों दुर्लभ फोटो भी होंगे। पूर्व में इसे कई बार संक्षिप्त में इंदौर के प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया है।
चिमनबाग : चिमनजीराव बोलिया सरकार का एक विशाल बगीचा होने के कारण इसका नाम चिमनबाग रखा गया। चमन जी राव बोलियां गोविंदराव बोलियां सरकार के पुत्र थे
संयोगितागंज : यह नाम महाराजा यशवंतराव होलकर द्वितीय की प्रथम पत्नी महारानी संयोगिता राजे के नाम से 1931 में रखा गया। इनकी मृत्यु दुर्घटना में हुई थी।
सियागंज : शिवाजीराव होलकर (1886-1908) के समय में शिवाजी गंज बनाया गया। इसमें किसी भी वस्तु पर कर नहीं होता था, चूंकि उन दिनों अंग्रेजों ने रेसीडेंसी इलाके में टैक्स-फ्री वस्तुओं का बाजार शुरू किया था, इससे शहरवासियों को अपनी सरहदों में एक ऐसे बाजार की जरूरत महसूस हुई। इसी के कारण टैक्स-फ्री बाजार का निर्माण महाराजा शिवाजीराव ने शुरू किया। ये पहले सेवागंज और बाद में सियागंज के नाम से मशहूर हुआ।
स्नेहलता गंज : महाराजा तुकोजीराव होलकर तृतीय की दूसरी पत्नी इंद्राबाई की पुत्री स्नेहलता राजे के नाम पर रखा गया। इनकी मृत्यु बचपन में दिवाली पर पटाखों से जलने के कारण हुई थी।
यशवंत सागर : 1939 में यशवंतराव होलकर द्वितीय द्वारा गंभीर नदी में 70 लाख की लागत से बांध बनवाया गया जो यशवंत सागर कहलाया। यह होलकर रियासत की सबसे महंगी योजना थी, जिसे इंदौर वासियों ने सदियों तक पानी की समस्या को नहीं पनपने दिया। उल्लेखनीय है कि इसके निर्माण में तांबे के पाइप बिछाए गए थे।
जूना तुकोगंज : महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय (1844-86) के नाम पर रखा गया। महाराजा तुकोजीराव आधुनिक इंदौर के निर्माता हैं। उनके प्रयास से इंदौर में मालवा अखबार, इंदौर की पहली कपड़ा मिल और रेलवे लाइन आई।
नया तुकोगंज : महाराजा तुकोजीराव होलकर तृतीय के नाम पर बसाया गया। उल्लेखनीय महाराजा तुकोजीराव 18 वर्ष से कम उम्र की शादी पर प्रतिबंध लगाया था।
प्रिंस यशवंत रोड : बाला साहब यशवंतराव होलकर की किशोर अवस्था में इस रोड का नाम प्रिंस यशवंत रोड (पीवाय रोड) रखा गया। यह रोड इंदौर का सर्वप्रथम सीमेंट कांक्रीट का रोड थी, जिसे कॉलम-बीम डालकर बनाया गया।
बक्षीबाग : बक्षी खुमानसिंह होलकर स्टेट आर्मी के कमांडर-इन-चीफ थे। उन्हें मैन ऑफ दी स्वोर्ड के साथ मैन-ऑफ-दी पैन भी कहा जाता था। उनकी हस्तलेखनी तथा वीरता के कारण वे प्रख्यात थे। 1857 के गदर में उन्होंने मुख्य भूमिका अदा की थी।
एमवाय हॉस्पिटल : महाराजा यशवंतराव होलकर हॉस्पिटल का निर्माण 18 फरवरी, 1950 में शुरू हुआ। महाराजा ने अपनी ओर से तीस लाख रुपए का अनुदान दिया। सन् 1955 में बनकर तैयार यह हॉस्पिटल तब एशिया की बड़ी इमारतों में शामिल हो गया। इसके आर्किटेक्ट कॉल वार्न हिन्स थे जिन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय नई दिल्ली को भी डिजाइन किया था।
उषागंज : महाराजा यशवंतराव होलकर द्वितीय की प्रथम पत्नी संयोगिताराजे की पुत्री उषाराजे के नाम से उषागंज रखा गया। इनका जन्म पेरिस में हुआ तथा किशोरावस्था तक ये फ्रांस में रहीं।
कृष्णपुरा : महाराजा यशवंतराव होलकर प्रथम की पत्नी कृष्णाबाई होलकर के समाधि स्थल के निर्माण के कारण यह क्षेत्र कृष्णपुरा के नाम से जाना जाता है। इन्हें केसरबाई के नाम से भी जाना जाता था।
महारानी रोड : महाराजा तुकोजीराव होलकर तृतीय की प्रथम पत्नी महारानी चंद्रावतीबाई के नाम पर यहां पर 1911 में महिला चिकित्सालय बना था। इस कारण इस रोड का नाम महारानी रोड रखा गया।
रानीपुरा : इंदौर का यह इलाका राव राजा राव जमीदार नंदलाल मंडलोई के जद में था। नजदीक ही जमीदार साहब के हाथी, हाथीपाला पर नहाया करते थे। दौलतगंज, निहालपुरा, नंदलालपुरा, तोड़ा, तेजकरणपूरा आदि नाम भी जमीदार परिवार से संबंधित है। यहां पर लखनऊ से आए मुस्लिम बुनकरों को बसाया गया। इसका उल्लेख तारीखे मालवा में भी मिलता है।
यशवंत निवास रोड : यशवंतराव होलकर द्वितीय के निवास के रूप में बनी इमारत के कारण यह मार्ग यशवंत निवास रोड कहलाया। हालांकि, यशवंतराव होलकर कभी इस इमारत में नहीं रहे। यह इमारत आज भी इस रोड पर स्टेट बैंक के पास मौजूद है।
मनोरमागंज : महाराजा तुकोजीराव होलकर तृतीय की प्रथम पत्नी महारानी चंद्रावतीबाई होलकर की पुत्री मनोरमा राजे के नाम से रखा गया। इनकी मृत्यु टीबी के कारण हुई। इन्हीं के नाम से इंदौर में टीबी हॉस्पिटल बना जो आज भी है।
नंदलालपुरा : होलकरों के आगमन के पूर्व इंदौर की जमींदारी नंदलाल जमींदार के हाथों में थी। इसी कारण यह इलाका नंदलालपुरा कहलाया।
यशवंत बाजार : छावनी के समीप की मुख्य सड़क यशवंत बाजार कहलाई, जो महाराज यशवंतराव होलकर द्वितीय के नाम पर रखी गई।
रानी सराय : रानी सराय का निर्माण सन् 1907 में किया गया। महाराजा शिवाजीराव होलकर की पत्नी

वाराणसीबाई होलकर के नाम से बनी थी। पहले इसे महारानी सराय कहते थे। बाद में रानी सराय नाम हुआ। वर्तमान में यहां पुलिस हेड क्वार्टर है।
किबे कम्पाउण्ड : दीवान सरदार अदी साहब किबे के नाम से किबे कंपाउंड रखा गया। कहावत थी कि होलकर का राज किबे का ब्याज। सरदार किबे ने कई बार होलकर स्टेट को वित्तीय सहायता प्रदान की थी।
शिव विलास पैलेस : शिव विलास पैलेस, न्यू पैलेस के नाम से मशहूर है। इसका निर्माण महाराजा शिवाजीराव होलकर ने सन् 1894 में लोकल इंजीनियरों को लेकर किया।
रामपुर कोठी : महाराजा हरिराव के समय से ही रामपुर नवाब होलकरों के घनिष्ठ मित्र थे। लालबाग की इमारत के पूर्व सारी महफिलें रामपुर कोठी में हुआ करती थी। यहीं नजदीक में महाराजा हरिराव होलकर द्वारा एक बावड़ी का निर्माण कराया गया था।
चित्र, शोध एवं जानकारी जफर अंसारी म्यूजियम ऑफ इंदौर
जलस्त्रोतों की उद्धारक : अहिल्याबाई
देश की प्रेरणास्पद नारी शक्तियों में अहिल्याबाई का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। यह नाम देश के उन तीर्थों के साथ विशेष रूप से जुड़ा हुआ है जो जन आस्था के केंद्र हैं। जगत्-जनार्दन की अर्चना के साथ ही जन-जन के लिए जलसेवा के निमित्त इस महामना का नाम लिया जाता है। एक कहावत सी लोक में है : जनार्दन ने अहिल्या की जल सेवा स्वीकार की।
सचमुच, एक प्रजानिष्ठ शासक होकर अहिल्याबाई ने जल सेवा के लिए जो संकल्प किया और जलस्रोतों के उद्धार सहित निर्माण के लिए संपदादान का जो पुण्यकार्य किया, उसने उनके पुण्य साम्राज्य की सीमाओं को बहुत बढ़ाया और चिरायु किया।
माहिष्मती में नर्मदा के घाट, जिनकी रचना तीर्थ पर शिव नामों के स्मरण के रूप में की गई है, उन महामना का सजीव स्वप्न है और देशवासियों के सम्मुख एक आदर्श है। गंगा वाला बनारस तो उनके संकल्प की फलश्रुति ही है। वे संकल्पों में शिव रही या शिव संकल्प की धनी रही, वैष्णव तीर्थ नाथद्वारा में भी उनका बनवाया कुंड है जो अहिल्या कुंड के नाम से ही जाना जाता है— वे जहां पधारी वहां वरुणदेव प्रसन्न हुए और उनके संकल्प की पूर्ति के लिए बारहों मास जलदायक रहे। (जल और भारतीय संस्कृति : श्रीकृष्ण ‘जुगनू’)
आज उनके अवतरण दिवस पर उनके संकल्प की सिद्धि याद आ रही है, कितने बरस पहले उन्होंने यह जान लिया था :
‘नहीं जलसेवा सम कछु काजा।
महत काज एहि सरब समाजा।’
इंदौर स्थित रानी अहिल्याबाई होलकर की छतरी। यह मराठा स्थापत्य कला की महत्वपूर्ण उदाहरण है।
(लेखक प्रख्यात भारतविद् एवं पुराविशेषज्ञ हैं)

