‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ से ‘भारतीयता में विश्वास’ तक

| Published on:

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दौर की एक खास बात यह भी है कि इसमें भारतीय भाषाओं,
सांस्कृतिक प्रतीकों, मूल्यों और परंपराओं को लेकर गर्व की भावना बहुत मजबूत रही है

     10 जून, 2026 का दिन स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक विशेष अवसर है। इस दिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जवाहरलाल नेहरू को पीछे छोड़ते हुए भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा करने वाले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री होने का रिकॉर्ड बनाया है। हालांकि, यह अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री श्री मोदी का यह कार्यकाल भारत के लिए भी एक निर्णायक दौर है, जो किसी अन्य रिकॉर्ड से अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है।

26 मई, 2014 से देश की राजनीति ने ‘भारतीयता’ की ओर एक निर्णायक मोड़ लिया, जिसकी वकालत महात्मा गांधी, सरदार पटेल, बाबासाहेब बी.आर. अंबेडकर, राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, के.एम. मुंशी और आधुनिक भारत के कई अन्य निर्माताओं ने की थी। इन लोगों ने अपनी विरासत एवं परंपराओं पर गर्व करने की बात कही थी, साथ ही हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति और सभ्यता को नये दृष्टिकोण से देखने की कल्पना की थी।

आर्थिक विकास के क्षेत्र में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने समावेशिता के साथ ‘राजाजी’ मॉडल को आगे बढ़ाया है। जैसाकि हम जानते हैं कि राजाजी नेहरूवादी अर्थव्यवस्था के ‘कमांड एंड कंट्रोल’ मॉडल के कड़े आलोचक थे, जिसके कारण ‘कोटा, परमिट और लाइसेंस राज’ का उदय हुआ था।

25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने समापन भाषण में डॉ. अंबेडकर के ऐतिहासिक और विद्वतापूर्ण बयान के बावजूद— जिसमें उन्होंने कहा था कि संसदीय लोकतंत्र के तत्व 2,500 साल पुरानी बौद्ध संस्थाओं में मिलते थे और उन बौद्ध संस्थाओं ने उस समय की प्रचलित राजनीतिक संस्थाओं से लोकतांत्रिक तौर-तरीके अपनाए होंगे— राजनीतिक चर्चाओं में हमारे छात्रों और कानूनविदों को यह विश्वास दिलाया गया कि हमारा लोकतंत्र पश्चिमी देशों की देन है।

श्री मोदी वैश्विक मंचों पर यह कहते रहे हैं कि भारत लोकतंत्र की जननी है और वे प्राचीन भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों और तौर-तरीकों का जिक्र करते हैं। दुनिया अब इस बात को समझ रही है कि भारत न केवल सबसे प्राचीन, बल्कि सबसे बड़ा और सबसे जीवंत लोकतंत्र भी है।

भारत के लगभग 100 करोड़ मतदाताओं की संख्या दुनिया के बाकी किसी भी हिस्से के लिए हैरान करने वाली बात है। दिलचस्प बात यह है कि मतदाताओं की यह संख्या स्वतंत्रता के समय भारत की कुल आबादी से लगभग तीन गुना अधिक है। मतदाताओं की संख्या के साथ-साथ चुनावी समीकरण भी और अधिक जटिल होते जा रहे हैं। 1951-52 के आम चुनाव में केवल 53 राजनीतिक पार्टियां थीं, जबकि 2024 के आम चुनाव में 744 पार्टियों ने हिस्सा लिया।

नेहरू के समय की तुलना में लोगों की उम्मीदें और आकांक्षाएं अधिक बढ़ गयी हैं। जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना और लोगों के साथ भरोसे का संबंध बनाए रखना श्री मोदी की एक बड़ी कामयाबी है; उनकी लोकप्रियता रेटिंग नेहरू की तुलना में लगातार ऊंची बनी हुई है, जबकि नेहरू को अपने कार्यकाल के दौरान अपनी साख और लोकप्रियता में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा था।

1950 और 1960 के दशक या फिर 1970 के दशक में भी दुनिया भर में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए कई नेताओं का कार्यकाल काफी लंबा रहा। 21वीं सदी में राजनीतिक नेताओं का कार्यकाल बहुत कम हो गया है। श्री मोदी इस वैश्विक चलन में अपवाद हैं।

यह सही कहा गया है कि कोई भी समाज तब तक सुदृढ़ और गौरवान्वित नहीं हो सकता जब तक उसमें आत्म-सम्मान की भावना न हो। सदियों से भारत सभ्यता और संस्कृति की उत्कृष्टता का एक शानदार उदाहरण रहा है। हालांकि, औपनिवेशिक शासकों द्वारा पैदा की गई हीन भावना स्वतंत्रता के बाद भी

भारत के लगभग 100 करोड़ मतदाताओं की संख्या दुनिया के बाकी किसी भी हिस्से के लिए हैरान करने वाली बात है। दिलचस्प बात यह है कि मतदाताओं की यह संख्या स्वतंत्रता के समय भारत की कुल आबादी से लगभग तीन गुना अधिक है। मतदाताओं की संख्या के साथ-साथ चुनावी समीकरण भी और अधिक जटिल होते जा रहे हैं। 1951-52 के आम चुनाव में केवल 53 राजनीतिक पार्टियां थीं, जबकि 2024 के आम चुनाव में 744 पार्टियों ने हिस्सा लिया

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में अंग्रेजी को सत्ता की भाषा के तौर पर बढ़ावा दिया गया। नेहरू के दौर और उसके ठीक बाद के समय में कुलीन वर्ग के बीच भारतीय वस्तुओं को लेकर शर्मिंदगी का भाव देखा गया। जो लोग भारतीय भाषाओं में बात करते, काम करते या अपनी बात रखते थे, उन्हें कमतर या हीन समझा जाता था। प्राचीन भारतीय परंपराओं पर आधारित सांस्कृतिक रीति-रिवाजों और प्रतीकों की उपेक्षा करके विदेशी धरती पर पनपी विचारधाराओं और प्रथाओं को प्राथमिकता दी गई

बनी रही। स्वतंत्रता के बाद भी कई औपनिवेशिक प्रथाएं जारी रहीं और यहां तक कि उन्हें बढ़ावा भी दिया गया; साथ ही, एक ऐसा कुलीन अल्पसंख्यक वर्ग बन गया जिसने थॉमस बैबिंगटन मैकाले के विचारों और आदर्शों को आगे बढ़ाया।

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में अंग्रेजी को सत्ता की भाषा के तौर पर बढ़ावा दिया गया। नेहरू के दौर और उसके ठीक बाद के समय में कुलीन वर्ग के बीच भारतीय वस्तुओं को लेकर शर्मिंदगी का भाव देखा गया। जो लोग भारतीय भाषाओं में बात करते, काम करते या अपनी बात रखते थे, उन्हें कमतर या हीन समझा जाता था। प्राचीन भारतीय परंपराओं पर आधारित सांस्कृतिक रीति-रिवाजों और प्रतीकों की उपेक्षा करके विदेशी धरती पर पनपी विचारधाराओं और प्रथाओं को प्राथमिकता दी गई। भारतीय परंपराओं के स्वाभाविक निरंतर विकास और विस्तार की कमी के कारण आत्मविश्वास और नई सोच की कमी पैदा हुई।

श्री मोदी ने भारतीय भाषाओं, प्रणालियों, प्रतीकों और मान्यताओं को मुख्यधारा में लाने का काम किया है। अब, लोगों में भारतीय होने और भारतीयता को जाहिर करने को लेकर गर्व की भावना दिखती है। मेरी कई देशों की यात्राओं के दौरान विदेशों में रहने वाले भारतीयों (डायस्पोरा) ने मेरे साथ गर्व की इसी नई भावना को साझा किया।

श्री मोदी ने मानसिक रूप से इस औपनिवेशिक सोच से आजाद होने के लिए अंग्रेजी भाषा के एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र द्वारा आयोजित कार्यक्रम को चुना। नवंबर, 2025 में हुए उस कार्यक्रम में उन्होंने भारत के लोगों से मैकाले की विरासत में रची-बसी औपनिवेशिक मानसिकता को छोड़ने के लिए 10 साल का राष्ट्रीय संकल्प लेने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत केवल एक उभरता हुआ बाजार नहीं है; बल्कि यह एक आत्मविश्वास से भरा एक नया मॉडल है।

स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशक और पिछले 12 वर्षों के बीच का अंतर एक बड़े बदलाव को दिखाता है। नेहरू के दौर में सांस्कृतिक और आर्थिक मान्यताओं को लेकर पश्चिम से मंजूरी और मदद पाने की चाहत स्पष्ट दिखायी देती थी। वहीं, श्री मोदी के दौर में मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था पर भरोसा दिखता है, जो दुनिया में होने वाली उथल-पुथल का भी सामना करने में सक्षम है।

श्री मोदी के दौर की एक खास बात यह भी है कि इसमें भारतीय भाषाओं, सांस्कृतिक प्रतीकों, मूल्यों और परंपराओं को लेकर गर्व की भावना बहुत मजबूत रही है।

हमारे ही परिवार के एक युवा लड़के ने, जो काफी समझदार है, एक ऐसी बात कही जिससे उसकी परिपक्वता और उसकी पीढ़ी की सोच का पता चलता है। उसने मुझसे कहा कि मैं नेहरू के भारत में बड़ा हुआ, जबकि वह मोदी के भारत में बड़ा हो रहा है। उस लड़के ने यह भी बताया कि इस वजह से उसकी पीढ़ी की स्थिति बेहतर है।