भविष्य की ऊर्जा प्रणालियों का निर्माण

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भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का लक्ष्य ‘ग्लोबल साउथ’ को सुरक्षित, मजबूत, निष्पक्ष और स्थाई वैश्विक ऊर्जा प्रदान करना है।

वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य तेज़ी से बदल रहा है। देश आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, साथ ही भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और जलवायु-संबंधी बाधाओं का सामना करने की क्षमता भी विकसित कर रहे हैं। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह चुनौती विशेष रूप से गंभीर है, जिससे सहयोग और नवाचार पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ठीक इसी संदर्भ में ब्रिक्स का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यह उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ काम करने, समाधान साझा करने और अधिक मज़बूत एवं टिकाऊ ऊर्जा भविष्य को आकार देने का अवसर प्रदान करता है।

भारत “लचीलेपन, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी का निर्माण” (Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability) थीम के तहत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की

भारत ने अपनी प्रमुख ‘सौभाग्य योजना’ के तहत रिकॉर्ड 2.86 करोड़ घरों तक बिजली पहुंचाकर सभी के लिए बिजली की सुविधा सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल की है। हर घर तक बिजली पहुंचने से प्रति व्यक्ति बिजली की खपत बढ़कर 1,450 यूनिट हो गई है, जो 2013-14 के स्तर से 52 प्रतिशत अधिक है। अनुमान है कि भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 2030 तक लगभग 2,000 यूनिट और 2047 तक लगभग 4,000 यूनिट हो जाएगी, जो बढ़ती खुशहाली और बेहतर जीवन स्तर को दर्शाता है

मेजबानी कर रहा है। ऊर्जा का क्षेत्र इस थीम को सबसे बेहतर ढंग से दिखाता है। ऊर्जा वह आधार है जिस पर देश की हर दूसरी महत्वाकांक्षा टिकी है — चाहे वह आर्थिक विकास हो, रोज़गार पैदा करना हो, शिक्षा, खेती या डिजिटल अर्थव्यवस्था हो। जब विभिन्न राष्ट्रों के ऊर्जा मंत्री और लगभग दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधि दिल्ली में इकट्ठा हुए, तो यह शिखर सम्मेलन की चर्चाओं और भविष्य की ऊर्जा प्रणालियों को आकार देने में भारत की भूमिका पर विचार करने का सही समय है।

इस ऊर्जा प्रणाली की रूपरेखा भारत के प्रधानमंत्री ने तब तैयार की थी जब उन्होंने कॉप—26 में 2070 तक नेट ज़ीरो बनने के भारत के संकल्प की घोषणा की थी। “सभी के लिए ऊर्जा” (Energy for All) वह ढांचा है जो ब्रिक्स देशों की साझा प्राथमिकताओं को दर्शाता है। इस ढांचे के मुख्य स्तंभ ये हैं:
• ऊर्जा तक पहुंच और समानता
• ऊर्जा सुरक्षा और सस्टेनेबिलिटी
• टेक्नोलॉजी और नवाचार
• ऊर्जा तक पहुंच

भारत ने अपनी प्रमुख ‘सौभाग्य योजना’ के तहत रिकॉर्ड 2.86 करोड़ घरों तक बिजली पहुंचाकर सभी के लिए बिजली की सुविधा सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल की है। हर घर तक बिजली पहुंचने से प्रति व्यक्ति बिजली की खपत बढ़कर 1,450 यूनिट हो गई है, जो 2013-14 के स्तर से 52 प्रतिशत अधिक है। अनुमान है कि भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 2030 तक लगभग 2,000 यूनिट और 2047 तक लगभग 4,000 यूनिट हो जाएगी, जो बढ़ती खुशहाली और बेहतर जीवन स्तर को दर्शाता है।

भारत ने पिछले 12 सालों में अपनी बिजली उत्पादन क्षमता को दोगुने से भी अधिक बढ़ाकर 540 गिगावॉट से अधिक कर लिया है। इस तेज़ी से हुई बढ़ोतरी की वजह से ही हम मौजूदा गर्मी के मौसम में 270.8 गिगावॉट की अब तक की सबसे ज़्यादा पीक डिमांड को पूरा कर पाए हैं।

खास बात यह है कि भारत ने नॉन-फॉसिल फ्यूल स्रोतों से अपनी इंस्टॉल्ड बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत का लक्ष्य पहले ही हासिल कर लिया है, जो उसके ‘नेशनली डिटरमिन्ड कंट्रीब्यूशन’ कमिटमेंट से पांच साल से भी पहले हुआ है। यह भारत की उस क्षमता को दिखाता है जिसके माध्यम से वह बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के साथ-साथ अपने क्लाइमेट लक्ष्यों को हासिल करने की राह पर भी मजबूती से आगे बढ़ रहा है। इस मजबूत आधार पर आगे बढ़ते हुए भारत अब अपने ऊर्जा बदलाव के अगले चरण की तैयारी कर रहा है। अनुमान है कि 2035-36 तक बिजली की पीक डिमांड लगभग 459 गिगावॉट तक पहुंच जाएगी, जिसके लिए लगभग 1,121 गिगावॉट की इंस्टॉल्ड क्षमता की आवश्यकता होगी। इस विस्तार में मुख्य रूप से रिन्यूएबल एनर्जी, खासकर सोलर और विंड एनर्जी की बड़ी भूमिका होगी। अब डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को अपनी ‘कोइन्सिडेंट पीक ऑब्लिगेशन्स’ के हिसाब से लंबी अवधि की योजना बनानी होगी और उसे हासिल करना होगा। यह भारत के पावर सेक्टर में एक अहम बदलाव है, जो हमारे बिजली सिस्टम की बढ़ती परिपक्वता, आधुनिकता और मजबूती को दर्शाता है।

मौजूदा जियोपॉलिटिक्स (भू-राजनीति) के कारण एनर्जी सिक्योरिटी (ऊर्जा सुरक्षा) का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। भारत बिजली पर केंद्रित एक विविध एनर्जी बास्केट बनाने का प्रयास कर रहा है। कोयले का अच्छा भंडार होने के कारण हमने पहले ही थर्मल पावर प्लांट में आयातित कोयले की ब्लेंडिंग (मिश्रण) कम कर दी है और आयातित कोयले पर चलने वाले प्लांट में घरेलू कोयले की ब्लेंडिंग की संभावना तलाश रहे हैं। बढ़ती औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कोयला गैसीफिकेशन एक और प्राथमिकता वाला क्षेत्र है। इसी के तहत ‘नेशनल कोल गैसीफिकेशन मिशन’ शुरू किया गया है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 100 मिलियन टन का उत्पादन करना है। ग्रीन हाइड्रोजन और उससे बनने वाले उत्पाद भी वैकल्पिक ईंधन के तौर पर उभर

भारत बिजली पर केंद्रित एक विविध एनर्जी बास्केट बनाने का प्रयास कर रहा है। कोयले का अच्छा भंडार होने के कारण हमने पहले ही थर्मल पावर प्लांट में आयातित कोयले की ब्लेंडिंग (मिश्रण) कम कर दी है और आयातित कोयले पर चलने वाले प्लांट में घरेलू कोयले की ब्लेंडिंग की संभावना तलाश रहे हैं। बढ़ती औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कोयला गैसीफिकेशन एक और प्राथमिकता वाला क्षेत्र है। इसी के तहत ‘नेशनल कोल गैसीफिकेशन मिशन’ शुरू किया गया है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 100 मिलियन टन का उत्पादन करना है। ग्रीन हाइड्रोजन और उससे बनने वाले उत्पाद भी वैकल्पिक ईंधन के तौर पर उभर रहे हैं – न केवल घरेलू आवश्यकताओं के लिए, बल्कि निर्यात के एक बड़े साधन के तौर पर भी। सरकार तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है

रहे हैं – न केवल घरेलू आवश्यकताओं के लिए, बल्कि निर्यात के एक बड़े साधन के तौर पर भी।
सरकार तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा दे रही है।

सौर ऊर्जा हमारे रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) ट्रांज़िशन का मुख्य आधार है। हमारी सौर ऊर्जा क्षमता, जो अभी 157 गिगावॉट है, 2014-15 की तुलना में 54 गुना बढ़ गई है और अगले दशक में इसके 500 गिगावॉट से अधिक होने का अनुमान है। सौर ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है।

रिन्यूएबल एनर्जी (नवीकरणीय ऊर्जा) के इस बड़े विस्तार में ट्रांसमिशन सेक्टर एक ऐसा हीरो है जिसकी चर्चा कम ही होती है। पिछले दशक में ट्रांसमिशन नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े सिंक्रोनाइज़्ड ग्रिड में से एक बन गया है, जो कम-कार्बन वाले बदलाव के लिए आवश्यक क्षमता और लचीलापन देता है।

टेक्नोलॉजी और इनोवेशन

डिजिटल इनोवेशन भविष्य के पावर सिस्टम को तेज़ी से आकार दे रहा है। स्मार्ट मीटर लगाने का काम तेज़ी से चल रहा है; अब तक 6 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं, जिससे ग्रिड स्मार्ट हो गया है और समय या उपयोग के आधार पर दरें तय करना मुमकिन हो गया है।

भविष्य के इंटेलिजेंट और कनेक्टेड सिस्टम उतनी ही वैल्यू पैदा करेंगे जितनी आज फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर करता है। अब हर ग्राहक के पास प्रोड्यूसर बनने का मौका है।

पीएम सूर्य घर योजना पहले ही 40 लाख घरों में इंस्टॉलेशन के साथ अपनी जगह बना रही है और यह पीयर-टू-पीयर एनर्जी ट्रांज़ेक्शन का रास्ता खोलेगी।

इंडिया एनर्जी स्टैक इस बदलाव को आसान बनाने के लिए भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। पावर सेक्टर के लिए यूपीआई जैसा क्रांतिकारी दौर आने वाला है।

कंज्यूमर-सेंट्रिक एनर्जी सिस्टम की ओर इस बदलाव का अगला चरण विकेंद्रीकरण है। डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर में सुधार के संकेत दिखने लगे हैं; एटीएंडसी नुकसान घटकर 15 प्रतिशत हो गया है और यूटिलिटी कंपनियां पहली बार पेट पॉजिटिव हुई हैं।

भारत का हमेशा से यह मानना रहा है कि मजबूत एनर्जी सिस्टम न केवल मजबूत घरेलू नीतियों से, बल्कि मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों से भी बनते हैं।

ब्रिक्स की असली ताकत एक-दूसरे की खूबियों और आवश्यकताओं को पूरा करने में है। ब्रिक्स के किसी एक देश के पास हर समस्या का समाधान नहीं है, लेकिन साथ मिलकर हमारे पास सुरक्षित, मजबूत और टिकाऊ एनर्जी सिस्टम बनाने के लिए ज़रूरी लगभग हर वस्तु उपलब्ध है।

इस साल ब्रिक्स की अगुवाई करते हुए हमारी कोशिश है कि इस साझा सोच को ठोस नतीजों में बदला जाए और एक टिकाऊ दुनिया का निर्माण किया जाए।