‘विकसित भारत’ का मार्ग प्रशस्त करते डॉ. मुखर्जी के आदर्श

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      भारत ने 23 जून को जब ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाया और डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी की 125वीं जयंती का उत्सव मना रहा है, तो हम अपने सबसे गौरवशाली सपूतों में से एक डॉ. मुकर्जी को केवल एक राजनीतिक आंदोलन के संस्थापक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ऐसे दूरदर्शी राष्ट्र-निर्माता के रूप में भी याद करते हैं, जिनके आदर्श आज भी ‘विकसित भारत’ के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। एक प्रख्यात विद्वान, शिक्षाविद, राजनेता और राष्ट्रभक्त के रूप में डॉ. मुकर्जी ने अपना संपूर्ण जीवन मां भारती की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक गौरव और सिद्धांतनिष्ठ सार्वजनिक जीवन की ऐसी अमिट विरासत छोड़ी, जो आज भी देशवासियों को प्रेरित करती

जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष संवैधानिक प्रावधानों का डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी द्वारा किया गया दृढ़ विरोध उनके सार्वजनिक जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। उनका ऐतिहासिक नारा— ‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे’— एक संविधान, एक ध्वज और एक संप्रभु भारत के प्रति उनके अटूट विश्वास का प्रतीक है। वर्ष 1953 में उनके सर्वोच्च बलिदान ने उन्हें राष्ट्रीय संकल्प और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया

है। 6 जुलाई, 1901 को कलकत्ता में जन्मे डॉ. मुकर्जी ने कम आयु से ही असाधारण शैक्षणिक प्रतिभा का परिचय दिया। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने, जहां उन्होंने शैक्षणिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के साथ-साथ भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन पर विशेष बल दिया। स्वतंत्र भारत के प्रथम उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उन्होंने देश के औद्योगिक विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता की सुदृढ़ नींव रखी।

जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी ने वर्ष 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया, तब उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक पद से बढ़कर राष्ट्रहित और राष्ट्रीय कर्तव्य सर्वोपरि हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि देश की एकता, अस्मिता और सुरक्षा से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जा सकता। यही अडिग राष्ट्रवादी सोच उन्हें भारत के महान राष्ट्रनायकों में अग्रणी स्थान दिलाती है। डॉ. मुकर्जी का यह विचार कि सार्वजनिक जीवन पदों और सत्ता के बजाय सिद्धांतों एवं मूल्यों से संचालित होना चाहिए, आज भी असंख्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं और जनसेवकों को प्रेरित करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और सुशासन पर आधारित एक सशक्त राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता को समझते हुए डॉ. मुकर्जी ने वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। उन्होंने जिन वैचारिक मूल्यों और सिद्धांतों की नींव रखी, वही आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ है।

जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष संवैधानिक प्रावधानों का डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी द्वारा किया गया दृढ़ विरोध उनके सार्वजनिक जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। उनका ऐतिहासिक नारा— ‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे’— एक संविधान, एक ध्वज और एक संप्रभु भारत के प्रति उनके अटूट विश्वास का प्रतीक है। वर्ष 1953 में उनके सर्वोच्च बलिदान ने उन्हें राष्ट्रीय संकल्प और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया। उनका जीवन साहस, त्याग, ईमानदारी और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है। एकजुट, सशक्त, आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी भारत का उनका स्वप्न आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ‘विकसित भारत’ के संकल्प को प्रेरणा प्रदान करता हुआ दिखाई देता है। उनकी ही प्रेरणा से प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त कर जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ पूर्ण संवैधानिक एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया गया। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लागू किया गया, नई शिक्षा नीति प्रस्तुत की गई, सिंदरी उर्वरक संयंत्र जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं को पुनः प्रारंभ किया गया तथा ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र को शासन की दिशा के रूप में स्थापित किया गया।

साथ ही, देश में 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ पर अनेक कार्यक्रम आयोजित हुए। यह दिन भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक की याद दिलाता है, जब वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा की गई। उस दौर की स्मृतियां आज भी देश की सामूहिक चेतना में अंकित हैं।

इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया, प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया और बिना किसी मुकदमे के हजारों विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों तथा पत्रकारों को जेल में डाल दिया। यही नहीं, संविधान की मूल भावना को भी कमजोर करने वाले अनेक कदम उठाए गए। लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रहार किए गए, असहमति को अपराध की तरह देखा गया और जनता की आवाज को कठोरता से दबा दिया गया।

भारतीय जनसंघ और लोकतंत्र के अनगिनत रक्षकों के लिए आपातकाल केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि संविधान और भारत की लोकतांत्रिक आत्मा की रक्षा का अभियान था। हजारों समर्पित कार्यकर्ताओं ने उत्पीड़न और कारावास का सामना किया, किंतु स्वतंत्रता, लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से कभी पीछे नहीं हटे। ‘संविधान हत्या दिवस’ उन सभी लोकतंत्र सेनानियों के बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर है। साथ ही, यह लोकतंत्र, संवैधानिक शासन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा इस मूल सिद्धांत के प्रति भारतीय जनता पार्टी की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है कि कोई भी सरकार संविधान और जनता की सर्वोच्च इच्छा से ऊपर नहीं हो सकती।

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