आपातकाल लागू हुए पचास साल हो चुके हैं और देश आज भी उस दौर पर विचार कर रहा है जिसे भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक माना जाता है। ‘संविधान हत्या दिवस: लोकतंत्र अमर रहे’ के राष्ट्रीय आयोजन के समापन समारोह का उद्देश्य केवल इतिहास को याद करना नहीं है, बल्कि उन स्थायी मूल्यों पर चिंतन करना भी है जो हमारे गणतंत्र को बनाए रखते हैं।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने एक बार कहा था: “संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज़ नहीं है; यह जीवन का एक माध्यम है और इसकी भावना हमेशा उस दौर की भावना होती है।”
बहुत कम बातें हमारे संवैधानिक यात्रा के सार को इन शब्दों से अधिक प्रभावशाली ढंग से बयां करती हैं। संविधान केवल एक कानूनी ढांचा नहीं है जो राज्य के कामकाज को नियंत्रित करता है। यह नागरिकों और संस्थाओं, अधिकारों और ज़िम्मेदारियों तथा आजादी और जवाबदेही के बीच एक जीवंत समझौता है।
लोकतंत्र को बचाए रखना अवश्यक है
भारत की लोकतांत्रिक भावना हमारी सभ्यता की परंपराओं में गहराई से बसी है। सदियों से हमारे समाज ने सलाह-मशविरे, सामूहिक विचार-विमर्श और जन-भागीदारी वाली संस्थाओं को बढ़ावा दिया है। यह याद रखना आवश्यक है कि भारत को लोकतंत्र विरासत में नहीं मिला; उसने इसे खुद विकसित किया है। प्राचीन सभाओं और समितियों से लेकर आज़ादी के बाद की संसदीय प्रणाली तक हमने हमेशा लोगों की सामूहिक इच्छा में विश्वास किया है।
संविधान ने इन परंपराओं को एक आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे में बदल दिया, साथ ही उन मूल्यों को भी बचाए रखा जिन्होंने पीढ़ियों से इन्हें बनाए रखा था। संविधान की प्रस्तावना हमारी संवैधानिक दिशा-सूचक है— न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व।
ये केवल संवैधानिक आदर्श नहीं हैं। ये राष्ट्रीय आकांक्षाएं हैं। ये सार्वजनिक नीति का मार्गदर्शन करती हैं, संस्थाओं को आकार देती हैं और राज्य तथा नागरिक के बीच के रिश्ते को तय करती हैं। साथ ही, इतिहास हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र को कभी भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।
1975-77 का आपातकाल आज़ाद भारत के सामने आई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था। इसने दिखाया कि जब संवैधानिक सुरक्षा-उपाय कमज़ोर पड़ जाते हैं और लोगों की आज़ादी पर रोक लगाई जाती है, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कितना दबाव पड़ सकता है। उस दौर का असर केवल राजनीतिक जीवन तक ही सीमित नहीं था। इसने देश भर के नागरिकों के रोज़मर्रा के जीवन को भी प्रभावित किया।
इसकी भारी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी। ये अनुभव हमें याद दिलाते हैं कि संवैधानिक अधिकार केवल कागज़ी कानूनी सिद्धांत नहीं हैं; ये ऐसे सुरक्षा-कवच हैं जो सीधे तौर पर नागरिकों की गरिमा, आज़ादी और रोज़मर्रा के जीवन को आकार देते हैं। जब इन अधिकारों में कटौती की जाती है, तो केवल संस्थाओं को ही नुकसान नहीं पहुंचता, बल्कि आम लोगों, परिवारों और समुदायों की आज़ादी और आकांक्षाएं सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। फिर भी, उस दौर से हमें जो सबसे बड़ी सीख मिलती है, वह है लोकतंत्र की मजबूती और मुश्किलों से उबरने की क्षमता।
भारत के लोगों ने संवैधानिक तरीकों में असाधारण भरोसा दिखाया। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं ने आखिरकार लोकतांत्रिक कमियों को ठीक किया। शांतिपूर्ण भागीदारी और वोटिंग के माध्यम से नागरिकों ने इस सिद्धांत को फिर से साबित किया कि सत्ता जनता के हाथ में होती है। यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है— सीखने, ढलने, खुद को सुधारने और मुश्किल समय से और मज़बूत होकर उभरने की इसकी क्षमता।
इस अवसर पर एक खास प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे मुश्किल दौर में से एक की एक विज़ुअल यात्रा की तरह है, जिसमें पुराने रिकॉर्ड, विरोध की कहानियां, संवैधानिक पड़ाव और आपातकाल के दौरान लोगों के अनुभव दिखाए गए हैं।
इस मौके का एक और अहम हिस्सा पद्म भूषण से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार और लेखक श्री राम बहादुर राय का एक खास मेमोरियल लेक्चर है— जो संवैधानिक सतर्कता और लोकतांत्रिक सुधार के बड़े विषय को आज के समय के हिसाब से प्रासंगिक बनाता है।
आज के समय में आज़ादी के लगभग आठ दशक बाद भी लोकतंत्र का मतलब लगातार बदल रहा है। नागरिक अब केवल प्रतिनिधित्व ही नहीं, बल्कि भागीदारी भी चाहते हैं; केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन भी चाहते हैं। वित्तीय समावेश, ज़मीनी स्तर पर भागीदारी और नागरिक-केंद्रित शासन को बढ़ावा देने वाली पहलों ने लोकतंत्र की पहुंच को बढ़ाया है।
साथ ही, नागरिकता की ज़िम्मेदारी और भी अहम हो गई है। एक मजबूत लोकतंत्र जागरूक नागरिकों पर निर्भर करता है। आज, जब दुनिया भारत की ओर देखती है और उसे ‘लोकतंत्र की जननी’ कहती है, तो यह हमारी लंबी सभ्यतागत यात्रा की पहचान है— प्राचीन राजाओं के धर्म से लेकर आधुनिक वोटरों की इच्छा तक।
आज़ादी के जीवंत नायक
यह समापन समारोह कार्यक्रम लोकतंत्र की उस व्यापक समझ को दिखाता हैं, जिसके तहत लोकतंत्र एक जीवंत और लगातार विकसित होने वाले राष्ट्रीय अनुभव बन जाता है।
डिजिटल डिस्ट्रिक्ट रिपॉजिटरी पर लगी प्रदर्शनी— जो 2021 में ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ के तहत शुरू की गई एक अनूठी पहल है— का मकसद देश के हर कोने से त्याग, साहस और जन-भागीदारी की उन सैकड़ों कहानियों को सामने लाना है जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
संस्कृति मंत्रालय ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी इन कम ज्ञात कहानियों पर दस लघु फिल्में भी बनाई हैं। ये सभी पहलें हमें याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र तब और मजबूत होता है जब संवैधानिक मूल्यों को सांस्कृतिक यादों, ऐतिहासिक जागरूकता और राष्ट्र के प्रति गहरे अपनत्व की भावना से बल मिलता है। अब तक, डीडीआर की समर्पित वेबसाइट पर 19,500 से अधिक कहानियां उपलब्ध हैं।
डीडीआर पहल में योगदान देने वाले संस्थानों और विभागों में संस्कृति मंत्रालय के तहत आने वाले एक स्वायत्त संगठन ‘सेंटर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज़ एंड ट्रेनिंग’ ने अहम भूमिका निभाई है। इसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन अनछुए पहलुओं को उजागर करने वाली बड़ी संख्या में कहानियों को संकलित और व्यवस्थित किया है।
संस्कृति मंत्रालय ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी इन कम ज्ञात कहानियों पर दस लघु फिल्में भी बनाई हैं। ये सभी पहलें हमें याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र तब और मजबूत होता है जब संवैधानिक मूल्यों को सांस्कृतिक यादों, ऐतिहासिक जागरूकता और राष्ट्र के प्रति गहरे अपनत्व की भावना से बल मिलता है। अब तक, डीडीआर की समर्पित वेबसाइट पर 19,500 से अधिक कहानियां उपलब्ध हैं
इस मौके पर हमारे साथ दो ऐसे जीवित स्वतंत्रता सेनानी मौजूद हैं जो साहस, त्याग और सेवा की जीती-जागती मिसाल हैं:
महाराष्ट्र के श्री शेषराव लक्ष्मणराव खोट, जो एक युवा छात्र के तौर पर हैदराबाद मुक्ति आंदोलन में शामिल हुए थे।
आंध्र प्रदेश के श्री एड्डुला सूर्यनारायण रेड्डी, जिन्होंने बचपन में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना करना शुरू कर दिया था और ग्यारह साल की उम्र में पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था।
उनकी मौजूदगी हमें याद दिलाती है कि आजादी कोई पिछली बात या बीता हुआ इतिहास नहीं, बल्कि एक जीवित स्मृति है।
विरासत और सांस्कृतिक निरंतरता
यह ‘विरासत’ का तीसरा संस्करण है, जो उन सांस्कृतिक परंपराओं, कलात्मक अभिव्यक्तियों और साझा विरासत का जश्न मनाता है, जिन्होंने पीढ़ियों के बीच संवाद, विविधता और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा दिया है। यह स्वतंत्रता सेनानी, सांस्कृतिक दूरदर्शी और संस्था निर्माता कमलादेवी चट्टोपाध्याय की स्मृति को सम्मान देता है।
शास्त्रीय प्रस्तुतियां उन संगीत परंपराओं पर आधारित हैं जो पीढ़ियों, क्षेत्रों और विचारधाराओं के बीच सदियों के संवाद से विकसित हुई हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत स्वयं निरंतरता, विविधता, अनुशासन और रचनात्मक स्वतंत्रता के मूल्यों का प्रमाण है— ऐसे मूल्य जो एक जीवंत लोकतंत्र के लिए भी उतने ही आवश्यक हैं।
‘लोकनाद – जनजातीय समरसता का स्वर संगम’ प्रस्तुति असम और पूर्वोत्तर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं का जश्न मनाती है। विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाली संगीत और नृत्य परंपराओं के माध्यम से यह हमारे गणतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों में से एक— ‘विविधता में एकता’— के विचार को खूबसूरती से प्रदर्शित करती है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत की ताकत कई तरह की पहचानों को समाहित करने की उसकी क्षमता में निहित है।
विशेष रूप से महत्वपूर्ण है सीसीआरटी विद्वानों की विशेष विषय-आधारित प्रस्तुति, ‘खामोशी से आवाज़ तक, अंधेरे से भोर तक’ । भारतीय शास्त्रीय संगीत की भाषा के माध्यम से यह डर और दमन से साहस, नवीनीकरण और लोकतांत्रिक पुनरुत्थान तक की यात्रा को दर्शाती है।
इस आयोजन के सिलसिले में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि ‘महर्षि दयानंद सरस्वती कला गुरुकुल और कलाग्राम’ की आधारशिला रखना है। इसे एक ऐसे केंद्र के तौर पर डिज़ाइन किया गया है जहां भारत की कलात्मक विरासत का अध्ययन और अभ्यास किया जा सके। यह गुरुकुल प्रणाली की प्राचीन परंपरा से प्रेरित है।
जिस तरह लोकतांत्रिक मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए, उसी तरह सांस्कृतिक परंपराओं को भी ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता होती है जो उन्हें बनाए रखें और उनका नवीनीकरण करें। इसी सिद्धांत के अनुरूप, ‘सेवा पर्व’ यह दिखाता है कि सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का लोगों की चेतना और नागरिक बोध पर आज भी गहरा प्रभाव है।

