बाबासाहेब भीमराव रामजी अंबेडकर का भारत के संवैधानिक ढांचे एवं सामाजिक न्याय के विमर्श में बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन बहुत लंबे समय तक उनके नाम तथा कार्यों को हाशिये पर धकेल दिया गया। कांग्रेस की सरकारों ने समानता एवं समावेशन के उन सिद्धांतों पर बहुत कम ध्यान दिया, जिनका डॉ. अंबेडकर समर्थन करते थे। वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें देशभर में उचित स्थान प्रदान करने के लिए हर संभव प्रयास किया है और पार्टी ने यह भी सुनिश्चित किया कि सामाजिक न्याय पर उनके विचार राष्ट्र की नीतियों का मार्गदर्शन करते रहें।
डॉ. अंबेडकर के प्रति कांग्रेस पार्टी की उपेक्षा उसकी नियति का परिणाम है। कांग्रेस ने डॉ. अंबेडकर को संविधान सभा में प्रवेश नहीं करने दिया और उन्हें रोकने का हरसंभव प्रयास किया, यह दर्शाता है कि कांग्रेस ने डॉ. अंबेडकर की बुद्धिमत्ता एवं सामाजिक स्थिति को अपने राजनीतिक गणित के लिए उचित नहीं माना था। यह उपेक्षा स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही। बंगाल के बरिसाल एवं फरीदपुर जैसे क्षेत्रों ने डॉ. अंबेडकर के संविधान सभा में प्रवेश का समर्थन किया था, जिन्हें बाद में इन क्षेत्रों को पाकिस्तान में जाने दिया गया – यह एक ऐसा कदम था जिसने चुनावी लाभ के लिए दलित आबादी वाले क्षेत्रों की उपेक्षा करने वाले कांग्रेसी चरित्र को लोगों के सामने ला दिया था।
कांग्रेस ने बार-बार डॉ. अंबेडकर को चुनावी राजनीति से बाहर करने के लिए रणनीतिक गठबंधन किए। 1952 के लोकसभा चुनावों में भी ऐसा ही देखने को मिला, जब एस.के. पाटिल सहित कांग्रेस के अन्य नेताओं ने नेहरू के निर्देश पर डॉ. अंबेडकर को हराने के लिए कम्युनिस्टों के साथ हाथ मिला लिया। 1954 में एक बार फिर यह दुश्मनी उजागर हुई, जब पार्टी ने भंडारा उपचुनाव में उन्हें हराने के लिए उसी उम्मीदवार को मैदान में उतारा। यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू ने भी उनके खिलाफ व्यक्तिगत
डॉ. अंबेडकर का नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में कार्यकाल भी उनके प्रति कांग्रेस की उपेक्षा को दर्शाता है। अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले भारतीय होने के बावजूद उन्हें जानबूझकर आर्थिक नीति, रक्षा एवं विदेश मामलों पर प्रमुख निर्णय लेने वाली समितियों से बाहर रखा गया। डॉ. अंबेडकर का इस्तीफा कांग्रेस नेतृत्व की जातिगत समस्याओं से लड़ने की अनिच्छा एवं हिंदू कोड बिल जैसे मजबूत सुधारों के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता की कमी का एक सशक्त उदाहरण था
रूप से प्रचार किया, जो इस बात का उदाहरण था कि कांग्रेस अपने वर्चस्व को मिलने वाली किसी भी चुनौती को खत्म करने के लिए दृढ़ संकल्प थी— खासकर डॉ. अंबेडकर जैसी क्षमता वाले विचारक से मिल रही चुनौती तो उनके लिए बेहद घातक सिद्ध हो सकती थी।
डॉ. अंबेडकर का नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री के रूप में कार्यकाल भी उनके प्रति कांग्रेस की उपेक्षा को दर्शाता है। अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले भारतीय होने के बावजूद उन्हें जानबूझकर आर्थिक नीति, रक्षा एवं विदेश मामलों पर प्रमुख निर्णय लेने वाली समितियों से बाहर रखा गया। डॉ. अंबेडकर का इस्तीफा कांग्रेस नेतृत्व की जातिगत समस्याओं से लड़ने की अनिच्छा एवं हिंदू कोड बिल जैसे मजबूत सुधारों के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता की कमी का एक सशक्त उदाहरण था।
इससे भी बदतर यह है कि कांग्रेस ने उनके इस्तीफे को संगृहीत करना भी उचित नहीं समझा, क्योंकि पार्टी डॉ. अंबेडकर और उनकी असहमति को आधिकारिक रिकॉर्ड में भी स्थान नहीं देना चाहती थी।
डॉ. अंबेडकर के महान योगदान के प्रति कांग्रेस की उपेक्षा उनके जीवन के साथ ही समाप्त नहीं हुई। दिसंबर, 1956 में उनके महापरिनिर्वाण के बाद तत्कालीन सरकार ने दिल्ली में उनके अंतिम संस्कार की अनुमति देने से इनकार कर दिया, जो हाशिए पर पड़े समुदायों के बीच उनकी लोकप्रियता को लेकर कांग्रेस की असुरक्षाओं को दर्शाता है। उनके परिवार को बुनियादी शिष्टाचार से वंचित रखा गया, उन्हें बिना किसी आधिकारिक सहायता के उनके पार्थिव शरीर को मुंबई ले जाने के लिए मजबूर किया गया। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि इस यात्रा के लिए राज्य विमान आवंटित करने से इनकार कर दिया गया और डॉ. अंबेडकर की शोकाकुल पत्नी को इस उड़ान की लागत का भुगतान तक करना पड़ा।
इसके बाद के दशकों में कांग्रेस ने नेहरू-गांधी परिवार को भरपूर याद किया, लेकिन डॉ. अंबेडकर को सम्मानित करने के आह्वान को बार-बार नजरअंदाज किया। कांग्रेस की सरकारों में उनकी स्मृति को समर्पित स्मारक, सिर्फ एक स्थल बनकर रह गए। 1990 में भाजपा समर्थित गैर-कांग्रेसी सरकार के तहत ही डॉ. अंबेडकर को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया— एक ऐसा सम्मान जिसे कांग्रेस ने लगातार रोके रखा।
भाजपा ने भारत के संवैधानिक मूल्यों को आकार देने में डॉ. अंबेडकर की परिवर्तनकारी भूमिका को मान्यता देते हुए उनकी सही विरासत को पुनः स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की ‘पंचतीर्थ’ पहल अपने आप में उल्लेखनीय है: यह डॉ. अंबेडकर के जीवन एवं शिक्षा से जुड़े पांच स्थल है— महू में उनका जन्मस्थान, लंदन में उनकी पढ़ाई का स्थान, नागपुर में उनका बौद्ध धर्म में धर्मांतरण, दिल्ली में महापरिनिर्वाण स्थल और मुंबई में चैत्य भूमि। इन जगहों को राष्ट्रीय स्मारक बनाकर, भाजपा ने भारत की वास्तविक सामाजिक न्याय की यात्रा में एक मार्गदर्शक के रूप में डॉ. अंबेडकर के स्थान को रेखांकित किया है।
यह परियोजनाएं महज एक प्रतीकात्मकता कदम से कहीं अधिक समानता एवं समावेश के उनके सपने को साकार करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। डॉ. अंबेडकर की विरासत को सम्मान देने के लिए बनाया गया ‘भीम ऐप’ प्रौद्योगिकी के जरिए वित्तीय समावेशन पर भाजपा के जोर को दर्शाता है। इसी तरह स्टैंड-अप इंडिया एवं मुद्रा जैसी योजनाएं डॉ. अंबेडकर की उस अर्थव्यवस्था के सपने को प्रतिध्वनित करती हैं, जो वंचितों के सशक्तीकरण को प्राथमिकता देती है। दिल्ली में डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर की स्थापना एवं उनके लंदन निवास का संरक्षण, भविष्य की पीढ़ियों के लिए उनकी अंतर्दृष्टि को सुलभ बनाए रखने के लिए भाजपा के समर्पण का प्रमाण हैं।
डॉ. अंबेडकर के भाषणों एवं लेखों में कांग्रेस के दोहरे चरित्र के प्रति बाबासाहेब की गहरी हताशा का एक स्पष्ट संदेश मिलता है। एक ओर जहां उन्होंने पार्टी में जड़ जमाए चाटुकारों को खत्म करने की अनिच्छा को इंगित किया, वहीं कांग्रेस नेताओं पर दलितों के हित के लिए केवल दिखावा करने और उनके उत्पीड़न को चुनौती देने के लिए कुछ नहीं करने का आरोप भी लगाया। उनकी आलोचनाएं,
डॉ. अंबेडकर को उनका उचित स्थान प्रदान कर, भाजपा ने एक ऐतिहासिक गलती को सुधारा है। उनके योगदान को केवल प्रतिमाओं और प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि तक सीमित रखने के बजाय पार्टी ने उनके जीवन को भारत के शासन के ताने-बाने में पिरोया है, उनके सिद्धांतों को स्पष्ट से रखा है— चाहे वह वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने की बात हो या सामाजिक पूर्वाग्रहों को चुनौती देने की – जो महज बयानबाजी से कहीं अधिक गहरी प्रतिबद्धता को दिखाती है
जिन्हें अक्सर व्यक्तिगत शिकायतों के रूप में खारिज कर दिया जाता है, इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक अभिजात्य वर्ग देश में हाशिए पर पड़े समुदायों के साथ सत्ता साझा करने के लिए अनिच्छुक रहे हैं।
यह वैचारिक दरार आज भी कायम है। कांग्रेस कभी-कभार डॉ. अंबेडकर का नाम लेती है, लेकिन यह वास्तविक इरादे से इतर एक अवसरवादी इशारा लगता है। इसके विपरीत, भाजपा ने डॉ. अंबेडकर के मूल्यों को सत्ता के ढांचे में एकीकृत करने का एक सुसंगत मार्ग अपनाया है, विकास योजनाओं को उनके द्वारा समर्थित सामाजिक एवं आर्थिक समावेशन के सिद्धांतों के साथ जोड़ा है।
शायद डॉ. अंबेडकर के विचारों की पुन: स्थापना का सबसे बड़ा प्रमाण भाजपा के नेतृत्व में हुए मूर्त परिवर्तन में निहित है। जहां कांग्रेस प्रतीकात्मक दिखावे से आगे बढ़ने में विफल रही, वहीं भाजपा ने सामाजिक न्याय एवं हाशिए पर पड़े लोगों के आर्थिक सशक्तीकरण के उनके आदर्शों को नीति-निर्माण के केंद्र में रखा है, जिससे वैचारिक, क्षेत्रीय एवं सामाजिक विभाजन को पाटा जा सके।
डॉ. अंबेडकर को उनका उचित स्थान प्रदान कर, भाजपा ने एक ऐतिहासिक गलती को सुधारा है। उनके योगदान को केवल प्रतिमाओं और प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि तक सीमित रखने के बजाय पार्टी ने उनके जीवन को भारत के शासन के ताने-बाने में पिरोया है, उनके सिद्धांतों को स्पष्ट से रखा है— चाहे वह वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने की बात हो या सामाजिक पूर्वाग्रहों को चुनौती देने की – जो महज बयानबाजी से कहीं अधिक गहरी प्रतिबद्धता को दिखाती है।
अंत में डॉ. अंबेडकर की कहानी व्यक्तिगत उपलब्धियों के रिकॉर्ड से कहीं अधिक है। यह एक ऐसे राष्ट्र के लिए नैतिक दिशा-निर्देश है जो अभी भी सामाजिक असमानताओं से जूझ रहा है। उनका जीवन और न्याय के लिए संघर्ष अनगिनत भारतीयों को प्रेरित करते आये हैं और भाजपा की पहलों ने इसको लेकर एक स्पष्ट आह्वान किया है। डॉ. अंबेडकर की भावनाओं को साथ लिए बिना कोई भी भारत के संविधान या समानता की खोज के बारे में बात नहीं कर सकता। कर्तव्यनिष्ठ नीतियों एवं अटूट संकल्प के माध्यम से भाजपा उनके दृष्टिकोण की सबसे सच्ची संरक्षक है, यह सुनिश्चित करते हुए कि उनकी विरासत राष्ट्र को आगे बढ़ाने वाली एक जीवंत शक्ति बनी रहे।
(लेखक भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

