प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने बाबा साहेब के विजन को जमीन पर उतारा

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भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ था और यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए एक मील का पत्थर भी साबित हुआ। हमारे देश के संविधान को इस तरह से तैयार किया गया था कि यह न केवल देश के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्यों को ध्यान में रखे, बल्कि बदलते समय के साथ बदलती जरूरतों के अनुरूप खुद को अद्यतन करने की क्षमता भी रखे। इसका मूल उद्देश्य हमारे देश के लोकतंत्र की रक्षा, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक न्याय की स्थापना करना था।

संविधान में संशोधन के लिए एक स्पष्ट प्रावधान (अनुच्छेद 368) रखा गया था, ताकि तेजी से बदलते समय और परिस्थितियों के अनुरूप इसमें आवश्यकतानुसार संशोधन किया जा सके। इसका उद्देश्य केवल संविधान को स्थायित्व देना और उसे बदलती दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने योग्य बनाना था।

हालांकि, हमारे संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का प्रयोग एक आवश्यक और सकारात्मक कदम के रूप में किया जाना चाहिए था, लेकिन इसे केवल और केवल राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए कई बार इस्तेमाल किया गया। भारत की आज़ादी के बाद दशकों तक देश पर शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ने संविधान के संशोधन की शक्ति का उपयोग संविधान के आदर्शों और मूल सिद्धांतों को सुरक्षित रखने के लिए कम और अपने राजनीतिक स्वार्थ और सत्ता लोलुपता के लिए बड़ी मजबूती से किया। कांग्रेस के इस मनमाने रवैये ने न केवल हमारे देश के संविधान के मूल उद्देश्यों को कमजोर किया, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती को भी घोर संकट में डाल दिया।

कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में किए गए कई संशोधनों, जिसकी संख्या लगभग सैकड़े के आसपास है, ने यह स्पष्ट कर दिया कि संविधान को राजनीतिक स्वार्थ के आधार पर सिर्फ अपने फायदे के लिए बदलने की प्रवृत्ति थी। इन संशोधनों का उद्देश्य न केवल पार्टी और नेहरू परिवार के पारिवारिक हितों को बढ़ाना था, बल्कि कई बार विपक्षी दलों को दबाने और लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई राज्य सरकारों को गिराने के लिए भी इसका उपयोग किया गया।

1951 में किया गया पहला संशोधन इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें इस संशोधन ने मौलिक अधिकारों, विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पर ‘युक्तियुक्त प्रतिबंध’ लगाए। इस कदम को उस दौर

कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में किए गए कई संशोधनों, जिसकी संख्या लगभग सैकड़े के आसपास है, ने यह स्पष्ट कर दिया कि संविधान को राजनीतिक स्वार्थ के आधार पर सिर्फ अपने फायदे के लिए बदलने की प्रवृत्ति थी। इन संशोधनों का उद्देश्य न केवल पार्टी और नेहरू परिवार के पारिवारिक हितों को बढ़ाना था, बल्कि कई बार विपक्षी दलों को दबाने और लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई राज्य सरकारों को गिराने के लिए भी इसका उपयोग किया गया। 1951 में किया गया पहला संशोधन इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें इस संशोधन ने मौलिक अधिकारों, विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पर ‘युक्तियुक्त प्रतिबंध’ लगाए। इस कदम को उस दौर के कई नेताओं ने जनता की आवाज दबाने का प्रयास भी बताया है

के कई नेताओं ने जनता की आवाज दबाने का प्रयास भी बताया है। भारतीय लोकतंत्र के काले अध्याय ‘आपातकाल’ के दौरान, कांग्रेस ने संविधान का सबसे बड़ा दुरुपयोग 1976 के 42वें संशोधन के रूप में किया। इस दौरान किए संशोधनों की संख्या इतनी ज्यादा थी के इसे, ‘मिनी संविधान’ कहा गया, क्योंकि इसने हमारे देश के संविधान के कई मूलभूत ढांचों को ही बदलकर रख दिया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लोकतंत्र को कुचलने का ये प्रयास भारत कभी नहीं भूल सकता, जो इसका गवाह है कि किस हद तक संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थ के लिए किया जा सकता है। ‘आपातकाल’ लागू होते ही देश में सभी नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। प्रेस की स्वतंत्रता खत्म और अखबारों पर कड़ी सेंसरशिप लगा दी गई थी। पूरे देश के विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों के साथ-साथ लाखों लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था।

बाबा साहेब ने संविधान को हमारे देश के लोकतंत्र का संरक्षक माना था। उन्होंने आपातकालीन प्रावधानों को केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए रखा था, न कि सत्ता में बने रहने के लिए।

आपातकाल के दौरान इन प्रावधानों के साथ जिस तरह खेला गया, वह उनकी दृष्टि के विपरीत था। बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में आपातकालीन प्रावधान इसलिए जोड़ा था, ताकि देश को आंतरिक या बाहरी खतरों से बचाया जा सके। बाबा साहेब ने अपने जीवनकाल में न जाने कितनी यातनाएं, जातिगत भेदभाव और संघर्षों को झेला, फिर भी हमारे संविधान में सबको बराबरी का अधिकार मिले, ऐसी दूरगामी कल्पना कर उसमें समाहित किया। 1975 में लाये गए आपातकाल ने बाबा साहेब के मूलभूत विचार और संविधान की मूल भावना को ही तार-तार कर दिया, ये कांग्रेस का संविधान और देश के लोकतंत्र के प्रति, झूठे नकाब के पीछे छिपा उनका वास्तविक चेहरा दिखाता है।

बाबा साहेब का सम्पूर्ण जीवन भारतीय समाज में सामाजिक न्याय, समानता और स्वतंत्रता के आदर्शों को स्थापित करने के लिए पूर्णतः समर्पित रहा। हमारे देश के संविधान शिल्पकार होने के साथ-साथ, उनका जीवन, समाज के वंचित वर्गों, विशेषकर दलित समुदाय को समान अधिकार दिलाने के लिए संघर्षरत रहा। उनकी दी हुई यही विरासत हमारे लोकतान्त्रिक ढांचे का आधार साबित हुई। विडंबना ये रही कि कांग्रेस पार्टी, जिसने दशकों तक भारत पर शासन किया, ने उनके व्यक्तित्व, विरासत और भावना को बार-बार अपमानित किया।

बाबा साहेब को उनके जीवनकाल में उचित मान्यता नहीं मिली। उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त करने के लिए सकारात्मक कदमों और आरक्षण की वकालत की, पर कांग्रेस ने इनके उद्देश्यों को हमेशा ठन्डे बस्ते में ही दबाये रखा। बाबा साहेब ने कांग्रेस पर हमेशा यह आरोप लगाया कि यह पार्टी वंचित वर्गों के हितों की अनदेखी करती है। भारत की आज़ादी के समय भी, उनके और कांग्रेस के बीच दलित अधिकारों को लेकर वैचारिक संघर्ष चलता रहा। इतिहास गवाह है, कांग्रेस के दशकों के शासन में वंचित और दलित समुदाय सिर्फ राजनीतिक हथियार बनकर ही रहा और उनको हमेशा की तरह हाशिये पर ही रखा गया।

बाबा साहेब ने संघीय ढांचे और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को हमारे लोकतंत्र के लिए आवश्यक माना था, लेकिन कांग्रेस ने इन दोनों स्तंभों को लगातार कमजोर करने का प्रयास किया। राज्यों की चुनी हुई विपक्षी सरकारों को बार-बार अनुच्छेद 356 का उपयोग कर बर्खास्त किया गया। इसी प्रकार, न्यायपालिका को नियंत्रित करने के लिए कांग्रेस ने संविधान संशोधन का सहारा लिया। कांग्रेस ने

बात करें बाबा साहेब की विरासत की, तो कांग्रेस पार्टी ने उनके नाम को खूब भुनाया। बड़े बड़े पोस्टरों पर उनकी तस्वीर लगाई, लेकिन उनके विचारों और सपनों को हकीकत में बदलने की कभी कोशिश ही नहीं की। सामाजिक न्याय, समान नागरिक संहिता और दलित-वंचितों के अधिकार, ये सब सिर्फ भाषणों तक ही सिमटकर रह गए, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में केंद्र की एनडीए सरकार ने बाबा साहेब के विचारों को सच में समझा और उनके विज़न को जमीन पर उतारने की कोशिश की है। वंचित वर्गों के सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं, वे दिखाते हैं कि बाबा साहेब का सपना सिर्फ एक इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आज के बदलते भारत का एजेंडा है। यही असली सम्मान है उनकी विरासत का

संविधान संशोधनों और प्रावधानों का समुचित दुरुपयोग कर सत्ता में बने रहने की कोशिश की और बाबा साहेब के विचारों को बार-बार नजरअंदाज किया।

बाबा साहेब की विरासत को सही मायने में सम्मानित करने का अर्थ केवल उनके नाम का इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को नीतियों और शासन में लागू करना है। हमारे देश के लोकतंत्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि संविधान के सिद्धांतों की रक्षा हो और बाबा साहेब के सपनों का भारत वास्तविकता बने।

हमारे देश का संविधान, जिसे बाबा साहेब ने बड़ी लगन, दूरदर्शिता और वर्षों की तपस्या के बाद तैयार किया था, सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज भर नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के लोकतंत्र, समानता और स्वतंत्रता की नींव भी है। लेकिन अफसोस, कांग्रेस और विपक्षियों ने इसे अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का ज़रिया बना लिया है। संविधान में संशोधन तो इसलिए होते हैं और होने चाहिए ताकि देश की बदलती ज़रूरतें पूरी की जा सकें, लेकिन कांग्रेस ने इसे सत्ता में बने रहने का टूल भर बना लिया था। 1975 में देश पर थोपा गया ‘आपातकाल’ और 42वें संशोधन जैसे कदमों ने संविधान के मूल ढांचे पर सीधा हमला किया। मतलब, भारत के संविधान के साथ जैसे चाहा, वैसे खेला।

बात करें बाबा साहेब की विरासत की, तो कांग्रेस पार्टी ने उनके नाम को खूब भुनाया। बड़े बड़े पोस्टरों पर उनकी तस्वीर लगाई, लेकिन उनके विचारों और सपनों को हकीकत में बदलने की कभी कोशिश ही नहीं की। सामाजिक न्याय, समान नागरिक संहिता और दलित-वंचितों के अधिकार, ये सब सिर्फ भाषणों तक ही सिमटकर रह गए, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में केंद्र की एनडीए सरकार ने बाबा साहेब के विचारों को सच में समझा और उनके विज़न को जमीन पर उतारने की कोशिश की है। वंचित वर्गों के सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं, वे दिखाते हैं कि बाबा साहेब का सपना सिर्फ एक इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आज के बदलते भारत का एजेंडा है। यही असली सम्मान है उनकी विरासत का।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)