भारत और स्वीडन: ग्रोथ, रेजिलिएंस और सस्टेनेबिलिटी की साझा राह

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भारत के प्रधानमंत्री                               :                                 स्वीडन के प्रधानमंत्री     

     ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा असुरक्षा और आर्थिक विभाजन बढ़ रहा है, विश्व के सामने दो रास्ते हैं — या तो संकीर्ण राष्ट्रीय सोच तक सिमट जाए, या फिर ऐसी साझेदारियों को मजबूत करे जो साथ मिलकर ग्रोथ, रेजिलिएंस और सस्टेनेबिलिटी को आगे बढ़ाएं।

संयुक्त राष्ट्र अपने 80वें स्थापना वर्ष का प्रतीकात्मक पड़ाव मना रहा है। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षवाद का महत्व पहले से अधिक स्पष्ट हो गया है। साथ ही, वैश्विक शासन संस्थाओं में मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप सुधार की आवश्यकता को अब नजरअंदाज करना संभव नहीं रह गया है।

अंतरराष्ट्रीय कानून और देशों की संप्रभु समानता पर एक नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था ने दशकों तक अपेक्षाकृत स्टेबिलिटी और डेवलपमेंट सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन आज क्लाइमेट चेंज, औद्योगिक बदलाव, सप्लाई चेन में बाधाएं और ऊर्जा परिवर्तन जैसी चुनौतियां व्यावहारिक और समावेशी सहयोग की नई भावना की मांग करती हैं।

क्लाइमेट चेंज जैसी चुनौतियां बहुत कम हैं, जो इतनी व्यापक और दूरगामी प्रभाव वाली हों। इसका असर भारत, स्वीडन और दुनिया के हर क्षेत्र की समाज और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। लेकिन जलवायु संबंधी कदमों को विकास की आकांक्षाओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आज भी अरबों लोग बेहतर जीवन स्तर, रोजगार, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी तक पहुंच की उम्मीद रखते हैं। ऐसे में विकास और अवसर सुनिश्चित करते हुए सतत प्रगति को आगे बढ़ाना कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि यह हमारे समय की सबसे बड़ी आर्थिक और राजनीतिक जिम्मेदारी बन चुका है।

भारत दुनिया की फास्टेस्ट ग्रोइंग इकोनॉमी में से एक बनकर उभरा है, साथ ही यह रिन्यूएबल एनर्जी परिवर्तन अभियानों में से एक को भी आगे बढ़ा रहा है। इस सोच के पीछे एक स्पष्ट उद्देश्य है: जलवायु संबंधी महत्वाकांक्षाओं और विकास की वास्तविक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना।
एक प्रमुख ग्रोथ इंजन और ग्लोबल साउथ की जिम्मेदार आवाज के रूप में भारत के निकट भविष्य के दो प्रमुख लक्ष्य हैं: 2047 तक ‘विकसित देश’ का दर्जा प्राप्त करना और 2070 तक शुद्ध जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य पूरा करना। ये दोनों घरेलू लक्ष्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

ग्लोबल कोऑपरेशन और कई अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म की मदद से भारत ने इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। इनमें संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर शुरू किए गए ‘लीडरशिप ग्रुप फॉर इंडस्ट्री ट्रांजिशन’ (LeadIT), इंटरनेशनल सोलर अलायंस, ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस और मिशन LiFE जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इन पहलों के माध्यम से भारत ग्लोबल साउथ की एक जिम्मेदार आवाज के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है।

वहीं, स्वीडन यूरोपीय क्लाइमेट एक्शन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। दशकों पहले लिए गए दूरदर्शी फैसलों की बदौलत वहां का बिजली ग्रिड आज 98 प्रतिशत तक जीवाश्म ईंधन मुक्त हो चुका है। जलवायु-अनुकूल समाधान विकसित करने और उनके निर्यात में प्राइवेट सेक्टर की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। कुल मिलाकर, 1990 के बाद से स्वीडन के उत्सर्जन में एक-तिहाई से अधिक की कमी आई है, जबकि इसी अवधि में उसकी अर्थव्यवस्था लगभग दोगुनी हो गई है।

भारत और स्वीडन की नीतियां इस व्यापक सोच को दर्शाती हैं कि क्लाइमेट एक्शन केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजगार पैदा कर सकती है, अवसरों का विस्तार कर सकती है, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर सकती है और लोगों के जीवन को बेहतर बना सकती है। लक्ष्य केवल घरेलू विकास मॉडल को डीकार्बोनाइज करना नहीं, बल्कि ऐसी साझेदारियां बनाना भी है जो बड़े स्तर पर स्वच्छ औद्योगिकीकरण को संभव बना सकें।

इसी सोच के साथ भारत और स्वीडन ने 17 मई को गोथेनबर्ग में मुलाकात की। यह साझेदारी इस साझा विश्वास को दर्शाती है कि औद्योगिक परिवर्तन गवर्मेंट, इंडस्ट्री, इनोवेटर्स और वित्तीय संस्थानों के सहयोग से आगे बढ़ाया जा सकता है।

ग्रीन ट्रांजिशन केवल पर्यावरण की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह प्रतिस्पर्धात्मकता, आर्थिक मजबूती और लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।

भारत और स्वीडन ने 2019 में संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से शुरू किए गए LeadIT के माध्यम से इस सहयोग की उपयोगिता को साबित किया है। इस पहल ने औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और उन क्षेत्रों को, जहां उत्सर्जन कम करना कठिन है, ग्लोबल क्लाइमेट डिस्कशन के केंद्र में लाने में मदद की है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने दिखाया है कि डेवलप्ड और डेवलपिंग अर्थव्यवस्थाएं विश्वास, इनोवेशन और साझा जिम्मेदारी के आधार पर मिलकर समाधान तैयार कर सकती हैं।

हालांकि, आज चुनौतियों का दायरा और उनकी तात्कालिकता इस बात की मांग करती है कि अब हमें और अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर आगे बढ़ना होगा।

LeadIT के अगले चरण को अब केवल विचारों तक सीमित न रहकर बड़े स्तर पर वास्तविक क्रियान्वयन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यह प्लेटफॉर्म तकनीकी साझेदारियों को गति देने, औद्योगिक पायलट प्रोजेक्ट को सक्षम बनाने, सस्टेनेबल फाइनेंस, क्लीन एनर्जी सप्लाई चेन को मजबूत करने और ग्लोबल लेवल पर प्रतिस्पर्धी कम-कार्बन उद्योगों के निर्माण में एक प्रभावी माध्यम साबित हुआ है।

अगले चरण का उद्देश्य वर्कफोर्स ट्रांजिशन, स्किल डेवलपमेंट और फाइनेंशियल आर्किटेक्चर को समर्थन देना होना चाहिए, जो जोखिम कम करे और औद्योगिक परिवर्तन के लिए पूंजी की लागत को घटाए।

हर देश को हर समाधान खुद विकसित करने की जरूरत नहीं है, लेकिन हर देश को अपनी विकास संबंधी जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुसार तकनीकों को अपनाने, लागू करने और बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने का अवसर जरूर मिलना चाहिए। प्रदूषण सीमाओं को नहीं पहचानता, इसलिए उसके समाधान भी सीमाओं तक सीमित नहीं हो सकते।

इसलिए, हम वर्ष 2030 तक इस साझेदारी को और व्यापक तथा मजबूत बनाने का आह्वान करते हैं। हम अधिक देशों को, विशेष रूप से मजबूत इनोवेशन इकोसिस्टम और क्लीन टेक्नोलॉजी में अग्रणी नॉर्डिक देशों को इस प्रयास में शामिल होने और सक्रिय योगदान देने के लिए आमंत्रित करते हैं। औद्योगिक बदलाव तभी सफल हो सकता है, जब वह वास्तविक आर्थिक लाभ और सामाजिक प्रगति सुनिश्चित करे।

सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण तकनीक और कम कार्बन उत्सर्जन वाले औद्योगिक समाधान, राष्ट्रीय परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुसार महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

कोई भी देश अकेले हर महत्वपूर्ण तकनीक, खनिज या औद्योगिक संसाधन को हासिल नहीं कर सकता। न ही कोई राष्ट्र अकेले क्लाइमेट चेंज का सामना कर सकता है। प्रदूषण सीमाओं को नहीं पहचानता — इसलिए उसके समाधान भी वैश्विक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने चाहिए।
हमारे सामने मौजूद यह अवसर केवल क्लाइमेट पॉलिसी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन के एक नए दौर को आकार देने का मौका भी है।