नरेन्द्र मोदी अपने आलोचकों को लगातार मात दे रहे हैं

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     सालों से, पश्चिमी उदारवादी और भारत का विपक्ष, दोनों ही खुद को एक सिद्धांत से सांत्वना देते रहे हैं: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक तानाशाह हैं; भारत की अभिभूत करने वाली विविधता, किसी ‘मज़बूत नेता’ के शासन के साथ मेल नहीं खाती; और इसलिए, उनकी ‘अनुदारवादी’ सोच का नतीजा स्वाभाविक रूप से उनके ही खिलाफ जाएगा।

इस सिद्धांत को शायद अब तक का सबसे बड़ा झटका सोमवार को लगा, जब मोदी की भारतीय जनता पार्टी जो इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है ने उन राज्यों में से एक पर जीत दर्ज की, जहां उनकी पार्टी के लिए पहुंच बनाना सबसे ज़्यादा असंभव माना जाता थाः एक बेहद स्वतंत्र और सांस्कृतिक रूप से अलग क्षेत्र, जिसकी आबादी कैलिफोर्निया, टेक्सास और न्यूयॉर्क की कुल आबादी से भी अधिक है। विपक्ष के लिए यही बेहतर होगा कि वह अपनी इस हार से कुछ सीखने की कोशिश करे।

सोमवार की मतगणना ने सिर्फ़ एक राज्य में सत्ता बदलने से कहीं ज़्यादा काम किया। दशकों से, भारत की सबसे ताक़तवर क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी के राष्ट्रीय विस्तार के रास्ते में सबसे मज़बूत बाधा रही हैं ये ऐसी राजनीतिक पार्टियां हैं, जिनकी जड़ें स्थानीय स्तर पर बहुत गहरी हैं, जो अपने राज्यों की भाषा और पहचान को अच्छे से समझती हैं और जिनमें बीजेपी की मुख्य रूप से उत्तर भारतीय, हिंदी-भाषी संस्कृति अक्सर सेंध लगाने में नाकाम रही है। पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस, जिसका नेतृत्व प्रभावशाली ममता बनर्जी करती हैं, इनमें से सबसे प्रमुख थी, जिसने इस विचार को और मज़बूती दी कि भारत की विविधता इतनी विशाल है कि कोई भी पार्टी इसे पूरी तरह से एक सूत्र में नहीं पिरो सकती – एक ऐसी पार्टी के लिए तो बिल्कुल भी नहीं, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की किसी विशिष्ट और आक्रामक दृष्टि को आगे बढ़ा रही हो। सोमबार को बनर्जी को पराजित करके, बीजेपी ने यह साबित कर दिया कि अब वह उन क्षेत्रीय और सांस्कृतिक बाधाओं को भी तोड़ सकती है, जो उसे आगे बढ़ने से रोकती थीं।

इस जीत से पहले भी बीजेपी के उभार से जुड़े आंकड़े पहले से ही चौंकाने वाले थे। बीजेपी के 140 मिलियन सदस्य हैं, जो पूरी दुनिया की किसी भी राजनीतिक पार्टी से अधिक हैं; यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी जो इसकी एकमात्र समकक्ष है – की तुलना में 40 प्रतिशत अधिक है। मानव इतिहास में किसी भी राजनेता की तुलना में मोदी को सबसे ज़्यादा वोट मिले हैं, और यह अंतर सैकड़ों मिलियन का है। मॉर्निंग कंसल्ट के वैश्विक नेता अनुमोदन ट्रैकर में मोदी ने कई सालों से दुनिया के हर दूसरे लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेता को आसानी से पीछे छोड़ दिया है, भले ही उनका कार्यकाल कितना भी लंबा रहा हो। उन पैमानों के हिसाब से, जो लोकतंत्र में सत्ता का मतलब होते हैं, हिंदू दक्षिणपंथ पहले से ही समकालीन दुनिया का सबसे सफल राजनीतिक आंदोलन बन चुका है।

आलोचक इसके जवाब में कहते हैं और उनके पास इसके कारण भी हैं कि चुनावी सफलताएं ही लोकतांत्रिक ताकत को मापने का एकमात्र तरीका नहीं हैं और यह कि बीजेपी और व्यापक हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन ने भारत की उदार संस्थाओं, प्रेस की आज़ादी और बहुलवादी सामाजिक ताने-बाने को कमज़ोर किया है, जिसके तहत उनके शासन में अल्पसंख्यकों को बढ़ती हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।

वे आगे यह भी दावा करते हैं कि चुनाव उतने सरल नहीं हैं, जितने वे दिखते हैं और वे बीजेपी पर चुनावी प्रक्रिया को अपने पक्ष में झुकाने का आरोप लगाते हैं— जैसे कि चुनाव आयोग में अपने लोगों को बिठाना और एक ऐसी चंदा योजना तैयार करना, जिसने पार्टी को अपने प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में भारी वित्तीय लाभ पहुंचाया। हालांकि, यह योजना अब खत्म हो चुकी है। पश्चिम बंगाल के चुनावों में भी एक विवाद खड़ा हो गया था, जब चुनाव आयोग ने मतदाता-सूची से लगभग 9 मिलियन नाम हटा दिए थे, जो मतदाताओं की कुल संख्या के लगभग 12 प्रतिशत थे। समर्थकों ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि ये नाम दोहराव, अयोग्य या मृत मतदाताओं के थे, जबकि आलोचकों ने मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बोट देने के अधिकार से वंचित करने के एक हथियार के तौर पर इसकी निंदा की, क्योंकि ये अल्पसंख्यक मुख्य रूप से विपक्षी पार्टियों को बोट देते हैं।

लेकिन बीजेपी की सफलताओं के पीछे केवल चुनावी रणनीति ही नहीं है। सोमवार को पार्टी ने पश्चिम बंगाल की दो-तिहाई से ज़्यादा सीटें जीतीं, और 50 साल से भी कम समय में एक छोटी सी पार्टी से बढ़कर 21 राज्यों का नेतृत्व करने वाली पार्टी बन गई जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जिसने भारत को आज़ादी दिलाई थी, अब सिर्फ चार राज्यों तक सिमट गई है।

मुख्य प्रतिद्वंद्वी के साथ यह अंतर बहुत कुछ सिखाता है। कांग्रेस पार्टी को अपना प्रभुत्व विरासत में मिला थाः इसने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया, भारत के अंग्रेज़ी बोलने वाले पढ़े-लिखे तबके का भरोसा जीता, देश के पहले 50 सालों में ज़्यादातर समय तक राज किया, देश के लिए संस्थाएं बनाईं— ये संस्थाएं समाज को प्रबंधित करने के बारे में उस समय के लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय विचारों से प्रेरित थीं।

बीजेपी ने अपना प्रभुत्व कड़ी मेहनत से बनाया— ज़मीन से जुड़कर, दशकों तक ज़मीनी स्तर पर संगठन बनाकर और बड़ी मेहनत से एक ऐसा गठबंधन तैयार करके, जिसमें अब अलग-अलग जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों और धार्मिक परंपराओं के लोग शामिल हैं ऐसे लोग, जिनके पास अन्यथा साथ में मतदान करने का कोई खास कारण नहीं होता है।

इसकी आधारशिला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का संघ परिवार या ‘संगठन परिवार’ है। आरएसएस एक हिंदू राष्ट्रवादी स्वयंसेवी संगठन है, जो अब सौ साल पुराना हो चुका है। इसका मुख्य उ‌द्देश्य लाखों कार्यकर्ताओं और दर्जनों ऐसे संगठनों को तैयार करना है, जो हिंदू समाज को पुनर्जीवित करने के इसके दृष्टिकोण को साकार करने के लिए समर्पित हों। बीजेपी के साथ मिलकर आरएसएस उन अन्य संगठनों के नेटवर्क के ज़रिए अपना संदेश फैलाता है, जिनकी स्थापना उसने बीजेपी के साथ ही की थीः जैसे भारत का सबसे बड़ा मज़दूर संघ, निजी स्कूलों का सबसे बड़ा नेटवर्क, सबसे बड़ा छात्र-संगठन और हिंदू धार्मिक नेतृत्व की सबसे प्रभावशाली परिषद्— ये तो बस कुछ ही उदाहरण हैं। भारतीय समाज में ज़मीनी स्तर पर, वैचारिक और सामाजिक संबंधों का यह अनूठा ताना-बाना— जिसमें कठोर सौदेबाज़ी और गठबंधन बनाने की चतुर कला भी शामिल है—बीजेपी के असाधारण उदय की नींव रहा है।

जब भारत दुनिया की महान शक्तियों में अपनी जगह बना रहा है, ठीक उसी समय बीजेपी अपनी सत्ता को और मज़बूत कर रही है: आबादी के हिसाब से सबसे बड़ा, सैन्य कर्मियों के हिसाब से दूसरा सबसे बड़ा, अर्थव्यवस्था के संदर्भ में तीसरा सबसे बड़ा बनने की राह पर और एशिया में चीन का संतुलन करने की क्षमता रखने वाला एकमात्र देश। पश्चिम बंगाल में सोमवार को मिली जीत यह दिखाती है कि बीजेपी का उभार अभी अपनी उच्चतम सीमा तक नहीं पहुंचा है।

बीजेपी के विरोधी उस न्याय की प्रतीक्षा कर सकते हैं, जिसकी भविष्यवाणी वे लंबे समय से करते आ रहे हैं। वह समय आ भी सकता है। लेकिन जो कोई भी मौजूदा हालात को देख रहा है, उसे इसके बजाय आने वाले दशकों के भारत और एशिया में सत्ता के संतुलन के लिए तैयार रहना चाहिए, जिसे काफी हद तक ‘हिंदू दक्षिणपंथी’ ही आकार देंगे।

(लेखक सीनियर फेलो, हडसन इंस्टीट्यूट से हैं)

(साभार: द वॉशिंगटन पोस्ट)