‘मोदी इतने सफल इसलिए हैं क्योंकि वे चिंतनशील हैं’

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पूर्व प्रधानमंत्री का कहना है कि श्री मोदी, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने के मामले में नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ा है, ने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में कभी कोई समझौता नहीं किया

     मोदी अब भारत के सबसे लंबे समय तक ‘सेवा’ करने वाले, लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री हैं। वह नेहरू के रिकॉर्ड से भी आगे निकल गए है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह इस बात का सबूत है कि भारत में लोकतंत्र न केवल बचा हुआ है, बल्कि फला-फूला भी रहा है। नेहरू को 1947 में कई समान प्रतिभाशाली एवं समर्पित लोगों के बीच से देश का पहला प्रधानमंत्री चुना गया था। असल में, जनता पर गांधी के नैतिक प्रभाव ने ही उनकी नियुक्ति सुनिश्चित की थी। इसके बाद नेहरू, गांधी का आशीर्वाद और स्वतंत्रता आंदोलन की प्रतिष्ठा लेकर 1952 के पहले आम चुनाव में उतरे। उस समय कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार था। उसे किसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ा।

हालांकि 53 राजनीतिक दलों ने आम चुनाव लड़ा, लेकिन उनकी उपस्थिति और प्रभाव नगण्य था। वहां से लेकर 2014 में पहली बार और 2024 में तीसरी बार मोदी के प्रधानमंत्री बनने तक भारत एक बहुत अलग देश बन गया था। आकार, विविधता और अर्थव्यवस्था के मामले में तो यह लगभग पूर्व से तुलना योग्य भी नहीं था।

आइए, कुछ दिलचस्प आंकड़ों पर नजर डालते हैं, जो नेहरू के समय से अब तक आए बड़े बदलावों को दिखाते हैं। अगर केवल राजनीतिक मुकाबले की बात करें, तो 1952 के चुनावों में मैदान में केवल 53 पार्टियां थीं, जबकि 2024 में मोदी का मुकाबला 2,593 पार्टियों से था। नेहरू के समय मतदाताओं की संख्या 17 करोड़ थी, जो 2014 तक बढ़कर 83 करोड़ हो गई। भारत की आबादी, जो 1952 में 34 करोड़ थी, आज 146 करोड़ से अधिक है

यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कि 2014 या 2024 की तुलना में 1952 में प्रधानमंत्री चुना जाना आसान था। यहां तक कि जब मैं 1996 में प्रधानमंत्री बना, तब तक परिस्थितियां, राजनीतिक मापदंड और प्रतिस्पर्धा पूरी तरह से बदल चुकी थीं। देश अधिक सवाल पूछने वाला, अधिक सक्रिय और अधिक परिपक्व हो गया था।

नेहरू-गांधी परिवार के इतर बनने वाले प्रधानमंत्रियों के पास कोई खास रुतबा या चमक-दमक नहीं थी। दूसरों के पास आगे बढ़ने के लिए कोई खास सुविधा, खानदानी रसूख या संरक्षण नहीं था। मोदी और मेरे मामले में, हमारे पास वह सामाजिक और सांस्कृतिक रसूख भी नहीं था जो कई दूसरे प्रधानमंत्रियों को मिला था।

मैं अधिक समय तक पद पर नहीं रहा; मेरा कार्यकाल सिर्फ़ 11 महीने का था और मैं सोचता हूं कि मोदी किस आशीर्वाद से बिना थके शीर्ष पर बने हुए हैं— न तो उनमें कोई थकान दिखती है और न ही उन्हें चुनने वाले लोगों में कोई उबाऊपन आता है। पद पर रहते हुए उनकी सहनशक्ति और काम करने की क्षमता वाकई बहुत खास है।

आइए, कुछ दिलचस्प आंकड़ों पर नजर डालते हैं, जो नेहरू के समय से अब तक आए बड़े बदलावों को दिखाते हैं। अगर केवल राजनीतिक मुकाबले की बात करें, तो 1952 के चुनावों में मैदान में केवल 53 पार्टियां थीं, जबकि 2024 में मोदी का मुकाबला 2,593 पार्टियों से था। नेहरू के समय मतदाताओं की संख्या 17 करोड़ थी, जो 2014 तक बढ़कर 83 करोड़ हो गई। भारत की आबादी, जो 1952 में 34 करोड़ थी, आज 146 करोड़ से अधिक है।

एक और बात जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया है, वह यह है कि नेहरू की कैबिनेट में भारत की सामुदायिक, सांस्कृतिक और जातीय विविधता की झलक नहीं मिलती थी। यहां तक कि जब नेहरू प्रधानमंत्री के तौर पर अपने तीसरे और आखिरी कार्यकाल में थे, तब भी उनकी कैबिनेट में अधिकतर ऊंची जाति के लोग ही शामिल थे। नेहरू ने काका केलकर कमीशन की उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था, जिसमें दबे-कुचले और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करने की कोशिश की गई थी।

इसके उलट, मोदी की मौजूदा कैबिनेट में जबरदस्त विविधता दिखाई देती है। इसमें 27 ओबीसी, 10 एससी और 5 एसटी सदस्य शामिल हैं। महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी काफी बढ़ा है। मोदी ने अप्रैल 2026 में संसद की सदस्य संख्या बढ़ाने का भी गंभीरता से प्रस्ताव रखा है, ताकि महिलाओं को ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व मिल सके और हमारा देश एक अधिक बेहतर संघ बन सके। उन्होंने महिला आरक्षण बिल को पास करवाने के लिए पुरजोर प्रयास किया।

आज का भारत नेहरू के समय के मुकाबले कहीं अधिक शोर-शराबे वाला और मुखर लोकतंत्र है। जाति को लेकर जागरूकता, संवैधानिक अधिकार, नागरिक अधिकार, जेंडर से जुड़ी जागरूकता और पर्यावरण की चिंताएं जैसे मुद्दे अब बहुत बड़े स्तर पर आ गए हैं। नेहरू के समय में भारत में अधिकतर लोग अशिक्षित थे। साथ ही, लोगों को यह ठीक से पता नहीं था कि लोकतांत्रिक सरकार से क्या उम्मीद की जाए। यह एक नई व्यवस्था थी, लेकिन आज के नागरिक अधिक पढ़े-लिखे और जागरूक हैं। उनकी दृष्टि से कुछ भी नहीं बचता।

नेहरू को अधिक से अधिक आधे दर्जन अखबारों से निपटना पड़ता था, लेकिन मोदी को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की वजह से हर पल लाखों लोगों की कड़ी नजर का सामना करना पड़ता है; इन प्लेटफ़ॉर्म पर आलोचना अप्रमाणित, अनुचित और बहुत कठोर व व्यक्तिगत भी हो सकती है। इसके अलावा, उन्हें मुख्यधारा की मीडिया की चौबीसों घंटे होने वाली आलोचना और कभी-कभी उनके विरोध का भी सामना करना पड़ता है। नेहरू के समय में टेलीविजन पर समाचार नहीं होते थे।

मैं मोदी को इस बात के लिए बधाई देता हूं कि उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि उनके कार्यकाल में भारत एक मजबूत लोकतंत्र बना रहे। भारत को सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनाए रखने की उनकी कोशिश, उनकी जन-कल्याणकारी नीतियां और सैन्य टकराव के दौरान उनके निर्णय लेने की क्षमता भी विशेष ध्यान देने लायक हैं। देश के हितों के मामले में उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया है।

मोदी केवल देश के कार्यकारी प्रमुख ही नहीं, बल्कि देश के मुख्य सलाहकार भी रहे हैं, जिन्होंने लगातार और सहानुभूति के साथ हर तरह के और हर वर्ग के लोगों से बातचीत की है। मैं उनका ‘मन की बात’ रेडियो प्रोग्राम कभी नहीं छोड़ता। या फिर उनके अवॉर्ड्स की लिस्ट, जिसमें बेहतरीन उपलब्धियां हासिल करने वालों को खोजा और सम्मानित किया जाता है। यहां भी, उन्होंने हर इलाके में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने का प्रयास किया है। कोई और प्रधानमंत्री ऐसा नहीं है जिसने उनकी तरह टेक्नोलॉजी का उपयोग किया हो। यह सब नि:स्वार्थ समर्पण के बिना नहीं हो सकता था। अंत में, मोदी इसलिए सफल हैं क्योंकि वे हमेशा चिंतनशील रहे हैं। उन्होंने खुद को लगातार जांच-परख के लिए खुला रखा है।