पश्चिमी देशों के नेताओं को नरेन्द्र मोदी द्वारा पर्यावरण पर लगातार दिए जाने वाले जोर से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है
दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सोमवार, 18 मई को नॉर्वे की यात्रा पर जाएंगे। यहां किंग हेराल्ड उनका स्वागत करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी इस यात्रा के दौरान भारतीय व्यापारों को बढ़ावा देंगे, वहां रहने वाले भारतीय समुदाय के लोगों से मिलेंगे और भारत-नॉर्डिक देशों के प्रधानमंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे। नॉर्डिक देशों के प्रधानमंत्रियों को मोदी की बात ध्यान से सुननी चाहिए, क्योंकि उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।
जहां नॉर्डिक देशों के प्रधानमंत्रियों की लोकप्रियता अपने देश में मुश्किल से 30 प्रतिशत तक है, वहीं मोदी की लोकप्रियता करीब 70 प्रतिशत है। दुनिया के किसी बड़े देश का नेता अपने देश में मोदी जितना लोकप्रिय नहीं है।
मोदी पिछले 12 साल से ज्यादा समय से भारत की सत्ता में हैं। अगर वह फिर चुनाव लड़ते हैं, तो सभी संकेत बताते हैं कि उन्हें फिर से जीत हासिल हो सकती है। यूरोप के नेताओं के लिए यह केवल एक सपने जैसा है। उनकी सफलता के पीछे तेज आर्थिक विकास, मजबूत विचारधारा, दुनिया की सबसे
मोदी पिछले 12 साल से ज्यादा समय से भारत की सत्ता में हैं। अगर वह फिर चुनाव लड़ते हैं, तो सभी संकेत बताते हैं कि उन्हें फिर से जीत हासिल हो सकती है। यूरोप के नेताओं के लिए यह केवल एक सपने जैसा है। उनकी सफलता के पीछे तेज आर्थिक विकास, मजबूत विचारधारा, दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी और उनकी निजी जीवन यात्रा का बड़ा योगदान है
बड़ी राजनीतिक पार्टी और उनकी निजी जीवन यात्रा का बड़ा योगदान है।
मोदी की पृष्ठभूमि दुनिया के ज्यादातर नेताओं से बिल्कुल अलग है। दुनिया के अधिकतर राष्ट्राध्यक्ष उच्च मध्यम वर्ग से आते हैं, लेकिन मोदी का बचपन बहुत साधारण था। उनके माता-पिता गुजरात के छोटे से कस्बे वडनगर के रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे। यह कस्बा इतना छोटा है कि भारत में भी मुश्किल से कुछ ही लोग इसका नाम जानते थे। मोदी आज जहां हैं, वहां तक अपने खुद के बलबूते पर पहुंचे हैं और इसमें हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलन का भी बड़ा योगदान रहा है। वह नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री Einar Gerhardsen की तरह हैं — खुद सीखने वाले और मजबूत संगठनकर्ता।
मोदी ऐसे समय में भारत का नेतृत्व कर रहे हैं जब देश तेजी से आगे बढ़ रहा है और इस विकास में उनका स्वयं का भी बड़ा योगदान है। भारत की अर्थव्यवस्था इस समय 7 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है जोकि चीन से भी तेज है और दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से काफी आगे है।
हालांकि, विकास हर जगह समान नहीं है। भारत के अमीर और गरीब राज्यों के बीच बड़ा अंतर है। भारत के पास चीन जैसी बहुत बड़ी शिक्षित workforce नहीं है। यहां अब भी नौकरशाही ज्यादा है और भारत अभी तक वैश्विक बाजार में निर्यात के लिए कोई प्रमुख उद्योग विकसित नहीं कर पाया है। लेकिन अगर विकास की यह दर बनी रही, तो 2050 तक भारत की अर्थव्यवस्था चार गुना हो जाएगी। तब भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है और अमेरिका को चुनौती देगा।
मैं भारत के लगभग हर राज्य में गया हूं और हर जगह विकास के संकेत दिखाई देते हैं। नए और आधुनिक एयरपोर्ट बन रहे हैं। दूर-दराज के इलाकों तक अच्छी सड़कें पहुंच रही हैं। गुजरात में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क बन रहा है और आंध्र प्रदेश में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर-विंड-हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट तैयार हो रहा है।
मोदी हरित विकास यानी ग्रीन ग्रोथ के सबसे बड़े समर्थक हैं। भारत आज दुनिया में सौर और पवन ऊर्जा का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। अगर भारत अमेरिका को पीछे छोड़कर दूसरे स्थान पर पहुंच जाए तो इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए। पिछले साल भारत में कोयले से होने वाला प्रदूषण पहली बार कम हुआ।
पश्चिमी देशों के नेता मोदी द्वारा लगातार दिए जाने वाले पर्यावरण संदेश से बहुत कुछ सीख सकते हैं। मैं कई सम्मेलनों में गया हूं जहां मोदी मुख्य वक्ता रहे हैं। मोदी लगभग कभी जलवायु समझौतों या उत्सर्जन की बात नहीं करते। वह लोगों से पर्यावरण बचाने के लिए त्याग करने की अपील भी नहीं करते। उनका संदेश साफ होता है कि भारत 1.5 अरब लोगों को गरीबी से बाहर निकाल सकता है और यह काम ग्रीन ग्रोथ के जरिए किया जा सकता है। अब अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के बीच चुनाव करने की जरूरत नहीं है।
अगर अगला चुनाव धर्मनिरपेक्ष पार्टियां जीत भी जाएं, तब भी भारत की मुख्य विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद ही रहेगी। हिंदू राष्ट्रवाद उस सवाल का भारत का जवाब है जिसका सामना औद्योगिक क्रांति के बाद लगभग हर गैर-पश्चिमी देश ने किया। सवाल यह था कि आधुनिक कैसे बनें, लेकिन पूरी तरह पश्चिम जैसा बने बिना। इस रास्ते को सबसे पहले जापान ने अपनाया। जापान आधुनिक भी बना और अपनी संस्कृति से भी जुड़ा रहा। आज दक्षिण कोरिया जापान से ज्यादा अमीर है और अपनी संस्कृति व संगीत को पूरी दुनिया तक पहुंचा रहा है। चीन भी अपनी आधुनिकता को कन्फ्यूशियस विचारधारा, ताओवाद और बौद्ध धर्म जैसी अपनी परंपराओं से जोड़ता है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस समय दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। इसके 10 करोड़ से ज्यादा सदस्य हैं। उत्तर और मध्य भारत के हर क्षेत्र में पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता मौजूद हैं। भाजपा ने भारत में एक अनोखी सफलता हासिल की है। उसे ऊंची जातियों, पिछड़ी जातियों और दलित समुदायों से एक समान समर्थन मिलता है। पार्टी को भारत के अरबपतियों का भी समर्थन है और दूरदराज के आदिवासी इलाकों का भी।
पश्चिमी देशों के कई विश्लेषक भाजपा की आलोचना करते रहते हैं। आलोचक एक बात उचित कहते हैं कि भाजपा हिंदुओं को एकजुट करने की बात करती है। लेकिन ऐसा कोई बड़ा प्रमाण नहीं है कि भाजपा के शासनकाल में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष बढ़े हों। कांग्रेस के समय ज्यादा हिंसा और दंगे हुए थे। पड़ोसी देशों से लाखों मुसलमान भारत आ रहे हैं, जबकि बहुत कम मुसलमान भारत छोड़कर जा रहे हैं।
लेकिन भाजपा का यह कहना कि इस्लाम और ईसाई धर्म विदेशी धर्म हैं, और मुस्लिम आक्रमणों को ब्रिटिश शासन के बराबर मानना, कई मुसलमानों में असुरक्षा पैदा करता है। भाजपा के कई सुझाव सामान्य समझ वाले लगते हैं। जैसे कि यह विचार कि कोई अलग विवाह कानून नहीं होना चाहिए जिसके तहत मुस्लिम पुरुष अन्य पुरुषों की तुलना में अधिक आसानी से तलाक ले सकें। लेकिन एक नए और मजबूत हिंदू पहचान वाले भारत के निर्माण में असली परीक्षा यह होगी कि क्या भाजपा दुनिया के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय- भारत के 20 करोड़ मुसलमानों को भी साथ लेकर चल पाती है।
भारत दुनिया का एकमात्र बड़ा और गरीब पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश है जिसने लोकतंत्र का रास्ता चुना। इसका श्रेय ब्रिटिश शासन को नहीं दिया जा सकता। अगर ऐसा होता, तो पाकिस्तान, म्यांमार और खाड़ी देशों में भी लोकतंत्र होता। भारत लोकतांत्रिक इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र भारतीय संस्कृति और परंपरा में गहराई से जुड़ा हुआ है।
आज की दुनिया में नॉर्वे जैसे देशों को नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए नए सहयोगियों की जरूरत है। नॉर्वे के व्यापार को भी नए अवसर चाहिए। ऐसे में भारत के साथ मजबूत संबंध दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए केवल भाषण देने की नहीं, बल्कि भारत की बात सुनने की भी जरूरत है। अगर ऐसा हुआ, तो दोनों देशों के लिए कई नए अवसर खुल सकते हैं।
(लेखक संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के पूर्व अध्यक्ष हैं)
: (साभार: डीएन)

