एनडीए सरकार ने 30 अप्रैल को आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जाति के आंकड़े एकत्र करने के अपने निर्णय की घोषणा की। इस घोषणा ने राजनीतिक हलकों एवं विश्लेषकों को चौंका दिया है। ऐसे देश में जहां जाति दैनिक जीवन और राजनीतिक गणित दोनों में गहराई से व्याप्त है, यह कदम न केवल नीतिगत बदलाव का प्रतीक है, बल्कि आधुनिक भारतीय शासन व्यवस्था में एक निर्णायक क्षण को भी दर्शाता है।
श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का फैसला समयानुकूल, साहसिक और दूरदर्शी है। इस फैसले को सभी दलों का समर्थन मिला है, खास तौर पर मेरे गृह राज्य बिहार में इसका खूब समर्थन किया गया। बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने एक बार कहा था कि भारत में अभी सामाजिक लोकतंत्र हासिल करना बाकी है। सरकार का यह कदम डॉ. अंबेडकर के विजन और मिशन को श्रद्धांजलि है। यह एक ऐसा कदम है जो सामाजिक न्याय एवं सामंजस्य को सुनिश्चित करेगा।
जनगणना में जाति के आंकड़ों को शामिल करना सिर्फ नौकरशाही का फैसला नहीं है। यह लंबे समय से लंबित बदलाव है। भारत ने पिछली बार विस्तृत जाति जनगणना 1931 में की थी। वह ब्रिटिश शासन के दौरान हुआ था। तब से हम पुराने अनुमानों, राजनीतिक अटकलों और बेतरतीब सर्वेक्षणों पर निर्भर रहे हैं। यूपीए सरकार के तहत शुरू की गई 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना
लगभग एक सदी से जनगणना में जाति की गणना नहीं की गई है। इसका दोष सीधे तौर पर कांग्रेस पार्टी के सामाजिक न्याय के प्रति उदासीन रवैये को जाता है। कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से ऐसे महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों के खिलाफ रही है क्योंकि वह सामाजिक दरारों को भरने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती है
(एसईसीसी) इस कमी को पूरा कर सकती थी, लेकिन यह विसंगतियों, कम रिपोर्ट किए गए आंकड़ों का शिकार हो गयी और इसे कभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किया गया। यह एक खोया हुआ अवसर था, और शायद असहज सच्चाइयों का सामना करने में राजनीतिक हिचकिचाहट का प्रतिबिंब था।
इंदिरा गांधी, राजीव गांधी या मनमोहन सिंह ऐसा कदम नहीं उठा पाए। 2014 में जब प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में सरकार बनीं, तो श्री मोदी ने अपने भाषणों में जोर देकर कहा कि समाज के वंचित वर्ग इस सरकार के केंद्र में हैं। जाति जनगणना की घोषणा ने इस बात की पुष्टि की है। यह याद रखना और स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी गुजरात में ओबीसी समुदाय से आते हैं और अथक परिश्रम के साथ वे मुख्यमंत्री बने और बाद में देश के प्रधानमंत्री चुने गए।
लगभग एक सदी से जनगणना में जाति की गणना नहीं की गई है। इसका दोष सीधे तौर पर कांग्रेस पार्टी के सामाजिक न्याय के प्रति उदासीन रवैये को जाता है। कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से ऐसे महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों के खिलाफ रही है क्योंकि वह सामाजिक दरारों को भरने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती है। कांग्रेस और उसके सहयोगी केवल अपने व्यक्तिगत एवं पारिवारिक हितों में रुचि रखते हैं। सामाजिक न्याय के उनके आह्वान झूठ और पाखंड से भरे हुए हैं। यह याद रखना भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस के सामाजिक न्याय और जाति जनगणना में भी कई खामियां थीं।
मोदी सरकार के हस्तक्षेप से अब जाति जनगणना के लिए एक सुव्यवस्थित दृष्टिकोण सुनिश्चित होगा, जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय के गांव के अंतिम नागरिक को सशक्त बनाने के दृष्टिकोण के अनुरूप है। इस मुद्दे पर राज्य-स्तरीय विभाजन से आगे बढ़ते हुए केंद्र सरकार अब मानव-केंद्रित विकास को बढ़ावा देने वाली और समाज को एक साथ लाने वाली जनगणना करने और इस प्रक्रिया मे पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह पुष्टि करेगा कि हम एक हैं। कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि कैसे उसने डॉ. बी आर अंबेडकर और बाबू जगजीवन राम जैसे बड़े दलित नेताओं को कम महत्व दिया है और अब पार्टी के नेता दलित सशक्तीकरण के अपने झूठे प्रचार को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
अगली जनगणना में जातिगत डेटा जोड़ना सिर्फ एक नौकरशाही कदम नहीं है। यह एक राजनीतिक और नैतिक मील का पत्थर है। यह विपक्ष के इस दावे को चुनौती देता है कि भाजपा जाति-आधारित असमानताओं के मामले में उचित रवैया नहीं अपनाती है।
उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए उपचुनावों के नतीजे एक दिलचस्प कहानी बयां करते हैं। इसमें भाजपा के समावेशी हिंदुत्व और विभिन्न जातियों तक पहुंच की रणनीति ने मतदाताओं को प्रभावित किया है, जिसने इस कथन को कमजोर किया है कि केवल जातिगत अंकगणित ही चुनाव जीतता है। विपक्ष का यह मानना कि जातिगत जनगणना से संतुलन अपने आप बदल जाएगा, गलत साबित हुआ।
मोदी सरकार का निचले तबके को सशक्त बनाने का संकल्प उसके पूरे कार्यकाल में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया है। चाहे वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लोगों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करना हो या भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनाना हो या फिर निचले तबके के नेताओं को मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बनाकर सरकारों में उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना हो। इन कदमों से देश को पता चलता है कि हम न केवल निचले तबके के लोगों की परवाह करते हैं, बल्कि उन्हें सत्ता के सर्वोच्च पदों पर बिठाने के लिए भी दृढ़ संकल्पित है।
सबसे बड़ी बात यह है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव — जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सहयोगी हैं — एक पोस्टर में नजर आए, जिसमें आधे फ्रेम पर उनका चेहरा था और आधे पर बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर का। समाजवादी पार्टी और उसके नेताओं को दलितों और उनके प्रतीकों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है और उन्होंने उन्हें सिर्फ वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल किया है।
प्रधानमंत्री श्री मोदी ने नेतृत्व किया है और रास्ता दिखाया है। आजादी के 78 साल बाद भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अपना सही स्थान प्राप्त कर रहा है। जाति जनगणना को एक नीतिगत अनिवार्यता के रूप देखा जाना चाहिए है और इसी तरह दुनिया के समक्ष रखना चाहिए, ताकि यह बताया जा सके कि भारत विभिन्न सामाजिक विविधताओं के बावजूद एक स्थिर राष्ट्र है। हालांकि यह रातों-रात नहीं होगा, लेकिन हम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
मुझे उम्मीद है कि मोदी सरकार जनगणना की प्रक्रिया में वेब 3.0 तकनीक का पूरा लाभ उठाएगी, जिससे दुनिया को भारत की तकनीकी क्षमता का पता चलेगा। जाति गणना के साथ भारत के नीति निर्माता सार्वजनिक नीतियों को नया आकार देने में सक्षम होंगे जो नागरिकों की जिंदगी में वास्तविक सुधार लाएंगे।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)

