– पं. दीनदयाल उपाध्याय
हमारी सदोष शिक्षा पद्धति भी बेकारी के लिए बहुत कुछ ज़िम्मेदार है। आज तो बेकारी का जो बढ़ा हुआ स्वरूप दिखाई देता है, वह शिक्षित मध्यम-वर्ग की बेकारी है। यह वर्ग एक विशेष प्रकार की रहन-सहन का आदी है तथा केवल कलम का ही काम कर सकता है। शिक्षा में आज हाथ के काम को कोई स्थान नहीं। इतना ही नहीं, आज का पठित युवक हाथ के काम से घृणा भी करने लगता है। इसका कारण यह है कि अंग्रेजी के माध्यम के द्वारा शिक्षा देने के कारण हमारे यहां का शिक्षित नवयुवक समाज से अलग एक वर्ग बन जाता है। उसकी अनुभूतियां समाज से भिन्न हो जाती हैं। वह अपने अनपढ़ पूर्वजों के विचारों को, उनकी रहन-सहन की पद्धति को, उनकी सादगी को नीची निगाह से देखता है। उनके पेशे को भी वह छोटा समझने लगता है। फलत: आज लाखों नवयुवक ऐसे हो गए हैं, जो अपना पुश्तैनी पेशा छोड़ चुके हैं। वे सरकारी या गैर-सरकारी नौकरी की तलाश में इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं, किंतु न तो कोई हाथ का काम करने की उनमें योग्यता है और न इच्छा। अत: आवश्यकता है कि हमारी शिक्षा को भारतीय बनाया जाए और उसका माध्यम मातृभाषा रखी जाए। मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त व्यक्ति को गांवों में रहने में कठिनाई नहीं होगी और न वह हाथ के काम से दूर भागेगा।
अक्षर और साहित्य के ज्ञान के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि विद्यार्थी को किसी-न-किसी प्रकार की औद्योगिक शिक्षा दी जाए। औद्योगिक शिक्षा की दृष्टि से यद्यपि विचार बहुत दिनों से हो रहा है, किंतु अभी तक सिवाय कुछ औद्योगिक शिक्षा केंद्रों के खोलने के साधारण शिक्षा का मेल औद्योगिक शिक्षा से नहीं बिठाया है। टेक्निकल और वोकेशनल शिक्षा केंद्रों में भी शिक्षा प्राप्त नवयुवक इस योग्य नहीं बन पाते कि वे स्वयं कोई कारोबार शुरू कर सकें। वे भी नौकरी की ही तलाश में घूमते हैं, क्योंकि जिस प्रकार की शिक्षा उन्हें दी जाती है, वह उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के अयोग्य बना देती है।
अत: आवश्यक तो यह होगा कि गांवों के धंधे, खेती और व्यापार के साथ हमें शिक्षा का मेल बैठाना होगा। प्रथमत: शिक्षा की प्रारंभिक एवं माध्यमिक अवस्थाओं में हमें विद्यार्थी को उसके घरेलू धंधे के वातावरण से अलग करने की ज़रूरत नहीं, बल्कि हम ऐसा प्रबंध करें कि वह उस वातावरण में अधिक-से-अधिक रह सके तथा अज्ञात रूप से वह धंधा सीख सके। धीरे- धीरे हमें यह भी प्रयत्न करना होगा कि वह अपने अभिभावकों का सहयोगी बन सके। माध्यमिक शिक्षा समाप्त करने तक नवयुवकों को अपना धंधा भी आ जाना चाहिए। हो सकता है कि उस धंधे की योग्यता के प्रमाण-पत्र की भी हमें कुछ व्यवस्था करनी पड़े। माध्यमिक शिक्षा तक कुशाग्र बुद्धि सिद्ध होने वाले नवयुवकों के लिए आगे शिक्षा का प्रबंध उनकी रुचि के अनुसार किया जाए। संक्षेप में शिक्षा की अवधि में बल अक्षर ज्ञान और साहित्य शिक्षा पर न होकर औद्योगिक शिक्षा पर से होना चाहिए तथा उसके अनुरूप ही संपूर्ण पद्धति की रचना करनी चाहिए।
बेकारी के मौलिक कारणों को तो दूर करने की व्यवस्था करनी ही होगी, किंतु आज हमें कुछ-न-कुछ तात्कालिक उपचार भी करना होगा। हां हमारा यह उपचार उसी दिशा में हो, जिस ओर हम मूल समस्या के निराकरण के लिए चल रहे हैं। तात्कालिक उपायों के लिए देश में सभी दलों की ओर से मांग की जा रही है तथा शासन की ओर से भी कुछ कार्यक्रम एवं योजनाएं प्रस्तुत की गई हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के आगरा अधिवेशन में बेकारी की समस्या के संबंध में एक प्रस्ताव पास किया गया तथा यह मांग की गई कि पंचवर्षीय योजना में इस दृष्टि से परिवर्तन किया जाए। प्रस्ताव में राज्य सरकारों से कुटीर एवं छोटे उद्योगों की ओर विशेष ध्यान देने की भी मांग की गई।
कांग्रेस के प्रस्ताव के पश्चात् योजना आयोग ने पंचवर्षीय योजना पर विचार किया और यह निर्णय लिया कि उसमें मौलिक रूप से कोई परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं। हमें उसने एक एकादश सूत्रीय कार्यक्रम अवश्य प्रस्तुत किया, जिसमें अधिकांश पुरानी बातों को दुहरा दिया। योजना आयोग का कार्यक्रम निम्नलिखित है-
1- व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूहों को छोटे-छोटे उद्योग प्रारंभ करने के लिए ‘उद्योगों को राज्य के विधान’ या इस प्रकार के अन्य विधानों के अंतर्गत सहायता देना।
2-जिन क्षेत्रों में जनशक्ति की कमी है उनमें शिक्षा की सुविधाओं का विस्तार करना। ऐसे कई क्षेत्र हैं, जिनमें योग्य व्यक्तियों के अभाव के कारण पंचवर्षीय योजना के कार्य में रुकावट आ रही है। विस्तृत शिक्षा की सुविधाएं इस अभाव की पूर्ति करेंगी तथा अर्ध-शिक्षित कामगारों को नई नौकरियों का अवसर प्रदान करेंगी।
3-राज्य सरकार एवं अन्य जन आयोगों द्वारा आवश्यक वस्तुओं का क्रय करके कुटीर और छोटे उद्योगों को सक्रिय प्रोत्साहन देना।
4-नगर पालिकाओं, अन्य संस्थाओं तथा सेवा संस्थाओं को शहरों में प्रौढ़ पाठशालाएं खोलने के लिए सहायता देना। देहातों में एक-अध्यापक शालाएं खोलना।
5-प्रस्तावित राष्ट्रीय विस्तार योजना को साहस के साथ हाथ में लेना, क्योंकि यह गांवों की अर्थव्यवस्था के विकास एवं पढ़े-लिखे लोगों की बेकारी की समस्या के हल के लिए आवश्यक है।
6-थल यातायात का विकास करना। प्रचलित लाइसेंस-व्यवस्था का, थल यातायात का विकास करने की दृष्टि से, विशेषकर गैर-सरकारी साधनों से, पुन: विचार करना।
7-देहातों में गंदे क्षेत्रों की सफाई एवं छोटी आय के लोगों के लिए मकान बनाने की योजनाओं को कार्यान्वित करना।
8-गैर-सरकारी गृह निर्माण को प्रोत्साहन देना।
9-पुरुषार्थी बस्तियों को, जिनमें घोर बेकारी है, योजनाबद्ध सहायता देना, जिससे वे ठीक तरह से बस सकें।
10-गैर-सरकारी तौर पर शक्ति (बिजली) पैदा करने की योजनाओं को प्रोत्साहित करना। अभी कई नगरों में बिजली की कमी है, जिससे उद्योगों के विकास एवं लोगों को रोजगार देने में बाधा पहुंचती है। राज्य सरकार विभिन्न क्षेत्रों में शक्ति-योजनाओं पर विचार करे तथा जो पंचवर्षीय योजना के क्षेत्र में नहीं आतीं, उन्हें केंद्र के पास भेजे।
11-काम और शिक्षा-केंद्रों की स्थापना।
उपर्युक्त कार्यक्रम में यद्यपि अनेक सुझाव दिए गए हैं, किंतु समस्या को मौलिक रूप से दूर करने का प्रयत्न नहीं किया गया। साथ ही ये ऐसे सुझाव हैं, जो सरकारों ने समय-समय पर कई बार कहे हैं, किंतु जिन पर कभी अमल नहीं किया गया। यद्यपि योजना आयोग ने यह माना है कि शिक्षित बेकारों की संख्या बहुत अधिक है, किंतु शिक्षा की पद्धति में सुधार की दृष्टि से कुछ भी नहीं किया गया। फिर भी उसका प्रयत्न सराहनीय है।
शासन ने इस दृष्टि से कुछ व्यावहारिक कार्यक्रमों की भी घोषणा की है। 12 करोड़ रुपया लगाकर शिक्षा-विस्तार की दृष्टि से एक अध्यापक स्कूल खोलने का विचार है, जिनमें 80,000 पढ़े-लिखे लोगों को काम मिल सकेगा। 500 करोड़ की पूंजी से एक उद्योग विकास कॉरपोरेशन बनाया जा रहा है, जो छोटे-छोटे उद्योगों को सहायता देगा। किंतु यह 500 करोड़ रुपया कहां से आएगा, इस संबंध में समाप्त होने वाली अनेक योजनाओं के समान यह भी कागजी योजना मात्र रह जाएगी। गांवों में स्कूल खोलने की योजना भी अच्छी है, किंतु जो स्कूल खुले हैं, वे भी ठीक चल रहे हैं या नहीं, यह तो देखना होगा। जिला बोर्डों के अनेक स्कूल धन के अभाव में बंद हो रहे हैं। उनके अध्यापक बेकार होते जा रहे हैं। अत: कारीगरों को बेकार बनाकर बेकारों को काम देना केवल स्थान परिवर्तन मात्र होगा।
(दीनदयाल समग्र, खंड-3 से साभार)

