आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर एक काला अध्याय था, जिसे याद रखना जरूरी है ताकि ऐसी घटना दोबारा न हो : अमित शाह

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‘द् इमरजेंसी डायरीज: ईयर दैट फॉर्ज्ड ए लीडर’ पुस्तक का विमोचन

     केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने 25 जून, 2025 को नई दिल्ली में आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम ‘संविधान हत्या दिवस’ पर ‘द् इमरजेंसी डायरीज: ईयर दैट फॉर्ज्ड अ लीडर’ पुस्तक का विमोचन किया, जिसमें उस दौर के दु:खद अनुभवों और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका विस्तार से दर्ज है। इस अवसर पर श्री शाह ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर एक काला अध्याय था, जिसे याद रखना जरूरी है ताकि ऐसी घटना दोबारा न हो। इमरजेंसी के दौरान मीडिया, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचल दिया गया था। कार्यक्रम के दौरान केन्द्रीय मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव, श्री गजेंद्र सिंह शेखावत, उपराज्यपाल श्री विनय कुमार सक्सेना, दिल्ली कि मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता और आपातकाल के खिलाफ मुखर आवाज रहे प्रोफेसर श्री रामबहादुर राय सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

‘संविधान हत्या दिवस’ मनाने का निर्णय

श्री शाह ने कहा कि कहा जाता है कि कुछ बुरी घटनाओं को जीवन से भुला देना चाहिए, यह बात व्यक्तिगत जीवन में उचित भी हो सकती है लेकिन जब विषय समाज और राष्ट्र का हो, तो ऐसी घटनाओं को चिरकाल तक याद रखना चाहिए, ताकि उनकी पुनरावृत्ति न हो सके। इसी उद्देश्य से देश के युवाओं को संस्कारित, संगठित और संघर्षशील बनाए रखना आवश्यक है। इसी सोच के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। जब इस दिन को मनाने का निर्णय लिया गया तब नाम को लेकर अनेक विचार आए, कुछ लोगों को लगा कि ‘संविधान हत्या दिवस’ शब्द कुछ कठोर और निर्मम प्रतीत होता है, परंतु गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात् यह नाम इसलिए तय किया गया, क्योंकि आपातकाल के दौरान देश को एक विशाल जेलखाना बना दिया गया था। देश की आत्मा को मूक कर दिया गया था, न्यायपालिका के कान बंद कर दिए गए थे और लेखनी से स्याही छीन ली गई थी। उस पूरे कालखंड का वर्णन ऐसे ही कठोर शब्दों के माध्यम से किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी यह जान सके कि वास्तव में उस समय क्या हुआ था।

‘द् इमरजेंसी डायरीज: ईयर दैट फॉर्ज्ड अ लीडर’ पुस्तक

श्री शाह ने कहा कि इस अवसर पर ‘द् इमरजेंसी डायरीज: ईयर दैट फॉर्ज्ड अ लीडर’ नामक पुस्तक का विमोचन भी हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आपातकाल कालखंड के अनुभवों का वर्णन है। उस समय वे एक युवा संघ प्रचारक के रूप में भूमिगत रहकर 19 महीनों तक चले आंदोलन का हिस्सा रहे। उन्होंने श्री जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख के नेतृत्व में चल रहे जन-आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी मीसा के तहत जेल में डाले गए बंदियों के परिजनों से मिले, उनकी समस्याएं सुनीं और उनके इलाज की व्यवस्था की। उन्होंने गुप्त समाचार पत्रों को बाजारों, चौराहों, विद्यार्थियों और महिलाओं में वितरित किया एवं गुजरात में संघर्ष का नेतृत्व किया। यह सब उन्होंने मात्र 24–25 वर्ष की आयु में किया था, जिसकी पूरी कथा इस पुस्तक में समाहित है। पुस्तक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ की भूमिका, लोक संघर्ष समिति के प्रयास, सत्याग्रह और जनजागरण की कठिनाइयों का भी उल्लेख किया गया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी उस समय भूमिगत रहकर कार्य कर रहे थे। उन्होंने कभी साधु, कभी सरदार, कभी अगरबत्ती विक्रेता तो कभी अखबार वितरक का रूप धारण कर कार्य किया।

उन्होंने कहा कि जब विधाता न्याय करता है, तो वह अपने तरीके से करता है। जिस 25 वर्ष के युवक ने उस समय कांग्रेस पार्टी की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तानाशाही विचारों का विरोध किया, घर-घर, गांव-गांव जाकर, शहरों में घूम-घूमकर विरोध किया, आज वही व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री है। जिस परिवारवाद को स्थापित करने के लिए आपातकाल थोपा गया था, उसी व्यक्ति ने 2014 में पूरे देश से परिवारवाद को उखाड़ फेंका। यह पुस्तक पांच अध्यायों में विभाजित है : मीडिया की सेंसरशिप, सरकार का दमन, संघ और जनसंघ का संघर्ष, आपातकालीन पीड़ितों की पीड़ा का वर्णन और तानाशाही से जन भागीदारी तक की यात्रा। विशेष रूप से देश के युवाओं को यह पुस्तक एक बार अवश्य पढ़नी चाहिए। किशोरावस्था के एक युवा ने अपने शुरुआती दिनों में तानाशाही के खिलाफ संघर्ष किया, आज वही युवा इस देश में लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने वाला प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी बन चुका है।

आपातकाल की बर्बरता और संपूर्ण क्रांति आंदोलन

श्री शाह ने कहा कि 24 जून, 1975 की रात को आपातकाल लागू कर दिया गया और एक तानाशाही सोच को जमीन पर उतारने का अध्यादेश अस्तित्व में आया। कई बार इतिहास केवल घटनाओं को नहीं बताता, वह नीयत और नजरिए को भी उजागर करता है। बाबा साहेब अंबेडकर, जिन्होंने संविधान की रचना 2,67,000 शब्द बोलकर चर्चाओं के माध्यम से की, उन सारी चर्चाओं का अंत इंदिरा गांधी ने एक वाक्य बोलकर कर दिया कि ‘राष्ट्रपति जी ने आज आपातकाल की घोषणा की है।‘ इस एक वाक्य ने संविधान की आत्मा को खत्म कर दिया और उसके बाद जयप्रकाश नारायण जी ने इसके खिलाफ संघर्ष किया। आपातकाल लगाने का मूल कारण भी 12 जून का वह फैसला था। 12 जून को दो घटनाएं एक साथ हुईं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश की प्रधानमंत्री के चुनाव को रद्द कर दिया और उन्हें छह साल तक चुनाव न लड़ने योग्य घोषित कर दिया। पूरे देश में सन्नाटा छा गया और सुप्रीम कोर्ट से उस पर स्टे मिला और उसी दिन यानी 12 जून को गुजरात में जनता पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर अपनी सरकार बनाई। इससे घबराकर 25 तारीख को आपातकाल लगाया गया। कारण यह बताया गया कि राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में है, जबकि पूरी दुनिया जानती है कि खतरा राष्ट्र की सुरक्षा को नहीं बल्कि इंदिरा गांधी की कुर्सी को था।

श्री शाह ने कहा कि जेपी के संपूर्ण क्रांति के नारे ने पूरे देश को झकझोर दिया था। गुजरात से शुरू हुआ आंदोलन बिहार तक पहुंचा, गुजरात में सरकार गिरी, चुनाव हुआ, कांग्रेस हटी और विपक्षी एकजुट हुए और जनता पार्टी की सरकार बनी। यह इंदिरा गांधी के लिए बहुत बड़ी चेतावनी थी। जेपी आंदोलन में महंगाई के खिलाफ छात्र एकत्रित हुए, अन्याय के खिलाफ रेल कर्मचारी एकजुट हुए, जगह-जगह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआ और अंत में 12 तारीख को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता को अयोग्य घोषित कर दिया। 24 जून को सुप्रीम कोर्ट से जब स्टे मिला, उसी रात इमरजेंसी लगाकर स्टे देने वाली कोर्ट को भी चुप करा दिया गया, अखबारों को भी चुप करा दिया और आकाशवाणी को भी चुप करा दिया गया। 1,10,000 सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल की कालकोठरी में बंद कर दिया गया। सुबह 4:00 बजे कैबिनेट बुलाई गई, कोई एजेंडा सर्कुलेट नहीं हुआ और आपातकाल की घोषणा कर दी गई।

उन्होंने कहा कि शाह कमीशन ने पूरी जांच के बाद कहा कि डिटेंशन, नसबंदी और तोड़फोड़ के माध्यम से जिस प्रकार से पूरे देश में भय और आतंक का वातावरण बना, उसका कोई भी उदाहरण विश्व में नहीं मिलता। श्रीमती विजयाराजे सिंधिया, श्री जयप्रकाश नारायण, श्री मोरारजी भाई, चौधरी चरण सिंह, श्री राजनारायण, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लालकृष्ण आडवाणी, आचार्य कृपलानी, श्री जॉर्ज फर्नांडिस, श्री अरुण जेटली, श्री जयकिशन गुप्ता, श्री सत्येंद्र नारायण सिंह, गायत्री देवीजी, श्री मुलायम सिंह यादव और डीएमके के नेताओं को बिना किसी अपराध के जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। 253 पत्रकार गिरफ्तार हुए, 29 विदेशी पत्रकारों को देश के बाहर भेज दिया गया और कई सारे अखबारों ने संपादकीय को खाली रखकर इसके सामने विरोध दर्ज कराया, जिसमें इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता प्रमुख था। उनकी बिजली काट दी गई और संसदीय कार्यवाही पर भी सेंसर लगा दिया गया। न्यायालयों को भी नियंत्रित कर दिया गया। देशभर में लोकतांत्रिक अधिकार खत्म हो गए। संविधान में 38वां, 42वां संशोधन कर अनुच्छेद 223-ए, 223-बी में बदलाव किए गए और इसके साथ-साथ अनुच्छेद 123, 213, 352, 519 और अनुच्छेद 356 का उपयोग कर लोकसभा का कार्यकाल भी बढ़ाया गया।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में सरकार के खिलाफ फैसले देने वाले जजों को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने से रोका गया। उसके पहले के और वरिष्ठता में आगे तीन-तीन न्यायाधीशों को दरकिनार कर जस्टिस रे को चीफ जस्टिस बनाया गया। श्री शाह ने कहा कि किशोर कुमार को ऑल इंडिया रेडियो से बैन कर दिया गया। मनोज कुमार की फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, देव आनंद को दूरदर्शन से प्रतिबंधित किया गया और यहां तक कि ‘आंधी’ और ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्मों को प्रतिबंधित कर दिया गया।

‘भारत प्रथम’ सोच की जनमानस में गूंज

श्री शाह ने कहा कि संविधान की हत्या करने के बाद इसे मौन कर दिया गया, अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई और बाद में एक दिन विपक्ष को झांसा देने के चक्कर में इमरजेंसी को समाप्त किया गया। देश में चुनाव आया। सारी विपक्षी पार्टियां श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में एकत्रित हुईं और देश की जनता ने तानाशाही मानसिकता वाली इंदिरा गांधी को ऐसा दंड दिया कि वह स्वयं रायबरेली से चुनाव हार गईं और देश में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। यह दिन इसलिए याद रखना आवश्यक है कि भविष्य में कभी भी कोई व्यक्ति तानाशाही सोच को इस देश के संविधान पर थोप न सके और इसी कारण प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस दिन को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। उस वक्त पनपे “राष्ट्र से बड़ी पार्टी है, पार्टी से बड़ा परिवार है, परिवार से बड़ा मैं हूं और देशहित से बड़ी सत्ता है” के विचार के विपरीत आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ‘भारत प्रथम’ की सोच पूरी देश के जनमानस में गूंज रही है।