‘संविधान की आत्मा की रक्षा जनता की सामूहिक जिम्मेदारी है’

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‘आपातकाल के 50 वर्ष’

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री अमित शाह ने 24 जून, 2025 को नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय में ‘आपातकाल के 50 वर्ष’ की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाए जाने का निर्णय लिया है। आपातकाल जैसी घटना ने लोकतंत्र की नींव को हिला दिया था यदि उसकी स्मृति समाज के मन से मिटने लगे, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन सकता है। ऐसी घटनाओं की स्मृति युवाओं और किशोरों की चेतना से धीरे-धीरे मिटने लगती है, तब इस प्रकार की संगोष्ठियां और ‘संविधान हत्या दिवस’ जैसे आयोजन उस स्मृति को पुनर्जीवित करने का कार्य करते हैं। कार्यक्रम के दौरान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष श्री अनिर्बान गांगुली और पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

तुगलकी फरमान

श्री शाह ने कहा कि दस्तावेजों में भले ही पचास साल बीत चुके हों, परंतु करोड़ों भारतीयों के मन में उस समय की स्मृति आज भी उतनी ही ताजा है जितनी 24 जून 1975 की रात को थी। स्वतंत्र भारत के इतिहास की वह रात शायद सबसे लंबी थी और एक प्रकार से सबसे छोटी भी। सबसे लंबी भी इसलिए, क्योंकि इस रात की सुबह पूरे 21 महीने बाद आई। 21 महीनों के बाद ही देश में फिर से लोकतंत्र लौटा और सबसे छोटी इसलिए, क्योंकि जिन अधिकारों को स्थापित करने के लिए विधिक प्रक्रिया, संसद की गरिमा और नागरिक सम्मान की रक्षा हेतु जो नियम बनाए गए थे, जिनका निर्माण दो वर्ष, 11 महीने और 18 दिन में हुआ, उन्हें एक झटके में नष्ट कर दिया गया। हमारे संविधान का निर्माण एक तपस्या था।

इसमें 13 समितियां बनीं, 11 सत्रों में 165 दिनों की चर्चा हुई, 163 दिनों में 114 दिन संविधान के विभिन्न प्रावधानों पर व्यापक बहस हुई। कुल 1100 घंटे और 32 मिनट चर्चा हुई, सात सदस्यीय ड्राफ्टिंग कमिटी ने उसे अंतिम रूप दिया। यह संविधान, जो विचार और विमर्श में दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक संविधान से कहीं अधिक गहरा और परिश्रम से बनाया गया था, उसे एक ‘किचन कैबिनेट’ के तुगलकी फरमान ने एक ही मिनट में खारिज कर दिया।

संविधान की आत्मा की हत्या

श्री शाह ने कहा कि एक बहुदलीय लोकतांत्रिक देश के मूल स्वभाव को एक व्यक्ति की तानाशाही में बदलने का षड्यंत्र ही ‘आपातकाल’ है। इस षड्यंत्र को उस समय बहुत से लोगों ने पुरजोर विरोध किया। उस काली रात की सुबह ने भारत की आत्मा को झकझोर दिया।

उन्होंने कहा कि 25 जून, 1975 की सुबह सूरज तो उगा लेकिन उसकी रोशनी आजाद नहीं थी। उस सुबह मौलिक अधिकारों की चादर ओढ़े नागरिक तानाशाही की जंजीरों में बंधे हुए नींद से जगे थे। उस सुबह ठीक आठ बजे ऑल इंडिया रेडियो से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज गूंजी कि ‘राष्ट्रपति ने देश में आपातकाल की घोषणा की है।‘

कांग्रेस से सवाल

श्री शाह ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से सवाल पूछे कि क्या आपातकाल जैसे निर्णय के लिए संसद की सहमति ली गई थी? क्या मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई गई थी? क्या विपक्ष या देशवासियों को विश्वास में लिया गया था? आज लोकतंत्र की खोखली बातें कर रहे लोग उसी पार्टी से जुड़े हैं जिसने लोकतंत्र के रक्षक की नहीं बल्कि भक्षक की भूमिका निभाई थी। आपातकाल के लिए कारण बताया गया राष्ट्र की सुरक्षा, जबकि वास्तविक कारण था अपनी सत्ता की सुरक्षा, क्योंकि जब इंदिरा गांधी के विरुद्ध चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने उनके चुनाव को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, तब कोर्ट ने उनके (इंदिरा गांधी) चुनाव को निरस्त कर दिया और कहा कि उन्होंने सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया।

सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी आधार पर उन्हें स्थगन तो प्रदान कर दिया, लेकिन यह शर्त रखी कि वे प्रधानमंत्री तो रह सकती हैं, परंतु संसद में मतदान नहीं कर सकतीं और सांसद के रूप में कोई अधिकार नहीं ले सकतीं। इसके बाद इंदिरा गांधी ने नैतिक आधार पर इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि इसी संवैधानिक परिस्थिति का सहारा लेकर, संविधान की धाराओं को ही तोड़-मरोड़कर संविधान की आत्मा की हत्या की। उस समय देश में न कोई बाहरी सुरक्षा का संकट था, न कोई आंतरिक संकट। देश महंगाई से जूझ रहा था। गुजरात में छात्रों ने सबसे पहले विरोध की मशाल जलाई, जो बिहार तक पहुंच गई। जेपी आंदोलन शुरू हुआ, रेलवे कर्मचारी हड़ताल पर चले गए और जगह-जगह कांग्रेस के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाजें उठने लगीं। मोरारजी देसाई आमरण अनशन पर बैठ गए और देश की जनता जाग उठी थी। बहुमत के नशे में चूर इंदिरा गांधी की सत्ता की कुर्सी डगमगाने लगी थी। एक व्यक्ति ने अपनी सत्ता को बचाने के लिए देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया गया। सुबह 4 बजे कैबिनेट की आपात बैठक बुलाई गई। तत्कालीन कैबिनेट सदस्य बाबू जगजीवन राम और स्वर्ण सिंह ने बाद में कहा कि ‘जब हम बैठक में पहुंचे, तो हमें न कोई एजेंडा बताया गया, न कोई विचार-विमर्श हुआ, केवल सूचना दी गई।’ गृह सचिव को बुलाकर आगे की कार्रवाई आरंभ कर दी गई।

संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग

श्री शाह ने कहा कि इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग किया। अनुच्छेद 352 का उद्देश्य देश पर गंभीर संकट आने की स्थिति में आपातकाल लागू करना था, किंतु इंदिरा गांधी ने उसी अनुच्छेद का प्रयोग कर केवल सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल लागू कर दिया। इस आपातकाल के दौरान 1,10,000 से अधिक विपक्षी राजनीतिक नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया। केवल नेता ही नहीं, पत्रकार, संपादक, रिपोर्टर, छात्र नेता, समाजसेवी सभी को जेल में बंद कर दिया गया। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, प्रेस, मीडिया, कलाकार और आम जन सभी स्तब्ध रहकर यह दृश्य देख रहे थे। आगे चलकर गुजरात और तमिलनाडु की गैर कांग्रेसी सरकारों को गिराने का भी प्रयास किया गया।

उन्होंने कहा कि आपातकाल के दौरान जो संविधान संशोधन हुए, उनमें 38वां संशोधन प्रमुख था, जिसके तहत अनुच्छेद 130 और 213 के द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपाल के अधिकारों को बढ़ा दिया गया। अनुच्छेद 352 द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा से बाहर कर दिया गया। फिर अनुच्छेद 329 में संशोधन कर प्रधानमंत्री को भी न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया। इसके साथ ही अनुच्छेद 323ए और 323बी के माध्यम से प्रशासनिक मामलों को देखने वाले न्यायाधिकरणों को सरकार के नियंत्रण में ला दिया गया। अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया और अनुच्छेद 356 के तहत आपातकाल की अवधि को बढ़ा दिया गया। संसद की सीमाएं भी बढ़ा दी गईं और व्यापक प्रशासनिक दुरुपयोग हुआ। तिहाड़ जेल में ही 4000 लोग मीसा के तहत बंद थे, जबकि जेल की क्षमता सिर्फ 1200 की थी। एक करोड़ से अधिक लोगों की जबरन नसबंदी की गईं। लता मंगेशकर जी ने ऐसे गाने गाए, जिनमें पुरुष और महिला दोनों की आवाजें उन्हीं की थीं, क्योंकि किशोर कुमार की आवाज को आकाशवाणी से बैन कर दिया गया था। न्याय का यह काल और लंबा चलता, अगर चाटुकारिता ही अंत का कारण न बनती। लेकिन अंततः दिल्ली में झुग्गियों का विध्वंस जैसी कई घटनाओं को आपातकाल के समर्थन में अंजाम दिया गया।

कांग्रेस पार्टी ने आज तक इस गलती को स्वीकार नहीं किया

श्री शाह ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने आज तक इस गलती को स्वीकार नहीं किया। यहां तक कि राजीव गांधी ने भी कभी इसे गलत नहीं माना। राजीव गांधी ने दंगों को जस्टिफाई करने की मानसिकता भी दिखाई। जब उन्होंने कहा, ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो जमीन हिलती है।‘ इस पूरी स्थिति में सबसे दुखद बात यह रही कि बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हेबियस कॉर्पस की अर्जियों को खारिज करने के लिए भी संविधान में बदलाव कर दिए गए। श्री जयप्रकाश नारायण उस समय के एक दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने उत्पन्न हो रहे खतरे को न केवल पहचाना, बल्कि उसका गंभीर मूल्यांकन भी किया। उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, फिर भी जब उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस पहुंची, उन्होंने एक ऐतिहासिक वाक्य कहा ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि।‘ बाद में इंदिरा गांधी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने यह भी लिखा, “एक गलत फैसले को सही ठहराने के लिए आप बार-बार गलत निर्णय ले रही हैं। इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा।” लोकनायक जयप्रकाश नारायण उस समय समूचे देश की आवाज बन गए। उन्हीं की आवाज ने भारत को दोबारा लोकतंत्र लौटाया। करोड़ों भारतीयों ने आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हजारों कार्यकर्ता, जनसंघ और कांग्रेस के असंतुष्ट नेता, सर्वोदय आंदोलन के अनुयायी, गांधीवादी चिंतक, हर वर्ग के लोग जेलों में बंद हुए, सत्याग्रह किया और बिना डरे, बिना थके, लगातार संघर्ष करते रहे। जनता भी पूरी शक्ति और समर्पण के साथ इन संघर्षशील जनों के साथ खड़ी रही।

लोकतंत्र में जनता निर्णायक

श्री शाह ने कहा कि जन प्रबोधन अर्थात् जनता के मन में लोकतांत्रिक विचारों को गहराई से स्थापित करना हर नागरिक का कर्तव्य है। संविधान की आत्मा की रक्षा केवल संसद या न्यायपालिका के भरोसे नहीं की जा सकती। संविधान की आत्मा की रक्षा देश की जनता की सामूहिक जिम्मेदारी है। जो भी संविधान के मूल स्वरूप और भावना के साथ खिलवाड़ करेगा, उसे दंडित करने की जिम्मेदारी जनता पर ही है, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है। आज का दिन उसी स्मृति का दिन है। कल ‘संविधान हत्या दिवस’ है और इस दिन को देशभर में मनाकर हम आने वाली पीढ़ियों युवाओं और किशोरों को यह लोकतांत्रिक संस्कार सौंप सकते हैं। यह संस्कार अगले 50 वर्षों तक राष्ट्र की चेतना को दिशा देगा और यही हमारा कर्तव्य है।