पाणिनी से एआई स्टैक तक: दिल्ली नई संरचना बना रही है, रूपरेखा को पुन:परिभाषित कर रही है

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      जब पाणिनी ने बोलचाल की भाषा की अराजकता को एक संक्षिप्त और गणना-योग्य व्याकरण में समेटा, तो उन्होंने यह सिद्ध किया कि बुद्धिमत्ता तब सबसे अधिक शक्तिशाली होती है जब उसे संरचना के रूप में व्यक्त किया जाता है। नालंदा ने इसी वृत्ति को संस्थागत स्वरूप दिया, जहां सीमाओं के पार ज्ञान पर बहस करने, उसे संरक्षित करने और प्रसारित करने की पद्धतियां विकसित की गईं। ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ की मेजबानी करने का भारत का निर्णय भी इसी सभ्यतागत प्रेरणा से उपजा है, क्योंकि तकनीक की अगली छलांग उन प्रणालियों से जुड़ी है जो बड़े पैमाने पर सीख सकती हैं, तर्क कर सकती हैं और कार्य कर सकती हैं। दुनिया ऐसे भविष्य की कल्पना नहीं कर सकती जिसमें केवल कुछ राजधानियां यह तय करें कि वे प्रणालियां कैसे बनाई जाएं।

यह ‘ग्लोबल साउथ’ के किसी देश द्वारा आयोजित पहला वैश्विक एआई शिखर सम्मेलन था और इसके पिछले किसी भी संस्करण में इस स्तर की भागीदारी नहीं देखी गई: 20 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष, 60 मंत्री, 100 से अधिक देशों के 500 से अधिक एआई नेतृत्वकर्ता और 10 विषयगत पैवेलियन में 300 प्रदर्शक। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने डेटा की संप्रभुता, डिजाइन द्वारा समावेशन और जवाबदेही जैसे विषयों पर अपना विचार पेश किया और हम वैश्विक पूंजी को इन्हीं शर्तों पर यहां निवेश के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।

यूपीआई ने 2025 में 228 अरब से अधिक ट्रांज़ैक्शन प्रोसेस किए, जिनकी कीमत लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर थी। जैम ट्रिनिटी ने 2015 से अब तक कल्याणकारी योजनाओं में 3.48 लाख करोड़ डॉलर से अधिक की बचत करवाई है। किसी भी दूसरे देश ने पहचान, पेमेंट और हकदारी वितरण को इतने बड़े पैमाने पर एक ही पॉलिसी के तहत नहीं बनाया है और यही वह नींव है जिस पर भारत का एआई का दौर टिका है

यह विचार प्रधानमंत्री के ‘मानव’ दृष्टिकोण के माध्यम से सबसे स्पष्ट तौर पर सामने आता है: नैतिक सीमाएं, जवाबदेह शासन, डेटा पर संप्रभुता— ताकि बुद्धिमत्ता (कच्चा माल) का उस प्रकार दोहन न किया जा सके जैसा कभी कमोडिटीज के साथ हुआ है; इसकी व्यापक पहुंच बनें— ताकि इसका लाभ मध्य प्रदेश के एक किसान तक भी उतना ही पहुंचे, जितना बेंगलुरु के एक इंजीनियर को प्राप्त हो रहा है; और कानूनी वैधता— ताकि हर लागू प्रणाली लोकतांत्रिक जांच के दायरे में हो। एआई को ‘खुला आसमान’ देने, लेकिन उसकी डोर इंसानी हाथों में रखने का उनका यह दृष्टिकोण एक ऐसी लकीर खींचता है, जिसे खींचने में कई उन्नत अर्थव्यवस्थाएं हिचकिचाती रही हैं।

अब ये सिद्धांत दिल्ली घोषणापत्र के मध्यम से बहुपक्षीय महत्व के बन गये हैं। यह घोषणापत्र शिखर सम्मेलन में अपनाया गया और इसे पहले ही ‘ग्लोबल साउथ’ की ओर से एआई गवर्नेंस का पहला बड़ा खाका कहा जा रहा है। यह विकास-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाता है, जो एक तकनीकी-कानूनी दृष्टिकोण पर आधारित है। यह दृष्टिकोण कड़े नियमों के बजाय लचीले सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता देता है। यह वैश्विक सहयोग को तीन स्तंभों के इर्द-गिर्द संगठित करता है: लोग, ग्रह और प्रगति। भारतजेन जैसे समाधान— जो 22 भारतीय भाषाओं को सपोर्ट करते हैं— इस सच्चाई को सामने लाते हैं कि दुनिया का अधिकतर हिस्सा अंग्रेजी में काम नहीं करता। एक प्रस्तावित ‘ग्लोबल कंप्यूट बैंक’— जो भारत में 65 रुपये प्रति घंटे की रियायती दर पर जीपीयू उपलब्ध कराने के मॉडल पर आधारित है— इस क्षेत्र में प्रवेश की बाधाओं को कम करता है। डेटा संप्रभुता पर जोर, एआई के ‘शोषणकारी रवैये’ को चुनौती देता है। यह वह तरीका है जिसमें विकासशील देशों के डेटा को इकट्ठा करके ऐसे मॉडल तैयार किए जाते हैं, जिनके इस्तेमाल के लिए बाद में उन्हीं देशों को पैसे चुकाने पड़ते हैं।

इस फ्रेमवर्क को जो बात विश्वसनीयता देती है, वह है इसके पीछे का एक दशक का काम। यह सरकार एआई तक सबसे महत्वाकांक्षी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रम के माध्यम से पहुंची है, जैसा किसी भी लोकतंत्र ने अब तक नहीं किया है। यूपीआई ने 2025 में 228 अरब से अधिक ट्रांज़ैक्शन प्रोसेस किए, जिनकी कीमत लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर थी। जैम ट्रिनिटी ने 2015 से अब तक कल्याणकारी योजनाओं में 3.48 लाख करोड़ डॉलर से अधिक की बचत करवाई है। किसी भी दूसरे देश ने पहचान, पेमेंट और हकदारी वितरण को इतने बड़े पैमाने पर एक ही पॉलिसी के तहत नहीं बनाया है और यही वह नींव है जिस पर भारत का एआई का दौर टिका है।

अगर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का मकसद हर नागरिक को सरकार से जोड़ना था, तो एआई इंफ्रास्ट्रक्चर का मकसद हर नागरिक को काबिलियत से जोड़ना है और यहां आंकड़े एक चौंकाने वाला अंतर दिखाते हैं: भारत दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत डेटा बनाता है, लेकिन उसके पास वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता का केवल 3 प्रतिशत ही है। इस अंतर को उसी सोच के साथ भरा जा रहा है जिसने यूपीआई बनाया था: तेज़, बड़े पैमाने पर और अपने खुद के डिजाइन के साथ।

ज़रा सोचिए कि क्या घोषणाएं की गईं। माइक्रोसॉफ्ट: 2030 तक ग्लोबल साउथ के लिए 50 अरब डॉलर, जिसमें से 17.5 अरब डॉलर भारत के लिए पहले ही तय किए जा चुके हैं। गुगल: अमेरिका-इंडिया कनेक्ट पहल, जिसके लिए पांच सालों में 15 अरब डॉलर का निवेश किया जाएगा। अमेज़न वेब सर्विस: महाराष्ट्र में 8.3 अरब डॉलर का निवेश। अडानी ग्रुप: 2035 तक रिन्यूएबल एनर्जी से चलने वाले एआई डेटा सेंटर्स के लिए 100 अरब डॉलर का निवेश। योट्टा डाटा सर्विसेज: एनवीडिया की ब्लैकवेल अल्ट्रा चिप्स का उपयोग करके एशिया के सबसे बड़े एआई कंप्यूटिंग हब्स में से एक के लिए 2 अरब डॉलर से अधिक का निवेश। एल एडं टी: एनवीडिया के साथ एक प्रस्तावित उद्यम, जिसके तहत भारत की सबसे बड़ी गीगावाट-स्केल एआई फ़ैक्टरी बनाई जाएगी।

इंडिया एआई मिशन के राष्ट्रीय कंप्यूट क्लस्टर में अब 38,000 से अधिक जीपीयू हो गए हैं और यह बढ़कर 58,000 तक पहुंचने वाला है; ये जीपीयू स्टार्टअप्स को वैश्विक लागत के लगभग एक-तिहाई दाम पर उपलब्ध होंगे। अगले दो सालों में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में 200 अरब डॉलर के निवेश का सरकार का लक्ष्य केवल एक महत्त्वाकांक्षा नहीं है; अब तक की गई घोषणाओं को देखते हुए यह लक्ष्य पूरी तरह से हासिल करने योग्य लगता है।

यह सुनिश्चित करते हुए कि यह निवेश एक दीर्घकालिक संरचनात्मक लाभ बन जाए, केंद्रीय बजट 2026-27 पेश किया गया। यह बजट उन विदेशी कंपनियों के लिए 2047 तक ‘टैक्स हॉलिडे’ (कर छूट) की सुविधा देता है जो वैश्विक क्लाउड सेवाओं के लिए भारतीय डेटा केंद्रों का उपयोग करती हैं और एआई तथा उन्नत विनिर्माण स्टार्टअप्स के लिए एक वेंचर कैपिटल फंड में 1.1 बिलियन डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। ‘राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन’ लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है, जिन पर एआई और सेमीकंडक्टर विनिर्माण निर्भर करते हैं।

लेकिन इन सब बातों का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक इसकी पहुंच लोगों तक न हो। समिट के पहले दिन 2.5 लाख से अधिक छात्रों ने ‘उत्तरदायी इनोवेशन’ के लिए एआई के उपयोग की शपथ ली। टियर 2 और टियर 3 शहरों में तीस डाटा और एआई लैब काम कर रहे हैं— जो 570 लैब के

इंडिया एआई मिशन के राष्ट्रीय कंप्यूट क्लस्टर में अब 38,000 से अधिक जीपीयू हो गए हैं और यह बढ़कर 58,000 तक पहुंचने वाला है; ये जीपीयू स्टार्टअप्स को वैश्विक लागत के लगभग एक-तिहाई दाम पर उपलब्ध होंगे

नियोजित नेटवर्क की पहली कड़ी हैं— जबकि एआईकोश, साझा सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के तौर पर 7,500 से अधिक डेटासेट और 273 मॉडल उपलब्ध कराता है। जब हमने सरकार बनायी, तब भारत में 16 आईआईटी थे; आज, इनकी संख्या 23 है। ओपनएआई के सीईओ ने बताया कि भारत चैट-जीपीटी का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। यहां इसकी खपत तो है ही, साथ ही उत्पादन क्षमता भी तेजी से बढ़ रही है: समिट में तीन सॉवरेन एआई मॉडल पेश किए गए, जिनमें सर्वम एआई का एलएलएम और भारतजेन का परम 2 शामिल हैं।

यह बताता है कि साझेदारियां अब किस तरह से बनाई जा रही हैं, क्योंकि अब इनका मकसद केवल विदेशी टेक्नोलॉजी का लाइसेंस लेना नहीं, बल्कि मिलकर अपनी खुद की क्षमता का निर्माण करना है। ओपन एआई के साथ टाटा ग्रुप की रणनीतिक साझेदारी— जिसकी शुरुआत ‘स्टारगेट’ पहल के तहत 100 मेगावॉट का एआई- डेटा सेंटर क्षमता निर्माण से हुई और जिसे अब बढ़ाकर एक गीगावाट तक ले जाने का लक्ष्य है— यह संकेत देता है कि भारतीय उद्योग अब वैश्विक बुद्धिमत्ता की ‘सप्लाई साइड’ (आपूर्ति पक्ष) की ओर बढ़ रहा है।

भारत द्वारा ‘पैक्स सिलिका घोषणा’ पर हस्ताक्षर करने से हम US-नेतृत्व वाले उस गठबंधन का हिस्सा बन गये है, जो एआई, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित करने का काम करता है। ‘भारत-अमेरिका एआई अवसर साझेदारी’ दोनों देशों को महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नवाचार-समर्थक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रतिबद्ध करती है; वहीं, 2026 में मनाया जाने वाला ‘भारत-फ्रांस नवाचार वर्ष’ इस प्रयास में एक और आयाम जोड़ता है, जो संयुक्त कौशल विकास और परिणामों पर केंद्रित है।

प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में भारत ‘ग्लोबल साउथ’ का पहला देश जिसने ग्लोबल एआई समिट सीरीज़ की मेज़बानी की, उसने वे शर्तें तय कर दी हैं जिनके आधार पर वह मुकाबला करना चाहता है: एक घोषणा जो एआई गवर्नेंस के नियमों को फिर से लिखती है, एक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जो दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम पेमेंट्स को प्रोसेस करता है, सैकड़ों अरबों के निवेश के वादे, बिल्कुल शुरू से बनाए गए सॉवरेन मॉडल और एआई युग की सप्लाई शृंखला सुरक्षा व्यवस्था में प्रवेश। पाणिनि का सबक कभी भी पेचीदा नहीं था। संरचना ही बुद्धिमत्ता है। भारत अब वही संरचना बना रहा है।

(लेखक केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हैं)