एकात्म मानववाद पर दिल्ली में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा एकात्म मानववाद पर प्रस्तुत व्याख्यान शृंखला की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर नई दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में दो दिवसीय (31 मई और 1 जून) राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी शोध अधिष्ठान के तत्वावधान में लोक नीति शोध केन्द्र, एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान और अन्य संस्थाओं के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी में प्रख्यात विद्वानों, नीति निर्माताओं और विचारकों ने दीनदयालजी के दर्शन की प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा ने समापन भाषण दिया। श्री नड्डा ने बताया कि किस तरह एकात्म मानववाद विचारधारा से शासन की ओर बढ़ा है, उन्होंने कल्याण और आर्थिक सुधारों को दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन की अभिव्यक्ति बताया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री अरुण कुमार ने अपने उद्घाटन भाषण में एकात्म मानववाद के आधारभूत सिद्धांतों पर जोर दिया, जिसे उन्होंने भारत की सभ्यतागत चेतना से उभरने वाला विश्व दृष्टिकोण बताया।
भाजपा राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) श्री शिवप्रकाश ने दीनदयालजी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ के विकास के बारे में बताया। उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति का जीवंत चित्रण किया, जो कठिनाई के बावजूद राष्ट्र निर्माण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध रहा। उन्होंने अपने वक्तव्य में दीनदयालजी की विनम्रता, बुद्धिमत्ता और संगठनात्मक प्रतिभा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके जीवन का अभिन्न अंग विचार, वचन और कर्म की एकरूपता थी, जो उनके गहन आध्यात्मिक अनुशासन और राष्ट्रवादी विचार का प्रतिबिंब था।
डॉ. महेश चंद्र शर्मा ने एकात्म मानववाद की विद्वत्तापूर्ण व्याख्या की, जिसमें उन्होंने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वय पर जोर दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि सिद्धांत एकरूपता नहीं, बल्कि एकता और संतुलन चाहता है। उन्होंने कहा कि दीनदयालजी का दृष्टिकोण विकेंद्रीकृत शासन, आत्मनिर्भर गांवों और आर्थिक नैतिकता को प्रोत्साहित करता है, जो धर्म पर आधारित विकास का एक विशिष्ट भारतीय मॉडल प्रस्तुत करता है।
अर्थव्यवस्था और कल्याण पर एक सत्र में भारतीय शिक्षण मंडल के श्री शंकरानंद ने एकात्म मानववाद को विकेन्द्रीकृत, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के विचार से जोड़ा।
संगोष्ठी के पहले दिन के दूसरे सत्र में केंद्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने एकात्म मानववाद की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने इसके मूल सिद्धांतों को पीएम मुद्रा योजना और स्टार्ट-अप इंडिया जैसी मौजूदा नीतिगत पहलों से जोड़ा। पंडित जी के अंत्योदय के विचार – अंतिम व्यक्ति का उत्थान – का जिक्र करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक विकास को नैतिकता, आध्यात्मिक चेतना और विकेंद्रीकृत उद्यम द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि धन सृजन को धर्म और पर्यावरणीय स्थिरता के साथ जोड़ा जाना चाहिए, न कि भौतिक अधिकता के साथ।
तीसरे सत्र में डॉ. एम.एस. चैत्रा और केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने राष्ट्रीय कायाकल्प में शिक्षा और संस्कृति की भूमिका पर जोर दिया। संगोष्ठी के पहले दिन के समानांतर सत्र में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव और साप्ताहिक पत्रिका ऑर्गनाइजर के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर ने संगोष्ठी में एकात्म मानववाद के पर्यावरणीय आयाम पर विचार रखे।
कार्यक्रम के दूसरे दिन पहले सत्र में श्री नितिन गोखले और भाजपा नेता श्री के. अन्नामलाई ने सांस्कृतिक एकता और सभ्यतागत विमर्शों के माध्यम से भारत के सुरक्षा प्रतिमान को फिर से परिभाषित किया।
केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान और डॉ. गजानन डांगे ने दूसरे दिन के दूसरे सत्र को संबोधित किया, ग्रामीण विकास के प्रमुख विशेषज्ञ डॉ. डांगे ने ‘मिट्टी से आत्मा तक’ विषय पर एक मुख्य भाषण दिया – एकात्म दर्शन ने स्वावलंबन और परस्पर सहयोग जैसे सिद्धांतों के माध्यम से सभ्यतागत मूल्यों का विकास किया।
केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए सतत विकास पर जोर दिया।
संगोष्ठी के दूसरे दिन के समानांतर सत्र में श्रीमती ममता यादव एवं भाजयुमो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री अभिनव प्रकाश ने आंतरिक अनुशासन, सभ्यतागत विमर्श और चरित्र निर्माण के माध्यम से महिलाओं और युवाओं की परिवर्तनकारी क्षमता पर प्रकाश डाला।
श्री जे. नंदकुमार, श्री एस. गुरुमूर्ति और डॉ. गुरु प्रकाश पासवान सहित अन्य प्रख्यात वक्ताओं ने धर्म, आध्यात्मिक एकता और सांस्कृतिक स्मृति पर आधारित भारत का सभ्यतागत दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
‘नेतृत्व की विरासत: राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय’ विषय पर एक सत्र को श्री जे. नंदकुमार और डॉ. गुरु प्रकाश पासवान ने संबोधित किया। श्री एस. गुरुमूर्ति ने अपने संबोधन में एकात्म मानववाद को एक राजनीतिक सिद्धांत के बजाय एक जीवंत सभ्यतागत नैतिकता के रूप में प्रस्तुत किया।
अपने समापन भाषण में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा ने बताया कि किस तरह एकात्म मानववाद विचारधारा से शासन की ओर बढ़ा है, उन्होंने कल्याण और आर्थिक सुधारों को दीनदयाल उपाध्याय के दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति बताया। उन्होंने राष्ट्रीय नीति के लिए एकात्म मानववाद को मार्गदर्शक बनाने का आग्रह किया। श्री नड्डा ने श्रोताओं को याद दिलाया कि भारतीय विचार कोई स्थिर या अमूर्त चीज नहीं है। यह गतिशील है। यह शाश्वत सिद्धांतों में निहित रहते हुए समय के साथ विकसित होता है।
यही कारण है कि एकात्म मानव दर्शन केवल एक ‘मॉडल’ नहीं है, बल्कि एक जीवंत दृष्टि है – दीनदयाल जी द्वारा लगाया गया एक पौधा जिसे अब एक वटवृक्ष के रूप में विकसित होना चाहिए, जो न केवल भारत को, बल्कि दुनिया को आश्रय और दिशा प्रदान करे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक स्थायी तंत्र उभरना चाहिए जो समकालीन चुनौतियों के जवाब में एकात्म मानववाद का विकास करे।

