माता अहिल्याबाई न केवल धर्म रक्षक थीं, बल्कि संस्कृति रक्षक और समाज सुधारक भी थीं : जगत प्रकाश नड्डा
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा ने 31 मई, 2025 को जयपुर में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जी की 300वीं जयंती कार्यक्रम को संबोधित किया। कार्यक्रम से पहले श्री नड्डा ने जयपुर में प्रदेश भाजपा द्वारा आयोजित तिरंगा यात्रा में भी हिस्सा लिया। श्री नड्डा ने माता अहिल्याबाई होलकर के बहुआयामी नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि माता अहिल्याबाई होलकर ने धर्म, संस्कृति और समाज सुधार तीनों क्षेत्रों में असाधारण कार्य किया। श्री नड्डा ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को भी उसी परंपरा का आधुनिक रूप बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने उज्ज्वला, जल जीवन मिशन, जनधन, स्टैंडअप इंडिया जैसी योजनाओं से महिलाओं को नई ताकत दी है। कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री मदन राठौड़, प्रदेश प्रभारी श्री राधा मोहन दास अग्रवाल, भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया, उप-मुख्यमंत्री श्रीमती दिया कुमारी एवं श्री प्रेमचंद बैरवा जी, केंद्रीय मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, भाजपा राष्ट्रीय मंत्री श्रीमती अलका गुर्जर, सांसद श्री सी. पी. जोशी सहित अन्य नेता व कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
श्री नड्डा ने कहा कि मुझे पुण्यश्लोक माता अहिल्याबाई होलकर जी की 300वीं जयंती के इस पावन अवसर पर उपस्थित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। हम अक्सर शताब्दियां मनाते हैं, उन्हें याद करते हैं, लेकिन उस स्मृति की सच्ची गरिमा तभी होती है जब हम उनके कार्यों और जीवन से प्रेरणा लेकर उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। केवल चर्चा कर लेना पर्याप्त नहीं होता। हम इस चर्चा से कुछ सीखकर इसे अपने जीवन में उतारें। हम सभी जानते हैं कि माता अहिल्याबाई न केवल धर्म रक्षक थीं, बल्कि संस्कृति की रक्षक और समाज सुधारक भी थीं। बहुत कम ऐसे राजनेता होते हैं जिनमें ये सभी गुण एक साथ समाहित होते हैं।

अहिल्याबाई का नेतृत्व अठारहवीं शताब्दी में न केवल अद्वितीय था, बल्कि उनका प्रभाव भी अत्यंत निर्णायक रहा। वे संकल्पशक्ति की प्रतिमूर्ति थीं, जो संकल्प कर लिया, उसे पूर्ण करना उनके जीवन का ध्येय बन जाता था
वह इक्कीसवीं शताब्दी नहीं, बल्कि अट्ठारहवीं शताब्दी थी। वह समय जब मुगलों का शासन था और महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। ऐसे समय में अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति का उदय होना और उनके द्वारा समाज को दिशा देना, हम सभी के लिए प्रेरणादायक है।
उन्होंने कहा कि आज प्रोग्रेसिव बात करना एक फैशन हो सकता है, लेकिन अठारहवीं शताब्दी में नई दृष्टि देना और महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए अपना जीवन समर्पित कर देना, यह बहुत बड़ा प्रेरणा का विषय है। इसलिए अहिल्याबाई का नेतृत्व अठारहवीं शताब्दी में न केवल अद्वितीय था, बल्कि उनका प्रभाव भी अत्यंत निर्णायक रहा। वे संकल्पशक्ति की प्रतिमूर्ति थीं, जो संकल्प कर लिया, उसे पूर्ण करना उनके जीवन का ध्येय बन जाता था। साथ ही, वे साहस से परिपूर्ण थीं और विचारधारा के प्रति पूरी तरह कटिबद्ध थीं। उनका जीवन एक लक्ष्य के लिए समर्पित था। माता अहिल्याबाई में राजनीति के सारे गुण-दोषों की गहरी समझ थी। वे कूटनीति की ज्ञाता थीं और साथ ही एक साहसी तथा निर्भीक महिला भी।
इसीलिए आज हम सभी को माता अहिल्याबाई होलकर से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। आज हम ‘गुड गवर्नेंस’ की बात करते हैं, लेकिन सोचिए अठारहवीं शताब्दी में, जब उनके पति कुंभेर की लड़ाई में शहीद हो गए, तब उन्होंने शासन संभाला और सुशासन की मिसाल कायम की। आज जब हम सुशासन की बात करते हैं, तो याद रखना चाहिए कि उन्होंने उस दौर में, जब संसाधनों की कमी थी, अहमदनगर में उत्तम प्रशासन का उदाहरण प्रस्तुत किया। माता अहिल्याबाई होलकर की सभी योजनाएं लोकहितकारी थीं, जो दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाली सिद्ध हुईं। माता अहिल्याबाई ने संस्कृति और धार्मिक धरोहर के संरक्षण के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। जब संस्कृति और धार्मिक धरोहर की बात होती है तो चाहे वह काशी विश्वनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर हो या बिहार का कोई अन्य प्राचीन मंदिर उनके पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार के लिए उन्होंने तन-मन-धन से कार्य किया। साथ ही, हर मंदिर के साथ धर्मशालाएं बनवाना भी उन्होंने सुनिश्चित किया। इस प्रकार अहिल्याबाई ने संस्कृति की रक्षा के साथ-साथ धर्म को भी प्रोत्साहित किया।

