नक्सल-मुक्त भारत मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धियों में से एक: अमित शाह

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               नक्सल-मुक्त भारत

31 मार्च, 2026

एकजुट, शांतिपूर्ण भारत की नई सुबह

वामपंथी उग्रवाद से देश को मुक्त कराने के प्रयास पर चर्चा

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने 30 मार्च, 2026 को लोकसभा में नियम 193 के तहत देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त कराने के प्रयासों पर हुई चर्चा का उत्तर देते हुए कहा कि वामपंथी उग्रवादियों और उनके समर्थकों ने भोले-भाले आदिवासियों के सामने एक झूठा नैरेटिव प्रस्तुत किया था कि वे उनके अधिकारों की रक्षा करने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर से अब नक्सलवाद लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है और वहां के प्रत्येक गांव में स्कूलों के निर्माण तथा राशन की दुकानों के संचालन का अभियान शुरू हो गया है। गृह मंत्री ने कहा कि जो लोग नक्सलवाद की वकालत करते हैं, उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि 1970 से लेकर अब तक ये कार्य क्यों नहीं हुए। श्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलियों के समर्थकों ने 1970 से मार्च, 2026 तक लगातार नक्सलवाद का समर्थन किया है। यह नरसंहार का समर्थन है और यदि 20,000 लोगों की हत्या के पीछे किसी एक विचारधारा को जिम्मेदार ठहराया जाए, तो वह मुख्य विपक्षी दल की वामपंथी विचारधारा है। नक्सलियों के साथ रहते-रहते यह पार्टी और इसके नेता स्वयं ही नक्सली बन गए हैं। श्री शाह ने कहा कि इस देश की जनता को चुनावों में इसका उत्तर देना होगा, क्योंकि यह मामला यहीं नहीं रुकेगा— यह जनता की अदालत में जाएगा। लोकसभा में श्री अमित शाह द्वारा दिए गए उत्तर का पाठ निम्नलिखित है:

श्री नरेन्द्र मोदी, माननीय प्रधानमंत्री, भारत

गृह मंत्री श्री अमित शाह जी का यह एक उत्कृष्ट भाषण है, जो महत्वपूर्ण तथ्यों, ऐतिहासिक संदर्भों और पिछले एक दशक में हमारी सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को रेखांकित करता है।
दशकों तक प्रतिगामी माओवादी विचारधारा ने कई क्षेत्रों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। वामपंथी उग्रवाद ने अनगिनत युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया है।
पिछले एक दशक में हमारी सरकार ने इस खतरे को जड़ से खत्म करने की दिशा में काम किया है और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया है कि विकास के लाभ उन क्षेत्रों तक पहुंचे जो नक्सलवाद से प्रभावित रहे हैं। हम सुशासन को बढ़ावा देने और सभी के लिए शांति व समृद्धि सुनिश्चित करने पर अपना ध्यान केंद्रित रखेंगे।

     

श्री नितिन नवीन, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा

लोकसभा में नक्सलवाद के खिलाफ भारत की निर्णायक लड़ाई पर बात करते हुए माननीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी का संबोधन स्पष्ट दृष्टिकोण, दृढ़ संकल्प एवं तथ्यों पर आधारित एक सोच को दर्शाता है।
दशकों से वामपंथी उग्रवाद ने कई क्षेत्रों में विकास यात्रा में बाधा डाली है और अनगिनत युवाओं के भविष्य पर बुरा असर डाला है। यह न केवल एक सुरक्षा चुनौती रही है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक प्रगति में भी बाधक है।
पिछले एक दशक में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में सरकार ने इस खतरे को खत्म करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया है कि विकास यात्रा का लाभ नक्सल प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचे। सुशासन, सुरक्षा और समावेशी विकास के प्रति अपनी निरंतर प्रतिबद्धता के साथ हम सभी के लिए शांति, स्थिरता एवं समृद्धि सुनिश्चित करते रहेंगे।

     महोदय, सबसे पहले मैं रेड कॉरिडोर के नाम से जो पूरा क्षेत्र जाना जाता था, 12 राज्यों, 17 प्रतिशत भूभाग और 20 करोड़ की आबादी वाले इस क्षेत्र में रहने वाले सभी आदिवासी भाइयों और बहनों की ओर से आपको धन्यवाद देना चाहता हूं कि आपने इस चर्चा के लिए आज यहां पर हमें परमिशन दी है।
महोदय, वे सालों से चाहते थे कि उनका दर्द, उनकी वेदना, उनकी परेशानी, नक्सलियों द्वारा उन पर किया गया अन्याय और उनके भविष्य को अंधेरे में घेरने वाली यह पूरी व्यवस्था, एक बार देश की सबसे बड़ी पंचायत, हमारी संसद में उजागर हो और पूरी दुनिया उसे जाने। लंबे समय तक इसे मौका नहीं दिया गया। मुझे इस बात की भी बहुत खुशी है कि देश और हम सबके लिए बहुत महत्वपूर्ण एक घटनाक्रम, जो वर्ष 1970 से लेकर वर्ष 2026 तक चला, उस घटनाक्रम के बारे में आज संसद में चर्चा हो रही है।

महोदय, ये जिस थ्योरी का प्रचार कर रहे थे, वे एक गलत प्रकार का नैरेटिव, एक गलत प्रकार का स्वप्न भोले-भाले आदिवासियों के सामने रख रहे थे कि हम आपके अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, हम आपको न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं, आप विकास से महरूम रह गए हो, हम इसलिए लड़ रहे हैं।
महोदय, आज बस्तर से नक्सलवाद लगभग-लगभग समाप्त हो चुका है। बस्तर के अंदर हर गांव में एक स्कूल बनाने की मुहिम चली। बस्तर के अंदर हर गांव में राशन की दुकान खोलने की मुहिम चली। हर तहसील और पंचायत में पीएचसी/सीएचसी बने। इनके आधार कार्ड बने, इनके राशन कार्ड बने और इन्हें 5 किलो अनाज मिल रहा है। इनके बीच गैस के चूल्हे भी वितरित किए जा रहे हैं। जो लोग यहां पर नक्सलवाद की वकालत कर रहे थे, मैं उनसे इतना ही पूछना चाहता हूं कि यह काम वर्ष 1970 से अब तक क्यों नहीं हुआ? पूरे देश को तो वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी जी की सरकार आने के बाद देश के हर गरीब को घर मिला, गैस मिली, शुद्ध पीने का पानी मिला, 5 लाख रुपये तक का बीमा मिला, प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 5 किलो अनाज मुफ्त मिला। ये बस्तर वाले क्यों छूट गए थे?

जो हथियार उठाएगा, उसको हिसाब चुकाना होगा

महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि सत्य को झुठलाया जा रहा है। ये बस्तर वाले इसलिए छूट गए थे, क्योंकि वहां लाल आतंक की परछाईं थी और इसीलिए वहां विकास नहीं पहुंचा था। लाल आतंक की परछाईं वहां पड़ी थी, इसलिए विकास वहां नहीं पहुंचा था। आज परछाईं हट गई है, बस्तर विकसित हो रहा है और बस्तर में विकास पहुंच रहा है। ये जो एक हत्यारी मूवमेंट के वकील बन रहे हैं, वे कहते हैं कि हम अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं। संविधान को मानोगे या नहीं मानोगे? किसी पर भी अन्याय होता है तो उसका उपाय हमारे संविधान के अंदर निहित है। अदालतें बनी हैं, विधानसभाएं बनी हैं, जिला पंचायतें बनी हैं, तहसील पंचायतें बनी हैं। इस पूरी व्यवस्था को नकारकर हाथ में हथियार उठा लोगे; ऐसा कैसे चलेगा? जो इस चीज़ को जस्टीफाई करे, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि वह समय चला गया है, यह नरेन्द्र मोदी की सरकार है, जो हथियार उठाएगा, उसको हिसाब चुकाना होगा।

इस तरह से नहीं चलेगा। सरकार संवेदनशील है, सभी समस्याओं को सुनना चाहती है और उनका निराकरण भी चाहती है। यहीं संसद में ढेर सारी योजनाएं बनाई गईं, मगर आप इनका इम्प्लीमेंटेशन भी नहीं करने देंगे, ताकि आपकी आइडियोलॉजी और आपका अवैध शासन वहां पर चलता रहे। मैं आज पूछना चाहता हूं; अभी कांग्रेस के कुछ सदस्य बहुत जोर-जोर से कह रहे थे कि आदिवासियों का विकास नहीं हुआ, विकास नहीं हुआ। राजकुमार रोत जी जैसे आदिवासी युवा सांसद भी वोट के लालच में कांग्रेस का समर्थन कर रहे थे, कांग्रेस की थ्योरी का समर्थन कर रहे थे। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि 75 सालों में से 60 साल तो आपने ही शासन किया है, तो आदिवासी लोग अब तक विकास से वंचित क्यों रह गए? विकास तो नरेन्द्र मोदी जी आकर कर रहे हैं। 60 सालों तक उनको घर नहीं दिया, पानी नहीं दिया, उनके लिए स्कूल नहीं बने, मोबाइल टावर नहीं पहुंचने दिए, बैंक की सुविधाएं नहीं पहुंचने दीं और अब आप हिसाब मांग रहे हैं। आप थोड़ा तो अपने गिरेबान में झांककर देखिए कि दोषी कौन है। मैं पूरा बताऊंगा।

रेड कॉरिडोर

मान्यवर, 12 राज्य हैं— इनमें छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक का कुछ हिस्सा और उत्तर प्रदेश के तीन जिले; यह पूरा रेड कॉरिडोर बना हुआ था और वहां कानून का शासन समाप्त कर दिया गया था। 20 करोड़ लोग गरीबी में सालों तक जीते रहे, लेकिन किसी ने चिंता नहीं की। हजारों युवाओं की मृत्यु हुई। एक एनजीओ की यदि हम मानें, तो दोनों ओर से 20 हजार युवा मारे गए। कई लोग पूरे जीवन के लिए दिव्यांग बन गए, अपाहिज बन गए, नर्क का जीवन जी रहे हैं और उन तक विकास भी नहीं पहुंचा।

नक्सलवाद का मूल कारण विकास की मांग नहीं है, बल्कि एक आइडियोलॉजी है

मान्यवर, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या इस देश की सबसे बड़ी लोकतंत्र की पंचायत को क्षीर-नीर विवेक से इस पर चिंतन नहीं करना चाहिए? या अपनी गढ़ी-गढ़ाई थ्योरी को लेकर घूमते रहना चाहिए? मैं इसके बाद बताता हूं कि नक्सलवाद का मूल कारण विकास की मांग नहीं है, बल्कि एक आइडियोलॉजी है; जिस आइडियोलॉजी को राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के लिए वर्ष 1970 में इंदिरा जी ने स्वीकार कर लिया और इस वामपंथी विचारधारा के कारण नक्सलवाद फैला।

मान्यवर, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने पूरे देश के सामने स्वीकार किया था कि कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट की तुलना में भी देश की आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी समस्या हथियारबंद माओवादी हैं, मगर कुछ नहीं हुआ।

मान्यवर, वर्ष 2014 में परिवर्तन हुआ और मोदी जी के शासन में कई सालों पुरानी समस्याओं का निराकरण हुआ। इनमें धारा 370 हट गई, 35(ए) हट गई, राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बन चुका है।

जीएसटी इस देश में आज वास्तविकता बन गया है, सीएए का कानून आ गया है। विधायी मंडलों में मातृशक्ति को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। कई सारे बड़े काम जो आज़ादी के वक्त से इस देश की जनता चाहती थी कि कभी न कभी हों, वे सारे काम नरेन्द्र मोदी जी के इन 12 सालों में हुए और अब नक्सलवाद से मुक्त भारत की रचना भी नरेन्द्र मोदी जी के शासन में ही हो रही है। ये 12 साल देश के लिए एक प्रकार से बहुत शुभंकर साबित हुए हैं। देश को गरीबी से मुक्ति दिलाने के लिए, देश के युवाओं के लिए नई शिक्षा पद्धति लाने के लिए, देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए, इस देश के मूलों से न जुड़ी हुई नीतियों को दरकिनार करने के लिए; इन 12 सालों में बहुत कुछ हुआ है।

मगर मैं मानता हूं कि अगर पॉलिटिकल साइंस का कोई विद्यार्थी इसकी रेटिंग करना चाहेगा कि इन सारी चीज़ों से सबसे बड़ा फायदा किस फैसले और किस सिद्धि से हुआ है, तो पॉलिटिकल साइंस का वह विद्यार्थी निस्संकोच नक्सल-मुक्त भारत को नंबर एक पर रखने से जरा भी नहीं हिचकेगा।

मान्यवर, यह जो बड़ी घटना देश में आकार लेने जा रही है, उसका पूरा श्रेय, उसका पूरा यश हमारे सी.ए.पी.एफ. के जवानों, विशेषकर ‘कोबरा’, सी.आर.पी.एफ. के जवानों, राज्य सरकारों की पुलिस, विशेषकर छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस, डी.आर.जी. के हमारे जवानों और वहां के स्थानीय आदिवासी वाशिंदों को जाता है। अगर उनका सहयोग न होता; तो दुनिया में कई ऐसे उदाहरण हैं कि बड़े-बड़े तानाशाह हुए, पर जब जनता ने उनका साथ नहीं दिया तो वे दुम हिलाकर भागे हैं। मगर यहां पर आज वामपंथी उग्रवाद समाप्त होने जा रहा है, इसमें जनता का भी बड़ा साथ है।

आज मैं फिर से एक बार इस चर्चा की शुरुआत में, जो हजारों युवा मारे गए, जो सिक्योरिटी फोर्सेज़ के जवान शहीद हो गए, जिन्होंने अपना सर्वस्व इस देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बलिदान कर दिया, उन सभी को मनःपूर्वक पूरे सदन की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि देकर उसे स्वीकार करना चाहता हूं।

माओवादी विचारधारा का ध्रुव वाक्य : सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है

मान्यवर, यह जो विचारधारा है, इसका विकास से कोई लेना-देना नहीं है, विकास की मांग से भी कोई लेना-देना नहीं है। यह विचारधारा कौन-सी है? क्या है माओवादी विचारधारा? इसका ध्रुव वाक्य क्या है? जब हम आज़ाद हुए, हमने कहा; ‘सत्यमेव जयते’, सत्य की हमेशा विजय हो, सत्य की विजय होती है।

मुझे एक बात समझ में नहीं आई कि 15 अगस्त, 1947 से पहले इस देश का आदिवासी बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, रानी दुर्गावती, मुर्मु बंधुओं को हीरो मानकर चलता था, लेकिन वह आदिवासी वर्ष 1947 से 1970 आते-आते माओ को अपना हीरो मानने लगा; यह परिवर्तन क्यों हुआ?

पर इनका ध्रुव वाक्य क्या है? इनका ध्रुव वाक्य है; ‘सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है।’ यह इनका ध्रुव वाक्य है। यहां ‘सत्ता’ शब्द का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह विकास के लिए नहीं है, अपनी आइडियोलॉजी के अस्तित्व के लिए है, अपनी आइडियोलॉजी की विजय के लिए है और आइडियोलॉजी को भोले-भाले आदिवासियों में फैलाकर सत्ता हासिल करने के लिए है। यहां विकास की कोई बात नहीं है। इनका लोकतंत्र में कोई विश्वास नहीं है।

हथियार हाथ में उठा लेना; क्या यह लोकतांत्रिक तरीका है?

मान्यवर, यहां ढेर सारे लोग; मैं उनके नाम नहीं लेना चाहता; मैं सुन रहा था, तीन घंटे से कह रहे हैं कि अन्याय है और अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं। लड़ने का तरीका क्या है? हम अंग्रेज़ों के शासन में नहीं रह रहे हैं। कुछ लोगों ने तो भगत सिंह जी और भगवान बिरसा मुंडा से कॉम्पेरिजन कर दी। यह क्या हिमाकत कर रहे हैं? शहीद भगत सिंह और भगवान बिरसा मुंडा अंग्रेज़ों के सामने लड़े। संविधान तोड़कर हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों की हत्या करने वाले लोगों से आप इनकी कॉम्पेरिजन कर रहे हैं। ऐसे विषयों में राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठ जाना चाहिए।

मान्यवर, यही विचारधारा कहती है कि दीर्घकालीन युद्ध ही हमारी विचारधारा को फैला सकता है। उन्हें अपने लोगों का भी खून बहाने से कोई परहेज नहीं है। उनके आदर्शों को देखिए। दस हजार सालों के हमारे उपलब्ध इतिहास में कितने आदर्श पुरुष, स्त्री, युवा हुए, उसकी एक बहुत बड़ी सूची बन सकती है। इन्होंने तिलका मांझी को अपना आदर्श नहीं समझा, भगवान बिरसा मुंडा, भगत सिंह या सुभाष बाबू को अपना आदर्श नहीं समझा। इन्होंने आदर्श किसको माना? इन्होंने आदर्श माओ को माना। ये अपने आदर्श तय करने में भी उसे फॉरेन से इंपोर्ट करते हैं।

मान्यवर, बस्तर का चयन क्यों हुआ? भारत मंडपम में एक कार्यक्रम था। बस्तर क्षेत्र से जो अच्छी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त किए हुए युवा थे, ऐसे युवाओं के साथ मेरा संवाद था। मेरे नाश्ते की मेज पर एक बच्ची बैठी थी। उसने कहा कि साहब, क्या आप बता सकते हैं कि माओवादियों ने, नक्सलियों ने हमारे बस्तर को ही क्यों चुना?

मान्यवर, इस विषय को मैं जरा विस्तार से बताना चाहता हूं। हम सब जानते हैं कि वर्ष 1947 में जब हम आज़ाद हुए, तो संसाधन बहुत कम थे। एक लंबी गुलामी के कालखंड को समाप्त करके हम आज़ाद हुए थे। देश के अंदर विकास का नामोनिशान नहीं था। लगभग दो सदी तक इस देश को गुलामी में लूटा गया। जब नया राष्ट्र बना तो राज्य की पहुंच कुछ क्षेत्रों में सीमित थी। वहां इसे बढ़ाना चाहिए था। यह तो समय के साथ-साथ बढ़ेगी।

मान्यवर, क्योंकि संसाधन कम थे, राजस्व कम था तो विकास भी रिसते-रिसते हर क्षेत्र में एक साथ नहीं पहुंच पाया। अगर सड़कें बनानी हैं तो पूरे देश में एक साथ नहीं बन सकीं। अगर बिजली पहुंचानी है तो पूरे देश में एक साथ नहीं पहुंच सकी। दूरदराज के क्षेत्र तक स्टेट की पहुंच की क्षमता सीमित थी। वहां विकास नहीं पहुंचा था। वहां राज्य का रुतबा बुलंद नहीं हुआ था। अब वे अत्याचार के खिलाफ की बात करते हैं। अगर वहां स्टेट पहुंचा ही नहीं था, सुनियोजित भेदभाव का वातावरण ही नहीं था तो वहां अत्याचार कैसे हो गए?

मान्यवर, एक कहानी गढ़ी जा रही है। सच्चाई यह है कि इन्होंने पूरे रेड कॉरिडोर को इसलिए चुना था, क्योंकि वहां स्टेट की पहुंच कम थी। वहां के भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथ में हथियार पकड़ाए गए। मैं आपको बाद में कुछ दृश्य बताऊंगा। मुझे एक बात समझ में नहीं आई कि 15 अगस्त, 1947 से पहले इस देश का आदिवासी बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, रानी दुर्गावती, मुर्मु बंधुओं को हीरो मानकर चलता था, लेकिन वह आदिवासी वर्ष 1947 से 1970 आते-आते माओ को अपना हीरो मानने लगा; यह परिवर्तन क्यों हुआ?

नक्सलवाद के कारण इस पूरे क्षेत्र में सालों तक गरीबी रही

मान्यवर, यह परिवर्तन विकास और अन्याय के कारण नहीं हुआ। कठिन भूगोल के कारण और स्टेट की अनुपस्थिति के कारण अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए वामपंथियों ने इस क्षेत्र को चुना। उन्होंने भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाना शुरू किया। उन्हें अपनी विचारधारा का अनुयायी बनाया। थोड़ा आगे बढ़ने के बाद उनको लगा कि यहां तो अच्छा काम हो सकता है। अगर वे पढ़-लिख जाएंगे तो हमारे साथ नहीं रहेंगे; उन्होंने स्कूलें जला दीं। उनके बैंक खाते खुल जाएंगे तो हमारे साथ नहीं रहेंगे; इसलिए बैंकें जला दीं। दवाखाने जला दिए गए। फिर वे कहते हैं कि यहां विकास नहीं पहुंचा। वामपंथी उग्रवादियों ने उस क्षेत्र में विकास को सालों तक नहीं पहुंचने दिया। आज नरेन्द्र मोदी जी के शासन में वहां विकास पहुंच रहा है। विकास घर-घर जा रहा है। गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण इस पूरे क्षेत्र में सालों तक गरीबी रही।

मान्यवर, मैं इसे और अच्छे तरीके से सदन के सामने रखना चाहता हूं। नक्सलवाद की जड़ें गरीबी और विकास से जुड़ी हुई नहीं हैं। वह वैचारिकी थी। मैं आज वर्ष 1960 के चार क्षेत्रों को पढ़ना चाहता हूं।
एक; नक्सलबाड़ी क्षेत्र में साक्षरता की दर 35 प्रतिशत थी। बस्तर की साक्षरता दर 23 प्रतिशत थी। सहरसा, बिहार, जो नक्सलवाद से कभी प्रभावित नहीं हुआ, वहां पर साक्षरता की दर 33 प्रतिशत थी। बलिया, यूपी जो सोनभद्र से सटा हुआ जिला है और जो नक्सलवाद से प्रभावित था, वहां भी साक्षरता की दर 31 प्रतिशत थी। चारों स्थानों पर साक्षरता की दर कमोबेश समान थी। प्रति व्यक्ति आय नक्सलबाड़ी में पांच सौ रुपये थी, जो कि चारों क्षेत्रों में सबसे ज्यादा थी। बस्तर में 190 रुपये थी, सहरसा में 299 रुपये थी और बलिया में 374 रुपये थी। प्रति व्यक्ति आय भी चारों क्षेत्रों में कमोबेश समान थी। मगर नक्सलबाड़ी और बस्तर में वामपंथी उग्रवाद पनपा, लेकिन सहरसा और बलिया में नहीं पनपा। क्योंकि सहरसा और बलिया का भूगोल उनके अनुकूल नहीं था। वहां घने जंगल नहीं थे। नदी, नाले और छुपने की पहाड़ियां नहीं थीं। हथियार लेकर अपनी मूवमेंट करने, आदिवासियों को दबाने और उन्हें जबरदस्ती अपनी आइडियोलॉजी के साथ जोड़ने की वहां अनुकूलता नहीं थी। अगर विकास ही पैमाना होता, अगर प्रति व्यक्ति आय ही पैमाना होता, तो देश के बहुत सारे हिस्से ऐसे थे जहां सन् 70 में विकास नहीं पहुंचा था। वहां नक्सलवाद क्यों नहीं हुआ?

मान्यवर, आज तो मैं इस सदन में इस विचार को सिरे से खारिज कर रहा हूं। हम लोकतंत्र में हैं। हमने इस देश के संविधान को स्वीकार किया है। संविधान के माध्यम से ही आज इस महान सदन के हम सदस्य हैं। अन्याय किसी के भी साथ हो सकता है। विकास कहीं पर भी कम-ज्यादा हो सकता है। हम संवैधानिक रास्तों से अपनी लड़ाई लड़ेंगे या हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों को मार डालेंगे? किस थ्योरी का यहां से समर्थन हो रहा है? मैं नहीं समझ पा रहा हूं। अगर आप धमकाना चाहते हैं कि यह होगा तो ये लोग भी हथियार उठाएंगे, ऐसा होगा तो ये भी हथियार उठाएंगे; मान्यवर, यह डरने वाली सरकार नहीं है। यह सबके साथ न्याय करने वाली सरकार है। किसी के साथ भी अन्याय हो तो हथियार हाथ में उठा लेना; क्या यह लोकतांत्रिक तरीका है? क्या हमारे संविधान के बताए हुए सारे रास्ते कुंद हो गए हैं, बंद हो गए हैं? संविधान ने हर चीज़ की व्यवस्था की है।

मान्यवर, आज इस बहस को देख रहे भारत के युवाओं के लिए नक्सलवाद की टाइमलाइन भी मैं बताना चाहता हूं। मान्यवर, 1970 के दशक में नक्सलवाद की शुरुआत नक्सलबाड़ी से हुई, बंगाल से हुई। सन् 1971 के एक ही वर्ष में हिंसा की 3,620 घटनाएं वहां पर हुईं। सन् 80 का दशक आते-आते पीपल्स वॉर ग्रुप बन गया और फिर यह महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और ओडिशा तक गया। जब मैं मध्य प्रदेश बोलता हूं तो वह पुराना मध्य प्रदेश है, जब छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश एक ही हुआ करते थे। माओवादी इन तीन राज्यों में फैले। उसके बाद 90 के दशक में दुनिया भर में जैसे वामपंथी विचारधारा सिकुड़ती गई, यहां पर भी उग्रवादी गुटों में और वामपंथी पार्टियों में विलय शुरू हुआ तथा वर्ष 2004 में दो प्रमुख गुट मिले और सीपीआई माओवादी का गठन किया गया। सन् 70 से वर्ष 2004 तक के इस पूरे कालखंड में, मान्यवर, चार साल छोड़कर पूरा समय कांग्रेस पार्टी का शासन रहा है। यह उन्हें याद रखना चाहिए।
कब माओवादी विचारधारा फैली, पनपी, एकत्रित हुई; यह आपको याद रखना चाहिए। मान्यवर, सन् 1970 को भी हमें याद करना चाहिए। अभी एक माननीय सदस्य जी ने बताया कि 1970 में क्या हुआ था। 1970 में एक नारा लगा था; “अंतरात्मा की आवाज़ पर मतदान करो।”

माओवादी पार्टियों ने इंदिरा जी को समर्थन किया

वह नारा इंदिरा जी ने लगाया और संजीव रेड्डी जी के खिलाफ अपना एक प्रत्याशी उतारा। उस वक्त आधार तलाश रहीं माओवादी पार्टियों ने इंदिरा जी को समर्थन किया और अपनी पार्टी में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए श्रीमती गांधी जी ने उस समर्थन को लपक लिया। और 1970 से लेकर 1980 तक इंदिरा जी उस विचारधारा से मुक्त नहीं हो सकीं। वे माओवादी विचारधारा की गिरफ्त में रहीं।

मान्यवर, यही वह समय है जब नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आंदोलन बारह राज्यों में फैल गया। देश के 17 प्रतिशत भू-भाग में फैल गया और दस प्रतिशत से ज्यादा आबादी तक पहुंच गया। कई सुरक्षा विशेषज्ञ ऐसा कहते थे कि सत्ता के समर्थन के बगैर किसी भी हथियारबंद आंदोलन का, देश के दिल में बीचों-बीच, तिरुपति से लेकर पशुपतिनाथ तक, यह रेड कॉरिडोर संभव ही नहीं है। अभी राजकुमार जी पूछ रहे थे कि हथियार कहां से आए? मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि जो हथियार पकड़े गए हैं, उनमें से 92 प्रतिशत हथियार पुलिस के लूटे हुए हथियार हैं। थाने लूट लिए, गोलियां लूट लीं और उनका उपयोग निर्दोष जवानों को, बच्चों को, कृषकों को मारने के लिए किया गया।

मान्यवर, एक भ्रांति की तरह वामपंथी विचारधारा ने इसे प्रचार के माध्यम से फैलाया। अपनी विचारधारा को टिकाने के लिए फैलाया कि अन्याय से बचने के लिए हथियार हाथ में उठाए हैं। मगर मैं फिर से एक बार पूछना चाहता हूं कि क्या राज्य, शासन और संविधान की वैधता को किसी भी अन्याय के एवज में चुनौती दी जा सकती है?

किसी भी समस्या का समाधान बहस से निकल सकता है, हथियारों से नहीं

अन्याय के खिलाफ लड़ने का हमारे संविधान ने रास्ता बनाया है; इसीलिए राजकुमार रोत जी यहां बैठे हैं, चुनाव लड़े और इसीलिए यहां बैठे हैं, वरना वे भी सरेंडर की सूची में होते, अगर हथियार लिया होता। हां, इसीलिए कहता हूं, यही रास्ता है, यही रास्ता है। आज जिस व्यवस्था के निर्मूलन की मैं बात कर रहा हूं, वह लोकतंत्र की जड़ों पर वार कर रही है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि किसी भी समस्या का समाधान बहस से निकल सकता है, हथियारों से नहीं निकल सकता।

मान्यवर, इन्होंने इस देश में वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया; स्टेट का वैक्यूम, सारी व्यवस्थाएं नष्ट करके गवर्नेंस का वैक्यूम, संविधान पर से श्रद्धा खत्म करके संविधान का वैक्यूम और पुलिस थानों को जलाकर सिक्योरिटी का वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया है।

मैं आज इस मंच से देश की जनता को यह बताने आया हूं कि माओवादी हिंसा करने वालों के, नक्सलवाद करने वालों के दिन लद गए हैं। अब इस सरकार के रहते ऐसा लंबे समय तक नहीं चलेगा। ऐसा कई देशों में हुआ है; जैसे कंबोडिया, पेरू, कोलंबिया। कई देशों का इतिहास इससे भरा पड़ा है। भयानक रक्तपात हुआ है। हमारे यहां भी 20 हजार लोग मारे गए।

वामपंथी विचारधारा अपना आधार खो बैठी है

मान्यवर, यह एक वैचारिक लड़ाई है। हमारे देश की जनता को माओवादी उग्रवाद को अन्याय के खिलाफ हथियारों की लड़ाई मानने की गलती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वामपंथी विचारधारा अपना आधार खो बैठी है।

सारे वामपंथी येन-केन-प्रकारेण अलग-अलग थ्योरी रचकर अपने अस्तित्व को टिकाने में लगे हैं। इनका एकमात्र एजेंडा देश में वैक्यूम खड़ा करना है; देश के स्वाभाविक असंतोष को हथियारों के माध्यम से दिशा देना है। स्टेट का वैक्यूम, गवर्नेंस का वैक्यूम, संविधान का वैक्यूम, सिक्योरिटी का वैक्यूम और रक्तपात; यही उनका उद्देश्य है, जो अब सफल नहीं होगा।

मान्यवर, कई सारे भोले-भाले ग्रामीणों को शत्रु-मुखबिर बताकर फांसी पर चढ़ा दिया। कौन-सी अदालत ने फांसी पर चढ़ाया? इन्होंने जनता अदालत के नाम से एक प्रहसन खड़ा किया, जहां न कोई वकील है, न कोई जज है; वे स्वयं बैठे हैं, वे स्वयं फैसले करते हैं और फांसी दे देते हैं। मैंने इसका जस्टिफिकेशन सिद्ध करते हुए सुना है। मैं आज नाम लेना नहीं चाहता, वरना यहां से लोग खड़े हो जाएंगे। इसका औचित्य नहीं हो सकता। इस देश में संविधान का राज है। फैसला संविधान द्वारा, सरकारों द्वारा स्थापित अदालतों में ही हो सकता है। अगर किसी के साथ अन्याय हो गया है तो उसके लिए त्रिस्तरीय न्यायिक प्रणाली है। गवर्नेंस का वैक्यूम कैसे हुआ? उन्होंने समानांतर सरकार चलाई। छत्तीसगढ़ के बस्तर में उनका गृह मंत्री होता था, उनका न्याय मंत्री होता था, लूटे हुए अनाज को बांटने वाला खाद्य और आपूर्ति मंत्री होता था। एक जनताना सरकार के नाम से भ्रांति खड़ी की। इन्होंने विकास की योजनाओं को रोकने का काम किया। इन्होंने संविधान और न्याय व्यवस्था को निशाना बनाकर संविधान का वैक्यूम खड़ा करने का काम किया। कोई चुनाव न लड़े, मतदान नहीं होने देंगे, सरपंच कोई नहीं होगा, कोई तहसील पंचायत, जिला पंचायत का सदस्य नहीं होगा, विधायक जो वे चाहते हैं वही जीतकर आएंगे। किस प्रकार की व्यवस्था खड़ी करना चाहते थे? इसका समर्थन कैसे हो सकता है? अब कह रहे हैं कि बातचीत करो। जो ऐसा कह रहे हैं, मैं उन्हें बताना चाहता हूं; मैं बस्तर में जाकर, बस्तर के हर तहसील में जाकर, सार्वजनिक मंचों पर पचास बार कह चुका हूं कि हथियार डाल दीजिए, सरकार आपके पूरे पुनर्वास की व्यवस्था करेगी, मगर वे हथियार नहीं डालेंगे।

जो गोली चलाता है, उसे जवाब गोली से ही दिया जाता है

मान्यवर, हमारी सरकार की पालिसी है; चर्चा उसी से होती है जो हथियार डालता है। जो गोली चलाता है, उसे जवाब गोली से ही दिया जाता है। यह हमारे सरकार की पालिसी है। मैं आगे बताता हूं कि कितने लोगों ने हथियार डाले हैं और अब पुनर्वास कर रहे हैं।

मान्यवर, इसका नतीजा यह है कि वर्ष 1970 से 2026 तक यहां यह चलता रहा। कई ऐसे हमले हुए। जहानाबाद का हमला हुआ। एक हजार सशस्त्र नक्सलियों ने सीआरपीएफ के कैंप और जेल को कब्जा करके अजय कानू समेत 389 कैदियों को मुक्त कराकर ले गए। आंध्र-ओडिशा सीमा पर दर्जनों स्कूलों

वर्ष 1969 में सीपीआई (एमएल) की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य विकास का वैक्यूम भरना नहीं था, किसी के अधिकारों की रक्षा करना नहीं था। इनके संविधान में उद्देश्य था कि संसदीय राजनीति का विरोध करके सशस्त्र क्रांति करना; जो रूस और चीन में कर चुके थे

और बुनियादी ढांचे का सुनियोजित विनाश किया। हर ठेके में 20 प्रतिशत का जनताना टैक्स वसूलते रहे। झारखंड में 70 ट्रकों में एक साथ आग लगा दी। मालगाड़ी की 11 बोगियों में एक साथ आग लगा दी। जनताना टैक्स की वार्षिक वसूली; जो कि इनके ही सेक्रेटरी के कंप्यूटर से मिली है; उसके मुताबिक यह राशि 240 करोड़ रुपये थी। इसे कैसे उचित ठहरा सकते हैं? किस तरह से उचित ठहरा सकते हैं?

नक्सलवाद कहां से आया|

मान्यवर, यह नक्सलवाद मूल रूप से कहां से आया? परंतु हमारे देश के लिए वह किसी भी प्रकार से ऐसी स्थिति थी ही नहीं, जहां इस प्रकार की साम्यवादी विचारधारा, लेफ़्टिस्ट विचारधारा का पनपना हो पाए।

मान्यवर, वर्ष 1905 से 1924 के बीच रूस में साम्यवादियों ने क्रांति की। 1914 के युद्ध में रूस की आर्थिक हालत बहुत बिगड़ गई और वहां भूख, महंगाई, अव्यवस्था और 1905 में खूनी रविवार की घटना ने जनता का विश्वास शासन के प्रति तोड़ दिया और उसने 1917 की क्रांति की नींव तैयार की।

मान्यवर, मजबूर होकर निकोलस द्वितीय ने गद्दी छोड़ दी। वहां एक वैक्यूम पैदा हुआ और उस वैक्यूम को भरने के लिए लेनिन की अध्यक्षता में साम्यवादी सरकार बनी। इसी तरह से चीन में एक अव्यवस्था खड़ी हुई। करोड़ों किसान गरीबी और भुखमरी में जीवन जी रहे थे। वर्ष 1921 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। माओ उनके नेता बने। कम्युनिस्टों और कुओमिन्तांग; जो वहां के राष्ट्रवादी थे, राजा के वफादार थे; उनके बीच युद्ध हुआ। वर्ष 1934-35 में एक लॉन्ग मार्च हुआ। पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना वर्ष 1949 में हुई। वर्ष 1949 और वर्ष 1925 की दो महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। इसका हमारे देश पर क्या असर हुआ, यह आप लोग समझें। जैसे ही रूस में साम्यवादियों की सरकार का गठन हुआ, यहां वर्ष 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी सीपीआई की स्थापना हुई। मैं उनके समर्थकों से पूछना चाहता हूं कि रूस में कम्युनिस्टों की जब सरकार बनी तो उसी वक्त यहां सीपीआई की स्थापना हुई; तो क्या इनके बीच कोई संबंध है? यह सोचने की बात है कि रूस की सरकार ने प्रायोजित करके दुनिया भर में कम्युनिस्ट पार्टी की रचना की और इसका एक हिस्सा हमारे यहां बना। जिस पार्टी की नींव ही किसी दूसरे देश की प्रेरणा से पड़ी है, वह हमारे देश का भला कैसे सोचेगी? इन्होंने तो अंग्रेज़ों का भी समर्थन किया था। वर्ष 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) बनी। सीपीआई (एम) क्यों बना?

सीपीआई (एम) एवं सीपीआई (एमएल) का गठन

मान्यवर, वर्ष 1964 में सीपीआई (एम) बनी। यह भी समझना होगा कि जब पहले से सीपीआई थी तो सीपीआई (एम) क्यों बनी? मान्यवर, वर्ष 1964 में सोवियत रूस और चीन के बीच झगड़ा हुआ। दोनों साम्यवादी राष्ट्रों में अलग-अलग विचारधारा की साम्यवादी सरकारें आईं। वहां जिस तरह से अलग-अलग विचारधारा की सरकार आई तो यहां भी एक चीन-समर्थक पार्टी सीपीआई (मार्क्सवादी) खोल दी, जिसके सदस्य श्री अमरा राम जी बोल रहे थे। मान्यवर, ये दोनों पार्टियां कम्युनिस्टों की हैं। एक रूस की क्रांति के समय बनी और दूसरी रूस-चीन के बीच मतभेद के बाद बनी। इसके बाद वर्ष 1969 में; संसदीय राजनीति का विरोध करने के लिए; मेरी बात सभी लोग ध्यान से सुनें, आपके माध्यम से मैं देश को भी बताना चाहता हूं कि वर्ष 1969 में सीपीआई (एमएल) की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य विकास का वैक्यूम भरना नहीं था, किसी के अधिकारों की रक्षा करना नहीं था। इनके संविधान में उद्देश्य था कि संसदीय राजनीति का विरोध करके सशस्त्र क्रांति करना; जो रूस और चीन में कर चुके थे। लेकिन यहां राजशाही नहीं बची थी। अंग्रेज़ यहां नहीं थे। यहां संविधान से चलने वाली लोकतांत्रिक सरकार बन गई थी। फिर क्यों संसद का विरोध? ये लोग चुनाव लड़ते, जीतकर आते और अपनी बातें मनवाते। मगर वैसे तो कोई बात सुनेगा नहीं, इसलिए सशस्त्र क्रांति। क्रांति कई प्रकार की होती है; वैचारिक क्रांति होती है, कुछ लोगों ने गीत लिखकर क्रांति की है, महात्मा जी ने अहिंसक क्रांति की थी। इन्होंने सशस्त्र क्रांति और संसदीय राजनीति का विरोध; इन दोनों उद्देश्यों के साथ सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) बनाई और ये ही आज के माओवादी हैं। ये मूल को समझे बगैर अन्याय-अन्याय रटे जा रहे हैं। भाई, यह अन्याय के लिए नहीं है। हमारी संसदीय राजनीति का विरोध करने के लिए, संसद का; जिसके आप सदस्य हैं; इसका विरोध करने के लिए बने हैं। उसके बाद वर्ष 1975 में जैसे ही कांग्रेस का समर्थन मिला, एमसीसी माओवादी बनी और बिहार-झारखंड केंद्रित पार्टी बनी। वर्ष 1980 में पीडब्ल्यूजी बना; वह आंध्र प्रदेश केंद्रित बना। वर्ष 1982 में दलित-किसान केंद्रित सशस्त्र संघर्ष; सीपीआई (एमएल) पार्टी यूनिटी; बिहार में बनी। दलित-किसान केंद्रित संघर्ष इनका उद्देश्य था। वर्ष 1998 में पीपल्स वॉर ग्रुप में माओवादियों का एकत्रीकरण हुआ। इतना सब करने के बाद भी वे सफल नहीं हुए। वर्ष 2000 में पीएलजीए बना, जो सैन्य शाखा बनी। गुरिल्ला फोर्स बनाई गई। वर्ष 2004 में पीडब्ल्यूजी और एमसीसी दोनों का विलय हो गया। थ्योरी वाले और हथियार उठाने वाले; दोनों का वर्ष 2004 में विलय हुआ। वर्ष 2014 में मोदी जी आए और वर्ष 2026 में सबकी समाप्ति हो गई। इनका कुल वर्ष 1925 से लेकर वर्ष 2026 तक 101 साल का इतिहास है। इसीलिए मैं सामने बैठे साथी सदस्यों से कहता हूं; आप इसे अन्याय के खिलाफ संघर्ष का स्वरूप मानकर महिमामंडित मत कीजिए। हम जिस सदन में बैठे हैं, वे इसका विरोध करने के लिए जन्मे हैं। वे वोट की जगह बुलेट से शासन प्राप्त करना चाहते हैं।

नागरिक की सुरक्षा

मान्यवर, अगर यही बात है कि चर्चा कीजिए, चर्चा कीजिए; चर्चा से कोई परहेज नहीं है, हर कोई चर्चा का स्वागत करता है। फिर पुलिस क्यों रखी गई है? पुलिस की जरूरत ही नहीं है। सेना क्यों रखी गई है?

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो चर्चा से मानते ही नहीं हैं। वहां बल प्रयोग करके उनके अत्याचार से निर्दोष नागरिकों को बचाना पड़ता है। जब नक्सलवादियों ने सैकड़ों निर्दोष किसानों को बम लगा-लगाकर पैरविहीन कर दिया, कई स्कूलों पर हमला करके आठ, नौ और दस साल के बच्चों को उठाकर ले गए और नक्सलवाद की सेना में भर्ती कर दिया; तो क्या हम मूकदर्शक बनकर खड़े रहें? यह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है

पैरामिलिट्री बल क्यों रखे गए हैं? कुछ लोग ऐसे होते हैं जो चर्चा से मानते ही नहीं हैं। वहां बल प्रयोग करके उनके अत्याचार से निर्दोष नागरिकों को बचाना पड़ता है। जब नक्सलवादियों ने सैकड़ों निर्दोष किसानों को बम लगा-लगाकर पैरविहीन कर दिया, कई स्कूलों पर हमला करके आठ, नौ और दस साल के बच्चों को उठाकर ले गए और नक्सलवाद की सेना में भर्ती कर दिया; तो क्या हम मूकदर्शक बनकर खड़े रहें? यह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। हर नागरिक की सुरक्षा नरेन्द्र मोदी जी ने सुनिश्चित की है। जो भी नागरिकों के साथ अन्याय करेगा; समझा तो ठीक है, वरना ये बल इसी के लिए बनाए गए हैं। इनका उपयोग होगा, परिणाम आएगा और आज आ भी गया है।

अर्बन नक्सल से सवाल

मान्यवर, जो इनके समर्थन में; जिन्हें लोकप्रिय भाषा में अर्बन नक्सल कहते हैं; मैं उन बुद्धिजीवी भाइयों से सवाल करना चाहता हूं। मैंने छह दिनों में लगभग दो हजार लेख देखे हैं। उन्हें सारे बुद्धिजीवी भाइयों ने लिखा है। मेरे पास उसका पूरा जिस्ट भी है। इन सभी आर्टिकलों में; हथियार उठाकर घूमने वाले माओवादियों के साथ चर्चा करो, वे अन्याय के लिए लड़ रहे हैं, उन्हें मारना नहीं चाहिए, उनके प्रति सहानुभूति होनी चाहिए, सरकार विकास जल्दी करे; इन सब बातों का जिक्र है। एक भी लेख उस आठ साल के अबोध बच्चे के लिए नहीं है, जिसे उठाकर ले जाकर हाथ में हथियार पकड़ा दिया गया; वह उसकी मां के लिए नहीं है।

मान्यवर, एक भी लेख उस किसान के लिए नहीं है जो अपने गांव से खेत में जाते हुए बम विस्फोट में पैर गंवा बैठा और पूरा जीवन दिव्यांग बन गया; उसकी सहानुभूति के लिए नहीं है। पांच हजार से ज्यादा सुरक्षा बलों के जवान लड़ते-लड़ते शहीद हो गए, उनकी विधवाओं के लिए एक भी लेख नहीं है। उनके अनाथ बच्चों के लिए एक भी आर्टिकल नहीं है। आपकी सारी मानवता संविधान तोड़कर हथियार लेकर घूमने वालों के लिए ही है? इनके हथियारों से जो नागरिक मारे जा रहे हैं, उनके लिए आपकी मानवता नहीं है। मानवता के इस दोहरे चरित्र को मैं स्वीकार नहीं करता; ये मानवतावादी नहीं हैं, नक्सलियों के समर्थक हैं। अगर मानवतावादी होते तो जिस किसान का पैर उड़ गया, उसकी भी चिंता करते; जिस अबोध बच्चे से उसका बचपन छीन लिया गया, उसकी भी चिंता करते।

सलवा जुडूम की शुरुआत

मान्यवर, वे गरीब हाथ में हथियार नहीं लेना चाहते; गरीबों के हाथों में हथियार देकर अपनी विचारधारा को, अपनी आइडियोलॉजी को पनपाना चाहते हैं, मगर अब उनके भी दिन लद गए हैं। आप स्पष्टता से सुन लीजिए, अब पूरे देश में जागरूकता आ गई है। उससे क्या हुआ? आज पूरा देश सुन रहा है, आज पूरा देश समझ रहा है।

मान्यवर, मैं आज एक बात और बताना चाहता हूं; किसी सदस्य ने सलवा जुडूम का जिक्र किया। कांग्रेस के नेता और सारे लोग; मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता, वरना फिर से खड़े हो जाएंगे; वे जो सलवा जुडूम पर जजमेंट आया, उसका पक्ष लेते हैं।

मान्यवर, सलवा जुडूम की शुरुआत वर्ष 2005 में राज्य-समर्थित, अर्थात् सरकार-समर्थित जन आंदोलन के रूप में हुई। आदिवासी युवाओं को एसपीओ बनाया गया, जिन्हें कोया कमांडो कहते थे। जो लोग आतंक फैलाते थे, उनके सामने लड़ने के लिए उन्हें ट्रेनिंग दिया गया।

मान्यवर, जो ऐम्बुश की रणनीति अपना रहे थे, उनके खिलाफ उसी प्रकार की रणनीति अपनाने का निर्णय हुआ। अब मैं यह पूछना चाहता हूं कि सलवा जुडूम की शुरुआत किसने की? यह शुरुआत किसी भाजपा के कार्यकर्ता ने नहीं की थी। सलवा जुडूम की शुरुआत श्रीमान कर्मा ने की थी, जिन्हें नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया था और वे कांग्रेस के नेता थे।

मान्यवर, 5 जुलाई, 2011 को सर्वोच्च न्यायालय में नंदिनी सुंदर और अन्य लोगों ने एक याचिका दायर की और सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी के नेतृत्व में निर्णय दिया कि नक्सलियों के खिलाफ राज्य की लड़ाई गैर-कानूनी है और तुरंत ही इनसे हथियार वापस लेने का आदेश दे दिया।

मान्यवर, इसका क्या परिणाम हुआ? उनके हथियार वापस लिए गए, नक्सलियों के हाथों में हथियार थे; उन्होंने चुन-चुनकर सलवा जुडूम से जुड़े हुए लोगों को मार दिया। वही सुदर्शन रेड्डी बाद में विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बने। कांग्रेस पार्टी कह रही है कि हमारा नक्सलियों से क्या लेन-देन है? यह लेन-देन है। जो देश की कानून-व्यवस्था को मानता है, वह सुदर्शन रेड्डी को कभी अपना प्रत्याशी नहीं बनाएगा।

मान्यवर, हमारे यहां न्याय-तंत्र की व्यवस्था है। जो न्यायाधीश बनता है, उसे तटस्थ माना जाता रहा है; यह हमारे न्याय-तंत्र की आत्मा है। मगर कोई व्यक्ति न्यायाधीश बनकर अपनी व्यक्तिगत आइडियोलॉजी का उपयोग करके, संवैधानिक आवरण पहनाकर अपनी आइडियोलॉजी को आदेश में

वर्ष 2014 के बाद इस पूरे क्षेत्र में 17,589 किलोमीटर सड़कें बनाने की मंजूरी दी गई है, जिनमें से 12 हजार किलोमीटर सड़कें बन चुकी हैं। ये विकास की बात करते हैं। यह इसलिए हो रहा है कि धीरे-धीरे नक्सलवाद समाप्त हो रहा है, वरना वहां सड़कें नहीं होती थीं; आईईडी गाड़ देते थे और ट्रकों को जला देते थे। लगभग 20 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। हम लगभग 5 हजार मोबाइल टावर 6 हजार करोड़ रुपये के खर्च से लगा चुके हैं

बदलकर; जिससे हज़ारों बेगुनाह आदिवासियों की जान जाए; ऐसा फैसला देता है, तो मैं ऐसे निर्णय की घोर निंदा करता हूं। मैं उन लोगों की भी निंदा करता हूं जिन्होंने उन्हें वोट दिया और प्रत्याशी बनाया। आइडियोलॉजी जनता के भले से ऊपर नहीं हो सकती।

विकसित बस्तर की रचना

मान्यवर, आइडियोलॉजी कभी अबोध आदिवासियों की सुरक्षा के ऊपर नहीं हो सकती। ये कह रहे हैं कि विकास नहीं है। मैं वर्ष 2014 के पहले का बोलूंगा तो फिर से हो-हल्ला करेंगे, मगर 2014 के बाद का तो मुझे बोलने का अधिकार है, क्योंकि हमारी पार्टी की सरकार है, हमारे नेता के नेतृत्व में, नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में यह सरकार चल रही है। वर्ष 2014 के बाद इस पूरे क्षेत्र में 17,589 किलोमीटर सड़कें बनाने की मंजूरी दी गई है, जिनमें से 12 हजार किलोमीटर सड़कें बन चुकी हैं। ये विकास की बात करते हैं। यह इसलिए हो रहा है कि धीरे-धीरे नक्सलवाद समाप्त हो रहा है, वरना वहां सड़कें नहीं होती थीं; आईईडी गाड़ देते थे और ट्रकों को जला देते थे। लगभग 20 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। हम लगभग 5 हजार मोबाइल टावर 6 हजार करोड़ रुपये के खर्च से लगा चुके हैं। वहां दूरसंचार पहुंचेगा तो ये दुनिया के साथ जुड़ेंगे, देश के साथ जुड़ेंगे और विकसित भारत के साथ जुड़ेंगे। दो अन्य योजनाओं में और 8 हजार 4जी टॉवर बनाने का निर्देश नरेन्द्र मोदी जी ने दिया है। इससे दिल्ली जितनी ही कनेक्टिविटी छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना के आदिवासी क्षेत्रों में होगी।

मान्यवर, 1,804 बैंक शाखाएं इन 12 सालों में खुली हैं, 1,321 एटीएम खुले हैं, 37,850 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंस बनाए गए और 6,025 डाकघर खुले। यह सिर्फ 12 साल में हुआ है। पहले कुछ नहीं हुआ; चर्चाएं कीं, लेकिन माओवादियों ने विकास नहीं होने दिया। हमने माओवादियों से चर्चा नहीं की, उन्हें समाप्त किया और विकास को आगे बढ़ाया। हमने 259 एकलव्य आदर्श विद्यालय स्वीकृत किए, 47 आईटीआई, 49 (SDC) स्किल डेवलपमेंट सेंटर बनाए। हमने इन सबमें लगभग 800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च इन 12 सालों में किया है। जगदलपुर, छत्तीसगढ़ में जहां सीएचसी, पीएचसी नहीं थे, वहां 240 बिस्तरों का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल हमने बनाया है। सिविक प्रोग्राम में 212 करोड़ रुपये के कार्य किए हैं, जो स्वास्थ्य, शिविर और दवाओं से जुड़े हुए हैं। हमने जनजातीय युवा एक्सचेंज के कार्यक्रम भी बनाए। सिक्योरिटी के लिए, राज्यों की सहायता के लिए एसआरई योजना लेकर आए और दस साल में 3 हजार करोड़ रुपये दिए; स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम लेकर आए और 5 हजार करोड़ रुपये दिए; विस्तारित एसआईएस योजना लेकर आए और 2 हजार करोड़ रुपये दिए तथा 4 हजार करोड़ रुपये केंद्रीय निधि द्वारा क्रिटिकल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए दिए। छोटी-छोटी अवसंरचना; जैसे पानी की टंकी, जोड़ने वाली पुलिया, गांव के अंदर पंचायत घर बनाना; इसके लिए 4 हजार करोड़ रुपये दिए। यह क्यों हो पाया और वर्ष 1970 से अब तक क्यों नहीं हुआ? कांग्रेस पार्टी करना नहीं चाहती थी, ऐसा नहीं है; ये करने जाते थे, वे धमाके करके मार देते थे। हमने धमाके करने वालों को समाप्त किया, तो यह विकास अब हो रहा है और विकसित बस्तर की रचना हो रही है।

पैरामिलिट्री फोर्सेज का अभियान

मान्यवर, हथियारबंद माओवादियों के खिलाफ हमारे पैरामिलिट्री फोर्सेज ने जो अभियान चलाया, मैं अब उस पर आ रहा हूं। वर्ष 2014 के बाद क्या बदला? सीएपीएफ तो वही है, राज्य पुलिस भी वही है। वर्ष 2014 के बाद क्लियर पालिसी और स्ट्रॉंग पोलिटिकल विल इस काम में जुड़ी। नरेन्द्र मोदी जी ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस देश के किसी भी कोने में; चाहे कश्मीर हो, चाहे उत्तर-पूर्व हो, चाहे वामपंथी उग्रवादी विस्तार हो; गैर-कानूनी प्रवृत्ति नहीं चलेगी। इस पर कठोर हाथों से काम लिया जाएगा।

केंद्र और राज्य के बीच अलाइनमेंट हुआ। राज्य की क्षमता में गवर्नमेंट, गवर्नेंस और पुलिसिंग; तीनों में हमने सुधार किया। सीएपीएफ और राज्य पुलिस का समन्वय बढ़ाया। ऐक्शनेबल इंटेलिजेंस को नीचे तक परकोलेट करने की व्यवस्था की और जिम्मेदारियां भी स्पष्ट कर दीं।

राज्य की उपस्थिति

मान्यवर, ऑल एजेंसी एप्रोच शुरू किया। सिर्फ हथियार नहीं; एनआईए, ईडी, खुफिया एजेंसी, नेटवर्क, फंडिंग और सपोर्ट सिस्टम, सभी पर हमने प्रहार किया। इफेक्टिव सरेंडर पालिसी लेकर आए। मैं बाद में आंकड़ा बताता हूं। डेवलपमेंट और गवर्नेंस में हमने कोई वैक्यूम नहीं छोड़ा और अब पहले जहां राज्य की उपस्थिति नहीं थी, वहां आज राज्य की उपस्थिति है और नक्सलवाद की हार का सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य अब हर गांव में पहुंच चुका है, वहां पंचायत बन चुकी है।

मान्यवर, विकास के लिए हमने व्होल ऑफ़ गवर्नमेंट एप्रोच अपनाया और सुरक्षा की नकेल कसने के लिए व्होल ऑफ़ एजेंसी एप्रोच अपनाया। मान्यवर, आज मैं देश के सामने तीन तिथियां जरूर बताना चाहता हूं; 24 अगस्त, 2024, 20 अगस्त, 2019 और कल 31 मार्च, 2026। 20 अगस्त, 2019 को गृह मंत्रालय में एक बैठक हुई; मोदी जी ने विकास का काम तो पहले ही शुरू कर दिया था। पुलिस

बिहार वर्ष 2024 से पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। महाराष्ट्र, एक तहसील छोड़कर, वर्ष 2024 से पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। ओडिशा वर्ष 2024 से पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। झारखंड, एक जिला छोड़कर, वर्ष 2024 से पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। सिर्फ छत्तीसगढ़ नहीं हुआ था

कोआर्डिनेशन का काम, मॉडर्नाइजेशन का काम, रिटायर्ड नक्सलियों को पुलिस बल में लेने का काम, इनके समन्वय का काम, खुफिया एजेंसी के साथ; यह सब 20 अगस्त को तैयार किया गया। तो फिर इतनी देर क्यों लगी?

कांग्रेस सरकार ने नक्सलवादियों को बचाकर रखा

मान्यवर, देर क्यों लगी; क्योंकि बीच में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी। मैं आज रिकॉर्ड पर यह कहना चाहता हूं। बिहार वर्ष 2024 से पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। महाराष्ट्र, एक तहसील छोड़कर, वर्ष 2024 से पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। ओडिशा वर्ष 2024 से पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। झारखंड, एक जिला छोड़कर, वर्ष 2024 से पहले नक्सलमुक्त हो चुका था। सिर्फ छत्तीसगढ़ नहीं हुआ था, क्योंकि वहां कांग्रेस की सरकार थी। मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है, क्योंकि सत्य बोलते हुए किसी स्थान का विचार नहीं करना चाहिए। सत्य बोलने के लिए ही होता है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार ने नक्सलवादियों को बचाकर रखा था।

मान्यवर, मैं किसी व्यक्ति के सामने नहीं कह रहा हूं। मुझे ये रूल्स न समझाएं। व्यक्ति के सामने यदि करना है तो भूपेश बघेल को पूछो; प्रमाण प्रस्तुत करूं क्या यहां पर? हां बोलो तो बोलो, वरना फंस जाओगे।

साझा रणनीति

मान्यवर, वर्ष 2024 में छत्तीसगढ़ में सरकार बदली; उसके दूसरे ही महीने मैं वहां गया था। भाजपा की सरकार ने पूरे समर्थन का भरोसा दिया। साझा रणनीति बनी और 24 अगस्त 2024 को मैंने घोषित किया था कि 31 मार्च 2026 को हम नक्सलवाद पूरे देश से समाप्त कर देंगे। उसके बाद जो हुआ, वह मैं बताना चाहता हूं।

महोदय, हमने सुरक्षा घेरे में बढ़ोतरी की। माननीय मोदी जी के 11 साल के कार्यकाल में 596 सुदृढ़ पुलिस थाने बनाए गए। वर्ष 2014 में 126 नक्सल प्रभावित जिले थे और अब सिर्फ दो बचे हैं। वर्ष 2014 में 35 सर्वाधिक प्रभावित जिले थे और अब शून्य हैं। नक्सल घटनाएं दर्ज करने वाले 350 पुलिस थाने थे, अब सात हैं। पिछले छह सालों में 406 नए सीएपीएफ शिविर बनाए गए, 68 नाईट लैंडिंग हेलीपैड बनाए गए, 400 बुलेट प्रूफ और ब्लास्ट प्रूफ गाड़ियां जवानों को दिए गए, पांच अस्पताल जवानों के लिए बनाए गए और संचार व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त की गई।

गोली का जवाब गोली से

मान्यवर, इसका परिणाम क्या हुआ? यहां बहुत सांसदों ने कहा कि मारना नहीं चाहिए, वार्ता करनी चाहिए; इसलिए मैं ये आंकड़े उनके लिए पढ़ना चाहता हूं। मैं वर्ष 2024, 2025 और 2026 का संयुक्त आंकड़ा पढ़ रहा हूं; मार्च 2026 तक, यानी तीन साल में, 706 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए और 2,218 गिरफ्तार हुए। हमने उन्हें पकड़कर जेलों में डाला और अदालतों की शरण में ले गए। 4,839 लोगों ने आत्मसमर्पण किया और ये हमसे संवाद करने की बात कर रहे हैं। 2,218 जेल में गए और सिर्फ 706 लोग, जिन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया, उन्हें पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। मैं कहता हूं कि शासन की यही एप्रोच होनी चाहिए; जो वार्ता करना चाहता है, उसके साथ वार्ता करनी चाहिए और जो हमारे जवानों, किसानों, बच्चों और आदिवासियों पर गोली चलाता है, उसका जवाब गोली से देना चाहिए। यही शासन का रूल है और यही शासन का नियम है।

टेक्नोलॉजी का उपयोग

मान्यवर, हमने संवाद, सुरक्षा और समन्वय; तीनों का उपयोग किया है। हमने नवीनतम टेक्नोलॉजी का उपयोग करके सटीक निगरानी और ढेर सारे टेलीफोन बिलों का विश्लेषण किया। लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम, मोबाइल फोन की गतिविधियां, साइंटिफिक कॉल लॉग, सोशल मीडिया एनालिसिस, फोरेंसिक और तकनीकी संस्थानों की सहायता लेकर पूरे अभियान का हमारे गृह मंत्रालय ने नेतृत्व किया। ड्रोन सर्वेलेंस, सैटेलाइट का उपयोग, इमेजिंग टेक्नोलॉजी और आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस-आधारित डेटा एनालिसिस से सफलता प्राप्त हुई।

महोदय, कई ऐसे अभियान चले जिन्होंने बड़े-बड़े क्षेत्र मुक्त करा दिए। अगर मैं नहीं बोलूंगा तो हमारे जवानों के साथ अन्याय होगा। वर्ष 2022 में ‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ बिहार में बूढ़ा पहाड़ क्षेत्र में चला। वर्ष 2022 में ‘ऑपरेशन डबल बुल’ गुमला, लोहरदगा और लातेहार में चला और 8 से 25 फरवरी के बीच तीनों जिले नक्सलवाद से मुक्त हो गए। 1 से 3 सितंबर 2022 में ‘ऑपरेशन थंडर स्ट्रॉम’ झारखंड के सरायकेला, पश्चिमी सिंहभूम और खूंटी जिले में चला। वर्ष 2022 में जून-जुलाई में ‘ऑपरेशन भीमबांध’ मुंगेर जिले में चला। वर्ष 2022 में ‘ऑपरेशन चक्रबंधा’ बिहार के गया और औरंगाबाद जिले में चला। ये सारे क्षेत्र इससे मुक्त हो गए।

‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’

मैं सदन का ध्यान ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ की तरफ विशेष रूप से दिलाना चाहता हूं। तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा में 50 किलोमीटर लंबी और 37 किलोमीटर चौड़ी एक पहाड़ी है। इस पहाड़ी पर इन्होंने अपना एक स्थायी शिविर बनाया था। ये लोग पांच साल लड़ सकें, इनके पास इतना गोला-बारूद और हथियार थे। वहां सोलर से लाइट की व्यवस्था थी, ढेर सारी आईईडी बनाने की कारखाने थीं। वहां पांच साल का अनाज भरा था और 400-500 कैडर एकत्रित थे।

सेंट्रल कमिटी मेम्बर और पोलिट ब्यूरो सदस्य वर्ष 2024 की शुरुआत में कुल 21 थे। यह इनकी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व है। 21 थे; एक पकड़ा गया है, सात ने आत्मसमर्पण किया है, 12 मारे गए हैं और एक फरार है; उसके साथ भी वार्ता चल रही है; मुझे लगता है वह भी बहुत जल्दी आत्मसमर्पण कर देंगे। 21 के 21 सेंट्रल कमिटी मेम्बर और पोलिट ब्यूरो सदस्य समाप्त हो चुके हैं और उनकी केंद्रीय व्यवस्था टूट चुकी है

मैं आज बड़ी संवेदनशीलता के साथ कहना चाहता हूं कि बहुत गर्मी थी। पहाड़ पर 45 डिग्री तापमान था, 10 बजते-बजते पत्थर गरम हो जाता था। शरीर से 2-3 लीटर पसीना बह जाता था; हम जवान को पीने के लिए राशनिंग में 300 ग्राम पानी देते थे। जवानों ने उफ नहीं की, मान्यवर। 21 दिन तक अभियान चला, 30 से ज्यादा माओवादी मारे गए, बाकी सारे नीचे उतरते ही पुलिस के साथ मुठभेड़ों में मारे गए या उन्होंने आत्मसमर्पण किया और यह पूरा असलाह हमने ज़ब्त कर लिया। इसी ने महाराष्ट्र, बस्तर-छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में माओवादी आंदोलन का अंत किया।

मान्यवर, बड़ी विनम्रता और बड़ी संवेदनशीलता के साथ कोबरा, सीआरपीएफ, डीआरजी और छत्तीसगढ़ पुलिस को मन से इस सदन में सलाम करना चाहता हूं, मान्यवर। इन्होंने अद्भुत धैर्य का परिचय देते हुए इनके किले को तोड़ा है। ओवैसी जी कह रहे हैं; ग्रेहाउंड्स का भी योगदान है, मगर हमें तेलंगाना सरकार ने कह दिया था कि हम ऊपर नहीं आएंगे; ये नीचे आएंगे तो हम इन्हें रोकेंगे। इसके लिए धन्यवाद; जो नीचे आए उन्हें रोका, ऊपर नहीं आए।

नक्सलियों का अंत

मान्यवर, वर्ष 2024 में इनकी मुख्य कैडर की स्थिति मैं बताना चाहता हूं। सेंट्रल कमिटी मेम्बर और पोलिट ब्यूरो सदस्य वर्ष 2024 की शुरुआत में कुल 21 थे। यह इनकी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व है। 21 थे; एक पकड़ा गया है, सात ने आत्मसमर्पण किया है, 12 मारे गए हैं और एक फरार है; उसके साथ भी वार्ता चल रही है; मुझे लगता है वह भी बहुत जल्दी आत्मसमर्पण कर देंगे। 21 के 21 सेंट्रल कमिटी मेम्बर और पोलिट ब्यूरो सदस्य समाप्त हो चुके हैं और उनकी केंद्रीय व्यवस्था टूट चुकी है।

दंडकारण्य में 37 सदस्यीय स्टेट कमिटी थी। तीन गिरफ्तार हुए, 21 ने सरेंडर हुए, 11 मारे गए और दो से बातचीत जारी है; 37 के 37 लोग; दंडकारण्य की मुख्य स्टेट कमिटी थी समाप्त हो चुकी है। मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ (एमएमसी) स्टेट कमिटी में तीन ही बचे थे, तीनों ने आत्मसमर्पण कर दिया।

ओडिशा में चार बचे थे; एक ने आत्मसमर्पण किया, तीन मारे गए। ओएससी, ओडिशा; पांच ने आत्मसमर्पण किया, पांच मारे गए; 10 के 10 हो गए। विक्षुब्ध क्षेत्र ब्यूरो; एक गिरफ्तार हुआ, तीन मारे गए, एक फरार है; मान्यवर, एक ही फरार है; तो छह के छह हो गए। तेलंगाना में छह ने आत्मसमर्पण किया, तीन मारे गए; एक भी नहीं बचा। उनका पोलिट ब्यूरो और CMC पूरी तरह समाप्त हो चुका है। हमने लक्ष्य किया था कि 31 मार्च को नक्सलमुक्त करेंगे। मैं पूरी व्यवस्था होने के बाद देश को भी सूचित करूंगा, मगर मैं धड़ल्ले से बोल सकता हूं कि हम नक्सलमुक्त हो गए हैं; ऐसा कहने में कोई संकोच नहीं है।

मान्यवर, इनके महासचिव बसवराजू न्यूट्रलाइज हुए। हिड़मा, जिन्होंने 27 लोगों को मारा था, 28 वर्षों से सक्रिय थे। बसवराजू 49 वर्षों से सक्रिय थे। विवेक 40 वर्षों से सक्रिय था; न्यूट्रलाइज हुआ। गजरला रवि 11 वर्षों से सक्रिय थे; न्यूट्रलाइज हुए। कदरी सत्यनारायण राव रेड्डी 46 वर्षों से सक्रिय थे; न्यूट्रलाइज हुए। गणेश उइके 44 वर्षों से सक्रिय थे; न्यूट्रलाइज हुए। वेणुगोपाल ने आत्मसमर्पण किया; 46 वर्षों से सक्रिय थे। वासुदेव ने आत्मसमर्पण किया; 36 वर्षों से सक्रिय थे। पुल्लूरी प्रसाद राव चंद्रन्ना 46 वर्षों से सक्रिय थे; आत्मसमर्पण किया। रामदेर मांझी देबू 36 वर्षों से सक्रिय थे; आत्मसमर्पण किया। थिप्परी तिरुपति 44 वर्षों से सक्रिय थे; उन्होंने भी आत्मसमर्पण कर दिया है। मुख्य हथियारबंद माओवादी समाप्त हो चुके हैं।

लाभप्रद पुनर्वास नीति

मान्यवर, हमने अत्यंत लुक्रेटिव पुनर्वास नीति को भी अपनाया है। आत्मसमर्पण के लिए प्रोत्साहन राशि 50 हजार रुपये घोषित की गई है; सामूहिक आत्मसमर्पण के लिए इस राशि को दोगुना कर दिया जाता है। सभी को सरकार की ओर से मोबाइल दिया जाता है; हथियार जमा कराने पर अतिरिक्त मुआवजा दिया जाता है। पुनर्वास केंद्र पर कौशल प्रशिक्षण व टूल किट का वितरण किया जाता है। उन्हें 10 हजार रुपये प्रति माह 36 महीने तक दिए जाते हैं। सभी को मोदी जी ने प्रधानमंत्री आवास योजना का उपहार दिया है। नक्सलमुक्त पंचायत होते ही गांव के विकास के लिए 1 करोड़ रुपये दिए जाते हैं।

जीवन-के-जीवन उजड़ गए

मान्यवर, हमने सरेंडर हेतु कैम्प लगाए हैं। मैं आज इस सदन को बहुत संवेदनशीलता के साथ बताना चाहता हूं; मैं उन शिकैंपस में गया हूं। बहुत सारी स्वयंसेवी संस्थाएं शिविरों में सालों तक हथियार लेकर घूमने वाले नक्सलियों को सामान्य नागरिक बनाने का प्रयास कर रही हैं। जब हम वहां जाते हैं तो आंखों

15 हजार बच्चों के जीवन बर्बाद कर दिए गए; इसका कौन जिम्मेदार है? है किसी के पास जवाब? सारे बुद्धिजीवी अर्बन नक्सल कैंपस में जाकर देखें कि आपने क्या किया है। आप तो AC चैम्बर में बैठकर कोर्ट के प्रोटेक्शन में लेख लिखते रहते हैं, लेकिन वहां जीवन-के-जीवन उजड़ गए हैं और किसी को परवाह नहीं है। अपने आप को ह्यूमन राइट्स का चैंपियन मानते हैं; मैं पूछना चाहता हूं कि 32 साल की आयु तक मेहंदी न लगाने वाली बच्ची के ह्यूमन राइट्स की चिंता कौन करेगा?

में आंसू आ जाएं, ऐसे दृश्य सामने होते हैं। किसी नक्सली बच्ची को नेल पॉलिश देते हैं तो वह लगाते-लगाते रो पड़ती है। उसकी ट्यूटर पूछती है कि क्यों रो रही हो, तो वह कहती है कि मैंने जीवन में पहली बार नेल पॉलिश लगाई है। मैं सात साल की थी जब ये मुझे उठा ले गए थे; तब से मैं पैंट, शर्ट और बूट में ही घूम रही हूं। मैंने ऐसे जीवन को कभी देखा ही नहीं। वे लिपस्टिक लगाते-लगाते रो पड़ती हैं; जब हाथों में मेहंदी लगती है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं होता।

मान्यवर, बस्तर में साप्ताहिक बाजार लगते हैं; वहां उनके मां-बाप से मिलने के लिए ले जाते हैं। वे खुद मां-बाप का आशीर्वाद लेते हैं, नए जीवन का आशीर्वाद मांगते हैं और कुछ लोग मां-बाप को यह कहते हुए पीटने लगते हैं कि नक्सलियों को क्यों दे दिया, क्यों हमारा जीवन बर्बाद कर दिया? वे पच्चीस-तीस साल तक न पढ़े, न लिखे, निरक्षर रहे, खाना नहीं मिला, पशुओं की तरह दौड़ते रहे; न रात देखी, न दिन देखा; उनका पूरा जीवन ही तबाह हो गया। जिसे भी नक्सलवादी हिंसा अन्याय का सामना लगती हो, मेरा सभी से करबद्ध निवेदन है कि वे शिविरों में जाकर दो रात बिताएं; तो आपको मालूम पड़ेगा कि इन नक्सलवादियों ने क्या किया है। यहां बैठकर फैशनेबल तरीके से इनका पक्ष लेना, इनकी सुनो, इनसे चर्चा करो; ऐसा कहना बहुत सरल है। है किसी के पास जवाब? 15 हजार बच्चों के जीवन बर्बाद कर दिए गए; इसका कौन जिम्मेदार है? है किसी के पास जवाब? सारे बुद्धिजीवी अर्बन नक्सल कैंपस में जाकर देखें कि आपने क्या किया है। आप तो AC चैम्बर में बैठकर कोर्ट के प्रोटेक्शन में लेख लिखते रहते हैं, लेकिन वहां जीवन-के-जीवन उजड़ गए हैं और किसी को परवाह नहीं है। अपने आप को ह्यूमन राइट्स का चैंपियन मानते हैं; मैं पूछना चाहता हूं कि 32 साल की आयु तक मेहंदी न लगाने वाली बच्ची के ह्यूमन राइट्स की चिंता कौन करेगा? मान्यवर, उसकी चिंता नरेन्द्र मोदी करेंगे और कोई नहीं करेगा। इनका जो अधिकार छीन लिया गया है, उसका हिसाब कभी न कभी देना पड़ेगा। मैं तो जन्म से हिंदू हूं, कर्मों में मानता हूं। जिन्होंने भी नक्सलवादियों का शब्द से भी प्रच्छन्न समर्थन किया है, वे सब इस पाप के उतने ही भागीदार हैं जितना बंदूक लेकर घूमने वाले।

कौशल केंद्र का निर्माण

मान्यवर, हमने इनकी नौकरी और रोजगार के लिए ढेर सारे प्रयास किए हैं। हमने कौशल केंद्र बनाए हैं। इनके बच्चों के लिए 12वीं कक्षा तक निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की है; महिलाओं को दो लाख रुपये और पुरुषों के लिए पांच लाख रुपये के ऋण की व्यवस्था की गई है।

हम बस्तर ओलंपिक्स और बस्तर पंडुम के माध्यम से खेल को बढ़ावा दे रहे हैं। वहां अब 1,20,000 कलाकारों ने बस्तर पंडुम में भागीदारी की है और 5,50,000 आदिवासी लोगों ने खेल खेला। मेरा विपक्ष के उन सभी सदस्यों से निवेदन है कि जो इसे न्याय की लड़ाई कहते हैं, वे बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक्स में जाएं।

मान्यवर, जिनके पैर उड़ गए, हाथ कट गए, आंख चली गई; मेरे घर पर ऐसे लोग आए थे, उन्होंने नाश्ता किया था। मैं उनकी वेदना जानता हूं। महामहिम राष्ट्रपति जी ने भी उन्हें बुलाया था। उनके लिए कभी एक घंटा तो निकालिए। उन पर जुल्म ढाने वालों के लिए, भाषण देने वालों के लिए आपके पास बहुत समय है; उस अत्याचार का परिणाम देखने के लिए आप एक घंटे का समय निकालिए, ऐसा मेरा निवेदन है।

नक्सलियों के हमदर्द

मान्यवर, वर्ष 1970 से नक्सली आतंकवाद क्यों फैला, मैं अंत में उसकी तह में भी जाना चाहता हूं। जब मनमोहन सिंह जी की सरकार बनी थी, तब एक नेशनल एडवाइजरी कौंसिल (एनएसी) बनी थी। हमने प्रधानमंत्री की मंत्रिपरिषद् के बारे में सुना था; संसद में बहस के दौरान सदस्य सलाह दें, हमने वह भी सुना था। एक नई नेशनल एडवाइजरी कौंसिल; एक असंवैधानिक मंच; खड़ा किया गया था, जो देश के लिए कानून बनाता था। उस मंच में कौन था? सोनिया जी इसकी अध्यक्ष थीं। हर्ष मंदर इसके सदस्य थे।

उनके एनजीओ ‘अमन वेदिका’ में शीर्ष नक्सली नेता की पत्नी को जिम्मेदारी दी गई थी। यह रिकॉर्ड में है कि वह उन नक्सलियों में शामिल थीं, जिन्होंने शहरी क्षेत्रों में अपहरण के मामले किए थे।

मान्यवर, यह एनएसी देश के लिए नीति-निर्धारण करती थी। राम दयाल मुंडा जी कहते थे कि नक्सल अभियान जरूरत से ज्यादा कठोर हैं। इस प्रछिन्न समर्थन ने ही नक्सलियों की हिम्मत बढ़ाई है। शबनम हाशमी, राम पुनियानी, उषा रामनाथन, एन. सी. सक्सेना, ज्यां द्रेज़, फ़राह नक़वी और विनायक सेन; वर्ष 2010 में वे अदालत द्वारा दोषी पाए गए थे, फिर भी उन्हें प्लानिंग कमीशन की हेल्थ स्टीयरिंग कमिटी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रखा गया था। एक महेश राउत नामक नक्सली था; जयराम रमेश जी ने उसकी रिहाई के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था।

मान्यवर, नंदिनी सुंदर, रामचन्द्र गुहा, ईएएस शर्मा जैसे लोग सलवा जुडूम के मामले से भी जुड़े हुए थे। जब देश की सर्वोच्च सत्ता के केंद्र; केंद्र सरकार; में एक एक्स्ट्रा कान्सटीट्युशनल अथॉरिटी हो, जो प्रधानमंत्री के भी ऊपर थी; वे उसके सदस्य हों और नक्सलवाद के समर्थक हों; तो आप मुझे बताइए कि किस तरह से नक्सलियों का हौसला टूटेगा। यह कांग्रेस पार्टी ने किया है। ये भाग नहीं सकते; यह तो इतिहास है। मेरी बात पर जो लोग विरोध कर रहे हैं, आने वाले दिनों में ऐसी सैकड़ों पुस्तकें लिखी जाएंगी जो आपके कारनामों से भरी होंगी। आप कैसे भागेंगे? लोकतंत्र के अंदर किसी की आवाज दबाई नहीं जा सकती।

मान्यवर, वर्ष 2011 में मनमोहन सिंह जी ने प्राइम मिनिस्टर रूरल डेवलपमेंट फेलोशिप प्रारंभ की थी।

राहुल गांधी जी अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई बार नक्सलों और उनके हमदर्दों के साथ देखे गए हैं। भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठनों ने हिस्सा लिया है; इसका रिकॉर्ड है। इन्होंने वर्ष 2010 में ओडिशा में लाडो सिकाका के साथ मंच साझा किया। सिकाका ने उसी मंच से भड़काऊ भाषण दिया और राहुल गांधी को माला भी पहनाई

उनका काम युवाओं को एक्सपोज़र देना था। उसमें महेश राउत फेलो बने थे, जो नक्सलियों के साथ संबंध की वजह से महाराष्ट्र पुलिस के मामले में जेल गए थे। जब प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा लाई गई प्रधानमंत्री रूरल डेवलपमेंट फेलोशिप जब लांच हुई थी और उसका एक बेनिफिशियरी नक्सलवादी हो, तो नक्सलवादियों के हौसले भला कैसे टूटेंगे?

कोई एक दोषी है तो वह कांग्रेस की वामपंथी विचारधारा वाली पार्टी है

मान्यवर, वर्ष 2010 में गृह मंत्री चिदंबरम जी ने चिंतलनार, छत्तीसगढ़ में एक वक्तव्य दिया था; एक साथ 76 जवानों को मार दिया गया था। उसके बाद जेएनयू में; जिसका अभी अमरा राम जी महिमामंडन कर रहे थे; उत्सव मनाया गया। वहां एक नृत्य किया गया कि पुलिस के 76 जवान मारे गए। उस नृत्य के समय जमीन पर भारत का तिरंगा बिछाकर, उसे पैरों के नीचे रखकर नृत्य किया गया। ये इसका समर्थन करते हैं।

मान्यवर, चिदंबरम साहब; 76 जवानों के मारे जाने के बाद किसी को खाना मुंह नहीं लगता और पानी हलक से नीचे नहीं उतरता; चिदंबरम साहब ने नक्सलियों से कहा: “हम आपसे हथियार डालने के लिए नहीं कह सकते, क्योंकि हम जानते हैं कि आप ऐसा नहीं करोगे, क्योंकि आप हथियारबंद आजादी की लड़ाई में विश्वास करते हैं।”

मान्यवर, किस प्रकार से यह देश चला है? पूरे तालाब में पानी भरा है, उसमें ये गोता लगाते हैं, कपड़े भिगोए बगैर बाहर निकलते हैं और कहते हैं कि हमने तो कुछ किया ही नहीं। मैंने तो ऐसे जादूगर देखे ही नहीं; कि आदमी तालाब में गोता लगाए और बाहर निकले तो एक भी कपड़ा भीगा न हो और ये कहेंगे कि मैं तो निर्दोष हूं, मैं तो गया ही नहीं और मैं तो बोला-चाला भी नहीं। इन्हें कमाल का जादू आता है।

मान्यवर, मैं अब उनके नेता राहुल गांधी जी की बात करना चाहता हूं। राहुल गांधी जी अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई बार नक्सलों और उनके हमदर्दों के साथ देखे गए हैं। भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठनों ने हिस्सा लिया है; इसका रिकॉर्ड है। इन्होंने वर्ष 2010 में ओडिशा में लाडो सिकाका के साथ मंच साझा किया। सिकाका ने उसी मंच से भड़काऊ भाषण दिया और राहुल गांधी को माला भी पहनाई। वर्ष 2018 में इन्होंने हैदराबाद में गुम्माडी विठ्ठल राव उर्फ गद्दार से मुलाकात की, जो उस विचारधारा के करीब रहे। इन्होंने मई, 2025 में कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ पीस के साथ मुलाकात की।

मान्यवर, 172 जवानों को मारने वाला हिड़मा जब मारा गया तो इंडिया गेट पर नारे लगे; “कितने हिड़मा मारोगे, हर घर से हिड़मा निकलेगा।” उस वीडियो को राहुल गांधी ने स्वयं ट्वीट किया है। ये कैसे बच सकते हैं? इन्होंने वर्ष 1970 से लेकर मार्च, 2026 तक नक्सलवाद का समर्थन किया है और नरसंहार का समर्थन किया है। जो 20,000 लोग मारे गए हैं, अगर उनका कोई एक दोषी है तो वह कांग्रेस की वामपंथी विचारधारा वाली पार्टी है।

नक्सलों के साथ रहते-रहते यह पार्टी और इनके नेता खुद नक्सलवादी बन गए हैं। इसका जवाब इस देश की जनता को चुनाव में देना पड़ेगा। यह बात यहां पर रुकेगी नहीं। यह बात जनता की अदालत में जाएगी। इसका जवाब इन्हें देना पड़ेगा।

मान्यवर, एक बार फिर से इस लड़ाई में जिस-जिस फोर्स के जो-जो जवान शहीद हुए हैं, दिव्यांग हुए हैं और जो-जो नागरिक मारे गए हैं; मैं उन सबको पूरे सदन की ओर से मनपूर्वक श्रद्धांजलि देकर अपनी बात पूरी करता हूं।