पं. दीनदयाल उपाध्याय पुण्यतिथि (11 फरवरी) पर विशेष
दीनदयाल उपाध्याय
भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अधिवेशन (28, 29 व 30 दिसम्बर 1967, श्री नारायण नगर, कालीकट) में
तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा दिए गए अध्यक्षीय उद्बोधन का दूसरा भाग
संयुक्त शासनों की उपलब्धियां
संयुक्त मंत्रिमंडलों ने कांग्रेस शासन का विकल्प तो दिया, किन्तु उसकी नीतियों और कार्यक्रमों का पर्याय प्रस्तुत करना न तो उनके लिए संभव था और न उनका निर्माण ही इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया था। खेद का विषय है कि कुछ दलों ने इन मंत्रिमंडलों की इस सीमा को न समझकर उन्हें अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को पूरा करने का साधन बनाने का प्रयास किया। इस दलीय दृष्टिकोण और गैर-जिम्मेदारी के व्यवहार के परिणामस्वरूप ये सरकारें बराबर तनावपूर्ण एवं अनिश्चितता के वातावरण में काम करती रही हैं। प्रदेशों के सीमित साधनों और अधिकारों, केन्द्र के कांग्रेसी शासन की कुटिल नीति तथा घटक दलों की खींचतान के बाद भी इन शासनों ने अपने छोटे से कार्यकाल में जनता को राहत पहुंचाने के बहुत से काम किये हैं। जो चमत्कार की आशा करते थे उनकी अपेक्षायें अवश्य पूरी नहीं हुईं। यदि इसमें से कुछ यथार्थवादिता और राजनीतिक विश्लेषण एवं विवेचन की प्रवृत्ति का उदय हुआ तो वह भी एक लाभ होगा। इन मंत्रिमंडलों के गठन ने राजनीतिक छुआछूत और विलगाव की मनोवृत्ति को समाप्त करने की ओर एक स्तुत्य पग बढ़ाया है। नीतिगत मतभेद रहते हुए भी दलों के बीच सहिष्णुता एवं आवश्यकतानुसार साथ काम करने की तैयारी प्रजातंत्र का आधार तथा राष्ट्रीय
ब्रिटेन और अमरीका की पद्धतियां वहां के इतिहास के साथ विकसित हुई हैं। हमें उनकी नकल करने के बजाय अपनी प्रकृति के अनुरूप प्रजातंत्रीय पद्धतियों का विकास करना चाहिए। पिछले पचास वर्षों से हम किसी न किसी रूप में संसदीय प्रणाली को व्यवहार में ला रहे हैं। हम इसे ही बदलती हुई राजनीति के अनुरूप ढालें। ब्रिटिश पार्लियामेंट की द्विदलीय राजनीति की परम्पराओं के स्थान पर यदि हम बहुदलीय राजनीति की नई परम्पराओं को अपना कर चलें तो संक्रमणकालीन अस्थिरता को भी टाला जा सकता है
एकरसता का सूचक है। संयुक्त मंत्रिमण्डलों का भविष्य चाहे जो हो, मेरी कामना है कि हम सभी इस उपलब्धि को हाथ से न जाने दें।
संसदीय प्रजातन्त्र कसौटी पर
संयुक्त मंत्रिमंडलों की तनावपूर्ण स्थिति तथा मंत्रिमंडलों के पतन के प्रयत्नों और परिणाम से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता के कारण कुछ लोग संसदीय प्रजातंत्र का परित्याग कर अध्यक्षीय प्रणाली अपनाने की सलाह दे रहे हैं। श्री अशोक मेहता का सुझाव है कि केवल प्रान्तों में इसे लाया जाय। केन्द्र और प्रान्तों के बीच भेद क्यों किया जा रहा है? सत्य तो यह है कि ब्रिटेन और अमरीका की पद्धतियां वहां के इतिहास के साथ विकसित हुई हैं। हमें उनकी नकल करने के बजाय अपनी प्रकृति के अनुरूप प्रजातंत्रीय पद्धतियों का विकास करना चाहिए। पिछले पचास वर्षों से हम किसी न किसी रूप में संसदीय प्रणाली को व्यवहार में ला रहे हैं। हम इसे ही बदलती हुई राजनीति के अनुरूप ढालें। ब्रिटिश पार्लियामेंट की द्विदलीय राजनीति की परम्पराओं के स्थान पर यदि हम बहुदलीय राजनीति की नई परम्पराओं को अपना कर चलें तो संक्रमणकालीन अस्थिरता को भी टाला जा सकता है। उदाहरण के लिए यह परम्परा विकसित की जा सकती है कि कोई भी मंत्रिमंडल तब तक त्यागपत्र नहीं देगा जब तक उसके विरुद्ध विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित न हो जाय। इस दृष्टि से यह भी परम्परा डाली जा सकती है कि यदि विधानसभा के बहुसंख्यक सदस्य अध्यक्ष से आग्रह करें तो विधानसभा की बैठक बुलाई जाय।

दल परिवर्तन
प्रदेशों में मंत्रिमंडलों के गठन और पतन के प्रसंग में विधायकों द्वारा दल परिवर्तन भी एक विचारणीय प्रश्न बन गया है। दल परिवर्तन कोई नई घटना नहीं है। चुनावों के पूर्व कांग्रेस छोड़ने का और बाद में कांग्रेस से नाता जोड़ने का क्रम सदैव रहा है। कांग्रेसियों की इस आवक-जावक से अनेक नये दल बने और बिगड़े हैं। जिन्होंने कांग्रेस नहीं छोड़ी वे भी कांग्रेस के अन्दर विभिन्न गुटों के प्रति अपनी निष्ठा बदलते रहे हैं। फलतः कांग्रेस का नाम बना रहने के बाद भी मंत्रिमंडलों के सम्बन्ध में अनिश्चितता का वातावरण रहा है और उनका अनेक बार पतन हुआ है। स्वराज्य के बाद कांग्रेस और कांग्रेसजनों के सामने कोई निश्चित नीति एवं आदर्श न होने के कारण ही उनका इस प्रकार का व्यवहार रहा है। दल बदलने वालों में से निन्यानवे प्रतिशत वे लोग हैं जो कांग्रेस को छोड़कर दूसरे दलों में आये और फिर उन दलों को छोड़कर चले गये। ज्यों-ज्यों दलों का गठन निश्चित नीति और सिद्धान्तों के आधार पर होता
प्रदेशों में मंत्रिमंडलों के गठन और पतन के प्रसंग में विधायकों द्वारा दल परिवर्तन भी एक विचारणीय प्रश्न बन गया है। दल परिवर्तन कोई नई घटना नहीं है। चुनावों के पूर्व कांग्रेस छोड़ने का और बाद में कांग्रेस से नाता जोड़ने का क्रम सदैव रहा है। कांग्रेसियों की इस आवक-जावक से अनेक नये दल बने और बिगड़े हैं। जिन्होंने कांग्रेस नहीं छोड़ी वे भी कांग्रेस के अन्दर विभिन्न गुटों के प्रति अपनी निष्ठा बदलते रहे हैं। फलतः कांग्रेस का नाम बना रहने के बाद भी मंत्रिमंडलों के सम्बन्ध में अनिश्चितता का वातावरण रहा है और उनका अनेक बार पतन हुआ है
जायेगा, उनका संगठन मजबूत होगा तथा जनता की राजनीतिक शिक्षा होकर वह अपने मत का उपयोग दलों के कार्यक्रमों का विचार करके करेगी, यह प्रवृत्ति कम हो जायेगी।
इस विषय में कानून का सहारा लेने का भी सुझाव दिया गया है। जो जनप्रतिनिधि हैं तथा जिनको कानून बनाने का अधिकार दिया गया है उनके आचरण को कानून के डण्डे से ठीक रखने के बजाय जनमत और परम्पराओं का सहारा लिया जाय तो अधिक उपयुक्त होगा। प्रत्येक विधायक, दल के अतिरिक्त अपने निर्वाचन क्षेत्र और देश के प्रति भी जिम्मेदार है। इन सभी जिम्मेदारियों का समन्वय और उनका निर्वाह किसी बंधे-बंधाये कानूनी ढांचे में नहीं किया जा सकता है। व्यक्ति को चुनने की ब्रिटिश पद्धति के स्थान पर दल के लिये मतदान की पद्धति को लाया जाये तो दल परिवर्तन से ही नहीं आज की अनेक राजनीतिक बुराइयों से बचा जा सकता है। पश्चिम जर्मनी के समान हम दोनों पद्धतियों का समन्वय भी कर सकते हैं।
क्रमश:…

