पराक्रम दिवस: ओडिशा में नेताजी की विरासत का सम्मान

| Published on:

 देश जहां एक ओर पराक्रम दिवस 2025 मनाने की तैयारी कर रहा है, वहीं इस वर्ष सभी की निगाहें ओडिशा के कटक पर टिकी हैं, जो भारत के सबसे साहसी नेताओं में से एक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्मस्थली है। ऐतिहासिक बाराबती किला, जो इस वर्ष के समारोहों का केंद्र रहने वाला है, वह सदियों से ओडिशा के इतिहास का मूक गवाह रहा है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को जानकीनाथ बोस के घर हुआ था, जो पेशे से वकील थे और 1880 के दशक में कटक, ओडिशा में आकर बस गए थे। अपने समृद्ध इतिहास एवं जीवंत बौद्धिक परंपराओं के साथ इस शहर ने एक ऐसे युवा के प्रारंभिक जीवन को आकार दिया, जो आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत को चुनौती देने वाला बन गया।

जनवरी 1909 में सुभाष चंद्र बोस ने कटक के रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल में दाखिला लिया। उनके जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव में उनकी बौद्धिक एवं नैतिक जागृति की शुरुआत हुई। बोस अपने प्रधानाध्यापक बेनी माधव दास की शिक्षाओं से बहुत प्रभावित थे, जिन्होंने उनमें उद्देश्य एवं अखंडता की भावना पैदा की। इस नींव को रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और श्री अरबिंदो घोष की दार्शनिक शिक्षाओं ने पूरक बनाया, जिनके राष्ट्रवाद और आत्म-साक्षात्कार के आदर्श बोस के लिए जीवन भर मार्गदर्शक सिद्धांत बने रहे।

ओडिशा में छात्रों की सक्रियता का एक शानदार इतिहास रहा है, जिसका प्रभाव नेताजी के जीवन पर देखा जा सकता है। 1939 में जब बोस त्रिपुरी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, तो उन्हें कई युवा नेताओं का समर्थन मिला, जिनमें हरेकृष्ण महताब भी शामिल थे, जो बाद में ओडिशा के मुख्यमंत्री बने। युवा छात्र नेता के रूप में महताब ने सत्र में सक्रिय रूप से भाग लिया, जो ओडिशा की प्रतिरोध एवं सुधार की स्थायी भावना को दर्शाता है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन की शानदार उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए आरंभ किया गया ‘पराक्रम दिवस’ एकता और साहस के राष्ट्रीय उत्सव के रूप में विकसित हुआ है। कोलकाता में आयोजित पहले पराक्रम दिवस में नेताजी के इस शहर से जीवंत जुड़ाव पर प्रकाश डाला गया, जहां उन्होंने मेयर के रूप में कार्य किया और एक निडर नेता के रूप में एक स्थायी विरासत छोड़ी। दिल्ली के लाल किले में 2024 के समारोह में भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) को सलामी दी गई, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण अध्याय को चिह्नित करता है और 2025 में यह समारोह वहीं लौट रहा

नेताजी सुभाष चंद्र बोस पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। एक उल्का की तरह वह भारतीय आकाश में ऊपर उठे और अपने चमकदार व्यक्तित्व से क्षितिज को रोशन किया। एक साहसी नेता के रूप में नेताजी की यात्रा की विनम्र शुरुआत कटक में हुई; वह ओडिशा और अन्य राज्यों के युवाओं को प्रेरित करते रहे हैं। उनका जीवन नवाचार और राष्ट्र के प्रति देशभक्तिपूर्ण प्रतिबद्धता के आदर्शों का प्रमाण है

है, जहां से यह सब शुरू हुआ था ‘कटक’। यह वह शहर है, जिसने नेताजी की आकांक्षाओं को पोषित किया और उनके क्रांतिकारी दृष्टिकोण को आकार दिया। जबकि दिल्ली का लाल किला भारत के संघर्ष की परिणति का प्रतीक है, बाराबती किला इसकी उत्पत्ति को दर्शाता है, जहां नेताजी में दृढ़ संकल्प के बीज पहली बार बोए गए थे।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। एक उल्का की तरह वह भारतीय आकाश में ऊपर उठे और अपने चमकदार व्यक्तित्व से क्षितिज को रोशन किया। एक साहसी नेता के रूप में नेताजी की यात्रा की विनम्र शुरुआत कटक में हुई; वह ओडिशा और अन्य राज्यों के युवाओं को प्रेरित करते रहे हैं। उनका जीवन नवाचार और राष्ट्र के प्रति देशभक्तिपूर्ण प्रतिबद्धता के आदर्शों का प्रमाण है। एक अमीर परिवार में पैदा होने के बावजूद नेताजी ने आत्म-बलिदान और अनुशासन का रास्ता चुना। स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए भारतीय सिविल सेवा से उनका इस्तीफा व्यक्तिगत लाभ पर मूल्यों को प्राथमिकता देने के साहस का उदाहरण है। नेताजी के नेतृत्व ने हमारे राष्ट्र निर्माण पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

नेताजी भारत की महानता में अटूट आस्था रखने वाले एक महान नेता थे। उन्होंने जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के विभाजन से मुक्त एक ऐसे भारत की कल्पना की थी जो राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बंधा हो। उन्होंने कहा, “भौगोलिक, जातीय और ऐतिहासिक दृष्टि से भारत किसी भी खोजकर्ता के लिए अंतहीन विविधता प्रस्तुत करता है, फिर भी इस विविधता के पीछे एक मौलिक एकता है।” भारत की एकता को बढ़ावा देने के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता ने ही महात्मा गांधी को यह लिखने के लिए प्रेरित किया: “नेताजी के नेतृत्व में आईएनए की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत के सभी धर्मों और जातियों के लोगों को एक झंडे के नीचे इकट्ठा करना एवं उनमें सभी सांप्रदायिक और संकीर्ण भावनाओं को पूरी तरह से खत्म करते हुए एकता की भावना भरना था। यह एक ऐसा उदाहरण है जिसका हमें अनुकरण करना चाहिए।”

नेताजी ने उत्तम आदर्शों का परिचय दिया, जो एक गैर-रूढ़िवादी और गैर-हठधर्मिता दृष्टिकोण में निहित है। उन्होंने जिस आईएनए की स्थापना की, वह देश की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए उनके अपरंपरागत और वैकल्पिक दृष्टिकोण का परिणाम था। नेताजी ने आईएनए को तीन शक्तिशाली शब्दों से प्रेरित किया, जो उनका सिद्धांत बन गए: ‘इत्तेफाक, इत्तेमाद और कुर्बानी’ – एकता, विश्वास और त्याग। अमृत काल में यदि हमारी अमृत पीढ़ी नेताजी के इन आदर्शों का पालन करती है, तो वह भारत को उसकी नियत महानता प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं, जिसे माननीय प्रधानमंत्री ने देश की स्वतंत्रता की शताब्दी तक ‘विकसित भारत’ के अपने दृष्टिकोण में व्यक्त किया है। यह वह सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी, जो हम नेताजी की स्मृति और बलिदान को दे सकते हैं।

पराक्रम दिवस-2025 हमारे युवाओं की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को पंख देने के लिए तैयार है। यह एक असाधारण उत्सव होगा, जिसमें तीन दिनों तक हमारे समृद्ध सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अनुभवों को पेश किया जाएगा। इस वर्ष के समारोह की मुख्य विशेषताओं में सांस्कृतिक प्रदर्शन, इमर्सिव प्रदर्शन और नेताजी के जीवन पर आधारित सैंड आर्ट प्रदर्शनियां शामिल हैं।

आज, ओडिशा के युवा एक शानदार विरासत को संरक्षित करने और राष्ट्र सेवा एवं उत्कृष्टता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं और इसमें वह अग्रणी भी हैं। ओडिशा के युवाओं के लिए नेताजी का जीवन सेवा

नेताजी ने उत्तम आदर्शों का परिचय दिया, जो एक गैर-रूढ़िवादी और गैर-हठधर्मिता दृष्टिकोण में निहित है। उन्होंने जिस आईएनए की स्थापना की, वह देश की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए उनके अपरंपरागत और वैकल्पिक दृष्टिकोण का परिणाम था। नेताजी ने आईएनए को तीन शक्तिशाली शब्दों से प्रेरित किया, जो उनका सिद्धांत बन गए: ‘इत्तेफाक, इत्तेमाद और कुर्बानी’ – एकता, विश्वास और त्याग। अमृत काल में यदि हमारी अमृत पीढ़ी नेताजी के इन आदर्शों का पालन करती है, तो वह भारत को उसकी नियत महानता प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं, जिसे माननीय प्रधानमंत्री ने देश की स्वतंत्रता की शताब्दी तक ‘विकसित भारत’ के अपने दृष्टिकोण में व्यक्त किया है

एवं ईमानदारी के साथ महानता की खोज के महत्व को रेखांकित करता है। उनके शुरुआती संघर्ष और बाद की उपलब्धियां अनुशासन, ज्ञान की खोज और मातृभूमि की सेवा के लिए किये गये अथक प्रयास में निहित थीं। ओडिशा के युवा राष्ट्र निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने के लिए अपनी ऊर्जा को चैनलाइज़ करके उनके दृढ़ संकल्प का अनुकरण कर सकते हैं, साथ ही विकास के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप ओडिशा के विकास की परिकल्पना को साकार करने के लिए आगे बढ़ सकते हैं और इसे एक अग्रणी राज्य बना सकते हैं।

जब सूर्य बाराबती किले के ऊपर अस्त होगा, तो ‘जय हिंद’ की गूंज गूंजेगी, जो हमें एक ऐसे नेता की याद दिलाएगी जिसका जीवन कटक की धरती से प्रेरित था और जिसकी विरासत आज भी करोड़ों दिलों को प्रेरित करती है। इस पराक्रम दिवस पर हम न केवल नेताजी के जीवन की उपलब्धियों का जश्न मना रहे हैं, बल्कि उनके मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की भी पुष्टि कर रहे हैं, जिससे एक मजबूत और एकजुट भारत का उनका सपना और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

(लेखक केंद्रीय शिक्षा मंत्री हैं)