‘सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी,
बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए।’
यह वक्तव्य देश की संसद में, लोकतंत्र की निरंतरता और राष्ट्र की प्राथमिकता पर जोर देते हुए राजनीति के ऐसे ध्रुव तारे ने कहा था जो अपनी नीति, सिद्धांत और राजनीतिक शुचिता के लिए जाने जाते हैं। यह उद्गार राजनीति के अजातशत्रु कहे जाने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी के द्वारा वर्ष 1996 में संसद में विश्वास मत पर हो रहे बहस के दौरान कही गयी थी।
यह वो समय था, जब देश की राजनीति में सूटकेस और जोड़-तोड़ का बोलबाला था और सरकारें जोड़-तोड़ से बन और बिगड़ रही थीं। वर्ष 1996 का अविश्वास प्रस्ताव (वास्तव में विश्वास प्रस्ताव पर बहस, जो अविश्वास की स्थिति में बदल गई) भारतीय राजनीति की एक ऐतिहासिक घटना है। यह अटल जी के प्रथम प्रधानमंत्री कार्यकाल (केवल 13 दिन) के अंत का प्रतीक बना। यह घटना 11वीं लोकसभा चुनाव के बाद हुई, जब देश में कोई भी दल स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर सका। 1996 के चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी (161 सीटें) और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को 140 सीटें प्राप्त हुईं, किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं था।
16 मई, 1996 को राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा जी ने सबसे बड़ी पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी जी को सरकार बनाने का न्योता दिया और अटल जी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। 27 मई को लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव पर बहस शुरू हुई। भाजपा अल्पमत में थी। 28 मई, 1996 को अटल जी ने अपने एक घंटे के ऐतिहासिक भाषण में कांग्रेस पर “षड्यंत्रपूर्ण” प्रयासों का आरोप लगाया कि वे उनकी
देश की राजनीति, जन सेवा, जनता का अपार समर्थन और भारतीय जनता पार्टी के निरंतर संघर्ष और समर्पण पर श्रद्धेय अटल जी ने कहा था कि यह हमारे प्रयासों के पीछे 40 सालों की साधना है, यह कोई आकस्मिक जनादेश नहीं है, कोई चमत्कार नहीं हुआ है, हमने मेहनत की है, हम लोगों के बीच गए हैं, हमने संघर्ष किया है, यह पार्टी 365 दिन चलने वाली पार्टी है। यह कोई चुनाव में कुकुरमुत्ते की तरह खड़ी होने वाली पार्टी नहीं है
सरकार को उखाड़ फेंकने में लगे हैं। अपने भाषण में उन्होंने राजनीति में नैतिकता, राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्र की निरंतरता पर जोर दिया। बहुमत न होने की स्थिति स्पष्ट होने पर, वोटिंग से पहले ही अटल जी ने इस्तीफा देते हुए कहा कि वे संख्या बल के सामने सिर झुकाते हैं, क्योंकि उनके लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि है।
समय बदला फिर चुनाव हुए और अटल जी दूसरी बार 1998 में प्रधानमंत्री बने और पुनः षड्यंत्रकारी कांग्रेस पार्टी द्वारा उनकी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और विरोधी दलों द्वारा छलपूर्वक मात्र एक वोट से 1999 में 13 महीने चली उनकी सरकार गिरा दी गई फिर 1999 में चुनाव हुए और पूर्ण बहुमत से तीसरी बार अटल जी देश के प्रधानमंत्री बने। देश की राजनीति, जन सेवा, जनता का अपार समर्थन और भारतीय जनता पार्टी के निरंतर संघर्ष और समर्पण पर श्रद्धेय अटल जी ने कहा था कि यह हमारे प्रयासों के पीछे 40 सालों की साधना है, यह कोई आकस्मिक जनादेश नहीं है, कोई चमत्कार नहीं हुआ है, हमने मेहनत की है, हम लोगों के बीच गए हैं, हमने संघर्ष किया है, यह पार्टी 365 दिन चलने वाली पार्टी है। यह कोई चुनाव में कुकुरमुत्ते की तरह खड़ी होने वाली पार्टी नहीं है।
कमल फूल, कीचड़ से ऊपर उठकर पानी की सतह से ऊपर खिलता है, जो पवित्रता और संघर्ष से सफलता का प्रतीक माना जाता है। कमल के शुद्ध और सुंदर रहने के कारण ही इसे पवित्रता, आध्यात्मिक उन्नति, समृद्धि और ज्ञान का प्रतीक भी माना जाता है। भारत का राष्ट्रीय पुष्प होने के साथ-साथ कमल, भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है, जो हमें सिखाता है कि कठिनाइयों में भी शुद्धता और सुंदरता बनाए रखी जा सकती है।
कमल के समान, व्यक्तित्व वाले अटल जी, भारतीय राजनीति के एक ऐसे राजनेता हैं, जिन्हें ‘अजातशत्रु’ कहा जाता है। उनका कोई विरोधी नहीं था, क्योंकि वे सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे। एक कुशल वक्ता, संवेदनशील कवि और दूरदर्शी राजनेता के रूप में वे जाने जाते हैं। उनका जन्म 25 दिसंबर, 1924 को ग्वालियर में हुआ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने राजनीति की शुरुआत की और अपने उदारवादी और समावेशी व्यक्तित्व द्वारा एक साधारण मनुष्य से लेकर राजनीति के शिखर तक का सफर मूल्यों, आदर्शों और सिद्धांतों पर तय किया।
अटल जी की नीतियां विकास और सुरक्षा पर केंद्रित थीं। 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण कर उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाया, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति और मजबूत हुई। आर्थिक सुधारों में उन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना शुरू की, जो देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में गेम चेंजर साबित हुई। विदेश नीति में ‘पड़ोसी पहले’ का सिद्धांत अपनाया। शिक्षा पर जोर देते हुए सर्व शिक्षा अभियान शुरू किया और दूरसंचार क्रांति लाई। उनके सिद्धांत लोकतंत्र, राजधर्म और सर्व पंथ समभाव पर आधारित था।
कश्मीर के लिए उन्होंने ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ का सिद्धांत दिया, जो मानवता, लोकतंत्र और क्षेत्रीय सद्भाव पर जोर देता है। सुशासन उनके जीवन का मूल मंत्र था, इसलिए उनका जन्मदिवस ‘सुशासन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी जी का व्यक्तित्व सौम्य लेकिन दृढ़ था। वे कविता से राजनीति को जोड़ते थे, जैसे “छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता”। उनकी विरासत आज भी प्रासंगिक है– समावेशी विकास, मजबूत विदेश नीति और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा। भारत रत्न से सम्मानित अटल जी ने भारतीय राजनीति को ऊंचाई दी, जहां सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जाता। उनका योगदान भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में मील का पत्थर है।
राजनीति की दूरदर्शिता, विपक्ष की ‘बाधा नीति’ और भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियां पर अटल जी ने कहा था, “सत्ता से बाहर कांग्रेस, सत्ता में कांग्रेस से अधिक खतरनाक है।” उनके कहे यह वक्तव्य आज भारतीय राजनीति के संदर्भ में सौ फीसदी सही साबित हो रहे। सत्ता के लिए कांग्रेस जल बिन मछली की तरह छठपटाती है एवं सत्ता हासिल करने के लिए हर गंदा, अनैतिक, अलोकतांत्रिक खेल खेलने के लिए तत्पर रहती है। अटल जी, विपक्ष का सम्मान करते थे और उनका मानना था कि विपक्ष की भूमिका रचनात्मक होनी चाहिए, न कि केवल बाधा डालने वाली। वे कहते थे कि राजनीति में मतभेद वैचारिक स्तर पर रहें, पर मनभेद नहीं होनी चाहिए। लेकिन वर्तमान भारतीय लोकतंत्र में विशेषकर 2024-2025 के संसदीय सत्रों में, कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के दलों की रणनीति अक्सर हंगामा, वॉकआउट और कार्यवाही बाधित करने पर केंद्रित रही, अटल जी की यह चेतावनी आज पूरी तरह से सही साबित हो रही है।
इस वर्ष के संसद के शीतकालीन संसद सत्र में चुनाव सुधारों के मुद्दे पर विपक्षी सांसदों ने हंगामा और फिर दोनों सदनों वॉकआउट करना है। पूज्य अटल जी के पदचिन्हों पर चलते हुए यशस्वी प्रधानमंत्री श्री
अटल जी की नीतियां विकास और सुरक्षा पर केंद्रित थीं। 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण कर उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाया, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति और मजबूत हुई। आर्थिक सुधारों में उन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना शुरू की, जो देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में गेम चेंजर साबित हुई। विदेश नीति में ‘पड़ोसी पहले’ का सिद्धांत अपनाया
नरेन्द्र मोदी जी के दूरगामी नेतृत्व में विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, शांति विधयेक (नाभिकीय ऊर्जा में निजी भागीदारी) और बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी विपक्ष का हंगामा और फिर वॉकआउट के परिणामस्वरूप सत्र में बहस कम, बाधाएं अधिक हुईं। 2024 के मानसून सत्र से लेकर अब तक कई विधेयक न्यूनतम चर्चा के साथ पारित हुए, जो संसदीय कार्यप्रणाली की गिरावट को दर्शाता है।
नए भारत के निर्माण में मेहनत की पराकाष्ठा और दूरगामी नीतियों से कार्य कर रही मोदी सरकार का पिछले ग्यारह वर्षों का आकलन करें और कांग्रेस की नीति, चरित्र और कार्यकलाप पर नजर डालें तो अटल जी की कांग्रेस को लेकर कही गई बातें बिल्कुल सही और सटीक प्रतीत होती है। कांग्रेस समेत विपक्ष की ‘असहयोग नीति’ संसद की उत्पादकता को प्रभावित कर रही, सदन में जनता के मुद्दों पर गहन चर्चा नहीं हो पाती। विपक्ष का सरकार पर आरोप लगाकर हंगामा करना आसान है, लेकिन रचनात्मक सुझाव देना उनके लिए कठिन है। विपक्ष का यह व्यवहार लोकतंत्र को कमजोर करता है, क्योंकि संसद जनता की आवाज का मंच है, न कि राजनीतिक अखाड़ा। अटल जी के समय में भी विपक्ष मजबूत था, वे खुद विपक्ष में रहते हुए भी राष्ट्रहित को ही सर्वोपरि मानते हुए शासन को सहयोग कर राजनीति के धर्म और सिद्धांत का पालन करते रहे।
लोकतंत्र में विपक्ष की जवाबदेही सुनिश्चित करने की भूमिका अहम है। अटल जी खुद गठबंधन चलाते हुए विपक्ष को साथ लेते थे। विपक्ष को बाधा से आगे बढ़कर रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो। अन्यथा, जनता का विश्वास संसदीय प्रक्रिया से उठेगा। अटल जी की विरासत हमें सिखाती है— राजनीति सेवा है, सत्ता का खेल नहीं।
क्या मैं युद्धक्षेत्र से भाग जाता?
जनता ने हमें सबसे बड़ी पार्टी बनाया,
तो क्या मैं पलायन कर जाता?
ये वाक्य अटल जी के उस राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं कि जब लक्ष्य बड़े हों और विरोधी प्रबल, तो जनहित में पलायन नहीं, दृढ़ता से जनादेश का पालन करना ही राष्ट्रधर्म है। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था। वे अक्सर कहते थे कि राजनीति सेवा का माध्यम है, न कि सत्ता प्राप्ति का। देश में कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियों के तीव्र विरोध के बावजूद आज कमल फूल के उद्भव के समान भारतीय जनता पार्टी देश के 19 राज्य समेत केंद्र में सत्तासीन है और दृढ़तापूर्वक जनता की सेवा, अटल जी के आदर्श और नीति के अनुरूप कर रही है।
भारत के राजनीतिक इतिहास में श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं जिन्होंने न केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मुख्यधारा में स्थापित किया, बल्कि देश की नीतियों और सिद्धांतों को एक नई दिशा भी प्रदान की। उनकी सरकार (1998-2004) ने आर्थिक सुधार, विदेश नीति में संतुलन, अच्छी शासन व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव पर जोर दिया। आज, ग्यारह वर्ष में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की सरकार के कार्य को देखने से स्पष्ट नजर आता है कि मोदी सरकार अटल जी की विरासत को न केवल संरक्षित कर रही है, बल्कि उसे आधुनिक संदर्भ में आगे भी बढ़ा रही।
मोदी सरकार की कई नीतियां वाजपेयी के ‘राजधर्म’, ‘सर्व पंथ समभाव’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे सिद्धांतों से प्रेरित हैं। अटल जी की आर्थिक नीतियां हमेशा से विकास-केंद्रित रही। उन्होंने पोखरण परमाणु परीक्षण एवं गोल्डन स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के माध्यम से देश में सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया। मोदी सरकार ने इस विरासत को ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के रूप में आगे बढ़ाया। 2020 में शुरू हुआ यह अभियान स्थानीय उत्पादन, निर्यात बढ़ाने और विदेशी निर्भरता कम करने पर केंद्रित है। 2025 तक भारत की जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान बढ़ा है और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी योजनाओं ने लाखों रोजगार सृजित किए हैं।
इसी तरह, अटल जी के समय शुरू हुए डिसइन्वेस्टमेंट पॉलिसी को मोदी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण के माध्यम से गति प्रदान की है, जिससे सरकारी राजस्व में वृद्धि हुई है। विदेश नीति में अटल जी के सिद्धांत ‘पड़ोसी प्रथम’ और वैश्विक संतुलन का रहा। मोदी सरकार इसी सिद्धांत पर चलते हुए ‘नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी अपनाई है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने क्वाॅड (Quad) और इंडो-पैसिफिक रणनीति के माध्यम से चीन के प्रभाव को संतुलित किया, जो अटल जी के वैश्विक सामरिक दृष्टिकोण से मेल खाता है। कोरोना महामारी के दौरान ‘वैक्सीन मैत्री’ कार्यक्रम ने विकासशील देशों को वैक्सीन प्रदान कर भारत की ‘वसुधैव कुटुंबकम्’
भारत के राजनीतिक इतिहास में श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं जिन्होंने न केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मुख्यधारा में स्थापित किया, बल्कि देश की नीतियों और सिद्धांतों को एक नई दिशा भी प्रदान की। उनकी सरकार (1998-2004) ने आर्थिक सुधार, विदेश नीति में संतुलन, अच्छी शासन व्यवस्था और सामाजिक सद्भाव पर जोर दिया
की भावना को मजबूत किया, जो अटल जी के मानवीय दृष्टिकोण से प्रेरित है। इसके अलावा, इजराइल, अरब और अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों में सुधार अटल जी के समय शुरू हुए प्रयासों का विस्तार है।
अच्छी शासन व्यवस्था अटल जी के प्रमुख सिद्धांत रहे। उन्होंने ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ की बात की, जो निर्णय लेने की प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर देती हैं। मोदी सरकार ने इसे ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘ई-गवर्नेंस’ के रूप में लागू किया।
मोदी सरकार की ‘संकल्प से सिद्धि’ नीति, जो 11 वर्षों में गरीबी कम करने में सफल रही, अटल जी के सरकार की नीतियों से जुड़ी है। 2025 के सहकारिता नीति में भी मोदी सरकार ने उनकी इसी विरासत को आगे बढ़ाया है। सामाजिक सद्भाव और राजधर्म अटल जी के मूल सिद्धांत थे। मोदी सरकार ने इसे ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ के नारे में ढाला है। मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक कानून, अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएं और श्रीराम मंदिर निर्माण ने सामाजिक न्याय को बढ़ावा दिया है। अटल जी के ‘सर्व पंथ समभाव’ को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जी-20 शिखर सम्मेलन में ‘एक पृथ्वी, एक परिवार’ के रूप में वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत किया।
मोदी सरकार ने अटल जी की स्मृति में कई परियोजनाएं शुरू कीं, जैसे अटल टनल, जो हिमाचल प्रदेश में रणनीतिक महत्व रखती है। गठबंधन राजनीति में अटल जी माहिर थे उन्होंने 24 दलों के साथ एनडीए बनाकर देश को स्थिर सरकार दी। मोदी जी ने इसे और मजबूत किया, सबको साथ लेकर चलने की नीति द्वारा पिछले 11 वर्ष में हुए चुनाव में एनडीए की निरंतर विजय इसका प्रमाण है।
मोदी जी ने अटल जी की विकास की दृष्टि को ‘विकसित भारत 2047’ में बदल दिया, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर जोर है। स्वच्छ भारत अभियान अटल जी के पर्यावरण संरक्षण से प्रेरित है।
प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने अटल जी की विरासत को मजबूत किया। 25 दिसंबर को अटल जी की जयंती अवसर पर राष्ट्र के प्रगति के प्रति उनके समर्पण को, देश याद कर रहा है।
सशक्त, समृद्ध और स्वावलंबी भारत के निर्माण के लिए समर्पित उनका जीवन और उनका विजन, विकसित भारत के निर्माण के संकल्प में निरंतर शक्ति का संचार करता रहेगा। सुशासन और जनकल्याण के प्रति अटल जी का समर्पण भावी सरकारों को दिशा दिखाता रहेगा। अटल जी ने जिस सशक्त और समर्थ भारत के निर्माण का स्वप्न देखा था आज वह प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में साकार होने की तरफ़ अग्रसर है। अटल जी की नीति आज मोदी जी की अगुआई में विश्व में भारत की क्षमता का उद्घोष बन चुकी है।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं)

