अवैध घुसपैठियों से निपटने की नीति – डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट : अमित शाह

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नरेन्द्र मोहन स्मृति व्याख्यान

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने 10 अक्टूबर को नई दिल्ली में ‘घुसपैठ, जनसांख्यिकी परिवर्तन व लोकतंत्र’ विषय पर ‘नरेन्द्र मोहन स्मृति व्याख्यान’ दिया और जागरण साहित्य सृजन पुरस्कार समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। यहां प्रस्तुत है उनके संबोधन का संपादित पाठ:

 घुसपैठ, जनसांख्यिकी का बदलाव और लोकतंत्र, ये तीनों विषय को समाहित कर मुझे अपने विचार आप लोगों के सामने रखने हैं। मैं आज यहां पर बेझिझक कहना चाहता हूं कि तीनों विषय, जब तक प्रत्येक भारतीय और विशेषकर युवा, जिसने 50-60-75 साल तक देश में जीना है, वो नहीं समझता है, इसकी समस्या से परिचित नहीं होता है, तो हम हमारे देश, हमारी संस्कृति, हमारी भाषाएं और देश की स्वतंत्रता को सुनिश्चित नहीं कर सकते। ये तीनों विषय एक दूसरे के साथ जुड़े हुए विषय हैं, इसलिए मैं आज आप सबके सामने कुछ चीजों को रखने का प्रयास कर रहा हूं, मुझे मालूम है कुछ चीजें कुछ लोगों को पसंद नहीं आएंगी। मगर मुझे लगता है कि मैं नहीं बोलूंगा, तो मेरे दायित्व के साथ मैं छल कर रहा हूं, इसलिए मैं बोलना चाहता हूं। इस देश में 1951 में, 1971 में, 1991 में और 2011 में जनगणना हुई।

अब जो मैं बोल रहा हूं जनगणना के रिपोर्ट का एनालिसिस है, इसमें मेरा कुछ नहीं है, क्योंकि हमारे यहां जनगणना में शुरू से, आजादी के बाद तुरंत से धर्म पूछने की एक परंपरा है, जनगणना में बाकी सब पूछते हैं, उसमें आप कौन से धर्म के अनुयायी हो, वह पूछा जाता है, मुझे मालूम नहीं है उस वक्त 1951 में क्यों यह निर्णय हुआ होगा? मगर निर्णय हमने नहीं किया है, आप सभी को मालूम है 1951 में मेरी पार्टी बनी ही नहीं थी, उस वक्त जब यह जनगणना का निर्णय हुआ, हम निर्णायक तो नहीं ही थे। मैं आज आंकड़े बताना चाहता हूं, 1951 की जनगणना में हिंदू 84% थे और मुस्लिम समाज की आबादी 9.8% थी, 1971 में 82% हुए हिंदू और मुस्लिम समाज की आबादी 11% हुई, 1991 में 81% हुए हम और मुस्लिम समाज की आबादी 12.12% हुई और 2011 में 79% हुए और मुस्लिमों की संख्या 14.2% हुई, इसमें ऐसे संशय में मत रहिएगा कि मैं क्यों दो ही धर्म की आबादी बोल रहा हूं, क्योंकि मैं घुसपैठ की बात करना चाहता हूं, इसलिए इसकी बात की और इसके रेफरेंस में बाद में मैं बताऊंगा, हमारा विभाजन भी है। अगर देश का विभाजन ना हुआ होता, तो धर्म के आधार पर जनगणना करने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ती। परंतु देश का विभाजन क्योंकि धर्म के आधार पर हुआ है, तो इसीलिए शायद कांग्रेस के नेताओं ने 1951 की जनगणना से धर्म को पूछना मुनासिब समझा होगा, तो एक प्रकार से बहुत सारी गिरावट हुई है। मुस्लिम आबादी की बढ़ोतरी 24.6% के दर से हुई है और हिंदू आबादी 4.5% कमी हुई है, अब मैं इसलिए बताता हूं कि ये फर्टिलिटी रेट के कारण नहीं हुआ है यह घुसपैठ के कारण हुआ है, जब भारत का विभाजन हुआ, धर्म के आधार पर हुआ, हमारी दोनों ओर पाकिस्तान बनाया गया, जो बाद में बांग्लादेश में कन्वर्ट हुआ और पाकिस्तान में कन्वर्ट हुआ और वह दोनों जगह से घुसपैठ के कारण यह आबादी में इतना बड़ा परिवर्तन आया और हमारे पड़ोसी देश, हमारे ही देश का एक हिस्सा जिसमें से पाकिस्तान और बांग्लादेश बना, उसमें स्थिति क्या हुई, वो भी देखना चाहिए।

देश आजाद हुआ 1951 में तब पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या 13% थी, अन्य माइनॉरिटी 1.2% थे और अब पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या 1.73% बची है, बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या 22% थी, अब वहां पर 7.9% बची है और अफगानिस्तान में 2,20,000 हिंदू सिख थे, आज 150 बचे हैं। यह मैं इसलिए कह रहा हूं, मैं हिंदू मुस्लिम के रेफरेंस से नहीं कह रहा हूं, क्योंकि आगे मैं बताऊंगा कि घुसपैठ और शरणार्थी के बीच में क्या अंतर है, यह सारे जो हिंदू कम हुए, वह मतांतरित नहीं हुए। सारे नहीं हुए, बहुतों ने भारत में आकर शरण ले ली और सारे मुस्लिम जो बड़े हैं, वो मैंने कहा फर्टिलिटी के कारण नहीं बढ़े हैं, वहां से ढेर सारे मुस्लिम भाई यहां घुसकर आए। अब हमने विभाजन किया, तब तय था कि दोनों देशों में सभी प्रकार के धर्मों के मनाने की छूट रहेगी, भारत में तो वो रहा, आर्टिकल 19 और 21 ने सबको प्रोटेक्शन दिया। पाकिस्तान और बांग्लादेश घोषित इस्लामिक राष्ट्र बन गए, उनका राज्य का धर्म इस्लाम को बनाया गया और फिर कई बार अनेक प्रकार के अत्याचार हुए, अनेक प्रकार की प्रताड़नाएं हुईं, इसके कारण वहां से हिंदू भागकर भारत की शरण में आया और यह आजादी के वक्त, आजादी के तुरंत बाद भारत के सभी नेताओं ने दिया हुआ वादा था कि अभी यहां आपाधापी में बहुत बड़े दंगे हो रहे हैं, आप अभी मत आइए, जब भी आप आना चाहोगे, आपको हम स्वीकार करेंगे। ये वादा था और एक प्रकार से नेहरू-लियाकत पैक्ट का हिस्सा था, जिस पर देश के प्रधानमंत्री ने सिग्नेचर किया था। मगर वे

बहुत प्रचारित किया गया कि सीएए से मुसलमानों की नागरिकता चली जाएगी, मैं बोल-बोल कर थक गया और मीडिया ने भी मेरे साथ अन्याय किया है, इस बात को कभी प्रमुखता से नहीं दोहराया कि सीएए किसी की नागरिकता छीन नहीं सकता, सीएए नागरिकता प्रदान करने का कार्यक्रम है

जब आए, तो उनको शरणार्थी मानकर इस देश में स्वीकार कर लिया गया, परंतु इनको नागरिकता नहीं दी। आप मुझे बताइए, कोई 1965 में आया, कोई 1971 में आया, कोई 1981 में आया, कोई 1991 में आया, कोई 2001 में आया, चार-चार पीढ़ी हो गई, उसको नागरिकता नहीं मिली, क्यों नहीं मिली? कि आप वहां थे, क्यों वहां थे? भारत ने विभाजन को स्वीकार किया, इसलिए वे वहां थे और हमने वादा किया था कि 1951 में वादा किया था, आप जभी भी आओगे हम आपको स्वीकार करेंगे। तो एक शरणार्थियों की वैधानिक नागरिकता के बगैर बड़ी फौज खड़ी हुई है और इसके लिए जब भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला, श्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने, सीएए का कानून लेकर हम आए और उनको नागरिकता देने का काम किया। उस वक्त बहुत प्रचारित किया गया कि सीएए से मुसलमानों की नागरिकता चली जाएगी, मैं बोल-बोल कर थक गया और मीडिया ने भी मेरे साथ अन्याय किया है, इस बात को कभी प्रमुखता से नहीं दोहराया कि सीएए किसी की नागरिकता छीन नहीं सकता, सीएए नागरिकता प्रदान करने का कार्यक्रम है। उस एक्ट के किसी भी प्रावधान में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई किसी की नागरिकता छीनने का रास्ता ही नहीं, जो शरणार्थी है, उसको नागरिकता देने का प्रावधान है, तो जो ऐतिहासिक गलती 1951 से लेकर 2014 तक हुई थी, उसको नरेन्द्र मोदी सरकार ने सबसे पहले, जो यहां अवैध रूप से कानूनी दृष्टि से, अवैध रूप से हिंदू शरणार्थी रहते थे, उनको लॉन्ग टर्म वीजा देने का काम किया, उनको एक सर्टिफिकेट दिया और बाद में उनको नागरिकता देने का कानून लेकर आए, इससे 1951 से लेकर 2014 तक 2019 तक जो गलतियां भारतीयों से हुई थी, उसका एक प्रकार से तर्पण करने का काम नरेन्द्र मोदी जी ने किया। क्योंकि हमारा वादा था, जवाहरलाल नेहरू जी का वादा था कि जब आप आओगे, तब आपको हम स्वीकार कर लेंगे और हम मुकर गए, पीढ़ियों तक वो अपने नाम से मकान नहीं खरीद सकते थे, सरकारी नौकरी नहीं मिलती थी, सरकारी राशन नहीं मिलता था, सरकारी अस्पताल में उनका इलाज नहीं होता था, ये 2.5-3 करोड़ लोगों का गुनाह क्या है? उनको पूछकर तो विभाजन किया नहीं गया था, धर्म के आधार पर जो विभाजन का फैसला था वह कांग्रेस वर्किंग कमेटी का था, देश की संसद का नहीं था और इसके कारण ये लोग चार-चार पीढ़ी तक प्रताड़ित होते रहे। मैं आज इस मंच के माध्यम से पूछना चाहता हूं, क्या उनको अधिकार नहीं है? गरीबों को मिलने वाले सस्ते राशन पर, 5 लाख रुपये तक के इलाज पर, भारत में वोट देने पर, संपत्ति खरीदने पर और जब यह कानून लेकर आए, इसको बिल्कुल, मैं कह सकता हूं कि अन्यायपूर्ण तरीके से इसको बदनाम करने का काम भी हुआ और दंगे भी हुए। मगर आज कोई व्यक्ति दृढ़ता से काम करता है, तो कैसे काम होता है?

आज इतना सारा विरोध होने के बावजूद सीएए अस्तित्व में है और सब शरणार्थियों को इस देश में नागरिकता का अधिकार है। 1951 से जो वंचित किया, उसको देने का काम किया है, अब वह कहते हैं कि घुसपैठिया और शरणार्थी के बीच में अंतर क्या है? वह भी मैं आज समझाना चाहता हूं, जो अपने धर्म को बचाने के लिए जो उसका अधिकार है, हमारे संविधान के हिसाब से तो उसका अधिकार है, आर्टिकल 19 और 21 में हमने अधिकार दिया है, वो अपने धर्म को बचाने के लिए भारत की शरण में आता है, तो हम उसको शरणार्थी कहते हैं। अब धर्म बचाने के लिए सिर्फ हिंदू नहीं आए, हिंदू भी आए, बौद्ध भी आए, सिख भी आए, क्रिश्चियन भी आए; तो हमने सबको नागरिकता देने का सीएए में प्रावधान किया है। अब एक डिमांड आती है, तो बाकी घुसपैठिए कौन है? अब जिसके लिए, जिस पर धार्मिक प्रताड़ना नहीं हुई है और आर्थिक कारणों से या अन्य कारणों से देश में अवैध रूप से आना चाहते हैं, वे घुसपैठिए हैं और फिर दुनिया में जिसको भी यहां आना है उसको आने दे, तो ये देश एक प्रकार से धर्मशाला बनकर रह जाएगा, हमारा देश चल नहीं पाएगा। हर एक को यहां आने की स्वतंत्रता नहीं है, विभाजन के परिप्रेक्ष्य में जिनके साथ वहां न्याय हुआ है, वह यहां आए, स्वागत है। मैं इस देश के गृह मंत्री नाते कहता हूं, जितना मेरा अधिकार इस देश की मिट्टी पर है, इतना ही पाकिस्तान, बांग्लादेश के हिंदुओं का अधिकार इस देश की मिट्टी पर है और अगर कोई आर्थिक रूप से कमाने के लिए या अन्य कोई कारणों से यहां आते हैं तो उसको भारत कैसे स्वीकार कर ले, तो मैं भी पजल में था, ढंग से प्रेशर में जवाब भी नहीं दे पाया था, तो एक 18 साल का बच्चा हरियाणा का मेरे घर पर आया समय लेकर और बाहर आकर खड़ा ही रह गया। मैंने उसको टाइम दिया, मैंने बोला यार काहे परेशान करते हो, कि भाई साहब आप क्यों जवाब नहीं दे पाते हो? मैं सवाल ठीक नहीं है इसलिए जवाब देना, तो बच्चे का है मेरे साथ मत जोड़ना, उसने कहा साहब आप सबको कहो कि हम हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सबको देश में प्रवेश कर देंगे, तो उसने मैंने कहा यार ऐसे कैसे हो सकता है? सब कुछ कि नहीं वह भूमि लेकर आए। वह भूमि के साथ सारे के सारे यहां आ जाए, हमें कोई आपत्ति नहीं। बड़ा सरल रास्ता उसने सुझाया, मैंने बेचारे को चाय नाश्ते करा कर भेजा। मैंने कहा कि देश ऐसे नहीं चलता है भाई कि नहीं वो अकेले ना आए, बस जो भूमि हमारी चली गई, वो भूमि के साथ सारे आ जाए, हम स्वागत कर देते हैं इनका, बड़ा सरल तरीका बताया, मगर मैं भी जानता हूं यह संभव नहीं जब होगा तब होगा। परंतु अभी शरणार्थी और घुसपैठिया, दोनों को एक पेज पर रखकर नहीं सोचना चाहिए। जो हमारे संविधान को जानते हैं, जो हमारे इतिहास को जानते हैं, हमारे देश की राजनीतिक इतिहास को जानते हैं, उनको कम से कम यह गलती नहीं करनी चाहिए। हमारा संविधान बहुत स्पष्ट है, इस देश में हर एक व्यक्ति को अपने धर्म के अनुसार अपने ईश्वर की उपासना करने का अधिकार है। इसमें किसी ने दखल नहीं देनी चाहिए। इस देश में रहना, जिन्होंने पसंद किया वो सभी मुसलमानों को कोई डिस्टर्ब नहीं किया, इनकी नागरिकता पर कोई सवाल नहीं उठा। अगर आप घुसपैठ कर आते हो, अलग-अलग उद्देश्यों से आते हो, तो आपको जरूर घुसपैठिए का लेवल लगेगा और वो लगाना चाहिए शासन में। फिर कुछ लोग दलील करते हैं कि अगर वह भारत में ही रहना चाहते हैं, तो हम क्यों सीमित करते हैं, सीमित नहीं करते, इसके लिए भी कानून है। पाकिस्तान से किसी भी धर्म का व्यक्ति एप्लीकेशन करें और एप्लीकेशन करके वैध तरीके से पासपोर्ट लेकर, वीजा लेकर आए, हम उनके क्रेडेंशियल देखकर, उनको नागरिकता देंगे, ये रास्ता खुला ही है। मगर आप अवैध तरीके से घुसपैठ करोगे, तो सीमाएं पोरस नहीं हो सकती, सीमाओं से घुसपैठ नहीं होनी चाहिए और उनको संभालना भी चाहिए और कुछ जगह कैसा हुआ? 2011 में असम में जनगणना हुई, क्योंकि 2011 की जनगणना एक प्रकार से हमारे शासन में नहीं हुई थी, तो सारे लिबरलर्स, जितने भी उदात्त विचार के प्रतिनिधि हैं वह और कांग्रेस हम पर आरोप नहीं कर सकते, क्योंकि वह कांग्रेस के टाइम है। 2011 की जनगणना में आसाम के अंदर दशकीय वृद्धि दर मुस्लिम भाइयों का 29.6% हुआ, जो संभव ही नहीं है, अगर घुसपैठ नहीं हुई है, तो यह संभव ही नहीं है और पश्चिम बंगाल के कई सारे जिलों में यह वृद्धि दर 40% क्रॉस कर गया, जो कह रहे हैं कि घुसपैठ काल्पनिक चीज है, उनको मैं कहना चाहता हूं, आप कैसे जस्टिफाई करते हो और ये वृद्धि दर बॉर्डर के जिलों में 70-70% है। मैं तो राज्य की एवरेज बता रहा हूं। यही साबित करती है कि घुसपैठ हुई है, होती है। पार्लियामेंट में विशेषकर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस की सांसद मुझ पर आरोप करते हैं कि चलो पहले जो हुआ वो हुआ, अभी हो रही है या नहीं हो रही? मैंने कहा अभी भी हो रही है। तो उन्होंने कहा तो जिम्मेदारी किसकी है? बीएसएफ किसकी है? आपकी जिम्मेदारी है, मेरी जिम्मेदारी है भाई।

मगर एक बार देश की सीमा देखकर आओ, सिर्फ बांग्लादेश के सीमा पर कई सारे झरने, महासागर जैसी नदियां, कई सारा जंगल का एरिया, कई सारी पहाड़ी चोटियां है, जहां बॉर्डर नहीं बनी है और वहां से घुसपैठ कोई नहीं रोक सकता है, वहां से घुसपैठ होती है। पकड़ते भी हैं, रोकते भी हैं, गोलियां भी चलती हैं, परंतु जिस प्रकार की टोपोग्राफी है, जिस प्रकार की भौगोलिक सीमा है, इसमें यह थोड़ा कठिन है। मगर मैंने बोला, मैं अब आपको पूछना चाहता हूं घुसपैठ कर वो कहां जाता है? तो

मैं सभी राजनीतिक दलों को कहना चाहता हूं, घुसपैठ का मुद्दा, जनसांख्यिकी का मुद्दा, एसआईआर का मुद्दा, इसको राजनीति से मत जोड़िए। एक समय आएगा, आप भी नहीं बचोगे। यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है, देश का मुद्दा है

स्वाभाविक है, पहले जिले में जाता है, तो गांव में कोई भी आदमी आएगा, पटवारी को मालूम पड़ेगा या नहीं पड़ेगा? भाई बताओ पटवारी को मालूम पड़ता है या नहीं पड़ता है? एक भी बंगाल के पश्चिम बंगाल के पटवारी ने थाने में फरियाद लिखाई हो, तो मुझे बताओ आप। एक भी पुलिस स्टेशन में फरियाद हुई है तो बताओ। आधार कौन बनाता है, वो जिले की कलेक्टर ऑफिस बनाती है और आधार के आधार पर सारी चीजें होती है, तो घुसपैठ इस तरह की विकट सीमाओं में अकेला केंद्र नहीं रोक सकता। केंद्र की जिम्मेदारी है, केंद्र ने बड़ी बाढ़ भी लगाई है। मगर ऐसा भौगोलिक क्षेत्र जहां बाढ़ लगाना ही असंभव है, बाढ़ का पानी बहाकर ले जाएगा, इतने कठोर पत्थर है जहां ड्रिलिंग भी नहीं हो सकती, तो वहां से जो घुसपैठ होती है उसको प्रश्रय कौन देता है। वहां की राज्य सरकारें देती है। प्रश्रय क्यों देते हैं, आश्रय क्यों देते हैं, क्योंकि कुछ पार्टियों ने उसमें वोट बैंक देखना शुरू कर दिया है, इसलिए वहां आश्रय मिलता है।

मैं सभी राजनीतिक दलों को कहना चाहता हूं, घुसपैठ का मुद्दा, जनसांख्यिकी का मुद्दा, एसआईआर का मुद्दा, इसको राजनीति से मत जोड़िए। एक समय आएगा, आप भी नहीं बचोगे। यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है, देश का मुद्दा है। कोई व्यक्ति अवैध रूप से घुसकर देश में आता है और आपके जिले का तंत्र उसको आइडेंटिफाई नहीं करता है, तो कैसे रोक सकता है कोई इसको? हमारे यहां भी सीमा है, गुजरात में भी सीमा है, राजस्थान में भी सीमा है, क्यों घुसपैठ नहीं होती है भाई? क्यों नहीं होती है? वहां पर भी बॉर्डर है, वहां पर भी बाढ़ लगाई है, वहां पर भी बीएसएफ ही है, ये अंतर है। घुसपैठ को राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, राजनीतिक संरक्षण भी नहीं देना चाहिए और यह शरणार्थी और घुसपैठिया, ये दोनों के बीच में जो अंतर नहीं समझेगा, वो अपने आप के साथ, अपनी आत्मा के साथ छलावा कर रहा है। मैं, आज कुछ चीजें पूछना चाहता हूं, युगांडा में 70 के दशक में ईदी अमीन का शासन आया था, वहां से ढेर सारे भारतीय भागकर यहां आए, क्यों कांग्रेस की सरकार ने उस वक्त उनको शरण दी थी? वो कहां जाएगा? यही आएगा, इसकी नेचुरल जगह है, इसलिए वो शरणार्थी है।

वहां राजनीतिक हालात बदले, प्रताड़ना हुई, हमने शरण दी थी। यहां वह धर्म को बचाने के लिए, अपने परिवार की महिलाओं की एक प्रकार से सम्मान बचाने के लिए यहां आता है, उसको राजनीतिक शरण देना हमारा दायित्व है। ये 1951 से भारतीय संघ का उनके साथ किया गया वादा है, तो घुसपैठिया और शरणार्थी के बीच में उसको अलग दृष्टिकोण से सुनना चाहिए, देखना चाहिए और इसका इवैल्यूएशन भी अलग दृष्टिकोण से होना चाहिए और ये सुरक्षा के भी प्रॉब्लम हुए, मजदूरी के भी प्रॉब्लम हुए, गरीबी का भी प्रॉब्लम हुआ है, ढेर सारी ड्रग कार्टेल, हथियारों की तस्करी, जाली, नोटों की तस्करी में घुसपैठिए पकड़े जाते हैं। अब यह सारी चीजें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई चीजें हैं। सामाजिक विखवाद भी खड़ा करने का काम हो रहा है। मैं अभी झारखंड में गया था, झारखंड में ट्राइबलों की संख्या में बहुत ज्यादा गिरावट आ गई, बहुत बड़ी गिरावट आई, इसका कारण क्या? बांग्लादेश से हुई घुसपैठ है। अभी-अभी हमारा चुनाव आयोग एसआईआर कर रहा है, यह कांग्रेस पार्टी डिनायल मोड में आ गई है। उनका सच और झूठ का दायरा बड़ा सीमित हो गया है, जो नरेन्द्र मोदी सरकार कहती है वो झूठ है और वो काल्पनिक झूठ का हम विरोध कर रहे हैं, इसलिए हम सच हैं, उनका सच और झूठ का दायरा सीमित हो गया है। एसआईआर पहली बार नहीं हो रहा है 1951 से एसआईआर हो रहे हैं और एसआईआर एक प्रकार से चुनाव आयोग का दायित्व है, हमारी राजनीतिक प्रक्रिया को शुद्ध रखने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है और ये जब तक हम मानेंगे नहीं, चुनाव आयोग कभी काम नहीं कर पाएगा। हमारे संविधान के अंदर फ्री एंड फेयर चुनाव करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को दी है और फ्री एंड फेयर चुनाव तभी हो सकता है जब हम मतदाता सूची मतदाता की व्याख्या के अनुरूप करें। हमारे लोक प्रतिनिधित्व कानून के अंदर मतदाता की व्याख्या की गई है, सबसे पहली इसकी मतदाता बनने की

हमारे देश की रचना जिओपॉलिटिकल नेचर से स्वभाव से नहीं हुई है, हम जियो कल्चर देश हैं, भू-सांस्कृतिक देश हैं और अगर इसकी आत्मा को समझना है, तो हमें राज्य की सीमाओं के दायरे से ऊपर उठना पड़ेगा

योग्यता वो भारत का नागरिक है, ऐसा लिखा है। आप लोपित करना चाहते हो, तो एक प्रस्ताव लेकर आइए पार्लियामेंट में, कि इस देश में कोई भी वोट डाल सकता है और दूसरी योग्यता 18 साल का आयु है। अब आप 18 साल का आयु पूछोगे है या नहीं है, तो एसआर में पूछना पड़ेगा और आप भारत के नागरिक हो या नहीं हो, वो एसआईआर में पूछना पड़ेगा, वो भी समझते हैं कि यह पूछना पड़ेगा। परंतु वह इसलिए विरोध कर रहे हैं इसके कारण जो वोट कटते हैं, वह वोट उनकी वोट बैंक जो मानकर बैठे हैं उनके कटते हैं। ये चुनाव आयोग का दायित्व है। मतदाता सूची का शुद्धीकरण अगर चुनाव आयोग नहीं करेगा, तो पॉलिटिकल पार्टी करेगी क्या? और फिर भी चुनाव आयोग के प्रक्रिया से कोई भी आपत्ति हो तो कोर्ट में जा सकते हो, इसके खिलाफ जुलूस निकाल सकते हो क्या? इसके खिलाफ जुलूस नहीं निकाल सकते, संवैधानिक मर्यादाओं का हर दृष्टि से उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट में गए, सुप्रीम कोर्ट ने मॉनिटरिंग में चल रहा है एसआईआर। फिर भी आप स्वीकार नहीं करोगे और कई क्षेत्रों के अंदर 30%, 20%, 15%, 11% घुसपैठी पकड़े गए हैं, ये चुनाव आयोग का मतदाता शुद्धीकरण का जो कार्यक्रम है मतदाता सूची शुद्धीकरण का एसआईआर, मैं सभी को कहना चाहता हूं कि मतदाता की उम्र 18 साल है या नहीं है, वो उनको पूछना ही पूछना है और मतदाता देश का नागरिक है या नहीं है वह पूछने का अधिकार नहीं? यह दायित्व हमारे संविधान ने चुनाव आयोग को दिया है और यह प्रक्रिया में किसी ने हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

आज एक घुसपैठ की जो व्याख्या हो रही है उसमें सदन को यह भी बताना चाहता हूं। दुनिया में 90% जियोपॉलिटिकल देश भू-राजनीतिक देश है। उनकी देशों की रचना कोई युद्ध के कारण या कोई नोटिफिकेशन से या कौन युद्ध जीता, इसके आधार पर हुई। भारत एकमात्र देश ऐसा है, बहुत कम देशों में से सबसे बड़ा देश हमारा एकमात्र ऐसा है, हमारे देश की रचना जिओपॉलिटिकल नेचर से स्वभाव से नहीं हुई है, हम जियो कल्चर देश हैं, भू-सांस्कृतिक देश हैं और अगर इसकी आत्मा को समझना है, तो हमें राज्य की सीमाओं के दायरे से ऊपर उठना पड़ेगा। इनको शरण क्यों दी? उनको शरण क्यों दी? जो इस देश का वादा था 1951 में, हम उसका वादा पूरा करने का काम कर रहे हैं। विभाजन जब हुआ मैं अभी भी मानता हूं मन से मानता हूं, मेरे कई साथी मेरा विरोध कर रहे हैं, मगर फिर भी मानता हूं, कि इस देश का विभाजन धर्म के आधार पर करना बहुत बड़ी गलती थी। आपने भारत माता की दो भुजाओं को काटकर अंग्रेजों के षड्यंत्र को सफल किया है, ये कभी नहीं होना चाहिए था। हमारे यहां तो अनेक प्रकार के धर्म सदियों से चल रहे हैं, जैन धर्म कई हजारों साल से चल रहा है, बौद्ध धर्म कई हजारों साल से चल रहा है, दशम पिता ने सिख धर्म की स्थापना की कि कई सदियों से हम दसम पिता का भी सम्मान करते हैं। इस देश में कभी धर्म के आधार पर विखवाद नहीं हुआ, धर्म के आधार पर देश का राष्ट्रीयता का निर्णय कैसे हो सकता है? धर्म और राष्ट्रीयता दोनों को अलग करना चाहिए था। मगर धर्म और राष्ट्रीयता को अलग नहीं किया, इसके कारण ये सारे विखवाद और विवाद खड़े हुए हैं। अगर नेहरू-लियाकत समझौते का 1951 में ही पालन हो गया होता, तो आज शरणार्थी और घुसपैठियों का यह जो विवाद है वह विवाद नहीं होता है। जब घुसपैठिए मतदाता सूची में होते हैं, तो वह हमारे देश की राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया के हिस्सेदार होते हैं। मैं देश के सभी नागरिकों से पूछना चाहता हूं इस मंच के माध्यम से, देश का प्रधानमंत्री कौन है, वह तय करने का अधिकार देश के नागरिक के अलावा किसी को मिलना चाहिए क्या, राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा इसका अधिकार? देश के नागरिकों के अलावा किसी को मिलना चाहिए क्या, तो किसकी वकालत कर रहे हैं? देश की जनता ने उनको पूछना चाहिए।

जब आप घुसपैठिए को बचाने का काम कर रहे हो, हमारे लोकतंत्र को, हमारे पवित्र संविधान की स्पिरिट को दूषित कर रहे हो। क्योंकि चुनाव ही तो जो है जो लोकतंत्र में देश कौन चलाएगा, उसका फैसला करता है और चुनाव की प्रक्रिया में जो देश का नागरिक नहीं है, उसको मताधिकार देते हो, तब मत देने का कारण राष्ट्र का हित नहीं बनता है। मुझे कौन इस देश में रहने देगा वो कारण से वोट की जाती है और जब मत देने का कारण राष्ट्र का हित नहीं रहता है, लोकतंत्र कभी सफल नहीं हो सकता है।

इसीलिए भारतीय जनता पार्टी डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट, इन तीन सूत्रों को 50 के दशक से स्वीकार कर चली है। घुसपैठियों को हम डिटेक्ट भी करेंगे, हम पूरा प्रयास करेंगे कि मतदाता सूची से वह डिलीट हो जाए और बाद में उनके देश में उनको वापस भेजने का भी हम काम करेंगे। किसी को संशय रखने की जरूरत नहीं है और मैं मानता हूं, देश की जनता को तीन डी के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करना चाहिए। क्योंकि ये तीन डी देश की आत्मा को बचाने के लिए है, देश की संस्कृति को बचाने के लिए है, देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए है। इस देश में भी कई करोड़ मुसलमान रहते हैं, कई करोड़ क्रिश्चियन भाई, बौद्ध भाई, सिख भाई रहते हैं, किसी पर किसी ने कुछ आरोप नहीं लगाया। वो भी वोट देते हैं चुनाव प्रक्रिया में, उनका स्वागत है, जो मत है उसका स्वागत है। इस देश में बहुमत में हिंदू समाज रहता है, उसने सालों तक हमें सत्ता पर नहीं आने दिया। ठीक है सत्ता पर से निकाला भी है।

कई राज्यों में भी हम चुनाव हारे हैं, अटल जी के छह साल की सरकार के बाद भी हम चुनाव हारे थे, परिणाम जो आए वो आए, परंतु मत देने का अधिकार उसी को होना चाहिए, जो इस देश का नागरिक है, इस देश की संस्कृति, इस देश की भाषा और इस देश के लोकतंत्र के साथ जुड़ी हुई निष्ठा रखे। और यह मूल दायित्व हमारे संविधान ने दिया है, अनुच्छेद 326 में वयस्क मतदाता को ही अधिकार दिया है 18 साल का और जो हमारा 1950 और 1951 में अमेंडमेंट के साथ जनप्रतिनिधि पीपल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट बना, उसमें मतदाता पंजीकरण, चुनाव प्रक्रिया और उम्मीदवारों की पात्रता और मतदाता की पात्रता, यह इसका सटीक जांच करने का अधिकार हमारे चुनाव आयोग को दिया है और एसआईआर पहली बार नहीं हो रही। मैं समझ सकता हूं राहुल गांधी जी को तो मालूम ना हो, मगर अभी भी कुछ

भारतीय जनता पार्टी डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट, इन तीन सूत्रों को 50 के दशक से स्वीकार कर चली है। घुसपैठियों को हम डिटेक्ट भी करेंगे, हम पूरा प्रयास करेंगे कि मतदाता सूची से वह डिलीट हो जाए और बाद में उनके देश में उनको वापस भेजने का भी हम काम करेंगे

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बचे हैं, उनको तो कहना चाहिए कि आपके नाना ने भी कराया था, आपकी दादी ने भी कराया था, आपके पिता ने भी कराया था, काहे को विरोध कर रहे हो? वह बोलते ही नहीं है हमने कराया था। मगर मैं निश्चित रूप से मानता हूं, कि ये मतदाता सूची को शुद्ध करने का काम, ये पवित्र काम है हमारे लोकतंत्र को शुद्धि देगा।

फिर से मैं कहना चाहता हूं घुसपैठिए की इतनी बड़ी संख्या किसी देश को सुरक्षित नहीं रखती, सीमावर्ती क्षेत्र की राजनीति और कानून और व्यवस्था दोनों को वह प्रभावित कर रही है, शहरी क्षेत्रों में भी भारत के गरीब मजदूरों के अधिकार को वह छीनते हैं, जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक आक्रमण के साथ-साथ जमीन पर कब्जा करने का भी अभियान चला है और यह किसी भी प्रकार से देश के हित में नहीं है। इसीलिए इस 15 अगस्त को नरेन्द्र मोदी जी ने लाल किले की प्राचीर से हाई पावर डेमोग्राफिक चेंज मिशन बनाने की घोषणा की है, वो मिशन अनेक प्रकार के काम करेंगे। अवैध प्रवासन मतलब घुसपैठियों की जनसांख्यिकी परिवर्तनों का वैज्ञानिक मूल्यांकन, भी वो डेमोग्राफिक मिशन करेगा, धार्मिक और सामाजिक जीवन पर जो असर पड़ रहे हैं इसका भी अभ्यास करेगा। जनसंख्यिक के बदलाव के संभवित कारणों का भी अध्ययन करेगा, असामान्य बसावट की पैटर्न और दीर्घकालीन प्रभाव जो सोसाइटी पर पड़ रहे हैं इसका भी अध्ययन करेगा और सीमा प्रबंधन पर जो बोझ आता है इसका भी ये अध्ययन करके, भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट देंगे। मुझे मालूम है यह रिपोर्ट आते ही फिर से एक बार बड़ा विवाद होने वाला है। मगर विवादों और देश की सुरक्षा, विवाद और हमारे देश की संस्कृति को बचाना, विवाद और हमारे लोकतंत्र को बचाना, ये दोनों में से अगर किसी को चयन करना है तो भारतीय जनता पार्टी लोकतंत्र बचाने को, संस्कृति बचाने को चयनित करती है और दृढ़ता के साथ जो विवाद खड़े होते हैं, इसका हम जवाब देश की जनता के सामने देंगे और मेरी देश की जनता से भी करबद्ध निवेदन है प्रचार में आए बगैर, तथ्यों की गहराई में जाइए, तथ्यों में गोता लगाकर सत्य को ढूंढ लीजिए। जब तक हम हमारे देश के, देश के नागरिकों के अधिकारों के लिए जागरूक नहीं होते हैं, विश्व में हमें कोई नहीं बचा सकता, देश के नागरिकों के अधिकार बचाने की जिम्मेदारी देश के नागरिकों की है। पड़ोस के देश से जो रिलीजियस प्रताड़ना के कारण, धार्मिक प्रताड़ना के कारण आते हैं वो घुसपैठिए नहीं हैं, वो शरणार्थी हैं। शरणार्थियों का भारत में स्वागत है। उनको नागरिकता भी मिलेगी, अब कानून बन चुका है और घुसपैठियों के लिए डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट, ये तीन ही रास्ते बचे हैं, इतना मैं कहना चाहता हूं। फिर से एक बार जागरण को मंच देने के लिए मेरा बहुत-बहुत धन्यवाद और फिर से एक बार मैं वो पवित्र आत्मा जिनकी स्मृति में ये व्याख्यान हो रहा है, उनको श्रद्धांजलि देकर अपनी बात समाप्त करता हूं। वंदे मातरम।