आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय : नितिन नवीन

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संविधान हत्या दिवस (25 जून)

      भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नितिन नवीन ने 25 जून, 2026 को ‘संविधान हत्या दिवस’ के अवसर पर आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताते हुए ‘एक्स’ पर लिखा कि 25 जून, 1975 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा लगाया गया आपातकाल केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर सुनियोजित हमला था। श्री नवीन ने लिखा कि सत्ता बचाने की लालसा में देश की लोकतांत्रिक आत्मा को

आपातकाल हमारे संविधान पर सीधा हमला था: नरेन्‍द्र मोदी

“आज (25 जून) हम उन सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक ‘आपातकाल’ के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों की दृढ़ता से रक्षा की। आपातकाल हमारे संविधान पर सीधा हमला था। इसके दौरान नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित कर दी गईं; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया; राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और उन संस्थानों पर हमला किया गया जो हमारे लोकतंत्र के आधार स्‍तंभ हैं। साथ ही, इसने उन अनगिनत नागरिकों के असाधारण साहस को भी उजागर किया जिन्होंने चुप रहने से इनकार कर दिया और हमारे संविधान में निहित आदर्शों को बनाए रखा। हम सभी के लिए हमारा संविधान 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं, अधिकारों और कर्तव्यों का प्रतीक है। हम संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के प्रति अपनी सामूहिक प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त करते हैं। अपने संविधान की भावना से प्रेरित होकर हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के प्रति सदा प्रतिबद्ध रहे।”

कुचलने का प्रयास किया गया, लेकिन लोकतंत्र सेनानियों, राष्ट्रवादी संगठनों और करोड़ों देशवासियों के संघर्ष ने अंततः लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। श्री नवीन ने लिखा कि ‘संविधान हत्या दिवस’ हमें उस दौर की याद दिलाने के साथ-साथ संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रति सतत सजग रहने का संकल्प भी प्रदान करता है।

श्री नवीन ने कहा कि 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित किया था। इसके बाद राष्ट्रहित नहीं, बल्कि सत्ता हित को प्राथमिकता दी गई। एक व्यक्ति की कुर्सी बचाने के लिए पूरे देश की स्वतंत्रता को बंधक बना लिया गया और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी द्वारा स्थापित संवैधानिक मूल्यों एवं लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कुचलने का प्रयास किया गया। लोकतंत्र की आवाज़ उठाने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को बड़ी संख्या में गिरफ्तार किया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी, अटल बिहारी वाजपेयी जी, लालकृष्ण आडवाणी जी सहित हजारों लोकतंत्र सेनानियों को जेलों में डाल दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, जबरन नसबंदी अभियान चलाए गए, मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और मिसा जैसे कानूनों के माध्यम से नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन किया गया। यह केवल राजनीतिक संकट नहीं, लोकतंत्र पर सीधा प्रहार था।

भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने आगे लिखा कि सत्ता को निरंकुश बनाने के लिए संविधान में कई संशोधन किए गए। न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित करने का प्रयास हुआ, लेकिन भारत की लोकतांत्रिक आत्मा

को दबाया नहीं जा सका। कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के युवाओं और आम नागरिकों ने एकजुट होकर इस तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष किया और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। उसी संघर्ष के दौर में एक युवा प्रचारक के रूप में श्री नरेन्द्र मोदी ने गिरफ्तारी से बचते हुए भेष बदलकर आंदोलन का संदेश घर-घर पहुंचाया। भारतीय जनसंघ ने राष्ट्रहित और लोकतंत्र की रक्षा को सर्वोपरि रखते हुए अपने व्यक्तिगत एवं संगठनात्मक हितों से ऊपर उठकर स्वयं को जनता पार्टी में विलीन कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हजारों स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर लोकतंत्र की रक्षा का कार्य किया, जबकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने छात्र शक्ति को संगठित कर जनजागरण का नेतृत्व किया। यह त्याग, समर्पण और राष्ट्रनिष्ठा भारतीय राजनीति का स्वर्णिम अध्याय है।

श्री नवीन ने कहा कि आज देश एक विचित्र विडंबना देख रहा है। जिन्होंने लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला किया, वही आज लोकतंत्र के सबसे बड़े स्वयंभू रक्षक बनने का प्रयास कर रहे हैं। जब चुनावों में जनता उन्हें नकार देती है, तब उन्हें चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं रहता। ईवीएम पर सवाल उठाए जाते हैं।

मुख्य बिंदु
•25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर सुनियोजित हमला था
• आपातकाल के लिए कांग्रेस ने आज तक देश से बिना शर्त माफी नहीं मांगी, जबकि वही आज लोकतंत्र की दुहाई देती है
• प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय इतिहास के साथ न्याय करने वाला कदम है
• सत्ता बचाने के लिए कांग्रेस ने लोकतंत्र का गला घोंटा, विपक्षी नेताओं को जेल में डाला और मौलिक अधिकार निलंबित किए
• लोकतंत्र सेनानियों, भारतीय जनसंघ, संघ और छात्र शक्ति के संघर्ष ने तानाशाही को पराजित कर लोकतंत्र की पुनर्स्थापना की

जब न्यायालयों के निर्णय उनके राजनीतिक हितों के अनुरूप नहीं होते, तब न्यायपालिका की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए जाते हैं। कांग्रेस की राजनीति आज जवाबदेही की नहीं, बल्कि दोषारोपण की राजनीति बनकर रह गई है। संसद नहीं चले तो दोष सरकार का, चुनाव हार जाएं तो दोष व्यवस्था का, जनता समर्थन न दे तो दोष संस्थाओं का। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जो दल आज संविधान की दुहाई देता है, उसने आज तक आपातकाल के लिए देश से बिना शर्त माफी क्यों नहीं मांगी? यदि सचमुच संविधान की

चिंता होती, तो सबसे पहले लोकतंत्र की हत्या के उस अपराध के लिए देश से क्षमा मांगी जाती। दशकों तक आपातकाल के इस काले अध्याय को देश की सामूहिक स्मृति से मिटाने का प्रयास किया गया। लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष और संविधान पर हुए इस प्रहार को इतिहास के हाशिये पर धकेल दिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लेकर इतिहास के साथ न्याय किया गया। संविधान हत्या दिवस हमें केवल अतीत की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह संकल्प भी कराता है कि संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए हम सभी को सदैव सजग और समर्पित रहना पड़ेगा।

सरकार संविधान को अक्षरशः व उसकी भावना दोनों बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध: राजनाथ सिंह



“1975 में आज ही के दिन भारत में आपातकाल लगाया गया था। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। उस दौरान बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई, न्यायपालिका को नियंत्रित व कमज़ोर करने की कोशिशें हुईं और लाखों नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन किया गया।

आपातकाल हमें याद दिलाता है कि जब सत्ता में बैठे लोग तानाशाही रवैया अपनाते हैं, तो नागरिकों का जीवन, लोकतांत्रिक संस्थाएं और संवैधानिक मूल्य गंभीर ख़तरे में पड़ जाते हैं। इसलिए, यह दिन न केवल अतीत को याद करने का मौका है, बल्कि लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के अधिकारों व आज़ादी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दोहराने का भी अवसर है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार संविधान को अक्षरशः व उसकी भावना दोनों बनाए रखने और भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को मज़बूत करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। देश उन सभी लोगों का ऋ णी है जिन्होंने आपातकाल के अन्याय और ज्यादतियों का विरोध किया और साहसपूर्वक लोकतंत्र व संविधान की रक्षा की।”

25 जून, 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय है: अमित शाह

“25 जून, 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह काला अध्याय है, जब इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी के सत्ता के अहंकार तथा लालच ने संविधान की आत्मा, प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार को कुचलने का प्रयास किया था। ‘संविधान हत्या दिवस’ के अवसर पर लोकतंत्र के उन सभी सेनानियों को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं, जिन्होंने आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष कर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की। मोदी सरकार द्वारा 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का उद्देश्य इस काले अध्याय को राष्ट्र की स्मृति में जीवित रखना तथा यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में कांग्रेस पार्टी लोकतंत्र और संविधान पर ऐसा आघात कभी दोबारा न कर सके।”

कांग्रेस सरकार ने नागरिक अधिकारों का गला घोंटते हुए देश पर आपातकाल थोपा था : जगत प्रकाश नड्डा

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा ने 26 जून, 2026 को पटना, बिहार में आयोजित ‘संविधान हत्या दिवस’ कार्यक्रम को संबोधित किया। श्री नड्डा ने आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताते हुए कहा कि 25 जून, 1975 को कांग्रेस सरकार ने लोकतंत्र, संविधान, न्यायपालिका, प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों का गला घोंटते हुए देश पर आपातकाल थोपा था। श्री नड्डा ने कहा कि बिहार की धरती लोकतंत्र की रक्षा के लिए हुए ऐतिहासिक संघर्ष की जन्मस्थली रही है और लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के नेतृत्व में चले आंदोलन ने देश को तानाशाही के विरुद्ध संगठित करने का कार्य किया। इस कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री श्री सम्राट चौधरी, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय संगठक श्री नागेंद्रनाथ त्रिपाठी, केंद्रीय मंत्री श्री गिरिराज सिंह तथा पटना महानगर अध्यक्ष श्री रूपक नारायण मेहता सहित बड़ी संख्या में पार्टी पदाधिकारी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

श्री नड्डा ने कहा कि 25 जून वह दिन था, जब प्रजातंत्र का गला घोंटा गया, प्रेस का गला घोंटा गया, व्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगाई गई और संविधान पर कुठाराघात किया गया। यह सब हमने अपनी आंखों के सामने देखा है। आज इसे इसलिए याद किया जाता है, ताकि भारत का प्रजातंत्र उसी मजबूती के साथ हमेशा कायम रहे, जिस मजबूती के साथ उसने उस समय प्रजातंत्र का गला घोंटने वालों को जवाब दिया था और इस पर कभी कोई आंच न आए। इसके लिए हम सभी प्रतिज्ञा भी करते हैं। यह आने वाली सरकारों और आने वाली जम्हूरियत के लिए भी एक उदाहरण है कि इस प्रकार का दुस्साहस करने वालों का हश्र क्या होता है और भारत की जनता किस प्रकार जागृत होकर जवाब देती है।

उन्होंने कहा कि जस्टिस जगमोहन ने इंदिरा गांधी को दोषी ठहराया था और कहा था कि उन्होंने चुनाव में धांधली की है तथा सरकार का दुरुपयोग किया है। इसी कारण उन्हें पद से हटाया गया और उनकी सदस्यता समाप्त की गई। यह बात हम सबको मालूम है। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि इस घटना के तीन सप्ताह के भीतर ही इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी थी। वह इमरजेंसी लगभग 21 महीने तक चली और वह सब भी हमने अपनी आंखों से देखा है। यदि इमरजेंसी की चर्चा की जाए, तो यह जानना जरूरी है कि 1 लाख 31 हजार लोगों को बिना कारण और बिना न्यायिक समीक्षा के जेल में डाल दिया गया था। आश्चर्य की बात यह है कि अंग्रेजों के खिलाफ पूरे आंदोलन के दौरान भी अंग्रेजों ने कभी इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जेल में नहीं डाला, जितना इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी ने डाल दिया।