छठ का महापर्व ‘संस्कृति, प्रकृति और समाज’ के बीच की गहरी एकता का प्रतिबिंब है: नरेन्द्र मोदी

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‘मन की बात’

छठ के घाटों पर समाज का हर वर्ग एक साथ खड़ा होता है। ये दृश्य भारत की सामाजिक एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है

     प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 26 अक्टूबर को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ की 127वीं कड़ी की शुरुआत करते हुए कहा कि पूरे देश में इस समय त्योहारों का उल्लास है। हम सबने कुछ दिन पहले दीपावली मनाई है और अभी बड़ी संख्या में लोग छठ पूजा में व्यस्त हैं। घरों में ठेकुआ बनाया जा रहा है। जगह-जगह घाट सज रहे हैं। बाजारों में रौनक है। हर तरफ श्रद्धा, अपनापन और परंपरा का संगम दिख रहा है। छठ का व्रत रखने वाली महिलाएं जिस समर्पण और निष्ठा से इस पर्व की तैयारी करती हैं वो अपने आप में बहुत प्रेरणादायक है।

उन्होंने कहा कि छठ का महापर्व संस्कृति, प्रकृति और समाज के बीच की गहरी एकता का प्रतिबिंब है। छठ के घाटों पर समाज का हर वर्ग एक साथ खड़ा होता है। ये दृश्य भारत की सामाजिक एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है। आप देश और दुनिया के किसी भी कोने में हों, यदि मौका मिले, तो छठ उत्सव में जरूर हिस्सा लें। एक अनोखे अनुभव को खुद महसूस करें। मैं छठी मैया को नमन करता हूं। सभी देशवासियों को, विशेषकर बिहार, झारखंड और पूर्वांचल के लोगों को छठ महापर्व की शुभकामनाएं देता हूं।

सरदार पटेल जी की 150वीं जयंती

श्री मोदी ने कहा कि वैसे मुझे 31 अक्टूबर का भी इंतजार है। यह लौहपुरुष सरदार पटेल की जयंती का दिन है। इस अवसर पर हर वर्ष गुजरात के एकता नगर में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के समीप विशेष समारोह आयोजित किए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि सरदार पटेल जी की 150वीं जयंती का दिन पूरे देश के लिए एक बहुत विशेष अवसर है। सरदार पटेल आधुनिक काल में राष्ट्र की सबसे महान विभूतियों में से एक रहे हैं। उनके विराट व्यक्तित्व में अनेक गुण एक साथ समाहित थे। वे एक अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र रहे। उन्होंने भारत और ब्रिटेन दोनों ही जगह पढ़ाई में बेहतरीन प्रदर्शन किया। वे अपने समय के सबसे सफल वकीलों में से भी एक थे। वो वकालत में और नाम कमा सकते थे, लेकिन गांधी जी से प्रेरित होकर उन्होंने खुद को स्वतंत्रता आंदोलन में पूरी तरह समर्पित कर दिया।

श्री मोदी ने कहा कि ‘खेड़ा सत्याग्रह’ से लेकर ‘बोरसद सत्याग्रह’ तक अनेक आंदोलनों में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है। अहमदाबाद नगरपालिका के प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल भी ऐतिहासिक रहा था। उन्होंने स्वच्छता और सुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में उनके योगदान के लिए हम सभी सदैव उनके ऋणी रहेंगे।

भारत का राष्ट्र गीत यानी ‘वन्देमातरम्’

श्री मोदी ने कहा कि अब ‘मन की बात’ में एक ऐसे विषय की बात, जो हम सबके दिलों के बेहद करीब है। ये विषय है हमारे राष्ट्र गीत का— भारत का राष्ट्र गीत यानी ‘वन्देमातरम्’। एक ऐसा गीत, जिसका पहला शब्द ही हमारे हृदय में भावनाओं का उफान ला देता है। ‘वन्देमातरम्’ इस एक शब्द में कितने ही भाव हैं, कितनी ऊर्जाएं हैं। सहज भाव में ये हमें मां-भारती के वात्सल्य का अनुभव कराता है। यही हमें मां-भारती की संतानों के रूप में अपने दायित्वों का बोध कराता है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रभक्ति, मां-भारती से प्रेम, यह अगर शब्दों से परे की भावना है तो ‘वन्देमातरम्’ उस अमूर्त भावना को साकार स्वर देने वाला गीत है। इसकी रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी ने सदियों की गुलामी से शिथिल हो चुके भारत में नए प्राण फूंकने के लिए की थी।

श्री मोदी ने कहा कि ‘वन्देमातरम्’ भले ही 19वीं शताब्दी में लिखा गया था, लेकिन इसकी भावना भारत की हजारों वर्ष पुरानी अमर चेतना से जुड़ी थी। वेदों ने जिस भाव को ‘माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:’(Earth is the mother and I am her child) कहकर भारतीय सभ्यता की नींव रखी थी।

बंकिमचंद्र जी ने ‘वन्देमातरम्’ लिखकर मातृभूमि और उसकी संतानों के उसी रिश्ते को भाव विश्व में एक मंत्र के रूप में बांध दिया था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आप सोच रहे होंगे कि मैं अचानक से वन्देमातरम् की इतनी बातें क्यों कर रहा हूं। दरअसल कुछ ही दिनों बाद 7 नवंबर को हम ‘वन्देमातरम्’ के 150वें वर्ष के उत्सव में प्रवेश करने वाले हैं। 150 वर्ष पूर्व ‘वन्देमातरम्’ की रचना हुई थी और 1896 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे गाया था।

उन्होंने कहा कि ‘वन्देमातरम्’ के गान में करोड़ों देशवासियों ने हमेशा राष्ट्र प्रेम के अपार उफान को महसूस किया है। हमारी पीढ़ियों ने ‘वन्देमातरम्’ के शब्दों में भारत के एक जीवंत और भव्य स्वरूप के दर्शन किए हैं।

निर्दयी निज़ाम के अत्याचारों के खिलाफ खड़े हुए कोमरम भीम

श्री मोदी ने कहा कि अब मैं आपको जरा Flashback में लेकर चलूंगा। आप कल्पना करिए, 20वीं सदी का शुरुआती कालखंड! तब दूर-दूर तक आजादी की कहीं कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। पूरे भारत में अंग्रेजों ने शोषण की सारी सीमाएं लांघ दी थी और उस दौर में हैदराबाद के देशभक्त लोगों के लिए दमन का दौर और भी भयावह था। वे क्रूर और निर्दयी निज़ाम के अत्याचारों को भी झेलने को मजबूर थे। गरीबों, वंचितों और आदिवासी समुदायों पर तो अत्याचार की कोई सीमा ही नहीं थी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसे कठिन समय में करीब बीस साल का एक नौजवान इस अन्याय के खिलाफ खड़ा हुआ था। आज एक खास वजह से मैं उस नौजवान की चर्चा कर रहा हूं। उसका नाम बताने से पहले मैं उसकी वीरता की बात आपको बताऊंगा।

श्री मोदी ने कहा कि उस दौर में जब निज़ाम के खिलाफ एक शब्द बोलना भी गुनाह था। उस नौजवान ने सिद्दीकी नाम के निज़ाम के एक अधिकारी को खुली चुनौती दे दी थी। निज़ाम ने सिद्दीकी को किसानों की फसलें जब्त करने के लिए भेजा था, लेकिन अत्याचार के खिलाफ इस संघर्ष में उस नौजवान ने सिद्दीकी को मौत के घाट उतार दिया। वो गिरफ़्तारी से बच निकलने में भी कामयाब रहा। निज़ाम की अत्याचारी पुलिस से बचते हुए वो नौजवान वहां से सैकड़ों किलोमीटर दूर असम जा पहुंचा।

उन्होंने कहा कि मैं जिस महान विभूति की चर्चा कर रहा हूं उनका नाम है कोमरम भीम। अभी 22 अक्टूबर को ही उनकी जन्म-जयंती मनाई है। कोमरम भीम की आयु बहुत लंबी नहीं रही, वो महज 40 वर्ष ही जीवित रहे लेकिन अपने जीवन-काल में उन्होंने अनगिनत लोगों, विशेषकर आदिवासी समाज के हृदय में अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने निज़ाम के खिलाफ संघर्ष कर रहे लोगों में नई ताकत भरी। वे अपने रणनीतिक कौशल के लिए भी जाने जाते थे। निज़ाम की सत्ता के लिए वे बहुत बड़ी चुनौती बन गए थे। 1940 में निज़ाम के लोगों ने उनकी हत्या कर दी थी। युवाओं से मेरा आग्रह है कि वे उनके बारे में अधिक से अधिक जानने का प्रयास करें।

श्री मोदी ने कहा कि अगले महीने की 15 तारीख को हम ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाएंगे। यह भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती का सुअवसर है। मैं भगवान बिरसा मुंडा जी को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं। देश की आज़ादी के लिए, आदिवासी समुदाय के अधिकारों के लिए, उन्होंने जो काम किया वो अतुलनीय है।