एक शताब्दी पहले हुई आरएसएस की स्थापना राष्ट्रीय चेतना की स्थायी भावना दर्शाती है: नरेन्द्र मोदी

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प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के प्रति आरएसएस के योगदान को रेखांकित करते हुए
विशेष रूप से डिजाइन किया गया स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किया

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित किया। श्री मोदी ने इस अवसर पर सभी नागरिकों को नवरात्रि की शुभकामनाएं दीं और कहा कि आज महानवमी और देवी सिद्धिदात्री का दिन है। उन्होंने कहा कि कल विजयदशमी का महापर्व है, जो भारतीय संस्कृति के शाश्वत उद्घोष, अन्याय पर न्याय, असत्य पर सत्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि ऐसे ही पावन अवसर पर 100 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी और कहा कि यह कोई संयोग नहीं है। उन्होंने कहा कि यह हजारों वर्षों से चली आ रही एक प्राचीन परंपरा का पुनरुद्धार है, जिसमें राष्ट्रीय चेतना प्रत्येक युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए नए रूपों में प्रकट होती है। उन्होंने कहा कि इस युग में संघ उस शाश्वत राष्ट्रीय चेतना का एक सद्गुणी अवतार है

“राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय, इदं न मम”

     प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष का साक्षी बनना वर्तमान पीढ़ी के स्वयंसेवकों के लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने राष्ट्रसेवा के संकल्प में समर्पित असंख्य स्वयंसेवकों को अपनी शुभकामनाएं भी दीं। प्रधानमंत्री ने संघ के संस्थापक और पूज्यनीय आदर्श डॉ. हेडगेवार के चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने घोषणा की कि संघ की गौरवशाली 100 वर्ष की यात्रा के उपलक्ष्य में भारत सरकार ने एक विशेष डाक टिकट और स्मारक सिक्का जारी किया है। 100 रुपये के इस सिक्के पर एक ओर राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न तो दूसरी तरफ सिंह के साथ वरद मुद्रा में भारत माता की भव्य छवि अंकित है, जिन्हें स्वयंसेवकों द्वारा नमन किया जा रहा है। श्री मोदी ने रेखांकित किया कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में संभवतः यह पहली बार है, जब भारत माता की छवि भारतीय मुद्रा पर दिखाई दी है। उन्होंने कहा कि सिक्के पर संघ का मार्गदर्शक आदर्श वाक्य— “राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय, इदं न मम” भी अंकित है।

आज जारी किए गए स्मारक डाक टिकट के महत्व और इसकी असीम ऐतिहासिक प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए श्री मोदी ने 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस परेड के महत्व को याद किया और इस बात पर प्रकाश डाला कि 1963 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने देशभक्ति की धुनों पर ताल से ताल मिलाते हुए बड़े गर्व के साथ परेड में भाग लिया था। उन्होंने कहा कि यह डाक टिकट उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति को समेटे हुए है।

श्री मोदी ने इन स्मारक सिक्कों और डाक टिकट के जारी होने पर देशवासियों को हार्दिक बधाई देते हुए कहा, “यह स्मारक डाक टिकट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों के अटूट समर्पण को भी दर्शाता है, जो राष्ट्र की सेवा और समाज को सशक्त बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस प्रकार महान नदियां अपने तटों पर मानव सभ्यताओं का पोषण करती हैं, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी असंख्य लोगों को पोषित और समृद्ध किया है। एक नदी जो अपनी निकटस्थ भूमि, गांवों और क्षेत्रों को पल्लवित और पोषित करते हुए बहती है और संघ, जिसने भारतीय समाज के हर कार्यक्षेत्र और राष्ट्र के हर क्षेत्र को छुआ है, के बीच तुलना करते हुए, श्री मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि यह निरंतर समर्पण और एक शक्तिशाली राष्ट्रीय धारा का परिणाम है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का महान उद्देश्य: राष्ट्र निर्माण

श्री मोदी ने कहा, “अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महान उद्देश्य— राष्ट्र निर्माण को अपनाया है।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ ने राष्ट्रीय विकास की नींव के रूप में वैयक्तिक विकास का मार्ग चुना है। इस मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने के लिए संघ ने एक अनुशासित कार्य पद्धति— शाखाओं का दैनिक और नियमित संचालन अपनाई है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “पूज्य डॉ. हेडगेवार समझते थे कि राष्ट्र तभी वास्तविक रूप से सशक्त होगा जब प्रत्येक नागरिक अपने दायित्व के प्रति जागरूक होगा; भारत तभी उन्नति करेगा जब प्रत्येक नागरिक राष्ट्र के लिए जीना सीखेगा।” उन्होंने कहा कि इसीलिए डॉ. हेडगेवार अद्वितीय दृष्टिकोण अपनाते हुए लोगों के विकास के लिए प्रतिबद्ध रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में वैयक्तिक विकास की महान प्रक्रिया के निरंतर फलने-फूलने पर प्रकाश डालते हुए श्री मोदी ने शाखा स्थल को प्रेरणा का एक पवित्र स्थल बताया, जहां एक स्वयंसेवक सामूहिक भावना का प्रतिनिधित्व करते हुए ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर अपनी यात्रा आरंभ करता है। उन्होंने कहा कि ये शाखाएं चरित्र निर्माण की यज्ञ वेदी हैं, जो शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देती हैं। श्री मोदी ने यह भी कहा कि शाखाओं के भीतर, राष्ट्र सेवा की भावना और साहस की जड़ें पनपती हैं, त्याग और समर्पण स्वाभाविक हो जाते हैं, व्यक्तिगत श्रेय की लालसा कम हो जाती है और स्वयंसेवक सामूहिक निर्णय लेने और टीमवर्क के मूल्यों को आत्मसात् कर लेते हैं।

इस तथ्य को स्वीकार करते हुए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राष्ट्रसेवा की अपनी यात्रा में अनेक आक्रमणों और षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा है, श्री मोदी ने स्मरण किया कि कैसे स्वतंत्रता के बाद भी संघ को दबाने और उसे मुख्यधारा में शामिल होने से रोकने के प्रयास किए गए। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि पूज्य गुरुजी को झूठे मामलों में फंसाकर जेल भेज दिया गया था। फिर भी रिहा होने पर गुरुजी ने अत्यंत धैर्य के साथ कहा, “कभी-कभी जीभ दांतों तले फंस जाती है और कुचल जाती है। लेकिन हम दांत नहीं तोड़ते, क्योंकि दांत और जीभ दोनों हमारी हैं।”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी नहीं रखी ‘कटुता’

श्री मोदी ने इस बात पर बल दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी कटुता नहीं रखी, इसका एक प्रमुख कारण लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं में प्रत्येक स्वयंसेवक की अटूट आस्था है। उन्होंने आपातकाल के दौरान स्वयंसेवकों को सशक्त और प्रतिरोध करने की शक्ति प्रदान करने का स्मरण किया। श्री मोदी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि समाज के साथ एकता और संवैधानिक संस्थाओं में आस्था, इन दो मूलभूत मूल्यों ने स्वयंसेवकों को हर संकट में धैर्यवान और सामाजिक आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाए रखा है।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल देते हुए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा में उसका एक सबसे महत्वपूर्ण योगदान समाज के विभिन्न वर्गों में आत्म-जागरूकता और गौरव का संचार करना रहा है, कहा कि संघ ने देश के सबसे दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में विशेष रूप से देश के लगभग दस करोड़ जनजातीय भाइयों और बहनों के बीच निरंतर कार्य किया है।

श्री मोदी ने कहा, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक समरसता को सदैव प्राथमिकता दी है।” उन्होंने सामाजिक समरसता को समाज के वंचित लोगों को प्राथमिकता देकर सामाजिक न्याय की स्थापना और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के रूप में परिभाषित किया।

संघ का आदर्श भारतीय संस्कृति की जड़ों को गहरा और सुदृढ़ करना

श्री मोदी ने कहा, “संघ का आदर्श भारतीय संस्कृति की जड़ों को गहरा और सुदृढ़ करना है। इसका प्रयास समाज में आत्मविश्वास और गौरव का संचार करना है। इसका लक्ष्य प्रत्येक हृदय में जनसेवा की ज्योति प्रज्वलित करना है। इसका विजन भारतीय समाज को सामाजिक न्याय का प्रतीक बनाना है। इसका मिशन वैश्विक मंच पर भारत की आवाज को बुलंद करना है। इसका संकल्प राष्ट्र के लिए एक सुरक्षित और उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करना है।” उन्होंने इस ऐतिहासिक अवसर पर सभी को बधाई देते हुए अपने संबोधन का समापन किया।

इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, केंद्रीय संस्कृति मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।