राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष का संबोधन
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा ने 11 दिसंबर, 2025 को राज्यसभा में ‘वंदे मातरम’ पर चर्चा में सदन को संबोधित किया। श्री नड्डा ने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, स्वतंत्रता संग्राम की ऊर्जा और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का मंत्र है
श्री जगत प्रकाश नड्डा ने कहा कि 1875 में ब्रिटिश सरकार ने भारत पर अपना राष्ट्रीय गीत थोपने की कोशिश की और हर स्कूल तथा सार्वजनिक स्थान पर ‘गॉड सेव द क्वीन’ को प्रचारित करना चाहा। उसी समय बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने देश को वंदे मातरम् का गीत दिया। 1882 में इसे आनंदमठ में शामिल किया गया। बंकिम चंद्र जी ने इसे उस समय लिखा जब अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति को तोड़ने और अवमूल्यन करने की नीति अपनाई थी। उन्होंने भारत माता को ज्ञान और समृद्धि की देवी के रूप में प्रस्तुत किया और मां लक्ष्मी, मां दुर्गा तथा मां सरस्वती के माध्यम से शक्ति, धन और विद्या की प्रतीकात्मकता दी और भारत के दुश्मनों के सामने मां भारती रण में चंडी की तरह खड़ी है। इस मंत्र की शक्ति इतनी प्रभावशाली रही कि ब्रिटिशों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया। वंदे मातरम् के गायन या इसका उद्घोष करने पर लोगों को जेल भेजा गया।
उन्होंने कहा कि जब वीर विनायक दामोदर सावरकर ने वंदे मातरम् पर लेख लिखा, जो बिहारी में प्रकाशित हुआ, तो उन्हें इसके लिए सजा दी गई। चार्जशीट में यह जोड़ा गया कि वंदे मातरम् पर लिखा गया उनका लेख देशद्रोही और विद्रोही था। इसके चलते उन्हें दो जन्मों के लिए काला पानी की सजा सुनाई गई। इसी तरह, जब श्री अरविंदो ने इस विषय पर छह-सात लेख लिखे और हिंदू प्रकाश में प्रकाशित किए, तो उन्हें भी गिरफ्तार किया गया और बाद में वह पुडुचेरी चले गए। वंदे मातरम् का प्रभाव केवल उत्तर, मध्य या पूर्वी भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी गूंज दक्षिण में, तमिलनाडु तक भी पहुंची। वहां कोरल मिल्स और टूटी कोरिन में हुए आंदोलनों में वंदे मातरम् के स्वर को सुना गया। तिरुल वैली में जनता पर आघात के समय भी यह गीत गाया गया। खुदीराम बोस जब फांसी के फंदे पर चढ़े, तो उनके अंतिम शब्द वंदे मातरम् थे।
श्री नड्डा ने 1937 के नेहरू अभिलेखों का हवाला देते हुए बताया कि उस समय जवाहरलाल नेहरू ने वंदे मातरम् के कुछ पहलुओं को खारिज किया। सितंबर 1937 में उन्होंने उर्दू लेखक अली सरदार जाफरी को पत्र लिखकर गीत की भाषा की आलोचना की, इसे कठिन शब्दों से भरा और आधुनिक राष्ट्रवाद व प्रगति के सिद्धांतों के अनुरूप न मानने का तर्क प्रस्तुत किया। 1937 में नेहरू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे, प्रधानमंत्री नहीं। उसी समय कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने 26 अक्टूबर से 1 नवंबर 1937 तक एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें यह निर्धारित किया गया कि वंदे मातरम् के पहले दो छंद राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गाए जाएं, जबकि बाकी छंद बहुत कम इस्तेमाल किए जाएं। इसका कारण यह बताया गया कि बाकी छंदों में धार्मिक या किसी अन्य समुदाय के विचार शामिल हो सकते थे। कमेटी ने यह भी सिफारिश की कि आयोजकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए कि वे अन्य अपवादहीन गीत गा सकते हैं, लेकिन राष्ट्रीय कार्यक्रमों में केवल पहले दो छंद गाए जाएं। वंदे मातरम् गीत कभी किसी समुदाय के खिलाफ नहीं था, न ही इसका उद्देश्य किसी चुनौती के रूप में प्रस्तुत करना था। यह केवल भारत की संस्कृति और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में संरक्षित किया गया।
उन्होंने कहा कि उन्होंने जो उद्धृत किया, वह यह दर्शाता है कि वंदे मातरम् को उचित सम्मान और स्थान नहीं दिया गया और इसे ध्यान में रखना आवश्यक है। वे राष्ट्रगान, जन गण मन का पूरे मन से सम्मान करते हैं और अपने जीवन को उसके सम्मान के लिए समर्पित करते हैं। लेकिन संविधान सभा में राष्ट्रगान पर कितनी देर चर्चा हुई। राष्ट्रीय ध्वज पर कमेटी बनाई गई थी, जिसमें चर्चा हुई और रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, लेकिन राष्ट्रगान पर चर्चा नहीं हुई। श्री नड्डा ने 24 जनवरी 1950 का उदाहरण देते हुए कहा कि संविधान सभा के अंतिम दिन, जब संविधान की तीन प्रतियों पर हस्ताक्षर किए गए, उस दिन बिना किसी बहस, चर्चा या नोटिस के डॉ. राजेंद्र प्रसाद के वक्तव्य के माध्यम से यह घोषणा की गई कि जन गण मन भारत का राष्ट्र गान होगा। इसके साथ ही वंदे मातरम् का सम्मान भी जन गण मन के सम्मान के समान ही किया जाएगा। यह निर्णय किस प्रकार संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप या लोकतांत्रिक निर्णय के रूप में कहा जा सकता है? यह संवाद संविधान सभा के सदस्यों को निर्णय लेने के लिए छोड़ा जाना चाहिए।
श्री नड्डा ने उस समय का एक ज्वलंत और अत्यंत संवेदनशील वक्तव्य पढ़ा। संविधान सभा में भारत के राष्ट्र गान के चयन के दौरान वंदे मातरम् के प्रति जो उदासीनता और उपेक्षा दिखाई गई, उसके लिए पूरी
बंकिम चंद्र जी ने वंदे मातरम् उस समय लिखा जब अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति को तोड़ने और अवमूल्यन करने की नीति अपनाई थी। उन्होंने भारत माता को ज्ञान और समृद्धि की देवी के रूप में प्रस्तुत किया और मां लक्ष्मी, मां दुर्गा तथा मां सरस्वती के माध्यम से शक्ति, धन और विद्या की प्रतीकात्मकता दी और भारत के दुश्मनों के सामने मां भारती रण में चंडी की तरह खड़ी है
तरह से जवाहरलाल नेहरू जिम्मेदार थे। उन्होंने यह जिम्मेदारी एक लिखित उत्तर में भी स्पष्ट रूप से जाहिर की थी। एक सदस्य ने भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल से यह जानना चाहा था कि भारत के राष्ट्र गान के संदर्भ में क्या कदम उठाए जा रहे हैं? सरदार पटेल को लिखी गई चिट्ठी का उत्तर नेहरू जी ने 25 अगस्त 1948 को दिया, जिसमें उन्होंने लिखा कि इस विषय पर सभी निर्णय वही ले रहे हैं। इस जवाब के माध्यम से देशवासियों को पहली बार पता चला कि भारत सरकार की कैबिनेट, जिसका नेतृत्व नेहरू जी कर रहे थे, संविधान सभा के बाहर अस्थायी रूप से जन गण मन को भारत का राष्ट्र गान घोषित करने का निर्णय ले चुकी थी। नेहरू जी ने अपने उत्तर में कुछ प्रमाण और दृष्टांत भी प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि जन गण मन की धुन 1947 में संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेंबली में उस क्षेत्र के बैंड द्वारा प्रस्तुत की गई थी, जिसे सभी देशों ने सराहा और उस धुन की प्रतिलिपि भी मांगी। नेहरू जी ने किस अधिकार से जन गण मन को विदेशों में भारत के राष्ट्र गान के रूप में साझा किया। उस समय वह देश के प्रधानमंत्री नहीं बने थे और न ही संविधान सभा ने राष्ट्र गान पर कोई औपचारिक निर्णय लिया था। नेहरू जी ने यह सर्वोत्तम संवैधानिक प्रैक्टिस और राष्ट्र गान को विदेश में पहले स्वीकृति दिलाने की प्रक्रिया कहां से सीखी थी और यह निर्णय देश में स्वीकार कराने से पहले क्यों किया गया?
उन्होंने कहा कि संविधान सभा में तीन वर्षों के कार्यकाल में 167 कार्यदिवसों में राष्ट्र गान के मुद्दे के लिए औपचारिक रूप से केवल नौ मिनट ही समर्पित किए गए, जबकि सदस्यों द्वारा गंभीर चर्चा की बार-बार मांग की गई थी, जैसे श्री हरि विष्णु कामत, सेठ गोविंद दास, श्री शिबन लाल सक्सेना, श्री बी. दास और श्री लक्ष्मी नारायण साहू। लेकिन उस पर बहस की अनुमति नहीं दी गई। 15 नवंबर 1948 को श्री शिबन लाल सक्सेना ने संविधान के दूसरी अनुसूची में वंदे मातरम् को शामिल करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन इसे अस्वीकार कर दिया गया। उस समय यह सवाल उठने लगा कि जैसे राष्ट्रीय ध्वज के लिए कमेटी बनाई गई थी, क्या राष्ट्रगान के लिए भी ऐसी कमेटी बनाना आवश्यक था या नहीं। जवाहरलाल नेहरू जी ने असम के गवर्नर श्री प्रकाश को पत्र लिखकर कहा कि राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र गीत के मामले में संविधान सभा के निर्णय का इंतजार किया जाना चाहिए। वंदे मातरम् को राष्ट्र गान के योग्य नहीं माना गया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को लिखे 21 जून 1948 के पत्र में नेहरू जी ने स्पष्ट रूप से कहा कि वंदे मातरम् राष्ट्र गान के रूप में संभव नहीं है, क्योंकि इसकी धुन अवसर और बैंड प्रस्तुतियों के लिए उपयुक्त नहीं थी। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि उस समय राष्ट्र गान और वंदे मातरम् के चयन में प्रक्रिया और निर्णय में गंभीर अंतर था और इसे देशवासियों को जानना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि वे स्पष्ट करना चाहते हैं कि राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत अलग हैं। जवाहरलाल नेहरू जी के विचार यह थे कि वंदे मातरम् की धुन, अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आकर्षण के बावजूद, विदेशी अवसरों और ऑर्केस्ट्रा प्रस्तुतियों के लिए सहज रूप से उपयुक्त नहीं थी। इसके कारण उस समय पर्याप्त समर्थन भी नहीं मिला। 15 अक्टूबर 1937 को मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ सत्र में वंदे मातरम् के खिलाफ फतवा पास किया। उस समय नेहरू जी ने इसके खिलाफ प्रतिवाद करने के बजाय इस विषय पर जांच शुरू कर दी। 20 अक्टूबर 1937 को नेहरू जी ने सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर स्वीकार किया कि वंदे मातरम् का पृष्ठभूमि संगीत ‘आनंदमठ’ में मुस्लिम समुदाय के लिए उत्तेजक हो सकता है। इसके बाद कांग्रेस की केंद्रीय कार्यकारी समिति और बंगाल की बैठक में वंदे मातरम् की समीक्षा हुई, लेकिन इसे उचित स्थान और सम्मान नहीं दिया गया। 1971 में पारित ‘प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट’ के तहत भारतीय ध्वज और राष्ट्र गान के अपमान के लिए दंड का प्रावधान था, लेकिन इसमें राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् शामिल नहीं किया गया। इस कानून के तहत वंदे मातरम् का सम्मान सुनिश्चित करने के लिए कोई दंड नहीं था।
श्री नड्डा ने कहा कि वंदे मातरम् का गीत हमारे राष्ट्रवाद के साथ जुड़ा हुआ है और इसी भावना के साथ इसे आगे बढ़ाना चाहिए। वंदे मातरम् को वही सम्मान और स्थान मिलना चाहिए जो राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र गान को मिलता है। इसे संविधान में शामिल किया जाना चाहिए।

