हम एक भी घुसपैठिये को मतदान का अधिकार नहीं देंगे: अमित शाह

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लोक सभा में चुनाव सुधार पर चर्चा

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने 10 दिसंबर को लोक सभा में चुनाव सुधारों पर हुई चर्चा में भाग लिया। केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि संसद देश की चर्चा की सबसे बड़ी पंचायत है और हम चर्चा से कभी नहीं भागते। उन्होंने कहा कि कोई भी मुद्दा हो संसद के नियमों के अनुसार हम हमेशा चर्चा के लिए तैयार रहते हें। उन्होंने कहा कि विपक्ष गहन पुनरीक्षण या SIR के नाम पर चर्चा चाहता था, लेकिन इस विषय पर इस सदन में चर्चा नहीं हो सकती, क्योंकि गहन पुनरीक्षण की ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग की है और आयोग सरकार के तहत काम नहीं करता है। श्री शाह ने कहा कि चुनाव सुधारों पर चर्चा होनी तय हुई थी, लेकिन विपक्ष के अधिकतर सदस्यों ने SIR पर चर्चा की। यहां प्रस्तुत है श्री शाह के उद्बोधन का संपादित पाठ:

     माननीय अध्यक्ष जी, मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करना चाहता हूं कि आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का अवसर दिया। इस विषय पर चर्चा के लिए सत्र की शुरुआत में दो दिन गतिरोध भी रहा। इससे एक प्रकार की गलतफहमी जनता के बीच बनी कि हम लोग यह चर्चा नहीं करना चाहते हैं।

मान्यवर, चर्चा ‘चुनाव सुधारों’ पर होनी तय हुई थी, किंतु विपक्ष के अधिकांश माननीय सदस्यों ने एस.आई.आर. पर ही चर्चा की। अब, जब उन्होंने इस प्रकार चर्चा शुरु की है, तो उसका उत्तर देना मेरा दायित्व बनता है और मेरा मानना है कि उन्हें सुनना भी चाहिए।

एस.आई.आर. पर फैलाई गईं भ्रांतियां

मान्यवर, इस एस.आई.आर. यानी गहन पुनरीक्षण पर पिछले चार महीनों से एकतरफा झूठ फैलाया गया है और देश की जनता को गुमराह करने का प्रयास किया गया है। मैंने एस.आई.आर. की प्रक्रिया, उससे जुड़े संवैधानिक प्रावधानों तथा भूतकाल में हुए सभी एस.आई.आर. का गहन अध्ययन किया है। आज मैं आपके माध्यम से सदन और सदन के माध्यम से देश की जनता को बताना चाहता हूं कि कांग्रेस पार्टी द्वारा इस बारे में कैसा झूठ फैलाया गया है। तर्कों के आधार पर मैं उसका उत्तर देने आया हूं।

चुनाव आयोग पर संवैधानिक प्रावधान

मान्यवर, चुनाव आयोग का गठन इस देश के संविधान के अनुसार किया गया है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। संविधान में चुनाव आयोग की संरचना, उसकी शक्तियां, चुनावी प्रक्रिया, मतदाता की परिभाषा तथा मतदाता सूची के निर्माण और संशोधन से संबंधित स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं।

संविधान के भाग 15 के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग का गठन, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एवं लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभाओं, उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति के चुनावों का संपूर्ण नियंत्रण चुनाव आयोग को सौंपा गया है। एक या एक से अधिक चुनाव आयुक्त के नियुक्त करने की शक्ति ‘राष्ट्रपति जी’ को सौंपी जाती है। अनुच्छेद 325 के अनुसार किसी भी पात्र मतदाता को मतदाता सूची से बाहर नहीं रखा जा सकता इसका प्रावधान किया है। अनुच्छेद 326 ‘गहन पुनरीक्षण’ यानी एस.आई.आर. के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझने की आवश्यकता

मान्यवर, अब उन्होंने एस.आई.आर. पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं कि आज यह क्यों हो रहा है?

मैं उन्हें थोड़ा इतिहास बताना चाहता हूं। अब एक नई प्रवृत्ति का जन्म हुआ है कि जब इतिहास बताया जाता है, तो लोग कहते हैं कि इतिहास मत बताइए, लेकिन किसी देश या समाज की कोई भी प्रक्रिया इतिहास को जाने बिना कैसे आगे बढ़ सकती है? इतिहास किसी भी समाज का अभिन्न अंग है। हमारे लोकतांत्रिक इतिहास की शुरुआत 1952 में हुई।

1. सबसे पहला गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) 1952 में हुआ। उस समय प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु थे, जो कांग्रेस पार्टी से थे।
2. दूसरा एस.आई.आर. 1957 में हुआ, तब भी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे। तीसरा 1961 में हुआ, उस समय भी नेहरू जी प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी।
3. 1965-66 में भी गहन पुनरीक्षण हुआ, उस समय श्री लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे और कांग्रेस पार्टी की सरकार थी।
4. 1983-84 में हुआ, तब श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं।
5. 1987-89 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे।
6. 1992, 1993 और 1995 में भी हुआ, जब प्रधानमंत्री श्री नरसिंह राव थे।
7. 2002 और 2003 में एस.आई.आर. हुआ, उस समय प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी थे।
8. 2004 में गहन पुनरीक्षण समाप्त हुआ, तब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे।
9. वर्ष 2002, 2003 और 2004 का गहन पुनरीक्षण एक ही प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसमें दो वर्ष एनडीए सरकार के थे और एक वर्ष डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल का था।
10. 2004 के बाद सीधे 2025 में गहन पुनरीक्षण हो रहा है और इस समय हमारी सरकार है।

इस पूरी गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (एस.आई.आर.) का वर्ष 2004 तक कभी भी किसी दल ने विरोध नहीं किया, क्योंकि यह चुनाव को पवित्र बनाने की, लोकतंत्र को स्वस्थ बनाए रखने की प्रक्रिया है। यदि लोकतंत्र में जिस मतदाता सूची के आधार पर चुनाव होते हैं, वही सूची दूषित हो जाए, तो चुनाव कैसे निष्पक्ष और पारदर्शी होंगे? समय-समय पर मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण आवश्यक है, इसलिए चुनाव आयोग ने निर्णय लिया कि वर्ष 2025 में इसे किया जाएगा।

गहन पुनरीक्षण की अवधारणा और उद्देश्य

मान्यवर, यह गहन पुनरीक्षण क्या है? इसका उद्देश्य है—
जिन व्यक्तियों की मृत्यु हो गई है, उनके नाम सूची से हटाना;
जो 18 वर्ष के हो चुके हैं, उनके नाम जोड़ना;
जिनके नाम दो स्थानों पर हैं, उनका नाम एक जगह की सूची से हटाना; और जो विदेशी नागरिक हैं, उनके नाम चुन-चुन कर डिलीट करना।
यही गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया है।

लोकतंत्र की सुरक्षा को लेकर दृष्टिकोण

मान्यवर, मैं आज इस मंच से और आपके माध्यम से इस सदन तथा देश की जनता से कहना चाहता हूं कि क्या किसी भी देश का लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है, यदि यह तय करने वाले कि देश का प्रधानमंत्री या किसी राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा, वे लोग हों जो घुसपैठिए हैं? मान्यवर, लोकतंत्र तब सुरक्षित नहीं रह सकता।

क्या एक मतदाता का नाम एक से अधिक स्थानों पर होना चाहिए? क्या एक व्यक्ति को एक से अधिक स्थानों पर वोट देने का अधिकार होना चाहिए? जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी है, क्या उनके नाम मतदाता सूची में बने रहने चाहिए?

यह एस.आई.आर. और कुछ नहीं, बल्कि मतदाता सूची का शुद्धीकरण है। मैं मानता हूं कि इससे कुछ दलों के राजनीतिक स्वार्थ आहत होते हैं। मुझे उन दलों के प्रति एक प्रकार की अनुकंपा भी है, क्योंकि उन्हें वास्तविक मतदाता तो वोट देते नहीं, थोड़े बहुत विदेशी जो वोट दे देते थे, अब वे भी चले जाएंगे।

जनादेश को समझने की आवश्कता

मतदाता सूची पुरानी हो या नई विपक्ष का हारना तय है। यह तय मतदाता सूची से नहीं होता है। यह जनता को जनादेश तय करता है।

उन्होंने कहा कि भाजपा को कभी एंटी-इनकम्बेसी’ का सामना नहीं करना पड़ता। सच यह है कि एंटी-इनकम्बेसी उन्हीं के खिलाफ होती है, जो जनहित के विरुद्ध काम करते हैं। भाजपा को एंटी-इनकम्बेंसी का सामना बहुत कम करना पड़ता है। हमारी सरकारें बार-बार चुनी जाती हैं, चाहे राज्य हों या केंद्र।

परंतु ऐसा नहीं कि हम 2014 के बाद कोई चुनाव नहीं हारे। 2018 में छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हारे। कर्नाटक में 2014 के बाद हारे, तेलंगाना, तमिलनाडु, बंगाल में भी हारे। जब हम हारते हैं, तब आपको मतदाता सूची गलत नहीं लगती। जीतने पर आप टप से नए कपड़े पहनकर शपथ ले लेते हैं, उस वक्त मतदाता सूची का विरोध नहीं करते, लेकिन जब बिहार की तरह मुंह की खानी पड़ती है, तब मतदाता सूची का विरोध करते हैं।

मान्यवर, अब ‘वोट चोरी’ का शोर मचाया जा रहा है। वोट चोरी के तीन प्रकार हैं-

1. जब कोई व्यक्ति जनादेश के विपरीत पद प्राप्त करता है।
2. जब कोई व्यक्ति अनैतिक तरीके से चुनाव जीतता है।
3. जब कोई व्यक्ति पात्र नहीं है और फिर भी मतदाता बन जाता है।

अब मैं वोट चोरी की तीन घटनाओं का उल्लेख करना चाहता हूं। इन तीनों को वोट चोरी कहा जाएगा— सबसे पहली घटना आजादी के बाद हुई। प्रधानमंत्री किसे बनना था, यह प्रांतों के कांग्रेस अध्यक्षों के मतों से तय होना था। 28 वोट सरदार पटेल को मिले, 2 वोट जवाहरलाल नेहरू जी को मिले, पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बने।

दूसरी वोट चोरी होती है, अनैतिक तरीके से चुनाव जीतने की। यह श्रीमती इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव में हुई। श्री राज नारायण इस मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट ले गए कि यह चुनाव नियमों के अनुसार नहीं हुआ है और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि श्रीमती गांधी ने नियमों का पालन नहीं किया और उनका चुनाव अमान्य घोषित किया। मान्यवर, यह भी एक बड़ी वोट चोरी थी। बाद में उस वोट चोरी को ढंकन के लिए संसद में कानून लाया गया कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई केस नहीं चलाया जा सकता। विपक्ष के नेता पूछते हैं कि हमने चुनाव आयुक्तों को इम्यूनिटी क्यों दी। मैं आगे बताऊंगा, लेकिन श्रीमती इंदिरा गांधी ने स्वयं अपने लिए इम्यूनिटी ले ली थी, उस पर आप क्या कहेंगे? मोदी जी को जनता ने प्रधानमंत्री बनाया है, आपकी कृपा से नहीं बने हैं।

मान्यवर, विपक्ष के नेता का कहना है कि हमने चुनाव आयुक्तों को इम्यूनिटी दी। उनका यह आरोप असत्य है। फिर भी यदि मान लें कि दी, तो इंदिरा गांधी जी ने तो अपने लिए ही इम्यूनिटी बना ली थी। बाद में जब संवैधानिक सुधारों पर चुनौती आई, तो केस जीतने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में चौथे क्रम के न्यायाधीश को चीफ जस्टिस बनाया गया और निर्णय उनके पक्ष में हुआ। मान्यवर, यह इतिहास है। इसे कौन नकार सकता है? इनको कोई पढ़ाता नहीं है क्या, यह तो इतिहास है, यह संसद और अदालत दोनों के अभिलेखों में दर्ज है। इमरजेंसी के समय ललन सिंह जैसे कितने लोग बिहार में लोकतंत्र की रक्षा के लिए लड़े, जेल गए, लाखों लोग बंदी बनाए गए।

अब तीसरी वोट चोरी—जब कोई अयोग्य व्यक्ति मतदाता बन जाता है। हाल में दिल्ली की एक सिविल अदालत में एक वाद पहुंचा है, जिसमें यह है कि सोनिया गांधी जी भारत की नागरिक बनने से पहले मतदाता बनीं।

लोकतंत्र और चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा

मान्यवर, चुनाव आयोग तटस्थता से चुनाव कराने के लिए बनायी गयी संवैधानिक संस्था है। इसकी मान्यता किसी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि हमारे संविधान ने उसके भागों और अनुच्छेदों के तहत दी है। इस संस्था पर प्रश्नचिह्न लगाना और अनर्गल आरोप लगाना, चुनाव आयोग की छवि को नहीं बल्कि भारत के लोकतंत्र की छवि को दुनिया भर में धूमिल करता है। आपको लगता है कि आप सरकार की छवि बिगाड़ रहे हैं, पर वास्तविकता यह है कि आप भारत के लोकतंत्र की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा रहे हैं। मतदाता को भली भांति मालूम है कि उसने वोट दिया है, इसलिए यह सरकार बनी है। उसके मन में कोई संशय नहीं है। आप ‘वोट चोरी, वोट चोरी’ करते रहे, ‘घुसपैठिया बचाओ यात्रा’ निकाली और फिर भी बिहार में हम दो-तिहाई बहुमत से जीते। यह जो नई परंपरा चली है कि जब चुनाव न जीतो, तो चुनाव आयोग को बदनाम करो; चुनाव प्रक्रिया को बदनाम करो; मतदाता सूची को बदनाम करो, यह हमारे लोकतंत्र का भला नहीं करेंगे।

चुनावी परिणामों और आरोपों की निरंतरता

इसी चुनाव आयोग और इसी सरकार के दौरान आप भी कई चुनाव जीते हैं। तब हम कुछ नहीं बोले, बल्कि अपनी पार्टी में बैठकर उसका विश्लेषण किया।

महोदय, मैं थोड़ी स्पष्टता के लिए आंकड़े बताना चाहता हूं। मई, 2014 में श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी इस

विपक्ष के नेता का कहना है कि हमने चुनाव आयुक्तों को इम्यूनिटी दी। उनका यह आरोप असत्य है। फिर भी यदि मान लें कि दी, तो इंदिरा गांधी जी ने तो अपने लिए ही इम्यूनिटी बना ली थी। बाद में जब संवैधानिक सुधारों पर चुनौती आई, तो केस जीतने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में चौथे क्रम के न्यायाधीश को चीफ जस्टिस बनाया गया और निर्णय उनके पक्ष में हुआ। मान्यवर, यह इतिहास है। इसे कौन नकार सकता है? इनको कोई पढ़ाता नहीं है क्या, यह तो इतिहास है, यह संसद और अदालत दोनों के अभिलेखों में दर्ज है

देश के प्रधानमंत्री बने और तब से इनको आपत्ति है। एनडीए क्या-क्या जीती? हम वर्ष 2024-25 तक टोटल 44 चुनाव जीते, ये भी अलग-अलग विधान सभाओं में 30 चुनाव जीते, 30 जगहों पर जीते।

अब प्रश्न यह है- अगर मतदाता सूची भ्रष्ट थी, तो आपने शपथ क्यों ली? चुनाव क्यों लड़ा? देश की जनता को यह बताइए।

न्यायपालिका पर दबाव बनाने की विपक्ष की प्रवृत्ति

मान्यवर, आजादी के इतने सालों में ऐसा नहीं हुआ, अगर कोई जज एक जजमेंट दे तो जज के खिलाफ इम्पीचमेंट लेकर आते हैं। अपनी वोट बैंक को एड्रेस करने के लिए इम्पीचमेंट लेकर आते हैं। सबने तो साइन कर दिए, साथ ही उद्धव जी ने भी साइन कर दिए। उद्धव जी, जजमेंट क्या है? एक पहाड़ी पर मान्यता है, सबसे ऊपर दीया जलाया जाए। वोट बैंक को संभालने के लिए हाई कोर्ट के जज के सामने इम्पीचमेंट लेकर आए हैं।

ईवीएम की शुरुआत और वैधानिकता

मान्यवर, वर्ष 2014 के बाद इनकी हार की परंपरा शुरू हुई। ये जीते भी हैं, मगर हार की परंपरा भी साथ-साथ चली है। मान्यवर, उसी के बाद इन्होंने ईवीएम को निशाना बनाया। आज मैं इस सदन और देश की जनता को बताना चाहता हूं कि इस देश में ईवीएम कौन लेकर आया?

15 मार्च 1989 को जब श्री राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब ईवीएम की शुरुआत के लिए कानूनी संशोधन हुआ। अब ये राजीव गांधी के लाए ईवीएम कानून का भी विरोध कर रहे हैं। इसके बाद जब किसी ने ईवीएम के खिलाफ याचिका दायर की, तो भारत के सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने वर्ष

चुनाव सुधार की प्रक्रिया यह है- चुनाव आयोग सभी राजनीतिक दलों से विचार-मंथन कर विधि मंत्रालय को प्रस्ताव भेजता है, जहां से बिल बनाकर संसद में रखा जाता है। मैंने सोचा इतने हंगामे के बाद कांग्रेस अवश्य ही अनेक सुझाव दे चुकी होगी, लेकिन मान्यवर, यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मई, 2014 से आज तक कांग्रेस ने चुनाव आयोग को एक भी सुधार प्रस्ताव नहीं दिया है

2002 में यह संशोधन पूर्ण रूप से वैधानिक घोषित किया। मगर आज ये न राजीव गांधी को मानते हैं, न सर्वोच्च अदालत को। वर्ष 1998 में चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की केवल 16 विधानसभाओं में इसका ट्रायल कराया। सब जांच के बाद वर्ष 2004 में पहली बार पूरे देश में लोकसभा चुनाव ईवीएम से कराए गए। वर्ष 2004 का महत्व इसलिए है कि इसी वर्ष ईवीएम का प्रथम व्यापक उपयोग हुआ। वे चुनाव जीते, उस वक्त ईवीएम की चर्चा बंद। तब न किसी ने प्रश्न उठाया, न आरोप लगाए। वर्ष 2009 का पूरा चुनाव भी ईवीएम से हुआ और तब भी ये जीते थे। चुप्पी साध ली। मगर वर्ष 2014 में जब हम जीते, तो ‘कांव-कांव-कांव-कांव’ शुरू हो गई।

मान्यवर यह कैसी सोच है? जब कानून आप लाए, मशीन आप लाए, पहला चुनाव मशीन से आप जीते, मौज से दस साल राज करें- तब सब ठीक और जब हार गये तो रोते हैं। देश की जनता सब जानती है।

मान्यवर, मैंने सोचा कि जब कोई गलती नहीं है, तो ये लोग विरोध क्यों कर रहे हैं। फिर मुझे याद आया कि जब इनके जमाने में चुनाव होते थे, बिहार और उत्तर प्रदेश में सरकारें बनती थीं तो पूरे वोट्स के बक्से हाईजैक कर लिए जाते थे। ईवीएम आने के बाद यह बंद हो गया। चुनाव की चोरी बंद हुई है, इसलिए पेट में दर्द हो रहा है, ईवीएम का दोष नहीं है। चुनाव जीतने का तरीका जनादेश नहीं था, करप्ट प्रैक्टिसेज थीं, इसलिए ये चुनाव जीतते थे। अब ये आज पूरी तरह से एक्सपोज हो चुके हैं। जब जनादेश पर चुनाव होता है, तो आप चुनाव जीत सकते हैं, जीतो, उसका स्वागत है, मगर जब आप हारते हैं, तो अन्य कारण बताते हैं। ऐसा बताना ठीक नहीं है।

प्रधानमंत्री के कार्यक्रम और चुनाव तिथियों पर आरोपों का खंडन

मान्यवर, कल मैंने स्वयं विपक्ष के नेता का पूरा भाषण सुना। उनका भाषण धागों की तरह उलझा हुआ था। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का शेड्यूल देखकर चुनाव आयोग तारीखें घोषित करता है।
मेरा सभी सांसदों से विनम्र निवेदन है। चुनाव से एक महीने पहले प्रधानमंत्री का शेड्यूल देख लें, पिछले 140 महीनों में किसी भी महीने का रिकॉर्ड देख लीजिए। आपको प्रतिमाह एक जैसे प्रवास मिलेंगे। यह प्रधानमंत्री की कार्यशैली है, न कि चुनाव से जुड़ी नीति। वे आज़ादी के बाद सर्वाधिक जनसंपर्क करने वाले प्रधानमंत्री हैं।

साहब, मैं नरेन्द्र मोदी जी को जानता हूं। वे 2001 से आज तक एक दिन की छुट्टी पर भी नहीं गए। लगातार जनसेवा में जुटे हैं। मैंने उन्हें कभी अवकाश लेते नहीं देखा। हम उनका अनुसरण करने का प्रयास करते हैं तो बी.पी. बढ़ जाता है।

चुनाव सुधारों पर वास्तविक योगदान

मान्यवर, यह पूरी चर्चा चुनाव सुधार पर थी। मैंने आज सुबह चुनाव आयोग में जांच कराई थी। कोई गोपनीय जानकारी नहीं पूछी, केवल यह जानना चाहा कि मई, 2014 के बाद किन-किन दलों ने चुनाव सुधारों पर आवेदन भेजे। चुनाव सुधार की प्रक्रिया यह है- चुनाव आयोग सभी राजनीतिक दलों से विचार-मंथन कर विधि मंत्रालय को प्रस्ताव भेजता है, जहां से बिल बनाकर संसद में रखा जाता है। मैंने सोचा इतने हंगामे के बाद कांग्रेस अवश्य ही अनेक सुझाव दे चुकी होगी, लेकिन मान्यवर, यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मई, 2014 से आज तक कांग्रेस ने चुनाव आयोग को एक भी सुधार प्रस्ताव नहीं दिया है।

मान्यवर, अपने स्टेटमेंट पर कायम हूं। नरेन्द्र मोदी सरकार बनने के बाद आज तक कांग्रेस पार्टी द्वारा चुनाव आयोग को चुनाव सुधार से जुड़ा एक भी प्रस्ताव नहीं भेजा गया। चुनाव सुधार जो होता है, चुनाव के पहले, चुनाव के जो नियम तय होते हैं, इसके लिए सभी दलों को बाकायदा पत्र लिखा जाता है और कोई मांगे, तो उसको समय भी देना पड़ता है। ये दो अलग चीजें हैं।

विपक्ष के 3 सवालों के जवाब

अब विपक्ष के नेता ने कल तीन प्रश्न और चार सुझाव दिए थे:

1. मुख्य न्यायाधीश को चुनाव आयोग चयन समिति से बाहर क्यों किया गया?
2. दिसंबर, 2023 में कानून बदलकर चुनाव आयोग को पूर्ण प्रतिरक्षा क्यों दी गई?
3. सीसीटीवी फुटेज 45 दिनों में नष्ट करने का कानून क्यों लाया गया?

मान्यवर, मैं इन तीनों प्रश्नों के उत्तर दूंगा।

मान्यवर, मैं सबसे पहले पहले प्रश्न का उत्तर देना चाहता हूं। आप सभी मुझे पूरी तरह सुनें, आपत्ति बाद में लें, क्योंकि मैं अतीत से बात शुरू करूंगा, पर वर्तमान का उत्तर भी दूंगा।

मान्यवर, सभी माननीय सदस्यों से निवेदन है कि ध्यान से सुनें। 73 सालों तक इस देश में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कोई कानून नहीं था। प्रधानमंत्री सीधे ही चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करते थे।

मान्यवर, मैं आज पूरे देश को यह बताना चाहता हूं कि इनके कार्यकाल में जितने भी मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त बने हैं, उनकी नियुक्ति इसी प्रक्रिया से हुई। वर्ष 1950 से 1979 तक चुनाव आयोग एक सदस्यीय था। कोई स्वतंत्र कानून नहीं था। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को फाइल भेजते थे और राष्ट्रपति उसके बाद अधिसूचना जारी करते थे। उस समय यही परंपरा थी।

मान्यवर, उनके पूरे 55 वर्षों के शासन में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री द्वारा ही की गई। तब किसी ने प्रश्न नहीं उठाया, लेकिन जब श्री नरेन्द्र मोदी करते हैं, तो प्रश्न उठाए जाते हैं। हमने तो वैसा भी नहीं किया। वर्ष 1989 से 1991 के बीच, जब चुनाव आयुक्त उनकी बात नहीं मान रहे थे, तब पहली बार इस पर अंकुश लगाने के लिए चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाया गया। यह निर्णय बिहार के चुनाव के कारण ही हुआ, परंतु तब भी प्रधानमंत्री की फाइल से ही नियुक्ति होती थी। अब तक कुल 49 मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त ऐसे हुए हैं जिनकी नियुक्ति उसी प्रक्रिया से हुई, जिसे कांग्रेस पार्टी ने ही स्थापित किया था। कानून भी कांग्रेस पार्टी ने ही बनाया था। आज वही दल हम पर आरोप लगाता है कि ‘आपने चुनाव चोरी कर लिया।’ ऐसे आरोप लगाने से कुछ नहीं होता। जनता सब सुनती है और हम जवाब भी देंगे।

2023 के कानून और पारदर्शिता पर स्पष्टता

मान्यवर, वर्ष 1950 से लेकर 2023 तक चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के संबंध में कोई विधिक प्रावधान अस्तित्व में नहीं था। वर्ष 2023 में अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार का मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया। उसमें न्यायालय ने सुझाव दिया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होनी चाहिए। यह एक ऑब्जर्वेशन था, आदेश नहीं था। हमारे सॉलिसिटर जनरल ने सहमति जताई। उन्होंने कहा कि हमें कानून बनाने में थोड़ा समय लगेगा और इस प्रक्रिया पर चुनाव आयोग से भी परामर्श करना होगा। अदालत ने कहा कि अगर आप सहमत हैं तो जब तक कानून न बने; प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक समिति बनाई जाए। हमने इसे स्वीकार किया था।

मान्यवर, वर्ष 2023 में कानून बन गया। अब प्रावधान यह है कि प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री, ये तीन व्यक्ति मेरिट पर विचार कर चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करेंगे। हमारे समय में अधिक पारदर्शिता आई है। वे कहते हैं, “हमारा तो 33 प्रतिशत हिस्सा है।” इतना तो है न, जब हम विपक्ष में थे, हमारा तो हिस्सा ही नहीं था।

जहां तक 66 प्रतिशत और 33 प्रतिशत का प्रश्न है, यह देश की 140 करोड़ जनता तय करती है कि कौन 66 होगा और कौन 33। अगर वे आपके लिए तय करेंगे, तो आप 66 हो जाएंगे, मगर आप तो 100 रखकर गये थे] लेकिन हमने 33 दे दिया।

मान्यवर, ये क्या सवाल उठाते हैं? वे समझते हैं कि मैं बोलता हूं, तो बस वह ब्रह्म वाक्य होगा, ऐसा नहीं होता है। हर चीज के तर्क होते हैं। इनका जो भाषण तैयार करते हैं, वे भी ठीक से तैयार नहीं करते हैं और रिसर्च नहीं करते हैं।

कानूनी प्रावधानों पर स्पष्टता का दृष्टिकोण

मान्यवर, उन्होंने कहा कि सीईसी को वर्ष 2023 में कानून बनाकर इम्यूनिटी दी गई है। Representation of the People Act, 1950 में ही ईसीआई के अधिकारियों को जो इम्यूनिटी प्राप्त है उसमें जरा भी बढ़ोतरी नहीं की गयी है। हमने सिर्फ Representation of the People Act, 1951 के एक्ट की पुनरावृत्ति की है। आरपीए एक्ट की धारा 32, आरपीए एक्ट, 1951 के सुधार की धारा 146 (सी) कहती है कि चुनाव आयोग के किसी भी अधिकारी, जिसमें इलेक्शन कमिश्नर आ जाते हैं, इन पर चुनाव प्रक्रिया के लिए कोई मुकदमा नहीं चल सकता है। यह प्रावधान है और देश के कानून में इस प्रावधान को भी संरेखित किया है। इतने सारे वकीलों को राज्य सभा भेज रखा है, वे अपने नेता को ब्रीफ भी नहीं करते हैं।

मान्यवर, कल देर रात जब मैं भाषण तैयार कर रहा था, तो मैंने स्वयं से पूछा कि “जब सब इतनी स्पष्ट बात है, तो ये मुद्दा बार-बार क्यों उठा रहे हैं?” उनका मूल उद्देश्य अवैध घुसपैठियों को मतदाता सूची में बनाए रखना है।

अवैध घुसपैठ पर मोदी सरकार की नीति

मान्यवर, ये चाहे दो सौ बार बहिष्कार करें, पर हम एक भी अवैध घुसपैठिए को इस देश में वोट नहीं देने देंगे। यह हमारी एनडीए की नीति है- Detect, Delete and Deport -पहचानो, सूची से हटाओ, और देश से बाहर करो। हम संवैधानिक प्रक्रिया के तहत इन्हें डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट करेंगे और यह मैं जोर देकर कहता हूं। मैं तो घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने की बात कर रहा था। मैंने श्री जहवारलाल नेहरू पर, इंदिरा गांधी पर, इनके पिताजी पर, सोनिया जी पर इतने सारे आरोप लगाये, अगर तब भागते तो लाजिमी था। ये घुसपैठियों के लिए भाग गए।

हमारी नीति स्पष्ट है: Detect, Delete, and Deport

उनकी पॉलिसी है कि घुसपैठ को नॉर्मलाइज कर दो, उसके बाद मान्यता प्रदान कर दो और चुनाव में मतदाता सूची में डालकर फॉर्मलाइज कर दो। मगर यह लम्बे समय तक नहीं चलता है। मैं अपने मन से मानता हूं, मेरी पार्टी के सिद्धांत तो हैं ही, मगर मैं मानता हूं कि जनसांख्यिकी में इतना बड़ा परिवर्तन देश के लिए बहुत बड़ा खतरा है। यह देश एक बार जनसांख्यिकी के आधार पर बंट चुका है। हम नहीं चाहते कि आने वाली पीढ़ी इस देश के भी बंटवारे देखें। इसलिए यह बहुत जरूरी है और इस देश से घुसपैठ को रोकना पड़ेगा।

मान्यवर, ये पूछते हैं कि घुसपैठ हो रही है तो क्या यह भारत सरकार की जिम्मेदारी नहीं? मैं कहना चाहता हूं कि घुसपैठ भारत-बांग्लादेश की सीमा से हो रही है। पश्चिम बंगाल में यह सीमा कुल 2216 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से 1653 किलोमीटर पर बाड़ लग चुकी है। भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर बड़े हिस्से की फेंसिंग केवल एक राज्य पश्चिम बंगाल में बाकी है। असम, मेघालय, त्रिपुरा, पंजाब, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर और गुजरात में बाड़ पूरी हो चुकी है। केवल बंगाल में अटका है। मैं आज टीएमसी के साथियों से कहना चाहता हूं। जब राजनीतिक दलों ने राहुल जी के साथ ‘घुसपैठिया बचाओ यात्रा’ निकाली, तो बिहार में जनता ने दो-तिहाई बहुमत से उसका उत्तर दिया तो वे साफ हो गये। आप भी घुसपैठियों को बचाओगे तो वहां भी भारतीय जनता पार्टी की विजय तय है।

मान्यवर, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है चुनाव का नहीं। आप घुसपैठ के आधार पर चुनाव तो जीत सकते हैं, पर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं कर सकते। बिहार की जनता ने एक महान फैसला किया है ‘घुसपैठिया बचाओ यात्रा’ का जवाब जनादेश से देकर, बंगाल भी यही होगा।

मान्यवर, राहुल गांधी जी ने कल कहा कि हमने संवैधानिक संस्थाओं को भ्रष्ट कर दिया। मैंने पूरा बताया कि चुनाव आयोग की नियुक्तियों की प्रक्रिया पहले क्या थी।

उन्होंने यह कहा कि महत्वपूर्ण पद पर आरएसएस की विचारधारा के लोग रख लिए जाते हैं। इसमें क्या आपत्ति है? क्या इस देश में कोई कानून बना है कि आरएसएस की विचारधारा वालों को महत्वपूर्ण पदों पर नहीं रखा जाएगा?

इस देश का प्रधानमंत्री आरएसएस की विचारधारा वाला है। इस देश का गृह मंत्री आरएसएस की विचारधारा वाला है और ये जनादेश से बनकर आए हैं, आपकी कृपा से बनकर नहीं आए हैं।

मान्यवर, उन्होंने क्या किया है, यह मैं फिर बताना चाहता हूं। वर्ष 1969 में इस देश के राष्ट्रपति का चुनाव हुआ। वर्ष 1969 में इंदिरा जी अपनी पार्टी के अंदर ही संघर्ष करती थीं। पार्लियामेंट्री बोर्ड ने राष्ट्रपति के चुनाव के प्रतिनिधि के रूप में श्री संजीव रेड्डी को कांग्रेस पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार बनाया। इंदिरा जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए अपनी पार्टी के मेंडेट को ही डिफाई करके कहा कि राष्ट्रपति के चुनाव में वोटिंग अंतर-आत्मा की आवाज से करनी चाहिए और उन्होंने वी.वी. गिरी को प्रत्याशी बनाया। फिर क्या हुआ? चूंकि वह अल्पमत में थीं और संजीव रेड्डी जी के वोट ज्यादा थे।

इंदिरा गांधी जी ने जीतने के लिए कम्युनिस्टों से समर्थन लिया और इस देश के सारे संस्थानों पर, शिक्षा संस्थानों पर, महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर कम्युनिस्टों को बैठाने का काम इंदिरा गांधी जी ने किया।

वहीं से इस देश के विमर्श को बदलने के काम किया गया। वामपंथी विचारधारा इस देश की प्रकृति को, इस देश के स्वभाव को, इस देश की जनता को स्वीकार्य नहीं है। इसीलिए वामपंथी लुप्त हो गए। उन्होंने इस देश के युवा धन को वामपंथी विचारधारा पर डायवर्ट करने का काम किया है। वर्ष 2014 से फिर से नरेन्द्र मोदी जी इसको एक अच्छे तरीके से, लोकतांत्रिक तरीके से परिष्कृत करने का काम कर रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के होने का अर्थ

आरएसएस की विचारधारा क्या है? देश के लिए मरना ही आरएसएस की विचारधारा है। देश को समृद्धि के परम शिखर पर ले जाना ही आरएसएस की विचारधारा है। देश की संस्कृति का झण्डा बुलंद करना ही आरएसएस की विचारधारा है। ये हमें क्या समझाते हैं? क्या हम ऐसे ही मान लेंगे? साहब, हम नहीं डरते हैं। मैं मेरी ही बात करता हूं। मैं तो दस साल का था और नारे लगाता था कि असम की गलियां सूनी हैं, इंदिरा गांधी खूनी है। हम तो वहां से लड़ते-लड़ते आए हैं। हम नहीं डरते हैं।

भाजपा के चुनावी विजय के कारण

मान्यवर, इन्होंने कहा कि वोट चोरी से जीते हैं। वोट चोरी से नहीं जीते हैं। आपने सर्जिकल स्ट्राइक का विरोध किया, इसलिए हम जीते हैं। आपने एयर स्ट्राइक का विरोध किया, इसलिए जीते हैं। आपने धारा 370 हटाने का विरोध किया, इसलिए जीते हैं। आपने राम मंदिर बनाने का विरोध किया, इसलिए जीते हैं। आपने घुसपैठियों को हटाने का विरोध किया, इसलिए जीते हैं। आपने सीएए का विरोध किया, इसलिए हम जीते हैं। आपने ट्रिपल तलाक हटाने का विरोध किया, इसलिए जीते हैं। आप अब ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का विरोध कर रहे हो, इसलिए हम फिर से जीतेंगे।

जनकल्याण और विकास के आधार पर जीत

मान्यवर, 60 करोड़ गरीबों को इस देश के प्रधानमंत्री जी ने घर दिया, गैस दिया, पानी पहुंचाया, शौचालय दिया, पांच किलो मुफ्त अनाज दिया और पांच लाख तक की दवाइयां मुफ्त कर दीं।

ये क्या समझते हैं कि हम वोट चोरी करके जीते हैं? इस देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर को इनके 40 सालों में देख लीजिए और हमारे 11 सालों में देख लीजिए। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इन्फ्रास्ट्रक्चर को तीन गुना बढ़ाया है। इसलिए जनता हमें जीताती है। मैं अभी भी कहना चाहता हूं कि वे यहां से चले गए हैं। मान्यवर, मैं अभी भी कहना चाहता हूं कि एसआईआर का विरोध करोगे तो बिहार की तरह बंगाल और तमिलनाडु में भी सफाया होगा।