लोकतंत्र की शुचिता के लिए आवश्यक प्रक्रिया है ‘एसआईआर’ – जगत प्रकाश नड्डा

| Published on:

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री; रसायन और उर्वरक मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा ने 16 दिसंबर को राज्य सभा में चुनाव सुधारों पर हुई चर्चा का उत्तर दिया। श्री नड्डा ने कहा कि भारत केवल एक लोकतांत्रिक देश नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जननी है। इस देश में एक-एक वोट का बहुत बड़ा महत्व है, क्योंकि यही वोट देश की दिशा, दशा और भविष्य तय करता है। इसलिए यह हम सभी की सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि चुनाव सुधारों की प्रक्रिया निरंतर चलती रहे, ताकि लोकतंत्र की जड़ें और अधिक मजबूत हों। यहां प्रस्तुत है उनके उद्बोधन का सारांश:

चुनाव सुधारों के माध्यम से ही चुनाव व्यवस्था प्रजातंत्र को मजबूत करने और उसे एकरूपता देने का कार्य करती है और इसमें निर्वाचन आयोग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मेरे लिए लोकतंत्र केवल संविधान के अनुच्छेदों या प्रावधानों से प्राप्त व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, जीवनशैली और हमारे सामाजिक मूल्यों में गहराई से रचा-बसा है। इसी कारण हम गर्व से कहते हैं कि भारत केवल एक लोकतांत्रिक देश नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जननी है। इस देश में एक-एक वोट का बहुत बड़ा महत्व है, क्योंकि यही वोट देश की दिशा, दशा और भविष्य तय करता है। इसलिए यह हम सभी की सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि चुनाव सुधारों की प्रक्रिया निरंतर चलती रहे, ताकि लोकतंत्र की जड़ें और अधिक मजबूत हों। जैसे-जैसे निर्वाचन आयोग, सर्वोच्च न्यायालय और न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्थाएं सशक्त होती हैं, वैसे-वैसे हमारे लोकतंत्र की नींव भी और मजबूत होती जाती है। इसीलिए हमें इन संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने और उनके प्रति प्रयोग किए जाने वाले शब्दों में भी पूरी ज़िम्मेदारी और मर्यादा रखनी चाहिए। मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि निर्वाचन आयोग ने सुधारों के साथ एक लंबी और विश्वसनीय यात्रा तय की है और पूरी शुचिता के साथ देश में एक के बाद एक चुनाव संपन्न कराए हैं। 1.4 अरब से अधिक की आबादी वाले देश में मतदाताओं के मतों को पूरी सुरक्षा के साथ परिणामों में बदलना कोई साधारण कार्य नहीं है, बल्कि यह विश्व में भारत के लोकतंत्र की एक अद्वितीय उपलब्धि है, जिसके लिए निर्वाचन आयोग न केवल मेरी ओर से बल्कि पूरे सभा की ओर से प्रशंसा और बधाई का पात्र है।

‘एसआईआर’ निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाने वाला संवैधानिक दायित्व

दशकों तक, जब एक ही पार्टी और एक ही परिवार सत्ता में रहा, तब कभी भी निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर प्रश्न नहीं उठे। आज जो भ्रम फैलाया जा रहा है कि सरकार चर्चा से भागती है, वह पूरी तरह गलत है। मैं देश को बताना चाहता हूं कि माननीय मोदी जी के नेतृत्व में हमारी सरकार हर विषय पर चर्चा के लिए हमेशा तैयार रही है और आज चुनाव सुधारों पर लगभग दस घंटे की बहस हो चुकी है, जिसमें मैं 58वां वक्ता हूं। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन कोई राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाने वाला संवैधानिक दायित्व है। आयोग का गठन अनुच्छेद 324 के तहत हुआ है और उसे मतदाता की परिभाषा तय करने, मतदाता सूची तैयार करने और समय-समय पर उसे शुद्ध करने का अधिकार और ज़िम्मेदारी दी गई है। इसलिए एसआईआर के नाम पर धांधली का माहौल बनाना अनुचित है। निर्वाचन आयोग अपने संवैधानिक अधिकार के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने का काम कर रहा है और यही उसका संविधान प्रदत्त दायित्व है।

मतदाता सूची तैयार करने और उसे दुरुस्त करने की पूरी ज़िम्मेदारी संविधान ने निर्वाचन आयोग को दी है। अनुच्छेद 324, भाग 15 के तहत आयोग को लोकसभा, राज्यसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है। अनुच्छेद 325 यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी योग्य मतदाता सूची से बाहर न रहे और कोई भी अयोग्य व्यक्ति सूची में शामिल न हो। अनुच्छेद 326 एसआईआर की बुनियाद तय करता है, जिसके तहत मतदाता की पात्रता, योग्यता और शर्तें निर्धारित की जाती हैं- जैसे भारतीय नागरिक होना, 18 वर्ष से अधिक आयु, मानसिक रूप से स्वस्थ होना और अपराध या भ्रष्टाचार में संलिप्त न होना। एसआईआर कोई नई प्रक्रिया नहीं है। यह 1952 से लगातार अलग-अलग प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में होती रही है – नेहरू जी से लेकर मनमोहन सिंह जी तक। इसलिए आज एसआईआर पर सवाल उठाना तथ्यात्मक रूप से गलत है। 2004 के बाद लंबे समय तक एसआईआर न होने से मतदाता सूची में कई त्रुटियां बनी रहीं, जिन्हें अब ठीक करना आवश्यक हो गया है।

एसआईआर का उद्देश्य वोटर लिस्ट का शुद्धीकरण है और यह निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व है, जो राजनीतिक बहसों से परे निरंतर चलता रहेगा। 2004 के बाद एक निर्णय के कारण रिटर्निंग ऑफिसर से नाम हटाने का अधिकार ले लिया गया, जिसके चलते मृत्यु, स्थानांतरण या अन्य कारणों से अयोग्य हो चुके कई नाम मतदाता सूची में बने रहे। आज 2025 में खड़े होकर हमें समझना चाहिए कि एसआईआर इसी तरह की कमियों को दूर करने और चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

वोटर लिस्ट से हटाना ही होगा ‘विदेशी नागरिकों और घुसपैठियों’ को

2010 से 2025 के बीच जिन मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है, जो विवाह या स्थानांतरण के कारण दूसरी जगह चले गए हैं, या राज्य से बाहर चले गए हैं, उनके नाम न हटने के कारण एसआईआर का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का उद्देश्य मृत मतदाताओं के नाम हटाना, विदेशी नागरिकों और अयोग्य व्यक्तियों को सूची से बाहर करना तथा मतदाता सूची का शुद्धीकरण करना है।

यदि हमें वास्तविक शुद्धीकरण करना है, तो विदेशी नागरिकों और घुसपैठियों को वोटर लिस्ट से हटाना ही होगा। चुनाव परिणामों से असहज होकर निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाना गलत है। हार का कारण कहीं और है, लेकिन उसे ढूंढ़ने के बजाय भ्रम फैलाया जा रहा है कि चुनाव इसलिए हारे गए क्योंकि आयोग ने गड़बड़ी की। यह न केवल पार्टी हित बल्कि राष्ट्रीय हित से भी समझौता है। निर्वाचन आयोग के अधिकारों पर सवाल उठाना तथ्य और कानून दोनों के खिलाफ है। 1995 के लाल बाबू हुसैन बनाम वोटर रजिस्ट्रेशन ऑफिसर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया था कि मतदाता की नागरिकता की जांच करना और अयोग्य नाम हटाना निर्वाचन अधिकारियों का कर्तव्य है। इसलिए एसआईआर पूरी तरह संवैधानिक, न्यायिक रूप से मान्य और लोकतंत्र की शुचिता के लिए आवश्यक प्रक्रिया है।

निर्वाचन आयोग की अथॉरिटी, उसकी मर्यादा और उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठाना लोकतंत्र को कमजोर करने जैसा है। बिहार में 24 जून, 2025 से शुरू हुए एसआईआर के तहत 22 वर्षों बाद मतदाता सूची का शुद्धीकरण किया गया, जिसमें 7.89 करोड़ मतदाताओं में से मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित और डुप्लीकेट नाम हटाकर सूची को पारदर्शी तरीके से सुधारा गया। आपत्तियों के बाद भी अयोग्य नाम हटाए गए और योग्य नए मतदाताओं को जोड़ा गया, जिससे अंतिम मतदाता सूची 7.42 करोड़ की बनी। यह पूरी प्रक्रिया आंकड़ों के साथ पारदर्शिता को दर्शाती है। इतने बड़े स्तर पर एजेंट नियुक्त होने के बावज़ूद बहुत कम आपत्तियां आना इस बात का प्रमाण है कि निर्वाचन आयोग ने निष्पक्षता से काम किया। निर्वाचन आयोग की छवि को नुकसान पहुंचाना लोकतंत्र की छवि को नुकसान पहुंचाने जैसा है। इसी तरह ईवीएम पर सवाल उठाना भी उचित नहीं है, क्योंकि ईवीएम राजीव गांधी जी के कार्यकाल में चरणबद्ध तरीके से आई, उस पर न्यायिक परीक्षण हुआ और सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने इसे वैध ठहराया। मैं मानता हूं कि जीत पर व्यवस्था को सही और हार पर उसे दोषी ठहराना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

आपने कहा कि सीसीटीवी फुटेज 45 दिनों के बाद ही क्यों नष्ट कर देते हो। आप 45 दिनों के बाद किसी अदालत में किसी चुनाव याचिका को चुनौती नहीं कर सकते हैं। जब चुनौती ही नहीं कर सकते हैं, तो चुनाव आयोग के पास उसका रिकॉर्ड रखने का क्या उद्देश्य है? आपने कहा कि चुनाव आयोग को इम्युनिटी क्यों दी? यह कानून 2003 में बना और हमने इम्युनिटी को बढ़ाया नहीं है। जो इम्युनिटी पहले दी गई थी, उसी को जारी रखा जा रहा है।

हमारे लिए दल बाद में है, देश पहले है

आपने तो भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जी को पिछली तारीख से ही इम्युनिटी दे दी थी! इसी संसद से आपने प्रधानमंत्री को किसी भी कानून के तहत इम्युनिटी दिलाने का काम किया और वह भी पिछली तारीख से इम्युनिटी दिलाने का काम किया! आज आप चुनाव आयोग की इम्युनिटी पर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं! आप इम्युनिटी पर सवाल उठा रहे हैं। मैं बताना चाहता हूं कि यह इम्युनिटी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में ही दी हुई है, 2003 में दी गई थी और आपने भी दी थी। आप बताइए कि देश घुसपैठियों के वोट से चलेगा या देश के नागरिकों के वोट से चलेगा? भारत निर्वाचन आयोग के आंकड़े दिखाते हैं कि मतदाता सूचियों में सबसे अधिक वृद्धि वाले शीर्ष दस में से नौ जिले बांग्लादेश की सीमा से सटे हुए हैं। यह विषय चुनाव जीतने और हारने का नहीं है। यह देश का विषय है। यह देश से संबंधित विषय है, जिसे हमें समझना चाहिए। हमारे लिए दल बाद में है, देश पहले है। देश के लिए जो आवश्यक होगा, वह हम करने के लिए तैयार हैं।