यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।
भावार्थ: जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। जहां स्त्रीजाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं। जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं।
उपरोक्त श्लोक से नारी शब्द से क्या अर्थबोध होता है? यहीं कि, नारी शब्द की परिभाषा को लेकर प्राचीन या इतिहास काल में नारी को सशक्त समझकर उन्हें सम्माननीय दर्जा मिलता रहा है। नारी शब्द में 1) स्त्री, 2) औरत, 3) महिला… इन तीन गुरु वर्णों की एक वृत्ति पाई जाती हैं, जो ऊर्जा का भी प्रतीक मानी जाती है।
300 वर्ष पूर्व भारत वर्ष में जन्मी हुई, मालवा की रानी राजश्री देवी अहिल्याबाई होलकर भी भारतीय इतिहास में एक आदर्श नारी मानी गई हैं, जिसे संपूर्ण विश्व में एक आदर्श रानी के रूप में भी सराहा है
प्राचीन काल से एक ही नारी विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न दायित्वों का निर्वाह करते हुए सदैव संस्कृति और सभ्यता की पोषक और संरक्षक मानी जाती थी। प्राचीन भारत में नारी की सामाजिक स्थिति उच्च थी। समाज में नारी को सम्मानजनक पद भी प्राप्त होते थे और प्रतिष्ठा भी। विशेषकर राजघरानों में और अनेक विशेष स्थानों पर पुरुष वर्ग की प्रेरणा का स्रोत भी नारी ही होती थी।
300 वर्ष पूर्व भारत वर्ष में जन्मी हुई, मालवा की रानी राजश्री देवी अहिल्याबाई होलकर भी भारतीय इतिहास में एक आदर्श नारी मानी गई हैं, जिसे संपूर्ण विश्व में एक आदर्श रानी के रूप में भी सराहा है। आदर्श शासक के रूप में ही नहीं अपितु एक आदर्श हिंदू नारी के रूप में भारतीय इतिहास ने उन्हें रेखांकित किया है और उनके आदर्श नारी विशेष गुणों के लिए आज भी उन्हें स्मरण किया जाता है।
अहिल्यादेवी का जन्म महाराष्ट्र के चौंढी गांव में एक मराठी परिवार में हुआ था। सखाराम शास्त्री भागवत द्वारा लिखित संस्कृत पुस्तक ‘अहिल्या चरितम्’ के अनुसार, कालदर्शिका में मराठी तिथि और पंचांग के अनुसार अहिल्यादेवी की जन्म तारीख 31 मई, 1725 सिद्ध हुई थी। तब तक इतिहासकारों ने हर जगह अहिल्यादेवी का जन्म मराठी तिथि के अनुसार ही प्रविष्ट किया था। इस संदर्भ के अनुसार अहिल्याबाई के जन्म का त्रिशताब्दी वर्ष 31 मई, 2024 इस तारीख से शुरू हुआ है।
आइए, उस अवसर पर तत्कालीन आदर्श नारी के रूप में एक बेटी, पत्नी, स्नुषा, मां, शासक, सामाजिक समरसता और अहिल्याबाई के लोककल्याणकारी कार्य जैसे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार कर इस लोकमाता नारी शक्ति का जागरण करें।
अहिल्याबाई एक कर्मयोगिनी थीं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार अहिल्याबाई को ‘पुण्यश्लोक’ की उपाधि तब तक नहीं मिली जब तक वह जीवित रहीं। इतिहासकारों के अनुसार, अहिल्यादेवी के लिए ‘पुण्यश्लोक’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले ‘विद्या ज्ञानविस्तार’ के 1907 अंक में किया गया था। इसके अलावा, यह बहुत गर्व की बात है कि ब्रिटिश काल के दौरान एक राजनेता, प्रशासक के रूप में अहिल्याबाई की तुलना रूस की महारानी कैथरीन द ग्रेट और इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ और डेनमार्क की रानी मार्गरेट से की जाती थी।
1767 से 1795 के बीच 28 वर्षों के दौरान सत्ता के लिए अहिल्याबाई के मानदंड शासन की तुलना में रैयतों और अवाम के प्रेम और लोककल्याण पर अधिक आधारित थे। और इसी कसौटी के कारण उनके कार्य को स्त्री प्रकृति और मातृशक्ति की अवधारणा की सार्वभौम स्थापना के रूप में प्रतिष्ठा मिली है।
यह एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है, जो उन्हें लोकमाता की भी उपाधि मिली थी। बेटी, पत्नी, बहू, मां, एक शासक इन सभी मापदंडों को एक ही इकाई में मापना हो तो अहिल्याबाई एक आदर्श नारी भी साबित हुई थी।
भारतीय नारी की पहचान केवल सुंदरता नहीं, अपितु उनके गुण, सादगी और विनयशीलता है। भारत देश ही ऐसा है, जहां नारियों में अलग-अगल राज्यों में अलग-अलग परंपरा और संस्कृतियां विद्यमान हैं। भारतीय नारी की एक विशेषता उनकी शक्ति और साहस है। भारतीय महिलाओं को उनकी अद्भुत क्षमता और अविचलित धैर्य के लिए जाना जाता है। आलेख के शुरुआत में परिभाषित नारी के सम्पूर्ण गुण अहिल्याबाई को एक सशक्त आदर्श नारी के रूप स्वीकारने को बाध्य करता है।
सामाजिक समानता एक ऐसी स्थिति है जिसमें समाज में सभी व्यक्तियों को समान अधिकार, स्वतंत्रता और स्थिति प्राप्त होती है, जिसमें नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, स्वायत्तता और कुछ सार्वजनिक वस्तुओं और सामाजिक सेवाओं तक समान पहुंच शामिल है। अहिल्याबाई के शासन काल में ऐसा सौहार्द देखा जा सकता है।
आइए, अहिल्याबाई के आदर्श नारी के रूप में अवाम के हित में जुड़े कार्यों और सद्भाव के 2 प्रसिद्ध उदाहरण देखें…
इस प्रकार यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अहिल्याबाई ने एक तीर से दो शिकार किये हैं। भील, पिंडारी और गोंड प्रजा तथा तीर्थयात्रियों सभी को न्याय मिला। इसके अलावा, बेटी मुक्ताबाई के लिए यशवंतराव फणसे जैसा यथोचित युवा वर। इससे आपको पता चलता है कि अहिल्याबाई का प्रशासन कितना जनोन्मुख था। उनके अंदर पनपती आदर्श नारी… एक औरत जो मां थी, एक शासक जो महिला थी और एक स्त्री जो धर्मपरायण थी। इन तीनों गुरु वर्णों की वृत्ति अहिल्याबाई को आदर्श नारी साबित करने में मददगार साबित हुई।
अहिल्याबाई को एक आदर्श भारतीय महिला के रूप में जाना जाता है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर न केवल भारतीय नारी ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष को गर्व है। उनके धार्मिक, पवित्र हाथ में शिव प्रतीक की उपस्थिति…सच्चाई और सुंदरता के मार्ग पर चलने के उनके दृढ़ संकल्प की साक्षीदार है
उनकी शासन-शैली बहुत अनोखी थी। कहा जाता है कि भूखंड के बारे में 7/12 की अवधारणा स्वयं अहिल्यादेवी ने लागू की थी, जिसका प्रयोग आज भी महाराष्ट्र में, संपत्ति के 7/12 प्रक्रिया के लिए किया जाता है। होलकर सरकार कुछ जरूरतमंद लोगों के लिए बारह पेड़ लगाएगी, जैसे— आम, इमली, फूल आदि। वह व्यक्ति उन सभी पेड़ों की देखभाल करेगा। उन बारह पेड़ों में से पांच पेड़ों की आय सरकारी खजाने में जाएगी और सात पेड़ों की आय उस अनुगृहीत व्यक्ति के पास जाएगी।
आज के परिवेश में उस 7/12 संकल्पना में बहुत सारे बदलाव आए हैं। तथापि इस अवधारणा को लोककथाओं से मजबूत समर्थन प्राप्त है। उनके शासनकाल में रैयतों के लिए लागू की गई यह अवधारणाएं बिलकुल नई थीं और उन्होंने अपने कुशल और सुनियोजित प्रशासन के माध्यम से इन्हें सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया था।
अहिल्याबाई को एक आदर्श भारतीय महिला के रूप में जाना जाता है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर न केवल भारतीय नारी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष को गर्व है। उनके धार्मिक, पवित्र हाथ में शिव प्रतीक की उपस्थिति…सच्चाई और सुंदरता के मार्ग पर चलने के उनके दृढ़ संकल्प की साक्षीदार है। सत्य, शिव और सौंदर्य का सुंदर संयोजन उनमें बसी स्त्री शक्ति का स्रोत था।
हमारे देश में तीर्थस्थलों के साथ-साथ जलस्रोतों का भी महत्व समझाने के अनेक प्रमाण हमें मिलते हैं। उस समय की किसी महिला के लिए पुण्यश्लोक विशेषण पाना बहुत कठिन था, जो अहिल्याबाई को आसानी से मिल गया। जो बचाता है वह तीर्थ… और आंतरिक एवं बाह्य दोषों और दरिद्रता को जो दूर करता है उसे ‘कुंड’ कहा जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में तीर्थस्थलों और कुंडों और उनके आचरण और धार्मिक प्रथाओं के बारे में अपने अपने निर्देश हैं। उस समय भारतीय शासकों के लिए धर्मग्रन्थ एवं उन पर टीकाएं मार्गदर्शक रही थीं।
कहने का तात्पर्य यह है कि अन्य शासकों की तरह अहिल्याबाई ने भी राष्ट्र के लिए सड़कें, तालाब, धर्मशालाएं, अन्न क्षेत्र, मंदिर, मंदिरों का जीर्णोद्धार, घाट निर्माण आदि सुविधाएं उपलब्ध कराकर अपनी विशिष्टता साबित की। ये सभी रचनाएं सरकारी खजाने से कम और उनकी निजी संपत्ति और धन से अधिक हुईं। अत: एक शासक के रूप में उनका अन्य शासकों से यह अंतर अधिक गहराई से देखा जा सकता है।
इन सभी जनकल्याणकारी कार्यों के कारण रानी अहिल्याबाई प्रजा के लिए पुण्यश्लोक एवं लोकमाता बनीं। यह उनके अंदर मौजूद नारी शक्ति और मातृ शक्ति का प्रबल परिणाम और प्रभाव था।
प्रजा के सुख और कल्याण के लिए यदि कोई शासक उदारतापूर्वक लोककल्याण कार्य करता है, वह भी अपनी निजी संपत्ति से, अपने निजी खजाने से, तो इससे भी बड़ी मानवता कोई और नहीं है। वह रैयत के लिए इतनी लगन से काम करके खुद को धन्य मानती थी। इसीलिए पुणे की पेशवा सरकार अहिल्या देवी को आदर्श रानी मानती थी। और पेशवा भी अहिल्यादेवी की इस राजधानी महेश्वर को गर्व से ‘पुण्यद्वार महेश्वर’ कहा करते थे।
अहिल्या देवी द्वारा बनवाए गए अनेक मंदिरों के कारण, मंदिर के निर्माण कार्य से नृत्य, गायन, संगीत वाद्ययंत्र, मूर्तिकला, स्थापत्य, चित्रकला, मूर्तिकला जैसी कलाओं का प्रदर्शन करनेवाले कलाकारों की कला को विस्तार मिला था। कारीगरों को नौकरियां और रोजगार मिल रहे थे। महेश्वर में बुनकरों को आमंत्रित किया गया था और उनके लिए नई बस्तियां बनाई गईं थी। प्रसिद्ध महेश्वर सिल्क उन्हीं की देन है।
उनकी भूमिका अक्सर आध्यात्मिकता से जुड़ी होती थी, जो हमेशा नैतिकता, आंतरिक सत्व, मानवता की नमी, शाश्वत मानवीय मूल्यों के आंतरिक खिंचाव और सभी मानव धर्मों में योग्यता की शाश्वत भावना में दृढ़ विश्वास से जुड़ी थी और मानवता हमेशा सद्भाव का प्रतीक है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सामाजिक समरसता एवं मानवतावाद एक दूसरे के पूरक हैं।
‘दुनिया में जो कुछ भी है उसका आनंद आत्म-त्याग के साथ लेना चाहिए, इस भावना के साथ, कि सब कुछ भगवान का है। और किसी के धन का लालच नहीं करना चाहिए।’ …उन्होंने अपने जीवन में ईशोपनिषद के इस वचन का पूर्णत: पालन करने का उदाहरण समाज के सामने रेखा।
‘धर्म का अर्थ है लोक कल्याण’… उन्होंने यह समीकरण स्थापित किया था।
कल्याणकारी राज्य की उनकी अवधारणा जितनी उनके धर्म पर आधारित थी उतनी ही नैतिक निष्ठा, जिम्मेदारी, नैतिक आचरण और मानव धर्म पर भी आधारित थी। अतः भारत के समग्र इतिहास में अहिल्याबाई का स्थान अद्वितीय है। अहिल्याबाई एक वीर महारानी थीं
कल्याणकारी राज्य की उनकी अवधारणा जितनी उनके धर्म पर आधारित थी उतनी ही नैतिक निष्ठा, जिम्मेदारी, नैतिक आचरण और मानव धर्म पर भी आधारित थी। अतः भारत के समग्र इतिहास में अहिल्याबाई का स्थान अद्वितीय है। अहिल्याबाई एक वीर महारानी थीं।
सर जॉन मैल्कम ने तत्कालीन मध्य भारत का इतिहास लिखा है। इसमें अहिल्याबाई की जीवनी का हिस्सा शामिल है। अहिल्याबाई का वर्णन करते हुए वे कहते हैं…
‘Ahilyabai has become by general strategies, the model of good government, in Malwa… Her name is considered, as such excellent authority, that an objection is, never made, when her praise is needed, as precedent.’
तत्कालीन ब्रिटिश वाइसराय लॉर्ड एलनबरो ने भी कहा था, “अहिल्याबाई सर्वश्रेष्ठ राजनयिक और सर्वश्रेष्ठ राजनेता हैं।”
उस समय मराठा साम्राज्य में लोकमाता की उपाधि पानेवाली वह एकमात्र रानी थीं। उनमें दूरदर्शिता भी थी। उन्होंने अपने प्रशासन में पत्रों के माध्यम से पेशवाओं को बार-बार चेतावनी देने का साहस किया था और सभी मराठों और भारत के अन्य शासकों जैसे कि राजपूत, सिख आदि से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का आग्रह किया था।
अहिल्या देवी एक दूरदर्शी नेता थीं। उन्होंने बदलती व्यवस्था के अनुरूप अपनी पारंपरिक सैन्य व्यवस्था में बदलाव किया था और पश्चिमी शैली की सेना का गठन कर्नल जे.पी. बॉयड नामक ब्रिटिश अधिकारी के माध्यम से किया था। उन्होंने अपने सैनिकों को आधुनिक तरीकों से प्रशिक्षित किया था। होलकर परिवार का तोपखाना भी अहिल्याबाई के नियंत्रण में था।
उनके शाही दरबार में कई कलाकार और कवि भी अपनी कला का प्रदर्शन करने आया करते थे। सुप्रसिद्ध मराठी कवि मोरोपंत उनमें से एक हैं। एक दिन राज दरबार में एक अन्य मराठी कवि अनंत फंदी शृंगार गीत गा रहे थे, तो उन्होंने उस कवि को डांटते हुए कहा था, “आज जब अंग्रेज अपने देश में हर जगह अपने पैर फैला रहे हैं, ऐसे समय पर तुम सामाजिक जागरूकता के लिए गाने के बजाय ये किस तरह के गीत गा रहे हो?”
कवि प्रभाकर ने भी उनके दरबार में अहिल्याबाई की प्रशंसा में गीत गाए थे। यह सर्वविदित है कि अहिल्याबाई ने उन्हें आत्म-प्रशंसा के बजाय सामाजिक जागरूकता से संबंधित कुछ लिखने की सलाह दी थी। अहिल्याबाई की फटकार से प्रभावित होकर कवि अनंत फंदी और कवि प्रभाकर भी, दोनों ने अपने अपने गीत गायन की शैली को बदल दिया। और उनकी आवाज देश भक्ति के लिए गाने लगी। उनका गीत प्रकार मराठी में ‘फटका’ शैली के रूप में लोकप्रिय हुआ।
अहिल्या देवी के समय का युग और समाज आज की तरह स्वतंत्र विचारधारा में विश्वास नहीं करता था। समाज की अवधारणाएं मनुस्मृति से प्रेरित थीं। इसलिए वह उस समय की सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं में फंसी महिलाओं के लिए एक आदर्श महिला साबित हुई। उन महिलाओं के लिए अहिल्याबाई एक आदर्श नारी थी।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 1735 के आसपास यानी 18वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अहिल्याबाई ने स्वयं से शुरुआत करते हुए मराठी राजपरिवार में महिला शिक्षा की नींव रखी थी। दहेज विरोध, विधवा पुनर्विवाह, सती प्रथा का विरोध, निःसंतान विधवाओं को पुत्र गोद लेने का अधिकार जैसे सभी आधुनिक विचार उनके कार्यों से प्रभावित थे, जिससे यह भी सिद्ध होता है कि अहिल्याबाई उस समय एक ‘युग प्रर्वतक’ भी थीं।
अहिल्याबाई अपनी गरीब प्रजा और अनेक निराश्रित परिवारों को न्याय देती थी। हर तरह से पारिवारिक अन्याय के खिलाफ लड़कर, पीड़ितों को न्याय देना, दुर्व्यवहार के खिलाफ जांच करना इत्यादि काम वो स्वयं करती थी। उनके द्वारा, पीड़ितों को उनके अधिकार बहाल करने और विधवाओं को संपत्ति में हिस्सा दिलाने की कई कहानियां इतिहास में दर्ज हैं।
अहिल्या देवी अपनी न्याय प्रणाली और न्याय प्रेम के लिए जानी जाती थीं। लोकमंगल, प्रजावत्सल, लोकमाता की उपाधियां उन्हें लोगों ने दी थीं। उनकी दूरदृष्टि और दूरदर्शिता की पेशवा सरकार अकसर प्रशंसा करती थी।
राजर्षि तथा राजश्री यह दो अलग विशेषण है। ‘राजर्षि’ उसे कहा जाता है जिसने कठोर तपस्या करके अपार ज्ञान प्राप्त किया हो। लेकिन अहिल्याबाई को शनिवारवाड़ा से जो पत्र प्राप्त होते थे, उनमें उन्हें ‘राजश्री अहिल्याबाई’ कहकर संबोधित किया जाता था। वह एक शासक थी। एक राज्य की सम्पन्न रानी थी और श्री रूप लक्ष्मी थी। (शासक+श्री) जिसका अर्थ था ‘राजश्री’। क्योंकि उनके पास पेशवाओं से अधिक धन और संपत्ति थी। आवश्यकता पड़ने पर पेशवा उनसे उधार भी लेते थे। यदि पेशवा 50,000/- का ऋण मांगते थे, तो वह उन्हें 5 लाख का ऋण दे देती थी। इस तरह से उनका ‘राजश्री’ होना भी एक आदर्श नारी का ही रूप था।
उनके पास महिलाओं की एक सैन्य इकाई थी। होलकर द्वारा सत्ता पर कुटिल दृष्टि रखने वाले रघुनाथराव पेशवा के विरुद्ध युद्ध पुकारकर महिला सैनिकों की एक टुकड़ी लड़ने के लिए तैयार रखने का इतिहास सर्वश्रुत है। महेश्वर पर टीपू सुल्तान जैसे योद्धा की भी टेढ़ी नजर नहीं थी। अहिल्याबाई एक आदर्श रानी और आदर्श नारी होने का यह भी एक पुख़्ता सबूत था। अपने ससुर, सुबेदार मल्हारराव होलकर की मृत्यु के पश्चात् वह एक ऐसी शासक रानी थीं, जो बिना किसी पदवी या सूबेदार के पद पर अपनी औपचारिक नियुक्ति के बिना ही राजधानी महेश्वर से सम्पूर्ण मालवा पर शासन करती थीं।
वह शास्त्रप्रेमी और न्यायप्रेमी थी। साथ ही वह एक कूटनीतिज्ञ और कुशल शासक भी थीं। वह शासक जरूर थी, लेकिन वह कभी भी रत्नों से जड़े ऊंचे सिंहासन पर नहीं बैठी। अपने पूरे जीवन भर दरबार में एक साधारण सफेद कंबल पर बैठकर ही उन्होंने न्यायालय का संचालन किया। न्याय करते समय उनके हाथ में शिवलिंग होता था। जिससे ईश्वर साक्षी होकर सबके साथ वह उचित न्याय कर सके। उन्होंने सरकारी कामकाज तो किया, लेकिन कभी सत्ता की भूख नहीं रखी।
अहिल्या देवी अपनी न्याय प्रणाली और न्याय प्रेम के लिए जानी जाती थीं। लोकमंगल, प्रजावत्सल, लोकमाता की उपाधियां उन्हें लोगों ने दी थीं। उनकी दूरदृष्टि और दूरदर्शिता की पेशवा सरकार अकसर प्रशंसा करती थी
26 मई, 1728 को होलकर का शासनकाल प्रारम्भ हुआ था। महेश्वर और इंदौर पर होलकर राजाओं की 14 पीढ़ियों ने कुल 220 वर्ष और 22 दिनों तक शासन किया। भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद 20 अप्रैल, 1948 को मध्य भारत संघ का गठन किया गया था और भारत में सभी संस्थाओं और राजशाही को समाप्त कर दिया गया था। उस समय होलकरशाही, होलकर राजशक्ति का भी भारतीय संघ में विलय हो गया था।
आज के महाराष्ट्र के जामखेड तालुका के चौंधी गांव में एक सामान्य व्यक्ति के घर जन्मी अहिल्याबाई ने कुल 28 साल 5 महीने 17 दिनों तक होलकरों पर शासन किया और मालवा प्रांत में महेश्वर को उनकी राजधानी बनाया। उनका शासनकाल 27 मार्च, 1767 से 13 अगस्त, 1795 तक रहा। (दूसरे तुकोजी ने लगातार 42 वर्षों तक शासन किया।)
अहिल्याबाई होलकर का जीवन काल 1725 से 1795 तक का है। लेकिन उस समय, जब पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था थी, जब लड़कियों के लिए पढ़ना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं था, अहिल्याबाई मोडी लिपि में पढ़ और लिख सकती थीं। उन्होंने हिंदी, संस्कृत और मराठी का अध्ययन किया था। उनके पास (नागरिक) मुलकी और (सैन्य) लश्करी दोनों प्रशिक्षण थे। सास गौतमा बाई और ससुर मल्हारराव होलकर के मार्गदर्शन में वह सक्षम बनीं थी। उन्हें अपने जीवन में बहुत कम समय के लिए अपने पति खांडेराव और बेटे मालेराव का समर्थन प्राप्त हुआ।
उनके शासन के दौरान दहेज विरोधी राजाज्ञा जारी किये गये थे। उन्होंने अपने ससुर सुभेदार मल्हारराव होलकर के अनुरोध को मानते हुए स्वयं से सती प्रथा न मानने की शुरुआत किया। विधवा विवाह को समाज द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए, इसके लिए उन्होंने स्वयं कोशिश की। हिंदू धर्म में गोद भरने का रिवाज होता है। अहिल्याबाई ने जीवनदायिनी देवी के रूप में नर्मदा नदी को गोद भराई करने की प्रथा शुरू की थी। आज भी होलकर उत्तराधिकारी तीर या एक बड़े चक्र जैसे बड़े पहिये से (रहट) नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक साड़ियां अर्पण करते हैं।
अहिल्याबाई द्वारा विभिन्न स्थानों पर किये गये जनकल्याणकारी कार्यों में धार्मिक परतें हैं। उस समय उन्होंने गुजरात, पंढरपुर, नासिक, उदयपुर, उज्जैन, उड़ीसा, नेपाल, मद्रास, कारवार, रामेश्वर, निज़ाम राज्य आदि में कावड़ियों द्वारा गंगा जल ले जाने की प्रथा शुरू की थी। ये सभी स्थान हिंदुओं के प्रमुख धार्मिक केंद्र थे और सभी के लिए खुले थे।
भावार्थ : नारी ही समाज की आदर्श शिल्पी है।
अहिल्याबाई के लिये यह श्लोक अत्यंत यथार्थ प्रतीत होता है।
अहिल्याबाई की प्रतिज्ञा को महेश्वर किले में होलकर राज्य के प्रतीक चिन्ह पर पढ़ा जा सकता है। वह इस तरह है…
“मेरा काम लोगों को खुश करना है। मैं अपने हर कार्य के लिए जिम्मेदार रहूंगी। मैं आज यहां एक शासक के रूप में जो भी कार्य कर रही हूं उसके लिए मुझे भगवान को जवाब देना पड़ेगा। मैं उस जिम्मेदारी को पूरा करना चाहती हूं जो भगवान ने मुझे सौंपी है। मुझे किसी भी स्थिति में इसे पूर्ण करना है।” — अहिल्याबाई
अहिल्याबाई ने अपने जीवन के अंत तक इस प्रतिज्ञा को सख्ती से निभाया। 13 अगस्त, 1795 को यह लोकमाता अनंत में विलीन हो गयी। जब भी किसी आदर्श नारी की छवि मन में आती हैं तो लोकमाता पुण्यश्लोक राजश्री देवी अहिल्याबाई होलकर का नाम अग्रस्थान पर होना स्वाभाविक है।

