अहिल्याबाई होल्कर ने बनाए अनेक भव्य-दिव्य मंदिर

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उदय शंकर

   गया जी (तीर्थ) में फल्गु नदी के किनारे विष्णुपाद या विष्णुपद मंदिर का निर्माण मालवा की रानी देवी अहिल्या बाई होल्कर ने सन् 1787 में कराया।

इस मंदिर के निर्माण में 3 लाख रुपए का खर्च आया था और बारह वर्षों तक 6 सौ मजदूर काम करते रहे। ये शिल्पी और मजदूर राजस्थान के जयपुर से लाए गए थे। इनके साथ शर्त थी कि काम पूरा होते ही इन्हें अपने-अपने घर लौटना पड़ेगा।

सन् 1795 में जब उनका देहावसान हुआ तब भी ये शिल्पी और मजदूर मंदिर के आसपास काम में लगे हुए थे, लेकिन इनकी मृत्यु की खबर सुनकर काम रोक दिया गया। इस वक़्त राजा मित्रजित ने इन शिल्पियों और मजदूरों को सनद देकर बसाया जो खान बहादुर के पिता थे। खान बहादुर बहुत अच्छे चित्रकार भी थे, जिनके कई चित्र आज भी ऐतिहासिक हैं। ये शिल्पी आज भी गया में देखे जा सकते हैं जिनका मुख्य पेशा पत्थरों को तराशकर मूर्तियां बनाना है।

अष्टकोणीय (अष्टफलकीय) आधार पर खड़े किए गए इस मंदिर के ऊपर तक 8 फलक ही हैं। इस मंदिर में 18 स्तम्भ हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि सभी पर अलग-अलग पोज़ के ‘नारायण चरण’ बनाए गए हैं। यह ‘नारायण चरण’ 30 सेंटीमीटर का है जिस पर शंख, चक्र, गदा अंकित हैं।

विष्णुपाद मंदिर स्थानीय बैसाल्ट चट्टानों को काटकर बनाया गया है। मंदिर के शीर्ष पर सोने का कलश और झण्डा लगा हुआ है जिसका वजन 51 किलोग्राम है। मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए विश्वविख्यात है जिसमें नट मंदिर और गर्भगृह की प्राचीन परंपरा का पालन किया गया है

विष्णुपाद मंदिर स्थानीय बैसाल्ट चट्टानों को काटकर बनाया गया है। मंदिर के शीर्ष पर सोने का कलश और झण्डा लगा हुआ है जिसका वजन 51 किलोग्राम है। मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए विश्वविख्यात है जिसमें नट मंदिर और गर्भगृह की प्राचीन परंपरा का पालन किया गया है। गर्भगृह का शिखर 100 मीटर ऊंचा है और नट मंदिर की ऊंचाई 30 मीटर है।

ये बैसाल्ट पत्थर गया से 19 मील दूर पत्थलकट्टी से लाए गए थे। इन पत्थरों को प्रभावी काला रंग देने के लिए सीम (Dolichos lablab) की पत्तियों और तने के रस इस्तेमाल किए गए। इस मंदिर को धर्मशिला के नाम से भी जाना जाता है।

ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि अहिल्या बाई मालवा की रानी थी जिनकी राजधानी महेश्वर थी। वे शिव भक्त थीं, लेकिन विष्णु की भक्ति भी कम नहीं करती थीं।

गया में विष्णुपाद मंदिर के निर्माण से पहले उन्होंने महाराष्ट्र के अमरावती में चंद्रभागा (पूर्णा) नदी के तट पर एक विष्णुपद मंदिर बनवाया था, जो बरसात के मौसम में लगभग पूरी तरह डूब जाता था। यह मंदिर 16 स्तंभों पर टिका हुआ है जिसके सभी स्तंभों पर विष्णु के एक-एक जोड़े चरण चिह्न अंकित हैं, लेकिन सभी एक-दूसरे से भिन्न हैं। विष्णु का चरणचिह्न इस मंदिर में सालों भर लगभग पूरी तरह डूबा रहता है। यही वो मंदिर था जिसने गया में विशाल मंदिर बनवाने की प्रेरणा उन्हें दी।

वे राजस्थान की मीराबाई की तरह ही भक्त थी जिनका उद्देश्य था— ‘मेरो तो गिरधर गोपाल, दूसरों न कोई’। परिवार में सबको खो देने के बाद इन्होंने प्रजा और ईश्वर के प्रति अपना पूरा समय दिया।

गया के प्रति उनकी आस्था ने विवाह के पश्चात् इस मंदिर का निर्माण कराया था। गया की सबसे पहली यात्रा उन्होंने अपनी दादी के साथ 1731 में की थीं। तब वे 6 वर्ष की थीं।

कहते हैं नर्मदा नदी को साड़ी चढ़ाने की परंपरा इन्होंने ही शुरू की थी। ये बेहतरीन तीरंदाज़ थीं। तीर में साड़ी का एक किनारा बांधकर और उसे प्रत्यंचा पर चढ़ाकर खींचते हुए नर्मदा नदी पार कर देती थी। इसे देखने के लिए जनसमूह उमड़ पड़ता था। यह परंपरा उनके बाद भी चलती रही।

जब इनकी मृत्यु हुई थी तब भारत भर में कई मंदिरों में काम चल रहा था। ये सभी रुक गए। गया में तब विष्णुपाद मंदिर के प्रांगण में इनकी एक प्रतिमा बनाकर इन शिल्पियों ने स्थापित करा दी। यह प्रतिमा आज भी इस मंदिर में है।

इन्होंने जिन मंदिरों का निर्माण कराया इनमें काशी विश्वनाथ मंदिर भी एक था, जिसे अपने वास्तविक जगह से थोड़ा हटाकर बनाया गया, क्योंकि वास्तविक जगह में ज्ञानवापी मस्जिद खड़ी थी।

रानी अहिल्याबाई ने त्रयंबकेश्वर मंदिर का निर्माण भी कराया। इंदौर स्टेट गज़ेटियर बताता है कि मालवा स्टेट के अंदर के इंदौर, महेश्वर और आलमपुरा तथा स्टेट के बाहर के उज्जैन, ओंकारेश्वर, रावर, कुंभर, पुष्कर, पूना, जेजुरी, बद्रीनाथ, हरिद्वार, अयोध्या, काशी, गया, वृन्दावन, नेमिषारण्य, अमरकंटक, पंढरपुर और रामेश्वर में मंदिर, छतरी घाट और धर्मशाला का निर्माण भी इनके कार्यकाल में जमकर हुआ।

इस बात को छोड़ना भी गुनाह होगा कि मुसलमानों के पूजा स्थल को भी इन्होंने निर्माण तथा मरम्मत के लिए हर तरीके की सहायता दिए। खासकर, मज़ारों के निर्माण के लिए इन्होंने सदा मदद दी।

(लेखक स्तंभकार हैं)