महारानी अहिल्याबाई होल्कर न केवल अपने प्रशासनिक और धार्मिक कार्यों के लिए विख्यात थीं, बल्कि उनके द्वारा जारी किए गए सिक्के भी भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन सिक्कों ने न केवल उनकी शासनकाल की वित्तीय स्थिरता को प्रमाणित किया, बल्कि उस समय की संस्कृति, कला और धर्म की झलक भी प्रस्तुत की।
होळकरशाही में सिक्कों की ढलाई की शुरुआत श्रीमंत सुभेदार मल्हारराव होल्कर ने की थी। उन्होंने सन् 1751 के दौरान किले चांदवड (चंद्राई), जिला नासिक में सबसे पहले टकसाल शुरू की और उसी वर्ष अपने नाम से सिक्के ढलवाकर उनका प्रचलन शुरू किया। यहीं से 18वीं शताब्दी में होळकरशाही के युग की वास्तविक शुरुआत हुई। किले चांदवड की टकसाल, होळकरशाही की पहली टकसाल थी।
अहिल्याबाई के शासनकाल में राज्य ने अपार समृद्धि और स्थिरता का अनुभव किया। इस दौरान उन्होंने अपने प्रशासनिक और धार्मिक कर्तव्यों के साथ-साथ आर्थिक मामलों पर भी विशेष ध्यान दिया
दिनांक 20 मई, 1766 को श्रीमंत सुभेदार मल्हारराव होल्कर की मृत्यु के पश्चात् बाद पुण्यश्लोक रानी अहिल्यादेवी होल्कर ने होळकर राज्य का प्रशासन सुभेदार मालेराव होल्कर के काल में 1766 से 1767 और सुभेदार तुकोजीराव होल्कर (पहले) के काल में 1767 से 1795 तक ‘रिजेंट महारानी’ के रूप में संभाला। उनके शासनकाल में राज्य ने अपार समृद्धि और स्थिरता का अनुभव किया। इस दौरान उन्होंने अपने प्रशासनिक और धार्मिक कर्तव्यों के साथ-साथ आर्थिक मामलों पर भी विशेष ध्यान दिया। उनके द्वारा जारी सिक्के उनके आर्थिक प्रबंधन और सांस्कृतिक दृष्टिकोण का प्रमाण हैं।
सन् 1766 में अहिल्यादेवी ने इंदौर के मल्हारगंज में नयी टकसाल की स्थापना की। इस टकसाल को मोहरदास सावकार को ठेके पर चलाने के लिए दिया गया था। टकसाल चलाने की जिम्मेदारी भले ही किसी निजी व्यक्ति को सौंपी गई हो, लेकिन वहां के सिक्कों की गुणवत्ता और शुद्धता पर होळकर सरकार का नियंत्रण रहता था। होळकर सरकार से मोहरदास सावकार को एक रुपये प्रति सैकड़ा मिलता था।
सन् 1767 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने किले महेश्वर (मध्यप्रदेश) को नयी राजधानी के रूप में घोषित किया और उसी वर्ष वहां नयी टकसाल शुरू की। इस प्रकार 1795 तक उन्होंने विभिन्न स्थानों पर नयी टकसालों की स्थापना की :
• मल्हारनगर (महेश्वर), जिला अशोकनगर (मध्य प्रदेश)
• किले चांदवड, जिला नासिक (महाराष्ट्र)
• सिरोंज, जिला विदिशा (मध्य प्रदेश)
• महिंदपुर, जिला उज्जैन (मध्य प्रदेश)
• वाफगांव, जिला पुणे (महाराष्ट्र)
• इंदौर (मध्यप्रदेश)
• पानीपत (हरियाणा)
•गलकोट, मौसुर (कर्नाटक)
• हरदा, मेरठ (उत्तरप्रदेश)
ब्रिटिश शासन के दौरान सन् 1830 में किले चांदवड की टकसाल, 1832 में महेश्वर की टकसाल और 1903 में इंदौर के मल्हारगंज की टकसाल को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया। अहिल्यादेवी के बाद होळकर राजवंश के अन्य शासकों ने भी सिक्के और मुद्राएं जारी कीं।
महारानी अहिल्याबाई ने 11 दिसंबर, 1767 को पहली बार नया सिक्का ढलवाया और उसी वर्ष से नये सिक्कों की ढलाई प्रारम्भ करवायी। सिक्कों की ढलाई का कार्य सन् 1795 तक अनवरत चलता रहा। उनके शासनकाल में जो सिक्के बनाए गए, उनके निर्माण में प्रमुख रूप से चांदी और तांबे का उपयोग हुआ। ये सिक्के उस समय के दैनिक जीवन में उपयोग किए जाते थे।
अहिल्याबाई होलकर द्वारा जारी सिक्कों के प्रकार और मूल्य :
• चांदी के सिक्के : एक आना, दो आने, चार आने, आठ आने के सिक्के चांदी के होते थे।
• तांबे के सिक्के : आधा आना, पाव आना, धेला के सिक्के तांबे के होते थे।
कुछ सिक्कों पर टकसाल का नाम लिखा जाता था और इन सिक्कों पर संस्कृत और अरबी भाषा का उपयोग देखा जाता है। इसके अलावा, सोने की मुहर भी बनाई जाती थी और उसका उपयोग नज़राना देने के लिए होता था।
सिक्कों पर प्रतीक
महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा जारी सिक्के इस मायने में विशिष्ट हैं कि इन पर हिंदू धर्म के प्रतीक-चिह्नों, जैसे— शिवलिंग व बेलपत्र तथा सूर्य व चन्द्र का खुलकर प्रयोग किया गया। इसके पीछे दो बड़े प्रमुख कारण थे। इनमें भगवान शिव को राजा बनाकर सेवक बनकर राज्य करना और अन्य हिंदू

राजाओं को यह संदेश देना कि यह तो शिव का राज्य है और शिव के राज्य पर हमला करने का मतलब भगवान शिव पर आधिपत्य करना माना जाएगा।
महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा जारी सिक्के उनके शासनकाल की आर्थिक स्थिरता, धार्मिक आस्था और प्रशासनिक कुशलता का प्रमाण हैं। इन सिक्कों ने न केवल उनके राज्य की आर्थिक प्रगति में योगदान दिया, बल्कि भारतीय मुद्रा के इतिहास में भी एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा। अहिल्याबाई होल्कर का योगदान भारतीय इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा और उनके द्वारा जारी किए गए सिक्के इस बात का साक्षी हैं कि एक सशक्त और धर्मपरायण शासक कैसे अपने राज्य को समृद्धि और स्थिरता की ओर अग्रसर कर सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और इतिहासविद् हैं)
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सुप्रसिद्ध इतिहासकार तथा मध्य भारत के पोलिटिकल एजेंट सर जॉन मालकम ने अहिल्याबाई के संबंध में पर्याप्त प्रमाणित तथ्य लिखे हैं। देवी की मृत्यु के कुछ वर्ष बाद वह मालवा में आया था। देवी की कीर्ति सुनकर महेश्वर में भारमल व अन्य लोगों से वह मिला था। वह लिखता है- ‘उनका रहन-सहन अत्यंत सरल, सादा और चरित्र अत्यंत महान था। सच्चे वैधव्य का हिंदू आदर्श जैसा उन्होंने निभाया था, वैसा बहुत कम विधवाएं कर सकी हैं। एक महारानी के लिए तो यह और भी सराहनीय है।… वे सदैव श्वेत साड़ी पहनती थीं। रंगीन, बेलबूटेदार कपड़ा वे कभी नहीं पहनती थीं।…’
एक और स्थान पर मालकम ने लिखा- ‘अहिल्याबाई का चरित्र विमल और शासन अत्यंत प्रशंसनीय था। उनका जीवन इस बात को स्पष्ट करता है कि भगवान के प्रति भक्ति रखकर कर्तव्यपरायण होने से मनुष्य को कितना व्यावहारिक लाभ होता है।’
मालकम के ये शब्द भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। वह लिखता है- ‘अहिल्याबाई एक असाधारण महिला हैं। उनमें दुरभिमान की गंध नहीं है। वे धर्मपरायण होते हुए भी सहन करने की शक्ति से पूर्ण हैं। उनका मन रूढ़ियों से प्रभावित है, पर उनका उपयोग जनता की भलाई के लिए ही होता है। वे एक ऐसी आत्मा हैं जो प्रतिक्षण विवेक से काम करती हैं। सुख-सुविधा से संपन्न होते हुए भी वे निष्कपट, विनम्र और संयमित हैं। उनके चरित्र का विकास अद्वितीय है। इतना होते हुए भी उनमें एक सद्गुण और है। वे अपने अधीन लोगों की कमजोरियों और अपराधों को सहन कर उन्हें क्षमा कर देती हैं।… ’

