बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर: अन्याय, अपमान से न्याय व सम्मान की यात्रा

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राष्ट्र निर्माता बाबा साहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने लोकतंत्र की जननी भारत में संवैधानिक मूल्यों को संयोजित करके उन्हें राष्ट्र की नियमित कार्यशैली में प्रतिस्थापित करने में वास्तुकार की भूमिका का निर्वहन किया था। निजी जीवन की अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों से ऊपर उठकर उन्होंने देश के करोड़ों लोगों के लिए न्याय, समता, समानता, बंधुत्व और सशक्तीकरण का मार्ग प्रशस्त किया। संविधान के प्रमुख वास्तुकार के रूप में बाबा साहेब ने समाज के शोषितों एवं पीड़ितों के उत्थान व संस्थागत असमानताओं को खत्म करने के लिए एक रूपरेखा उपलब्ध कराकर यह सुनिश्चित किया कि स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र की मजबूत आधारशिला बनें।

राष्ट्र निर्माण में अद्वितीय योगदान के बावजूद बाबा साहेब को अपने जीवन काल व महापरिनिर्वाण के बाद भी सत्ता के शीर्ष पर रहने वाले लोगों ने राजनीतिक स्वार्थ के चलते वो सम्मान व प्रतिष्ठा प्रदान नहीं की, जिसके वह हकदार थे, एक तरह से यह राष्ट्रनायक के साथ विश्वासघात था। राजनीतिक प्रभुत्व हासिल करने के लिए कांग्रेस ने बाबा साहेब की विशाल एवं अविस्मरणीय विरासत को गुमनामी के अंधेरे में धकेल कर उन्हें हाशिए पर रखने का काम किया। ऐसा करके कांग्रेस के नेताओं ने न केवल बाबा साहेब के साथ बल्कि उन आदर्शों के साथ भी विश्वासघात किया जिनके वे पक्षधर थे।

दशकों से कांग्रेस ने सामाजिक न्याय का प्रबल समर्थक होने का दावा किया है, लेकिन कांग्रेस द्वारा सामाजिक न्याय का विरोध करने और उदासीनता बरतने को देखते हुए इस संबंध में कांग्रेस के विचारों की एक अलग ही तस्वीर दिखाई देती है। उन्हें सम्मान देने में कांग्रेस की विफलता उनके दृष्टिकोण के साथ कांग्रेस के विश्वासघात को दर्शाती है। वैचारिक दोगलेपन में उलझी कांग्रेस को अब मजबूरी में बाबा साहेब अंबेडकर को याद करना पड़ रहा है। इसी कांग्रेस परिवार ने बाबा साहेब का अपमान करके अपने कृत्यों से लगातार उनकी विरासत को कमजोर किया। यह कांग्रेस द्वारा बाबा साहेब के प्रति ईष्या का ही परिणाम रहा कि बाबा साहेब के परिनिर्वाण के बाद 1990 में भारत रत्न देने में 34 साल की देरी हुई, जबकि इसी परिवार के जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल के दौरान ही यह पुरस्कार प्राप्त किया। इसी प्रकार संसद के सेंट्रल हॉल में बाबा साहेब का तैल चित्र लगाने में कांग्रेस ने अनिच्छा दिखाई और कभी जगह की कमी और प्रोटोकॉल के बहाने सेंट्रल हॉल में तस्वीर लगाने की मांग को बार-बार खारिज किया गया। बाबा साहेब के अनुयायियों की मांग पर 9 अगस्त, 1989 को केन्द्रीय कक्ष में तस्वीर लगाई गई, जिसे बाद में हटा दिया गया। कांग्रेस के इस कृत्य से लाखों अनुयायियों ने स्वयं को ठगा महसूस किया। बाद में भाजपा समर्थित सरकार द्वारा 12 अप्रैल, 1990 को दोबारा बाबा साहेब का तैल चित्र को सेंट्रल हॉल में लगाया गया। नेहरू और इंदिरा गांधी द्वारा प्रयोग में लाई गई वस्तुएं सावधानीपूर्वक समयबद्ध तरीके से संरक्षित की गईं, वहीं बाबा साहेब के जीनवकाल में उपयोग आने वाली वस्तुओं यथा टाइपराइटर, किताबों और अन्य कलाकृतियों को दशकों तक खराब होने के लिए छोड़ दिया गया था, जिसके संरक्षण का कार्य भी मोदी सरकार द्वारा नागपुर स्थित चिंचौली में डॉ. अंबेडकर सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र बनाकर उनकी शाश्वत विरासत को जीवंत किया जा रहा है।

डॉ. अम्बेडकर की राजनीतिक यात्रा को कांग्रेस द्वारा बार-बार बाधित किया गया, जिससे समाज में बदलाव लाने के बाबासाहेब के इरादे से कांग्रेस की परेशानी का पता चलता है। 1952 के आम चुनावों में बाबा साहेब के संसद हेतु निर्विरोध चुने जाने का समर्थन करने के बजाय कांग्रेस ने उनके खिलाफ श्री नारायण काजोलकर को मैदान में उतारा तथा प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने व्यक्तिगत रूप से उन्हें हराने के लिए प्रचार किया। यह विश्वासघात 1953 में भंडारा उपचुनाव के दौरान भी जारी रहा, जहां कांग्रेस ने बाबा साहेब को फिर से रोकने के लिए श्री वानखेड़े को मैदान में उतारा तथा जनता को भ्रमित करने के लिए दोहरे मतदान करने की प्रक्रिया के संदर्भ में दुष्प्रचार किया। यहां यह जानना बेहद प्रासंगिक है कि 1952 के प्रथम आम चुनाव में कुल खारिज मतपत्रों की संख्या 74,333 थी, लेकिन बाबा साहेब की हार मात्र 14,561 वोटों से हुई थी, जो कि कांग्रेस के सुनियोजित दुष्प्रचार का परिणाम थी।

बाबा साहेब ने आरक्षण को समाज के दलित वर्गों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करने और सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने के एक उपाय के रूप में देखा, लेकिन कांग्रेस ने बार-बार इन उपायों में बाधा डाली। जवाहरलाल नेहरू ने वर्ष 27 जून, 1961 को मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में आरक्षण को ‘योग्यता एवं कार्यकुशलता के लिए हानिकारक’ कहते हुए इसकी आलोचना की। नेहरू ने अपनी टिप्पणियों से हाशिए पर रहने वाले समुदायों के सामने आने वाली बुनियादी बाधाओं को अनदेखा किया। काका कालेलकर आयोग की 1955 की सिफारिशें जिसका उद्देश्य पिछड़े वर्गों की पहचान करना और उनका उत्थान करना था, को भी कांग्रेस के नेतृत्व में इसी तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

मंडल आयोग के निष्कर्षों ने सकारात्मक कार्रवाई को अपनाने के प्रति कांग्रेस की अनिच्छा को और उजागर कर दिया। 3 मार्च, 1985 को नवभारत टाइम्स में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा दिए गए साक्षात्कार में ‘आरक्षण के नाम पर बुद्धुओं को बढ़ावा नहीं देने’ से संबंधित टिप्पणी भी पूरे हाशिए पर खड़े समुदाय की आत्मा को झकझोर देने वाली थी। जब वी.पी. सिंह की सरकार ने वर्ष 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं तो तत्कालीन विपक्ष के नेता स्वर्गीय श्री राजीव गांधी ने इस कदम का पुरजोर विरोध किया और इसे विभाजनकारी और देश की प्रगति को बाधित करने वाला निर्णय करार दिया। आज भी आरक्षण पर कांग्रेस का अंतर्विरोध बरकरार है। श्री राहुल गांधी ने वर्ष 2024 में अमेरिका के जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में अपना व्याख्यान देते हुए आरक्षण के विषय में सुझाव दिया गया था कि समय आने पर आरक्षण को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। ये सब तथ्य कांग्रेस के वैचारिक दोगलेपन व सदियों से शोषण का शिकार रहे अनुसूचित वर्ग के लोगों को दिए गए विशेष अधिकारों के प्रति Selective approach के साथ आरक्षण व्यवस्था के प्रति ऐतिहासिक असुविधा को प्रतिबिंबित करता है।

अक्सर कांग्रेस नेता दावा करते हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बाबा साहेब अंबेडकर को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया था, किंतु यह तथ्य पूर्ण रूप से सही नहीं है। जैसाकि एडविना माउंटबेटन के एक पत्र से पता चलता है, आयरलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री ईमोन डी वलेरा ने इस भूमिका के लिए बाबा साहेब की सिफारिश की थी। उनकी अद्वितीय प्रतिभा और देशभक्ति को पहचानते हुए एडविना ने उन्हें एकमात्र ऐसा नेता माना, जो सभी वर्गों और पंथों के लिए न्याय सुनिश्चित करने में सक्षम था। यह कांग्रेस की उदारता नहीं थी, बल्कि कांग्रेस द्वारा अनुसूचित वर्गों को दरकिनार करने के लिए किए जा रहे प्रयासों के बावजूद बाबा साहेब के असाधारण विचारों और नेतृत्व क्षमता को दिया गया सम्मान था। उनकी नियुक्ति उनकी प्रतिभा और उदात्त नैतिक चरित्र का प्रमाण थी, जो उन्होंने अपने विचारों की प्रबल शक्ति और न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के माध्यम से अर्जित की थी।

इसके ठीक विपरीत, मोदी सरकार ने बाबा साहेब के सिद्धांतों व आदर्शों पर चलकर सैकड़ों जन-कल्याणकारी योजनाओं को न केवल सफलतम रूप से धरातल पर कार्यान्वित किया, बल्कि बाबा साहेब के जीवन से जुड़े हुए सभी पहलुओं पर संवेदनशीलता से विचार करके, जिस सम्मान के वे हकदार थे उसे प्रतिस्थापित करने का कार्य किया है। बाबा साहेब के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों, पंच तीर्थ यथा जन्म भूमि महू (मध्य प्रदेश), शिक्षा भूमि (लंदन), दीक्षा भूमि (नागपुर), परिनिर्वाण भूमि (दिल्ली) व चैत्य भूमि (मुंबई) का निर्माण किया गया। इसी क्रम में डॉ. बी. आर. अंबेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर 2015 से हर वर्ष 26 नवंबर को ‘संविधान दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। संविधान दिवस 2023 के अवसर पर न्याय के सर्वोच्च मंदिर सुप्रीम कोर्ट परिसर में वकीलनुमा पोशाक में 7 फीट ऊंची पंच धातु की प्रतिमा का अनावरण किया गया है। वित्तीय समावेशन एवं सामाजिक न्याय को ध्यान में रखकर लागू की गई नीतियों के माध्यम से बाबा साहेब के दृष्टिकोण में नई जान फूंक दी है। प्रतीकों से आगे बढ़कर मौजूदा सरकार ने बाबा साहेब के विचारों के अनुरूप समाज में प्रभावी बदलाव लाने के लिए नीतियां लागू की हैं। स्टैंड-अप इंडिया और JAM Trinity (जन धन-आधार-मोबाइल) जैसी पहल निर्भरता और बहिष्कार के दुष्चक्र को समाप्त करते हुए हाशिए पर रह रहे समुदायों के बीच वित्तीय समावेशन और उद्यमिता को बढ़ावा देती है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए आरक्षण की शुरुआत ऐतिहासिक और आर्थिक असमानताओं को ठीक करने की दिशा में मौजूदा सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। बाबा साहेब की प्रेरणा से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में संचालित योजनाओं के माध्यम से पिछले एक दशक में 25 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं।

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर अपने समय से बहुत आगे थे, वह एक ऐसे भविष्य की कल्पना कर रहे थे जहां न्याय और समानता केवल आकांक्षाएं न हों, बल्कि वास्तविकता बन जाएं। संविधान के प्रमुख वास्तुकार के रूप में उन्होंने प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा के लिए सुरक्षा उपाय किए, यह सुनिश्चित किया कि कानूनी और संस्थागत ढांचे के माध्यम से प्रणालीगत बाधाओं को खत्म किया जा सके।
मोदी सरकार की पहल सार्थक बदलाव के लिए एक रोडमैप प्रदान करती है, लेकिन यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। संस्थानों, नागरिक समाज और व्यक्तियों को बाबा साहेब के एक ऐसे राष्ट्र के सपने को साकार करने के प्रयास में शामिल होना चाहिए जहां न्याय, समानता और भाईचारा सिर्फ सिद्धांत नहीं बल्कि जीवंत वास्तविकताएं हों।

आज देश में विपक्षी पार्टियों द्वारा, प्रमुखतः कांग्रेस के द्वारा निजी, स्वार्थ के चलते वोट बैंक की राजनीति के वशीभूत बाबा साहेब के नाम का प्रयोग किया जा रहा है, जबकि सच सबके सामने है कि बाबा साहेब का सम्मान किसने किया और सम्मान देने का कार्य किसने किया। अब समय आ गया है कि बाबा साहेब के विचारों को न केवल शासन में बल्कि समाज के हर क्षेत्र में पूरी तरह से अपनाया जाए। आइए, हम अपने कार्यों के माध्यम से बाबा साहेब की स्मृति को सम्मानित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करें, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके आदर्श न्याय और प्रगति की दिशा में भारत की यात्रा का मार्गदर्शन करें।

(लेखक केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) व संसदीय कार्य राज्य मंत्री हैं)