संविधान गौरव अभियान पर विशेष
देश अपने संविधान का 75वें वर्ष का उत्सव माना रहा है। यह समय ‘संविधान के सम्मान’ का काल है। यह संविधान की एक ऐतिहासिक यात्रा है, जिसने कई बाधाओं और चुनौती को दूर करते हुए अपने को सशक्त रूप में स्थापित किया है। यह एक उपलब्धि है, क्योंकि भारत के साथ स्वतंत्र होने वाले अन्य देशों के अधिकतर संविधान की औसत आयु 15 या 17 वर्ष ही रही है। भारत एक सफल लोकतंत्र के श्रेणी में खड़ा हुआ है। इस सफलता के समय उन संविधान निर्माताओं का स्मरण करना आवश्यक है, जिसमें डॉ. अम्बेडकर एक प्रतीक के रूप में सभी का प्रतिनिधित्व करते है। संविधान का सम्मान डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का सम्मान है।
बाबा साहेब संविधान के सूत्रधार हैं। डॉ. अम्बेडकर में आध्यात्मिकता है। वे मानते हैं कि सभी में परम चैतन्य आत्मा व्याप्त है। संविधान के प्रणयन में योगदान है। डॉ. अम्बेडकर का संविधान ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की अवधारणा पर आधारित है। यदि ऐसा नहीं होता, तो इतना सुन्दर प्रस्तावना निकलकर नहीं आती। हम सब जानते है कि भारत के संविधान की आत्मा उसके प्रस्तावना में निहित है। प्रस्तावना ही भारत का राष्ट्रीय उद्देश्य है। इसकी प्राप्ति ही अभीष्ट लक्ष्य है। प्रस्तावना भारतीय संविधान के मूल भावना या प्राण तत्व है।
डॉ. अम्बेडकर पहली बार संविधान सभा में 17 दिसबर 1946 को बोले थे और अंतिम बार 25 नवम्बर, 1949 को बोले थे, जब संविधान बनकर तैयार हो चुका था। 29 अगस्त, 1947 को प्रारूप समिति का अध्यक्ष चुना गया। हम सभी भाषण का तो उल्लेख नहीं कर सकते हैं, लेकिन प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में 25 नवम्बर की टिप्पणी सभी का सार है, यह भाषण बहुत ही सार्थक और प्रासंगिक है जिसमें वे संविधान की कार्य प्रणाली, जनतंत्र के सफल होने की पूर्व दशाएं और असफल होने की आशंकाएं बताई हैं।
वे संविधान सभा का एक लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को समवेत हुई थी और पूरा संविधान दो वर्ष ग्यारह महीने और अठारह दिन में तैयार हुआ था, जिसके लिए संविधान सभा के कुल सत्रह सत्र हुये। इन सत्रह सत्रों में से प्रथम छह सत्र लक्ष्यमूलक
राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र के एकीकरण में उनके योगदान के स्मरण के लिए केवल एक शब्द ही पर्याप्त है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है कि “India That is Bharat shall be union of state”, भारत ‘राज्यों का संघ’ होगा। यह शब्द भारत के एकीकरण की प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करता है
संकल्प पारित करने और मूलाधिकार विषयक, संघ संविधान विषयक, संघ की शक्तियों, प्रान्तीय संविधान विषयक, अल्पसंख्यक-वर्ग विषयक तथा अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों विषयक समितियों के प्रतिवेदनों पर विचार करने में लगे। सातवें, आठवें, नौवें, दसवें और ग्यारहवें सत्रों में संविधान के प्रारूप पर विचार हुआ। संविधान सभा के इन ग्यारह सत्रों में 165 दिन लगे। इनमें से सभा ने 114 दिन संविधान के पारूप पर विचार करने में लगाये। ये तथ्य वे स्वयं सदन के पटल पर रखे थे।
बाबा साहेब की संविधान के वास्तुकार के रूप में भूमिका व्यापक है, क्योंकि प्रारूप समित के अध्यक्ष है। एक प्रकार से संविधान के पर्याय हैं। लगभग सभी अनुच्छेद कोई न कोई उत्तर या सुझाव हैं, लेकिन कुछ योगदान का उल्लेख करना आवश्यक है।
राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र के एकीकरण में उनके योगदान के स्मरण के लिए केवल एक शब्द ही पर्याप्त है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है कि “India That is Bharat shall be union of state”, भारत ‘राज्यों का संघ’ होगा। यह शब्द भारत के एकीकरण की प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करता है। उनके राजनीतिक जीवन को वैचारिक दृष्टि सामान्य तौर पर दो अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है।
पहली अवस्था वह है जहां पर डॉ. अम्बेडकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विरोध में हैं। उनके चिंतन के केंद्र में अस्पृश्य समाज का हित है। अपने चिंतन की दूसरी अवस्था में, जब वे प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनते है, तब उनके विचारों में राष्ट्रीयता दिखती है। राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र का एकीकरण ही उनके चिंतन का आयाम बनता है। संविधान सभा में समान नागरिक संहिता, भाषा, केंद्र के पास शक्तियों जैसे विषयों पर मुखर और स्पष्ट हैं, जिसमें वह एक सशक्त भारत चाह रहे हैं। विधि मंत्री के रूप में पाकिस्तान से अपने समाज के वापस आने का आह्वान हो या इस्लाम न स्वीकार करने की सलाह हो, वे राष्ट्रीय हित को ध्यान देते हैं। यहां पर डॉ. अम्बेडकर एक युगपुरुष नेता के रूप में उभरते हैं।
डॉ. अम्बेडकर के लिए राष्ट्र ही सर्वोपरि था। डॉ. अम्बेडकर प्रखर राष्ट्र भक्त थे, क्योंकि उनके सम्पूर्ण चिंतन का केंद्रबिंदु भारत व भारत का भविष्य ही था। लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से किया गया उनका शोध भी भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए ही था और कोलंबिया विश्वविद्यालय से किये गये उनके शोध के केंद्र में भी भारत के ट्रेड/व्यापार/वाणिज्य के बारे में पता चलता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि डॉ. अम्बेडकर कहीं भी रहे हों, लेकिन उनके हृदय और मस्तिष्क में भारत ही बसता और धड़कता था। इसलिए जब हम डॉ. अम्बेडकर को समग्रता में देखते है तो हमें उनके जीवन की महानता के दर्शन होते हैं। प्रत्येक भारतीय को वे एक सन्देश देते है, “We are Indian Firstly and Lastly” ये पंक्ति पढ़ने में जितनी सामान्य दिखती है इसका अर्थ उतना ही गहरा है।
डॉ. अम्बेडकर देश की विभाजनकारी नीतियों का समर्थन करने वाली शक्तियों के सदैव खिलाफ थे। भारत विभाजन से पूर्व उन्होंने पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ़ इंडिया में वे भारत विरोधी षड्यंत्रों को उजागर करते है। वे अपने भाषणों में कहते हैं कि यदि पाकिस्तान बनाना ही है तो फिर ‘टोटल एक्सचेंज ऑफ़ मुस्लिम पॉपुलेशन’ यानी वे मुस्लिम जनसंख्या को पूरी तरह से पाकिस्तान भेजने की वकालत करते हैं।
भारत विभाजन के बाद हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय नहीं किया था और उसके द्वारा और पाकिस्तान में दलितों पर अत्याचारों की लगातार घटनाओं से डॉ. अम्बेडकर जी बहुत दु:खी थे। हैदराबाद और पाकिस्तान में दलितों को जबरन मुसलमान बनाया जा रहा था। डॉ. अम्बेडकर हैदराबाद के निजाम को भारत का दुश्मन बताते हुए वहां के दलितों को निर्देश देते है कि वे उसका साथ न दें।
यहां प्रत्यक्ष रूप से उनका राष्ट्रवाद झलकता है।
यह सहज आशंका भारतीय और पाश्चात्य जगत में था कि स्वतंत्र भारत कब तक स्वतंत्र रहेगा। यह प्रश्न डॉ. अम्बेडकर के समक्ष भी था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष होने के कारण इसका उत्तर भी जानना आवश्यक था। इसलिए डॉ. अम्बेडकर कहते हैं कि 26 जनवरी, 1950 को भारत एक स्वतंत्र देश होगा, उसकी स्वाधीनता का क्या परिणाम होगा? क्या वह अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकेगा या उसको फिर खो देगा?
डॉ. अम्बेडकर कहीं भी रहे हों, लेकिन उनके हृदय और मस्तिष्क में भारत ही बसता और धड़कता था। इसलिए जब हम डॉ. अम्बेडकर को समग्रता में देखते है तो हमें उनके जीवन की महानता के दर्शन होते हैं। प्रत्येक भारतीय को वे एक सन्देश देते है, “We are Indian Firstly and Lastly” ये पंक्ति पढ़ने में जितनी सामान्य दिखती है इसका अर्थ उतना ही गहरा है
दूसरी आशंका डॉ. अम्बेडकर का भारतीय संविधान के भविष्य को लेकर है। वे कहते हैं कि जब भारत 26 जनवरी, 1950 को गणतंत्र हो जायेगा, तो उसके इस लोकतंत्रात्मक संविधान का क्या भविष्य होगा? अर्थात् क्या वह इसकी रक्षा कर सकेगा या इसको फिर खो देगा। यह दूसरा विचार है जो उनके मन में उत्पन्न होता है और पहले विचार की भांति व्यथित करता है।
तीसरा प्रश्न था कि संविधान की गुणवत्ता क्या है? डॉ. अम्बेडकर संविधान और राजनीतिक संस्कृति से जोड़ते हैं और कहते हैं, “मैं समझता हूं कि संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो यदि उसे कार्यान्वित करने वाले लोग बुरे हैं तो वह निस्संदेह बुरा हो जाता है। संविधान का क्रियाकरण पूर्णतया संविधान के प्रकार पर निर्भर नहीं करता है।” संविधान तो एक मात्र व्यवस्था हैं जिसमें सरकार के विभिन्न अंगों के सुचारू रूप से संचालन के लिए निर्मित किया गया। संविधान का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि सामान्य नागरिक किस रूप में इस राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदार बनता है।
वे भारत के सन्दर्भ में लोकतंत्र और संविधान के सफलता के लिए तीन बात कहते हैं—
1. क्रांति मार्ग को त्यागना,
2. व्यक्ति पूजा से विच्छेदन
3. राजनीतिक लोकतंत्र का सामाजिक और आर्थिक समाज के साथ समन्वयन।
ये अच्छे शिल्पकार का प्रेम है कि अपने द्वारा निर्मित भवन को देर तक सुरक्षित रखना चाहता है इसलिए उन आशंकाओं का भी समाधान करता है। यहां बाबा साहेब संविधान के भविष्य में आने वाली चुनौतियों के संदर्भ में संविधान को लचीला रखने के पक्षधर थे, जिसका परिणाम आज देखने को मिलता है, इससे संविधान की सार्थकता व यर्थाथता भी देखने को मिलती है।
नरेन्द्र मोदी जी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार और डॉ. अम्बेडकर
श्री नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार ने डॉ. अम्बेडकर के विचारों के प्रसार व प्रचार के लिए उनके जीवन से सम्बंधित स्थान (जन्मभूमि, शिक्षा भूमि, दीक्षा भूमि, महापरिनिर्वाण भूमि और चैत्य भूमि) को पंचतीर्थ के रूप में विकसित किया है। सरकार के निर्देशानुसार 26 नवम्बर को 2015 से संविधान दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है। यह उनके संविधान में योगदान की स्वीकारोक्ति है। पंचतीर्थ समाज के समरसता के प्रतीक के रूप में विकसित किया गया है। एक प्रकार से यह समय संविधान के सम्मान का समय है और वर्तमान सरकार ‘मनसा वाचा कर्मणा’ तीनों से श्रद्धांजलि दे रही है।
वर्तमान सरकार की मंशा और डॉ. अम्बेडकर के आदर्शों के समन्वय को समझना हो तो भारत सरकार द्वारा वितरित किया जाने वाला पदम पुरस्कार है। 2015 से लेकर आज तक पदम पुरस्कार प्राप्त करने वाले सामाजिक विन्यास को समझा जाय, तो सरकार ने समाज के अंतिम पायदान के व्यक्ति जो नि:स्वार्थ भाव से राष्ट्र सेवा में लगा हुआ है, उन्हें सम्मानित किया है।
(लेखक केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री हैं)

