कांग्रेस द्वारा संविधान निर्माता का अपमान

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भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की उपेक्षा पंडित जवाहरलाल नेहरू देश की आजादी के पहले से करते रहे। वे नहीं चाहते थे कि बाबा साहेब संविधान सभा के सदस्य बनें। कैबिनेट मिशन योजना 1946 के तहत जुलाई, 1946 में संविधान सभा के चुनाव हुए थे। अंग्रेजों ने यह चुनाव पूरे अविभाजित भारत में कराए थे, जिसमें भारत के साथ आज के पाकिस्तान और बांग्लादेश शामिल थे। शुरुआत में इसमें 389 सदस्य थे, परंतु भारत और पाकिस्तान बंटवारे के बाद यह संख्या घटकर 299 रह गई। उस समय 12 भारतीय प्रांतों से चुने गए 229 सदस्य और 29 रियासतों से 70 सदस्य मनोनीत किए गए थे।

डॉ. भीमराव अंबेडकर मुम्बई उत्तर से संविधान सभा का चुनाव लड़े थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू उन्हें किसी भी हालत में संविधान सभा में नहीं आने देना चाहते थे। उन्होंने बांबे प्रेसीडेंसी के प्रधानमंत्री बी.जी. शेखर को बाबा साहेब को चुनाव हरवाने की जिम्मेदारी सौंपी। कांग्रेस ने पूरी ताकत लगाकर डॉ. अंबेडकर को मुम्बई से संविधान सभा का चुनाव हरवा दिया।

संविधान सभा में बाबा साहेब

संविधान सभा में मुम्बई से बाबा साहेब को हराये जाने के बाद भारत के दलितों में खलबली मच गई। वे निराश थे कि यदि बाबा साहेब संविधान सभा में नहीं पहुंचेंगे तो उनके हितों की रक्षा नहीं हो पायेगी। बंगाल के दलित नेता जोगेंद्रनाथ मंडल ने बाबा साहेब को बंगाल से जीताकर संविधान सभा में भेजने का निर्णय लिया। उन्हें जिताने के लिए 5 विधायकों की आवश्यकता थी। उस समय बंगाल में 4 विधायक अनुसूचित जाति के थे, जीतने के लिए एक और विधायक के समर्थन की आवश्यकता थी, जिसके लिए जोगेन्द्रनाथ मंडल जी- जान से लग गए। 8 जुलाई, 1946 को बाबा साहेब ने अपना नामांकन पत्र दाखिल किया, जिनके प्रस्तावक जोगेन्द्रनाथ मंडल और समर्थक नागेन्द्र नारायण राय थे। कांगेस ने यहां भी उन्हें हराने के लिए जोगेन्द्रनाथ मंडल के दार्शनिकगुरु हरिचांद गुरुचांद ठाकुर के वंशज पी.आर. ठाकुर को बाबा साहेब के विरोध में उतार दिया। जोगेन्द्र बाबू ने बाबा साहेब को जिताने के लिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बड़े भाई शरतचंद्र बोस का सहयोग लिया। बाबा साहेब को जोगेन्द्रनाथ मंडल के अलावा 6 अन्य विधायकों- नागेन्द्र नारायण राय, मुकुंद बिहारी मल्लिक, द्वारिकानाथ बरूरी, गयानाथ बिस्वास, क्षेत्रीनाथ सिंधा और बिरसा का समर्थन मिला और 20 जुलाई, 1946 को बाबा साहेब विजयी घोषित हुए।

बाबा साहेब संविधान सभा से बाहर

बाबा साहेब की जीत की खुशी केवल सालभर रह पाई। 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद में ‘भारतीय स्वतंत्रता बिल’ प्रस्तुत हुआ, जो 15 जुलाई, 1947 को पारित हो गया। भारत का विभाजन निश्चित हो

डॉ. भीमराव अंबेडकर मुम्बई उत्तर से संविधान सभा का चुनाव लड़े थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू उन्हें किसी भी हालत में संविधान सभा में नहीं आने देना चाहते थे। उन्होंने बांबे प्रेसीडेंसी के प्रधानमंत्री बी.जी. शेखर को बाबा साहेब को चुनाव हरवाने की जिम्मेदारी सौंपी। कांग्रेस ने पूरी ताकत लगाकर डॉ. अंबेडकर को मुम्बई से संविधान सभा का चुनाव हरवा दिया

गया। भारत विभाजन के साथ ही बंगाल भी दो टुकड़ों में विभाजित हो गया। बाबा साहेब बंगाल के जिस खुलना-जैसोर सीट से निर्वाचित हुए थे, वह पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। इस प्रकार बाबा साहेब भारत की संविधान सभा से बाहर हो गए। दुःखद पक्ष यह रहा कि खुलना-जैसोर क्षेत्र में हिंदू 52 प्रतिशत और मुस्लिम 4 प्रतिशत थे और बंटवारे में सैद्धांतिक रूप से इसे भारत का हिस्सा होना चाहिए था, परंतु कांग्रेस पार्टी ने अपनी कुटिल राजनीति के तहत उसे पाकिस्तान को दे दिया। यह पंडित जवाहरलाल नेहरू की कुत्सित नीति थी कि बाबा साहेब को स्वतंत्र भारत की राजनीति से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए।

बाबा साहेब संविधान सभा में आए

बाबा साहेब 1942 से 1946 तक ‘वायसराय परिषद्’ के सदस्य थे उनके पास श्रम और सी.पी.डब्ल्यू.डी. विभाग थे।

वायसराय परिषद् में बाबा साहेब अपनी कार्यकुशलता और विद्वता का परिचय दे चुके थे। बाबा साहेब का जीवन संघर्षभरा था, वे दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, वंचितों के हितों के लिए समर्पित थे। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर लंदन में 1930 के प्रथम गोलमेज सम्मेलन में दलितों और पिछड़ों के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल हुए थे। उन्होंने दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की समस्याओं और हितों को जोरदार तरीके से प्रस्तुत किया था। उनके गोलमेज सम्मेलन 1930 के भाषण को ऐतिहासिक माना जाता है, जो पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं को रास नहीं आई थी। नेहरूजी नहीं चाहते थे कि दलित, पिछड़े और आदिवासियों का प्रतिनिधि गोलमेज सम्मेलन में भाग ले और कांग्रेस की कुत्सित नीतियों को बेनकाब कर दे।

जनता बाबा साहेब की कार्यकुशलता और विद्वता का सम्मान करती थी और उन्हें संविधान सभा में पहुंचाना चाहती थी, जिससे भारत के संविधान में दलितों/पिछड़ों के हितों की रक्षा हो सके। जनता के दबाव में कांग्रेस पार्टी ने बाबा साहेब के प्रति अपनी हठधर्मिता नरम की और वे बाम्बे राज्य से मुकुन्द रामराव जानकर द्वारा खाली कराई गई सीट से चुनकर भारतीय संविधान सभा में पहुंचे।

संविधान प्रारूप समिति

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। संविधान सभा की सभी समितियों में सबसे महत्वपूर्ण समिति ‘प्रारूप समिति’ थी, जिसका गठन 29 अगस्त, 1947 को किया गया था। इस समिति को ही नए संविधान का प्रारूप तैयार करने का कार्य सौंपा गया। नेहरूजी बाबा साहेब को प्रारूप समिति में नहीं देखना चाहते थे। डॉ. अंबेडकर की समाज सुधारक वाली छवि कांग्रेस के लिए चिंता का कारण थी। यही कारण था कि कांग्रेस पार्टी ने उन्हें संविधान सभा से दूर रखने की योजना बनाई थी, परंतु जनता के दबाव के कारण बाबा साहेब संविधान सभा में चयनित हो सके।

पंडित जवाहरलाल नेहरू संविधान लिखने के लिए ब्रिटिश विशेषज्ञ की सहायता लेना चाहते थे, परंतु महात्मा गांधी ने कहा कि जब भारत में डॉ. अंबेडकर जैसा विद्वान उपलब्ध है तो विदेशी विशेषज्ञ की क्या जरूरत है।

संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर बनाए गए। समिति के अन्य सदस्य एन. माधव राव, टी.टी. कृष्णामाचारी, डॉ. के.एम. मुंशी, सैयद मोहम्मद सादुल्लाह, एन. गोपालास्वामी अयंगर, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, बी.एल. मित्तर और डी.पी. खेतान थे।

इन सदस्यों में दो विदेश मे रहे, एक का देहान्त हो गया। कई सदस्यों का वांछित सहयोग नहीं मिला। संविधान पर हस्ताक्षर करते समय प्रारूप समिति के सदस्य टी.टी. कृष्णामाचारी ने स्वीकार किया कि संविधान निर्मित करने में डॉ. भीमराव अंबेडकर की मुख्य भूमिका रही।

भारत की अंतरिम सरकार 1946

2 सितंबर, 1946 को भारत में अंतरिम सरकार बनाने के लिए वायसराय लार्ड वेवेल ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को आमंत्रित किया। इस अंतरिम सरकार में पंडित नेहरू के नेतृत्व में 12 सदस्य

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। संविधान सभा की सभी समितियों में सबसे महत्वपूर्ण समिति ‘प्रारूप समिति’ थी, जिसका गठन 29 अगस्त, 1947 को किया गया था। इस समिति को ही नए संविधान का प्रारूप तैयार करने का कार्य सौंपा गया। नेहरूजी बाबा साहेब को प्रारूप समिति में नहीं देखना चाहते थे। डॉ. अंबेडकर की समाज सुधारक वाली छवि कांग्रेस के लिए चिंता का कारण थी। यही कारण था कि कांग्रेस पार्टी ने उन्हें संविधान सभा से दूर रखने की योजना बनाई थी, परंतु जनता के दबाव के कारण बाबा साहेब संविधान सभा में चयनित हो सके। पंडित जवाहरलाल नेहरू संविधान लिखने के लिए ब्रिटिश विशेषज्ञ की सहायता लेना चाहते थे, परंतु महात्मा गांधी ने कहा कि जब भारत में डॉ. अंबेडकर जैसा विद्वान उपलब्ध है तो विदेशी विशेषज्ञ की क्या जरूरत है

शामिल थे। कांग्रेस के तीन सदस्यों के इस्तीफे के बाद 5 सदस्य मुस्लिम लीग के शामिल किए गए, तब सदस्यों की कुुल संख्या 14 हुई।

अंतरिम सरकार में दो दलित मंत्री शामिल किए गए। ये सदस्य थे बाबू जगजीवन राम—श्रम मंत्री और जोगेन्द्र नाथ मंडल— कानून मंत्री। मंडल मुस्लिम लीग कोटे से बनाये गए थे। अंतरिम सरकार में डॉ. अंबेडकर को नजरंदाज किया गया जिसकी टीस बाबा साहेब को सालती रही। 4 साल एक महीना और 26 दिन बाद भारत के कानून मंत्री के पद से जब 27 सितंबर, 1951 को बाबा साहेब ने त्यागपत्र दिया तो उन्होंने लिखा था कि 1946 की अंतरिम सरकार में उन्हें मंत्री पद लायक नहीं समझा गया।

भारत के कानून मंत्री डॉ. अंबेडकर के पास कोई प्रशासनिक विभाग नहीं

देश की आजादी के बाद पंडित नेहरू के नेतृत्व में सरकार बनी, जिसमें बाबा साहेब कानून मंत्री बनाए गए। बाबा साहेब चाहते थे कि उन्हें कोई प्रशासनिक पद दिया जाए जिससे वे दलितों, पिछड़ों और वंचितों के लिए कुछ कर सके। उन्होंने अपने त्यागपत्र में लिखा कि वायसराय परिषद् का सदस्य होने के कारण वे जानते थे कि कानून मंत्रालय प्रशासनिक दृष्टि से महत्वहीन है। वे इस मंत्रालय को खाली साबुनदान कहते थे, जो केवल पुराने-पुराने वकीलों के खेलने के लिए अच्छा था। उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू से कहा कि वायसराय परिषद् की कार्यकारी परिषद् में उनके पास दो प्रशासनिक विभाग ‘श्रम और सी.पी.डब्ल्यू.डी.’, जहां उन्होंने बहुत सी परियोजनाओं को देखा है, जिसके कारण भी उन्हें कुछ प्रशासनिक विभाग मिलने चाहिए। प्रधानमंत्री सहमत भी हुए कि वे उन्हें ‘योजना’ विभाग देंगे जिसका वे सृजन करने वाले हैं। योजना विभाग काफी विलंब से बना और जब बना तो वहां भी बाबा साहेब को अनदेखा कर दिया गया। उनके कार्यकाल में कई मंत्रियों के विभाग बदले, कई को दो-तीन विभाग भी सौंपे गए, परंतु नेहरूजी ने उनके नाम पर कभी विचार ही नहीं किया। उन्हें कैबिनेट की मुख्य समितियों- जैसे विदेशी मामले, रक्षा समिति, आर्थिक मामलों की समिति में भी स्थान नहीं दिया गया। बाबा साहेब विख्यात अर्थशास्त्री थे, उन्हें आर्थिक मामलों की समिति में लिए जाने की आशा थी, जो निराशा ही साबित हुई।

नेहरूजी के दलितों, पिछड़ों की उपेक्षा से बाबा साहेब दुःखी

बाबा साहेब नेहरू सरकार द्वारा दलितों, पिछड़ों, वंचितों की उपेक्षा से दुःखी थे। संविधान में दलितों, पिछड़े वर्गों की सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किए गए। इन वर्गों के हितों की रक्षा, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाने वाले आयोग की सिफारिशों के आधार पर कार्यकारी सरकार द्वारा किया जाना था। संविधान लागू होने के एक वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी सरकार ने आयोग बनाने के बारे में सोचा तक नहीं। 1946 में जब वे किसी पद पर नहीं थे, तब उन्हें दलितों और पिछड़ों के लिए बहुत चिंता सता रही थी। अनुसूचित जातियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मामले में अंग्रेजों ने जो वादे किए थे, उनसे भी नेहरू सरकार मुकर गई। अनुसूचित जातियों की स्थिति की रक्षा के लिए संविधान में किए गए प्रावधान से बाबा साहेब संतुष्ट नहीं थे। दलितों पर अत्याचार से बाबा साहेब दुःखी थे, क्योंकि आजादी के बाद भी उसमें कोई सुधार नहीं हो रहा था। उन्हें बहुत दुःख हुआ कि दलितों के मुद्दों पर कुछ नहीं हो पा रहा था और वे उपेक्षित थे।

पंडित नेहरू को केवल मुसलमानों की चिंता

स्वतंत्र भारत में दलितों, पिछड़ों की दशा से बाबा साहेब बहुत दुःखी रहते थे। 10 अक्तूबर, 1951 को अपने त्यागपत्र में उन्होंने बड़ी कड़वी सच्चाई लिखी। उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री का पूरा समय और ध्यान मुसलमानों के सुरक्षा के लिए समर्पित है। बाबा साहेब ने कहा कि वे चाहते हैं कि मुसलमानों को जब भी और जहां भी जरूरत हो, उन्हें दिया जाए लेकिन क्या सिर्फ मुसलमान ही ऐसे लोग हैं जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है? क्या अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और भारतीय ईसाइयों को सुरक्षा की जरूरत नहीं है? प्रधानमंत्री ने इन समुदायों के लिए कोई चिंता नहीं दिखाई। देश के इन वंचित समाज को मुसलमानों से अधिक देखभाल की जरूरत है।

हम बाबा साहेब के मुक्त विचारों से कह सकते हैं कि कांग्रेस पार्टी दलितों, पिछड़ों की शुरुआत से ही विरोधी रही है।

संविधान निर्माता का अपमान

कांग्रेस पार्टी हमेशा बाबा साहेब को नीचा दिखाने का प्रयास करती रही। उन्हें जीवनपर्यंत उपेक्षा झेलनी पड़ी। उन्हें संविधान सभा में रोकने के लिए कांग्रेस ने पूरी ताकत लगा दी। जब बाबा साहेब 1952 में मुंबई से लोकसभा चुनाव लड़े, तब नेहरूजी ने दो बार उनके चुनाव में जाकर विरोध किया। बाबा साहेब

यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 26 नवंबर, 2015 को संविधान दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। कांग्रेस को इस पर भी आपत्ति थी। उनका कहना था कि जब 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाई जाती है, तो 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने की कोई आवश्यकता नही हैं। अब संविधान दिवस का आयोजन करके संविधान निर्माता ‘भारत रत्न’ डॉ. भीमराव अंबेडकर को सम्मानित किया जाता है और संविधान निर्माण में उनके योगदान को जन-जन तक पहुंचाया जा रहा है

के पूर्व सहयोगी काजोलकर से बाबा साहेब 14,374 वोट से चुनाव हार गए। देखने की बात यह भी है कि उस चुनाव में लगभग 78,000 वोट अवैध घोषित किए गए। इसी प्रकार कांग्रेस ने 1954 में भंडारा लोकसभा उपचुनाव में फिर बाबा साहेब को हरवा दिया।

इतना ही नहीं, कांग्रेस बाबा साहेब के महापरिनिर्वाण के बाद भी ‘भारत रत्न’ तो दूर पार्लियामेंट के सेंट्रल हाल में उनकी तस्वीर तक नहीं लगने दी। जब भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री हुए तब श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी एवं भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के सुझाव पर बाबा साहेब को ‘भारत रत्न’ दिया गया और 14 अप्रैल, 1990 में सेंट्रल हॉल में उनकी तस्वीर लग सकी।

भारतीय जनता पार्टी सरकार के प्रयास से ‘भारत रत्न’ तथा बाबा साहेब का सम्मान

वर्ष 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने 26 अलीपुर रोड नई दिल्ली, जन्मस्थान महू, दीक्षा भूमि नागपुर, चैत भूमि इन्दुमिल मुम्बई, उनकी शिक्षा स्थली लंदन, ब्रिटेन में पंचतीर्थ का निर्माण करवाये, जो अब तीर्थस्थली बन चुकी है। कांग्रेस पार्टी की सरकारों ने बाबा साहेब को केवल अपमानित किया है।

यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 26 नवंबर, 2015 को संविधान दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। कांग्रेस को इस पर भी आपत्ति थी। उनका कहना था कि जब 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाई जाती है, तो 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। अब संविधान दिवस का आयोजन करके संविधान निर्माता ‘भारत रत्न’ डॉ. भीमराव अंबेडकर को सम्मानित किया जाता है और संविधान निर्माण में उनके योगदान को जन-जन तक पहुंचाया जा रहा है।

(लेखक राज्यसभा सांसद एवं उ.प्र. के पूर्व डीजीपी हैं)