लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री का जवाब
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने 11 मार्च को लोकसभा में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब दिया। चर्चा के बाद सदन ने अविश्वास प्रस्ताव को ध्वनि मत से खारिज कर दिया। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि यह कोई सामान्य घटना नहीं है और लगभग 4 दशक के बाद लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया है। उन्होंने कहा कि संसदीय राजनीति और सदन के लिए यह एक अफसोसजनक घटना है। श्री शाह ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष किसी दल के नहीं होते, बल्कि सदन के होते हैं और सदन के सभी सदस्यों के अधिकारों के संरक्षक होते हैं। उन्होंने कहा कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना कोई साहसिक घटना नहीं है। यहां प्रस्तुत है उनके संबोधन का सारांश:
यह लोकसभा भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत है। दुनिया भर में हमारे लोकतंत्र की एक साख बनी है, जब इस पंचायत के अभिभावक की निष्ठा पर सवालिया निशान लगता है तो केवल देश में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं। स्पीकर का पद पार्टी से ऊपर होता है। संविधान ने स्पीकर के पद को एक प्रकार से मध्यस्थता की भूमिका में रखा है। विपक्ष ने मध्यस्थता करने वाले पर ही शंका का सवाल उठा दिया है। सदन आपसी विश्वास से चलता है। स्पीकर को लोकसभा कैसे चलानी है, उसके लिए इस लोकसभा ने कुछ नियम बनाए हैं। सदन के अंदर नियमों के अनुसार खड़ा होकर बोलना पड़ता है। जब आप लोकसभा को चलाने के नियमों का नजरअंदाज करेंगे, तो स्पीकर का पवित्र दायित्व है कि चाहे कोई भी सदस्य हो, उसको रोके, टोके और निकाल कर बाहर करे। स्पीकर जब निर्णय देते हैं, तो हो सकता है कि हमें कभी निर्णय अनुकूल लगेगा, कभी अनुकूल नहीं लगेगा। निर्णय से असहमति व्यक्त करने तक सभी लोग सहमत हो सकते हैं, मगर विपक्ष अगर निर्णय की निष्ठा पर सवाल खड़ा करता है, तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।
तीन बार लोकसभा के स्पीकर पर आया अविश्वास का प्रस्ताव
तीन बार लोकसभा के स्पीकर पर अविश्वास का प्रस्ताव आया, परंतु भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में रहते हुए कभी भी लोकसभा स्पीकर पर अविश्वास का प्रस्ताव नहीं लाई। हमने स्पीकर के पद की गरिमा का संरक्षण करने का काम किया है। लोकसभा के अध्यक्ष का प्रथम कर्तव्य यहां पर व्यवस्था और शिष्टाचार बनाए रखना है। आज मैं यहां पर स्पीकर साहब के खिलाफ अविश्वास के प्रस्ताव पर बोल रहा हूं तो माओवाद पर लैक्चर नहीं दे सकता। कोई भी सदस्य भाषण करता है तो स्पीकर साहब को एड्रेस करके ही करता है। अव्यवस्था, अनुशासनहीनता की स्थिति में स्पीकर को चेतावनी देने का अधिकार है,
स्पीकर का पद पार्टी से ऊपर होता है। संविधान ने स्पीकर के पद को एक प्रकार से मध्यस्थता की भूमिका में रखा है। विपक्ष ने मध्यस्थता करने वाले पर ही शंका का सवाल उठा दिया है। सदन आपसी विश्वास से चलता है। स्पीकर को लोकसभा कैसे चलानी है, उसके लिए इस लोकसभा ने कुछ नियम बनाए हैं
नामित करने का अधिकार है, निष्कासन करने का अधिकार है और निलंबित करने का भी अधिकार है। स्पीकर साहब को असंसदीय शब्दों या टिप्पणियों को कार्यवाही से हटाने का अधिकार दिया गया है। मगर यहां आग्रह है कि हम कोई भी भाषा का प्रयोग करें, उसको रखने दीजिए। असंसदीय शब्दों की लिस्ट सबके लिए बाध्यकारी है।
लोकसभा स्पीकर पीठासीन अधिकारी मात्र नहीं है। हमारी विधायी चेतना और हमारे लोकतंत्र की गरिमा का प्रतीक स्पीकर होता है। अध्यक्ष को केवल असाधारण और गंभीर परिस्थितियों में हटाया जा सकता है। तीन प्रकार की मेजोरिटी होती है— सिंपल मेजोरिटी, इफेक्टिव मेजोरिटी और स्पेशल मेजोरिटी, जो दो-तिहाई होती है। स्पीकर को हटाना है, तो इफेक्टिव मैजोरिटी चाहिए। जो अविश्वास प्रस्ताव रखा गया है उसने प्रस्ताव की तिथि में वर्ष 2025 लिखा था। उन्होंने संकल्प की कॉपी भी संलग्न नहीं की। उन्हें लगा कि स्पीकर साहब इसके कारण इसे रिजेक्ट कर देंगे और जब यह इनके ध्यान पर लाया गया, तो इन्होंने नोटिस वापस ले लिया और दूसरा नोटिस दिया। दूसरे नोटिस में एक को छोड़कर शेष सभी हस्ताक्षर जेरॉक्स थे। दो-दो बार अविश्वास का प्रस्ताव नियमानुसार न होने के बावजूद हमारे अध्यक्ष जी ने उनको मौका देकर नोटिस सुधारने का अवसर दिया। ये नियम को मानते ही नहीं है और फिर कहते हैं कि हमें बोलने नहीं दिया जाता है। इनमें कितनी गंभीरता है, यह मैं बताना चाहता हूं। मैने सभी भाषण ध्यानपूर्वक सुने भी है और पढ़े भी हैं। 80 प्रतिशत से ज्यादा भाषण स्पीकर के कंडक्ट पर नहीं है। वे केवल सरकार का विरोध करने के लिए हैं।
मैं विद्यमान लोकसभा स्पीकर के लिए भी कुछ कहना चाहता हूं। 16वीं लोकसभा में 331 बैठकें हुई। 17वीं लोकसभा में 274 बैठकें हुई और वर्ष 2025 तक 103 बैठकें हुई। वर्ष 2025 में जो बजट सत्र था, उसमें 118 प्रतिशत उत्पादकता रही। शून्यकाल की अवधि को अध्यक्ष जी ने पांच घंटे तक पहुंचाया। 202 सांसदों को प्रश्न उठाने का मौका मिला। वर्ष 2019 में रिकॉर्ड 78 महिलाएं संसद में चुनकर आईं। सभी 78 महिला सांसदों को बोलने का अधिकार हमारे स्पीकर साहब ने दिया है। सदन के अंदर क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग भी बढ़ा और लगभग 14 भाषाओं में भाषण किया गया। लगभग 8,000 घंटे का ऑडियो विजुअल रिकॉर्डिंग डिजिटल कर दिया गया है।
बीजेपी से कांग्रेस पार्टी को 6 गुना अधिक समय
17वीं लोकसभा में कांग्रेस पार्टी को 157 घंटे और 55 मिनट का समय दिया गया, जबकि उनके 52 सदस्य थे। प्रो रेटा देखें, तो बीजेपी से कांग्रेस पार्टी को 6 गुना अधिक समय देने का काम स्पीकर साहब ने किया है। 18वीं लोकसभा में कांग्रेस पार्टी द्वारा कल तक 71 घंटे बोला गया, उनके पास 99 सदस्य हैं।
विपक्ष के नेता अपने अधिकारों की बात करते हैं। उनकी परफॉर्मेंस के बारे में मैं कहना चाहता हूं। 17वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति 51 प्रतिशत रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 80 प्रतिशत रही और 15वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति 43 प्रतिशत रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 76 रही
एक प्रकार से 18वीं लोकसभा में भी कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से 2 गुना ज्यादा समय दिया गया है। विपक्ष के नेता की शिकायत है कि मुझे बोलने नहीं दिया जाता है, मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि कांग्रेस पार्टी द्वारा 157 घंटे 55 मिनट बोला गया, उसमें कौन बोलेगा, उसे कौन तय करेगा? क्या इसे स्पीकर तय करेंगे? नहीं, उसे विपक्ष के नेता को तय करना है। मगर जब बोलने का समय आता है, तब वे जर्मनी में होते हैं, इंग्लैण्ड में होते हैं, उसके बाद कंप्लेन करते हैं। यह जो कहते हैं कि बोलने नहीं देते हैं, वह ठीक नहीं है। वह बोलना नहीं चाहते हैं और बोलना चाहते हैं, तो नियमानुसार बोलना नहीं आता है। विपक्ष के नेता अपने अधिकारों की बात करते हैं। उनकी परफॉर्मेंस के बारे में मैं कहना चाहता हूं। 17वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति 51 प्रतिशत रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 80 प्रतिशत रही और 15वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति 43 प्रतिशत रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 76 रही।
वर्ष 2014, वर्ष 2015 वर्ष 2017 और वर्ष 2018 में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव में इन्होंने हिस्सा नहीं लिया। 16वीं लोकसभा में एक भी सरकारी विधेयक पर चर्चा में हिस्सा नहीं लिया। 17वीं लोकसभा में वर्ष 2019, वर्ष 2020 और वर्ष 2021 में राष्ट्रपति अभिभाषण में हिस्सा नहीं लिया। वर्ष 2019, वर्ष 2020 और वर्ष 2022 और वर्ष 2023 में केंद्रीय बजट पर चर्चा में हिस्सा नहीं लिया। एक बिल को छोड़कर एक भी विधेयक की चर्चा में हिस्सा नहीं लिया। 18वीं लोकसभा में वर्ष 2025 में केंद्रीय बजट की चर्चा में भाग नहीं लिया। जब-जब भी बजट सत्र आता है या महत्वपूर्ण सत्र आता है तो उनकी विदेश यात्रा शुरू हो जाती है और फिर कहते हैं कि हमें बोलने नही देते।
पक्ष, प्रतिपक्ष, स्पीकर और महामहिम राष्ट्रपति जी के साथ मिलकर बनता है ‘सदन’
सदन पक्ष, प्रतिपक्ष, स्पीकर और महामहिम राष्ट्रपति जी के साथ मिलकर बनता है। आप स्पीकर के कंडक्ट पर टीका कर रहे हैं, अपने कंडक्ट पर भी तो कभी बात करें। यह क्या बात हुई कि यहां ट्रेजरी बैंच पर माननीय प्रधानमंत्री बैठे हैं, दौड़कर आकर गले लग जाएंगें। कभी ऐसा नहीं हुआ कि सत्ताधारी पक्ष के सदस्यों के सामने फ्लाइंग किस करेंगे। मुझे तो बोलने में भी संकोच हो रहा है। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ जो प्रस्ताव लाया गया है, वह प्रस्ताव इसलिए लाया गया है कि इनको कहीं से भी चुनाव में सफलता नहीं मिल रही है। चुनाव आयोग पर शंका उठाना, सुप्रीम कोर्ट पर शंका उठाना, न्यायपालिका पर शंका उठाना, एजेन्सियों पर शंका उठाना और ये अध्यक्ष के आसन पर भी शंका उठाते हैं। यह सदन बहुमत के साथ दिखाई पद रहा है और इसलिए इस प्रस्ताव को बहुमत के साथ खारिज कर दिया जाए।

