‘भारत रत्न’ बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर: एक निष्ठावान राष्ट्रवादी
• माननीय ‘भारत रत्न’ बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपना जीवन हाशिए पर पड़े समुदायों के कल्याण के लिए समर्पित किया।
• डॉ. भीमराव अंबेडकर की पारिवारिक पृष्ठभूमि ने इस उद्देश्य को आकार दिया, क्योंकि वह एक गरीब परिवार से आते थे और उनका जीवन बॉम्बे के एक इंप्रूवमेंट ट्रस्ट चॉल के गरीबों के बीच गुजरा था, जहां वह रहा करते थे।
“मैं यह मानने लगा हूं कि मेरे जीवन का उद्देश्य दलितों के कल्याण के लिए संघर्ष करना है।”
– रत्नागिरी जिला कृषक सम्मेलन, चिपलून में उनके संबोधन का अंश; 14 अप्रैल, 1929
डॉ. भीमराव अंबेडकर का एकजुट एवं मजबूत हिंदू धर्म का दृष्टिकोण
• भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हिंदुओं में एकता और ताकत पैदा करने के लिए जाति को खत्म करने की वकालत की।
• हिंदू धर्म के बारे में उनका दृष्टिकोण एक एकजुट एवं ताकतवर हिंदू धर्म से था, जो युद्ध के लिए तैयार है और अब्राहमिक धर्मों का मुकाबला करने के लिए तैयार है।
उन्होंने कहा, “जब तक जाति रहेगी, तब तक संगठन नहीं होगा और जब तक संगठन नहीं होगा, तब तक हिंदू कमजोर और दब्बू रहेगा…”
– जाति का विनाश (1944), लेखक – भारत रत्न
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर
जाति को लेकर उनकी आलोचना ने हिंदू एकता को होने वाले नुकसान को रेखांकित किया
• यह सामाजिक विभाजनों को कम करने और एक एकजुट एवं मजबूत हिंदू पहचान को बढ़ावा देने वाले दृष्टिकोण के साथ मेल खाता है।
• यह इस संदर्भ में भी है कि यदि कोई यह समझना चाहे कि वह हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा किए गए सभी वास्तविक सुधार कार्यों की अत्यधिक सराहना क्यों करते थे।
• उन्होंने हिंदू महासभा के नेताओं वीर वी.डी. सावरकर और स्वामी श्रद्धानंद के कार्यों की खुलकर सराहना की है।
इस्लाम पर डॉ. भीमराव अंबेडकर
• डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस्लाम को एक अलगावकारी ताकत के रूप में देखा।
• उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम का भाईचारा ‘केवल मुसलमानों के लिए’ है, जो विश्वव्यापी भाईचारे को बढ़ावा देने के बजाय विभाजन पैदा करता है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ में लिखा, “यह मुसलमानों और
गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद करता है, वह बहुत वास्तविक है… बहुत अलगावकारी भेद है।”
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने पर्दा प्रथा की निंदा की
• बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ में पर्दा प्रथा की कड़ी आलोचना की, जिसमें बुर्का पहने महिलाओं को ‘भारत में देखी जा सकने वाले सबसे भयावह दृश्य में से एक’ बताया।
• उन्होंने उन प्रतिबंधात्मक सामाजिक प्रथाओं की निंदा की, जो मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और गतिशीलता को सीमित करती हैं। उन्होंने कहा कि वह केवल कुछ पुरुष रिश्तेदारों से ही मिल सकती हैं एवं उन्हें मस्जिद में प्रार्थना करने से भी रोका जाता है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण का विरोध किया
• डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सांप्रदायिक या समुदाय आधारित आरक्षण का विरोध किया जो कुछ समूहों को लाभ पहुंचाता था, उन्होंने चेतावनी दी कि इससे अवसर की समानता कम होगी।
• उन्होंने तर्क दिया कि ध्यान उन लोगों के उत्थान पर होना चाहिए जो ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित रहे हैं, न कि मजहब के आधार पर अलग-अलग श्रेणियां बनायी जाए, जो सांप्रदायिक हितों पर एकीकृत राष्ट्रीय पहचान के लिए खतरा बन जाए।
संविधान सभा को 30 नवंबर, 1948 को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा,
“मान लीजिए, उदाहरण के लिए किसी समुदाय या समुदायों के समूह के लिए आरक्षण किया गया… क्या कोई यह कह सकता है कि सामान्य प्रतिस्पर्धा के लिए 30 प्रतिशत का आरक्षण पहले सिद्धांत को प्रभावी बनाने के दृष्टिकोण से संतोषजनक होगा, अर्थात् अवसर की समानता होगी?”
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने का विरोध किया
• डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कश्मीर के लिए विशेष दर्जे की मांग का कड़ा विरोध किया, क्योंकि यह राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के खिलाफ था।
• उन्हें लगा कि यह प्रावधान भारत के भीतर एक और संप्रभुता का निर्माण करेगा, जो देश की एकता के लिए विनाशकारी होगा।
जब वह डॉ. भीमराव अंबेडकर को जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए मनाने गए थे, तब शेख अब्दुल्ला से बातचीत के दौरान डॉ. अंबेडकर के शब्द थे,
“आप चाहते हैं कि भारत कश्मीर की रक्षा करे, उसके लोगों को भोजन दे और कश्मीरियों को पूरे भारत में समान अधिकार प्रदान करे, लेकिन आप भारत और भारतीयों को कश्मीर में सभी अधिकारों से वंचित करना चाहते हैं। भारत के कानून मंत्री के रूप में मैं राष्ट्रीय हितों के साथ इस तरह के विश्वासघात का हिस्सा नहीं हो सकता।”
डॉ. भीमराव अंबेडकर का दत्तोपंत ठेंगड़ी पर प्रभाव
• आरएसएस के एक युवा प्रचारक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी ने 1954 के उपचुनावों के दौरान डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोलिंग एजेंट के रूप में काम किया।
• श्री ठेंगड़ी ने बाद में अपने अनुभवों को ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा’ नामक पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया, जिसमें भारत के सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने में डॉ. अंबेडकर के विचारों के गहन प्रभाव के बारे में चर्चा की गयी है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर: समान नागरिक संहिता के प्रबल समर्थक
• संवैधानिक बहसों के दौरान डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस बात पर प्रकाश डाला कि विभिन्न व्यक्तिगत कानून होने से सामाजिक मतभेद पैदा हो सकते हैं और राष्ट्रीय एकीकरण में बाधा आ सकती है।
• डॉ. भीमराव अंबेडकर ने तर्क दिया कि मजहब पर आधारित व्यक्तिगत कानून अक्सर लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।
• उन्होंने तर्क दिया कि समान नागरिक संहिता विभिन्न कानूनी प्रणालियों के प्रति परस्पर विरोधी निष्ठाओं को दूर करके नागरिकों के बीच एकता को बढ़ावा देगी।



