वित्‍त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी में 7.4 प्रतिशत वृद्धि होने का अनुमान

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आर्थिक समीक्षा 2025-26

केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने 29 जनवरी को संसद में
आर्थिक समीक्षा 2025-26 प्रस्तुत किया। आर्थिक समीक्षा का सारांश निम्‍न है:

एक फ्रैजाइल वैश्विक परिदृश्य में वैश्विक विकास का इंजन: भारत

ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था विखंडन और अनिश्चितता से जूझ रही है, मोदी सरकार के नेतृत्व में भारत एक उज्ज्वल उदाहरण तथा वैश्विक विकास का एक विश्वसनीय इंजन बनकर उभरा है। जहां मध्यम अवधि में वैश्विक विकास दर 3.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है, वहीं अधिकांश प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अभी भी महामारी के बाद के समायोजन, आपूर्ति शृंखला के पुनर्संयोजन तथा निरंतर भू-राजनीतिक तनावों से प्रभावित हैं, जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों में असमान परिणाम देखने को मिल रहे हैं।

इस चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिदृश्य में वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की अनुमानित 7.4 प्रतिशत की विकास दर यह दर्शाती है कि भारत केवल वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना ही नहीं कर रहा, बल्कि वैश्विक विकास की दिशा को भी आकार दे रहा है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत की मध्यम अवधि की संभावित विकास दर को 7.0 प्रतिशत तक बढ़ाया गया है, जो तीन वर्ष पूर्व 6.5 प्रतिशत आंकी गई थी। यह सुधार किसी अस्थायी उछाल का परिणाम नहीं है, बल्कि निरंतर संरचनात्मक सुधारों, विस्तारित एवं उच्च गुणवत्ता वाले सार्वजनिक अवसंरचना निवेश, अर्थव्यवस्था में मजबूत होती बैलेंस शीट तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से उत्पादकता में हुई वृद्धि का संयुक्त प्रभाव है।

मुद्रास्फीति पर विजय: घरेलू कल्याण का संरक्षण

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार गत वित्तीय वर्ष मुद्रास्फीति प्रबंधन के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ है, जो मोदी सरकार की घरेलू कल्याण और मूल्य स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। महामारी के बाद के वर्षों में मुद्रास्फीति ने विश्वभर में आम जनजीवन को प्रभावित किया। किंतु वित्त वर्ष 2025-26 में इस दबाव में उल्लेखनीय कमी आई। अप्रैल से दिसंबर 2025-26 के दौरान खुदरा मुद्रास्फीति औसतन 1.7 प्रतिशत रही, जो वर्तमान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक शृंखला में अब तक का सबसे निम्न स्तर है। इसका मुख्य कारण खाद्य कीमतों में व्यापक नरमी रही। आपूर्ति स्थितियों में सुधार, बाजारों के बेहतर संचालन जैसे अधिक आवक, कुशल वितरण और प्रभावी आपूर्ति प्रबंधन के चलते आवश्यक वस्तुओं, विशेषकर सब्जियों और दालों की कीमतों में राहत आई, जिसका लाभ आम परिवारों को प्रत्यक्ष रूप से महसूस हुआ।

एक उल्लेखनीय उपलब्धि यह रही कि मुद्रास्फीति को नियंत्रित करते हुए भी आर्थिक विकास से समझौता नहीं किया गया। कोर मुद्रास्फीति स्थिर रही, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक गतिविधियां मजबूत रहने के बावजूद मांग-पक्ष का दबाव नियंत्रण में रहा। ऐसे समय में जब कई देश अभी भी उच्च महंगाई और बढ़ती जीवन-यापन लागत से जूझ रहे हैं, भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि वित्त वर्ष 2025-26 में मुद्रास्फीति में कमी के साथ-साथ विकास की गति भी बनी रही, जिससे क्रय शक्ति सुरक्षित रही और उपभोग में निरंतरता बनी रही।

सुदृढ़ उपभोक्ता विश्वास से घरेलू मांग को मजबूती

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की विकास गाथा मुख्य रूप से घरेलू मांग की मजबूती से संचालित रही है, न कि बाहरी कारकों पर निर्भरता से। वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता और मंद व्यापार के बीच भारत के परिवार आर्थिक गति के प्रमुख आधार बने हैं। घरेलू उपभोग अब सकल घरेलू उत्पाद का 61.5 प्रतिशत है, जो वित्त वर्ष 2011-12 के बाद का सबसे उच्च स्तर है और यह अर्थव्यवस्था की आंतरिक विकास क्षमता के सुदृढ़ होने का संकेत देता है। जमीनी स्तर पर भी इसका स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में निजी अंतिम उपभोग व्यय में 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में व्यापक विस्तार को दर्शाती है।

उपभोग-आधारित वृद्धि से निवेश-आधारित विकास चक्र की ओर

भारत की विकास यात्रा अब अल्पकालिक उपभोग उछालों के बजाय एक सुदृढ़ और निरंतर निवेश चक्र पर आधारित होती जा रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में सकल स्थिर पूंजी निर्माण में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और निवेश दर सकल घरेलू उत्पाद के 30 प्रतिशत पर स्थिर रही, जो दीर्घकालिक पूंजी निर्माण का संकेत है। इस निवेश को गति देने में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय की निर्णायक भूमिका रही है। वित्त वर्ष 2018-19 से 2021-22 के बीच सरकार का पूंजीगत व्यय 3.07 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 5.92 लाख करोड़ रुपये अर्थात् 92 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह गति आगे भी बनी रही और वित्त वर्ष 2025-26 (बजट अनुमान) में पूंजीगत परिव्यय लगभग 89 प्रतिशत बढ़कर 11.21 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। अवसंरचना निवेश का गुणक प्रभाव 2.5 से 3.5 के बीच होने के कारण अवसंरचना में किया गया प्रत्येक 1 रुपये का निवेश मध्यम अवधि में 2.5 से 3.5 रुपये का अतिरिक्त सकल घरेलू उत्पाद सृजित करता है। इस प्रकार, यह रणनीति उत्पादकता बढ़ाने और दीर्घकालिक विकास क्षमता को सुदृढ़ करने में केन्द्रीय भूमिका निभा रही है

सार्वजनिक पूंजीगत व्यय से निजी निवेश को प्रोत्साहन और संपर्क अवसंरचना का उन्नयन

भारत में अवसंरचना के व्यापक निर्माण ने निजी पूंजी के प्रवाह को प्रोत्साहित करने का एक सशक्त प्रभाव उत्पन्न किया है, जिससे नए वित्तीय स्रोत खुले हैं और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में गति आई है। जहां अवसंरचना क्षेत्र के बैंक ऋण में पुनरुद्धार हुआ है और अक्टूबर, 2025 में इसमें 4.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, वहीं एक गहरा संरचनात्मक परिवर्तन भी सामने आ रहा है। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) अब महत्वपूर्ण वित्तपोषक के रूप में उभर रही हैं। वित्त वर्ष 2020 से 2025 के बीच वाणिज्यिक क्षेत्र को एन.बी.एफ.सी ऋण में 43.3 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई, जो पारंपरिक बैंक ऋण की तुलना में कहीं अधिक है। यह विविधीकरण एक परिपक्व होते वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है, जो दीर्घकालिक विकास के लिए संसाधन जुटाने में सक्षम है।

राजकोषीय अनुशासनः समष्टि-आर्थिक स्थिरता का आधार

गत वित्तीय वर्ष में राजकोषीय नीति ने कोविड काल की नरमी से हटकर स्थिरता, विश्वसनीयता और मध्यम अवधि के अनुशासन पर आधारित ढांचे की ओर स्पष्ट संक्रमण को दर्शाया है। केंद्र सरकार सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में दृढ़ता से अग्रसर है, जिससे विकास की गति बनाए रखते हुए राजकोषीय समेकन सुनिश्चित किया जा रहा है। यह समायोजन संतुलित ढंग से किया गया है जहां आवश्यकता हो वहां मांग को समर्थन देते हुए राजकोषीय मार्ग पर विश्वास को मजबूत किया गया है।

रोजगार और उत्पादकता से जुड़ी शिक्षा

कौशल, एस.टी.ई.एम (STEM) और अवसंरचना की तैयारी पिछले दशक में शिक्षा को आर्थिक प्राथमिकताओं और रोजगार योग्यता से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित (STEM) तथा व्यावसायिक पाठ्यक्रम अब कुल नामांकन का लगभग 43 प्रतिशत हैं, जबकि कौशल आधारित और व्यावसायिक कार्यक्रम सबसे तेजी से बढ़ने वाला खंड बन गए हैं। यह श्रम बाजार की आवश्यकताओं के साथ बेहतर सामंजस्य को दर्शाता है। इस परिवर्तन को क्षमता विस्तार और अवसंरचना के आधुनिकीकरण से बल मिला है। विश्वविद्यालयों की संख्या 2014 में 760 से बढ़कर 1,150 से अधिक हो गई है, महाविद्यालयों की संख्या 38,500 से बढ़कर 45,000 से अधिक हो गई है तथा देश में अब 14.9 लाख विद्यालय हैं। इनमें से 95 प्रतिशत विद्यालय विद्युतीकृत हैं और 55 प्रतिशत विद्यालय इंटरनेट से जुड़े हुए हैं, जो 2016 में 20 प्रतिशत से भी कम था। इससे रोजगारोन्मुखी और भविष्य-तैयार शिक्षा प्रणाली की मजबूत नींव तैयार हुई है।

स्वास्थ्य में संरचनात्मक परिवर्तनः जीवन-रक्षा से मानव पूंजी निर्माण की ओर

विकास के लक्ष्य की ओर अग्रसर होते हुए भारत की स्वास्थ्य यात्रा अब केवल जीवन-रक्षा तक सीमित न रहकर उत्पादक मानव पूंजी के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाती है। वर्ष 1990 के बाद से प्रमुख मृत्यु दर संकेतकों में भारत ने एक संरचनात्मक परिवर्तन हासिल किया है। मातृ मृत्यु दर में 86 प्रतिशत की कमी तथा पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में 78 प्रतिशत की गिरावट, जो वैश्विक रुझानों से कहीं बेहतर है। यह प्रगति जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य क्षमताओं के व्यापक विस्तार पर आधारित है। शिशु मृत्यु दर घटकर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 25 रह गई है, जिसे 1.82 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के सुदृढ़ नेटवर्क का समर्थन प्राप्त है। 506 करोड़ से अधिक लाभार्थी विज़िट्स और 42 करोड़ टेली-परामर्शों के माध्यम से इस अवसंरचना ने व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल और कल्याण सेवाओं को ग्रामीण एवं शहरी दोनों स्तरों पर मजबूती से स्थापित किया है।