आगत पीढ़ियों के लिए यह अत्यन्त विचारणीय होना चाहिए कि छोटी से छोटी और साधारण से साधारण परिस्थितियों में भी कोई अपने व्यक्तित्व को कैसे धुर विपरीत स्थिति में इतना गगनोत्तर स्थापित कर सकता है?
महाराष्ट्र के छोटे-से गांव पोंढी के साधारण कृषक मान्तोराव शिंदे के परिवार में जन्मी कन्या कैसे आरोहों-अवरोहों से बिना विचलित-विगलित हुए पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के रूप में प्रतिष्ठित हुई? अहिल्याबाई होल्कर अपनी आराध्या मां नर्मदा की भांति ही नीचे से ऊपर की ओर प्रवहमान हैं। प्रकृति के अनुरूप नहीं, प्रकृति को अपने अनुरूप कर प्रवाहित होना ही नार्मदीय प्रवाह है। निर्भीक, अदम्य साहस और सर्वोच्च जीवनमूल्यों-आदर्शों तथा दृढ़तर आस्था की धनीमानी रानी
राजकाज एवं शासन-प्रणाली के सफल संचालन हेतु अहिल्याबाई होल्कर सर्वसामान्य से सीधे जुड़कर उनकी समस्याओं का निदान कर, जन-हितैष्णाओं को महत्त्व देतीं। न्याय करते समय वे अपने-पराये में किंचित भेद नहीं करतीं
अहिल्याबाई होल्कर का सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व अजस्र प्रेरणा का स्रोत है। आठ वर्ष की कन्या अहिल्या अपनी समवयस्क सहेलियों के साथ पार्थिव शिवलिंग बना रही थी कि अचानक मालवा के सूबेदार मल्हारराव होल्कर के काफ़िले का घोड़ा अपने मार्ग को छोड़कर बच्चियों की तरफ़ बढ़ जाता है। सब लड़कियों में भयमिश्रित भगदड़ मच जाती है, परन्तु अहिल्या अपने आराध्य देव महादेव के भरोसे शिवलिंग बनाने में जुटी रहती है। मल्हारराव होल्कर बालिका अहिल्या की दृढ़तर आस्था और निर्भीकता से इतने प्रभावित हो उठते हैं कि अहिल्या को अपने सुपुत्र खण्डेराव के लिए वधू के रूप में चयन कर लेते हैं। मल्हारराव की दूरदृष्टि विफल नहीं होती। यही साधारण कृषक-कन्या आगे चलकर पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होल्कर के रूप में सनातन धर्म और संस्कृति की यश:पताका की गगनोत्तरी प्रतिष्ठा रचती है।
रानी अहिल्याबाई को समझने के लिए उनके परिवेश को समझना अनिवार्य है। उस समय के राजनीतिक परिदृश्य और मालवा के बाह्य और आन्तरिक संघर्ष ही अहिल्याबाई के व्यक्तित्व को गढ़ते हैं। पहले तो मल्हारराव के परिजनों (खण्डेराव के प्रतिद्वन्द्वियों) की सत्ता हड़पने की महत्वाकांक्षा को समूल कुचलने की पहल और दूसरे सीमावर्ती पड़ोसी राज्यों के कूट-कुचक्रों को नष्टकर राजनीतिक प्रत्युत्पन्नमति का समयोनुरूप प्रयोग। राजकाज एवं शासन-प्रणाली के सफल संचालन हेतु अहिल्याबाई होल्कर सर्वसामान्य से सीधे जुड़कर उनकी समस्याओं का निदान कर, जन-हितैष्णाओं को महत्त्व देतीं।
न्याय करते समय वे अपने-पराये में किंचित भेद नहीं करतीं। पूर्ववर्ती उज्जयिनी-नरेश सम्राट् विक्रमादित्य उनके आदर्श थे। सत्ता भोग की नहीं, सेवा की साध्य थी। यही कारण था कि उनके शासनकाल को प्रजा लम्बे अन्तराल तक भूल नहीं पायी। भील-आदिवासी सहित सभी जनजातियों के प्रतिनिधि रानी अहिल्याबाई के राज में अपराधिक गतिविधियों को छोड़कर जनहित में अपनी चहेती रानी के इशारे पर जान छिड़कने को तत्पर रहते। सामाजिक समरसता, नारी-शिक्षा और नारी सम्मान के लिए अहिल्याबाई के प्रशासनिक निर्णय उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते रहे।
रानी अहिल्याबाई के शासनकाल में नारी-शिक्षा, नारी-स्वातन्त्र्य और नारी के सर्वांगीण उत्थान के लिए व्यापक स्तर पर निर्णायक पहल की गयी। यहां तक कि नारी के सशक्तीकरण पर ज़ोर देकर नारी-सेना का भी निर्माण किया गया। नारियों को घुड़सवारी, तलवार-भाला-बरछी सहित अन्यान्य शस्त्र संचालन की दक्षता प्रदान कर, नारी को शारीरिक और मानसिक तौर पर सक्षम बनाया गया। महेश्वर से इन्दौरपर्यंत सम्पूर्ण सूबे में ही नहीं, अपितु देशभर के अनेक धार्मिक तीर्थस्थलों में मन्दिरों, धर्मशालाओं, कुओं-बावड़ियों का निर्माण कराया गया। महेश्वर में नर्मदा तट पर पक्के घाटों-मन्दिरों, काशी-विश्वनाथ, सोमनाथ सहित द्वादश ज्योतिर्लिंगों और अन्यान्य प्रतिष्ठित शिव-मन्दिरों का निर्माण तथा जीर्णोद्धार कराया गया।
सनातन धर्म और संस्कृति के उत्थान हेतु अहिल्याबाई होल्कर ने श्रीमदाद्यशंकराचार्य को अपना प्रेरणास्रोत माना। अहिल्याबाई होल्कर ने शस्त्र और शास्त्र को प्रतिष्ठित कर भारतीय मनीषा, संस्कृत के मूल्यवान ग्रन्थों, कला-साहित्य को संरक्षण और सम्पोषण दिया है। मराठों की सत्ता-शक्ति के संवर्धन में मुग़लों और उनके नवाबों से भी लोहा लिया।
अपने आराध्य देव महादेव शिवशंकर की ऊर्ध्वमुखी प्रतिष्ठा की पर्याय बनकर अहिल्याबाई होल्कर ने स्वयं को लोकोपकारी-मंगलकारी, जनहितैष्णाओं के लिए प्राणप्रण से समर्पित कर दिया। सनातन धर्म एवं संस्कृति के निमित्त रानी अहिल्याबाई की जीवन-गाथा हमें ऊर्जा प्रदान करती रहेगी।
धर्म-संस्कृति, जीवनमूल्यों की है अक्षत थाती।
देवि अहिल्याबाई होल्कर सत्य सुपथ दर्शाती।।
सनातन धर्म और संस्कृति की गगनोत्तरी यश:पताका पुण्य श्लोकदेवी अहिल्या बाई होल्कर की प्रासंगिकता युगान्तरकारी है। जब तक संसार में जीवनमूल्यों, आदर्शों और मानवीय संस्कारों का मान रहेगा, तब तक सनातन धर्म और संस्कृति के साथ रानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रेरक जीवन-गाथा का महत्व जनमानस में भारतीय मनीषा के रूप में प्रतिष्ठित रहेगा।
(लेखक भारतीय संस्कृति के अध्येता हैं)

