वनगमन के समय मां सीता को वल्कल वस्त्र धारण किए हुए देख गुरु वशिष्ठ के नेत्र सजल हो उठे थे। उन्होंने मां सीता को रोकते हुए व कैकेयी को कठोर फटकार लगाते हुए कहा, “सीता वन में नहीं जाएंगी, श्रीराम के लिए सजे हुए राजसिंहासन पर ये ही बैठेंगी और पूरी पृथ्वी का पालन करेंगी।” (वा.रा. 2.37.23-24)
18वीं शताब्दी के मध्य में, जब भारत में मुगल साम्राज्य का पतन हो रहा था और मराठा शक्ति का उदय हो रहा था, तब एक ऐसी शासिका ने इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित किया, जिनकी शासन शैली और व्यक्तित्व आज उनके जन्म के त्रिशती वर्ष में भी प्रासंगिक बने हुए हैं। यह महिला थीं – गंगा के समान पवित्र राजमाता महामहिम देवी अहिल्याबाई होल्कर।
पहले शांति, फिर संधि और अंत में शस्त्र प्रयोग, अपनी इसी नीति के बल पर देवी ने अपने 28 वर्षों के दीर्घ शासन के पहले और एकमात्र चन्द्रावतों के विद्रोह का सफल दमन किया
वनगमन के समय मां सीता को वल्कल वस्त्र धारण किए हुए देख गुरु वशिष्ठ के नेत्र सजल हो उठे थे। उन्होंने मां सीता को रोकते हुए व कैकेयी को कठोर फटकार लगाते हुए कहा, “सीता वन में नहीं जाएंगी, श्रीराम के लिए सजे हुए राजसिंहासन पर ये ही बैठेंगी और पूरी पृथ्वी का पालन करेंगी।” (वा.रा. 2.37.23-24)
परिस्थितिवश उस युग में तो ऐसा नहीं हुआ, परन्तु मालवा का इतिहास साक्षी है कि जब अपने पति खाण्डेराव की मृत्यु के पश्चात् देवी अहिल्याबाई सती होने जा रही थीं, तो भग्नहृदय सूबेदार मल्हारराव की करुण विनती ने देवी अहिल्या को सती होने से रोक दिया और अपने राजपाट का सम्पूर्ण भार उन्हें सौंपकर विश्व को एक महिला के ऐसे अभूतपूर्व शासन से परिचित कराया जो अन्यथा इतिहास का एक अपूर्ण स्वप्न बनकर रह जाता।
देवी अहिल्या के प्रारम्भिक वर्षों में जब मल्हारराव सैन्य अभियानों का नेतृत्व, कूटनीतिक कक्षों में बहस, वित्त का प्रबंधन, राजकीय व न्यायिक समस्याओं का निस्तारण कर रहे थे तब मालवा की भावी शासिका उन्हें देखकर व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रही थीं। 1765 में मल्हारराव द्वारा लिखे गए एक पत्र में हमें देवी अहिल्याबाई की क्षमताओं पर उनके असीम विश्वास का प्रमाण मिलता है, वहीं देवी के मानसिक अंतर्द्वंद्वों और उनसे पार पाने का वर्णन भी मिलता है।
मल्हारराव ने जब देवी को ग्वालियर में एक तोपखाना तैयार करने, तोपों का मॉडल बनाने, तोप और गोलों का निर्माण कराने, निर्माण के लिए वित्त प्रबन्धन, बाणों का बारूद रखने हेतु पात्रों का क्रय, तोपखाने की सुरक्षा, कर्मचारियों के वेतन व मालवाहक बैलों के चारे की व्यवस्था जैसी विशाल जिम्मेदारी सौंपी, तब अति धार्मिक देवी अपने निजी स्वभावानुसार ग्वालियर जाते समय दो दिन मथुरा में तीर्थवास करना चाहती थीं, परन्तु इससे असंतुष्ट मल्हारराव ने कहा, “मथुरा में एक घूंट पानी पीने के लिए भी न रुकें, सीधे ग्वालियर कूच करें, अन्यथा आप खुशी से तीर्थयात्रा पर जाने को स्वतंत्र हैं।”
सैन्य कार्य की गम्भीरता देख देवी अहिल्या ने अपने निजी महत्त्व की तीर्थयात्रा की योजना रद्द कर तुरंत ग्वालियर कूच किया व सौंपे गए कार्यों का निष्पादन किया। इसके दो महीने के भीतर ही देवी ने तोपों की मदद से गोहद के किलों पर कब्जा कर अपने अद्भुत सैन्य कौशल का प्रदर्शन किया। इस अभियान में मल्हारराव ने देवी को सीख दी थी कि ‘न्यूनतम शक्ति से अधिकतम परिणाम’ प्राप्त करना आपका आदर्श वाक्य होना चाहिए। यह बीज ऐसी ग्रहणशील भूमि में बोए गए थे, जिसके मधुर फलों ने भविष्य में पूरे भारतवर्ष को संतृप्त किया।
देवी अहिल्याबाई की नीतिगत व प्रशासनिक दक्षता जानकर उनकी योग्यता की बड़ाई स्वयं पेशवा सरकार करने लगे थे। पहले शांति, फिर संधि और अंत में शस्त्र प्रयोग, अपनी इसी नीति के बल पर देवी ने अपने 28 वर्षों के दीर्घ शासन के पहले और एकमात्र चन्द्रावतों के विद्रोह का सफल दमन किया। इस उपलक्ष्य में पूना में आयोजित भव्य दरबार में नाना फडणवीस ने देवी की वीरता और युद्ध कौशल की भूरि-भूरि प्रशंसा की, इस समय तक देवी प्रायः एक धर्मपरायण महिला के रूप में ही प्रसिद्ध थीं।
लेकिन इस विजय के उपरान्त भी रानी अहिल्याबाई ने पुरानी सब बातें भुलाकर और पश्चाताप का पूरा अवसर देकर भवानी सिंह को पुनः पद पर बैठाया और सम्मान में वस्त्र भेंट किए, बदले में उन्होंने भी सम्मानपूर्वक होल्करों को वस्त्र भेंट किए। इस प्रकार देवी की वीरता, न्याय, दया व धर्मनिष्ठा की कीर्ति चतुर्दिक् फैल रही थी और तत्कालीन शासक वर्ग उनमें एक वन्दनीय अनुल्लंघनीया साध्वी के रूप में श्रद्धा रखने लगा था, जिनसे राजनीतिक स्पर्धा या विवाद करना शासकों की धार्मिक प्रतिष्ठा व जनभावना के अनुकूल न था।
जनता के लिए वास्तव में वे एक सरकार नहीं माता थीं, वे उन्हें गंगा के समान पवित्र, राजमाता व मातेश्वरी कहा करते थे। एक नागरिक जब उन्हें कहता है, “मेरे पिता जी ने साठ वर्षों तक आपकी सेवा की है। मैं भी वृद्ध हो गया हूं, अब मेरी रक्षा और जीवनयापन का दायित्व आप पर है। मैं अपने परिवार सहित आपके पास कुछ दिन रहना चाहता हूं।” तो इसमें हम वह जनभावना समझ सकते हैं कि देवी उनके लिए महज सरकार नहीं, बल्कि सहारा देने वाली सहज सुलभ मां के रूप में उपस्थित थीं।
एक अवसर पर जब एक लड़की के पिता को पता चला कि जिससे उन्होंने अपनी बेटी की सगाई की है,
देवी अहिल्या की दृष्टि व्यापक थी, वे राज्य के मामलों में सूक्ष्म विवरणों पर भी पूरा ध्यान देती थीं। सैन्य अभियानों के साथ-साथ देवी के लिए इंजीनियरिंग भी अज्ञात नहीं थी, क्योंकि तोप का मॉडल निश्चित करने से लेकर, तोप और गोला निर्माण में उनकी सक्रिय भूमिका तो थी ही, इसके साथ ही कई जगह बांध निर्माण के समय उसके आकार-प्रकार सम्बन्धी निर्देश भी उन्होंने अपने पूर्व अनुभवों से दिए थे
दरअसल वह गम्भीर रोगी है, तो सगाई तोड़ने का आवेदन उन्होंने देवी अहिल्याबाई के समक्ष प्रस्तुत किया। देवी ने तुरंत राजाज्ञा जारी कर सगाई निरस्त घोषित की जिससे किसी बेटी का भविष्य अंधकारमय होने से बच जाए व उसके पिता को भी सामाजिक दबाव से मुक्ति मिल जाए।
पर यहां हम देवी के जीवन की उस त्रासदी को भी देखते हैं, जिन्होंने स्वयं वैधव्य का दंश झेला व अपनी बेटी मुक्ताबाई को भी कम आयु में विधवा व सती होते हुए देखा, पर उसके लिए कुछ न कर सकीं। मुक्ताबाई के सती होने के बाद देवी अहिल्या शोक में इतना डूब गयीं थीं कि तीन दिन तक बिना कुछ खाए-पीए एकदम मौन हो गयीं थीं। इससे उबरने के बाद उन्होंने मुक्ताबाई की याद में अत्यंत सुंदर स्मारक का निर्माण कराया जो किसी महिला के लिए बनाई गई पहली छतरी थी।
मैल्कम ने कहा है, ‘’मातृ प्रेम के इस स्मारक से ज़्यादा सुंदर और परिष्कृत कारीगरी वाले आधुनिक मंदिर भारत में बहुत कम हैं।’’ इसके अतिरिक्त अपनी नीतियों व कार्यों के माध्यम से उन्होंने विधवाओं और महिलाओं की आत्मनिर्भरता के लिए कई कदम उठाए। गया धाम के विष्णुपद मंदिर के निर्माणकार्य की महती जिम्मेदारी भी उन्होंने अपनी सहयोगी मोहिनी राज मुरार नाम की महिला को दी थी।
सूबेदार मल्हारराव ने जब माहेश्वर पर अधिकार किया, तब यह मात्र एक कस्बा था। यहां विभिन्न शहरों के विभिन्न व्यवसायों वाले नागरिकों, वेद-शास्त्र, व्याकरण, कर्मकाण्ड, ज्योतिष, चिकिसा के जानकर पण्डितों, साहूकार, मूर्तिकार, कवि, कलाकारों, बुनकरों आदि को अनुदान देकर नगर में बसाया गया।
केवल इस कस्बे में देवी अहिल्या के शासनकाल तक विभिन्न सम्प्रदायों के 66 भव्य मंदिरों और सुरम्य घाटों का निर्माण हो चुका था। देवी राजधानी के सर्वांगीण विकास हेतु कटिबद्ध थीं, यही कारण था कि यहां पुलिस स्टेशनों, स्कूलों, सड़कों, गुप्तमार्गों, डाक व यातायात की समुचित व्यवस्था की गई थी।
देवी अहिल्या की दृष्टि व्यापक थी, वे राज्य के मामलों में सूक्ष्म विवरणों पर भी पूरा ध्यान देती थीं। सैन्य अभियानों के साथ-साथ देवी के लिए इंजीनियरिंग भी अज्ञात नहीं थी, क्योंकि तोप का मॉडल निश्चित करने से लेकर, तोप और गोला निर्माण में उनकी सक्रिय भूमिका तो थी ही, इसके साथ ही कई जगह बांध निर्माण के समय उसके आकार-प्रकार सम्बन्धी निर्देश भी उन्होंने अपने पूर्व अनुभवों से दिए थे। वे मुहूर्त्त व शकुन शास्त्र की अद्भुत ज्ञाता थीं। प्रतिदिन उपनिषद्, गीता, महाभारत आदि शास्त्रों से लेकर आयुर्वेद के ग्रन्थों का भी वे अध्ययन करती थीं।
अनुभूत जीवन ध्येय के प्रति समर्पण
देवी अहिल्याबाई होल्कर के बनाए मंदिरों और दान पर जो भी कहा जाए, वह सूर्य को निवेदित श्रद्धापूर्ण दीपक के समान ही है। देवी का नाम और मंदिर भारतीय जनमानस में इस हद तक एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं कि जहां कहीं भी मंदिर, घाट या अन्य धार्मिक भवन अपंजीकृत दिखाई देते हैं, हिन्दू समाज सोचता है कि इन्हें देवी ने ही बनाया होगा।
जिस बुतशिकन औरंगजेब ने भारतीय धर्म के विध्वंस का भीषण कार्य कर तीर्थों को मलबे के ढेर में बदल दिया था और आधी शताब्दी तक उसके बदले कुछ भी नया नहीं बनाया था, उसके जाते ही एक ओर मराठा शक्ति के दिग्विजय अभियान सैन्य विजय हासिल करते चले जा रहे थे, दूसरी ओर देवी अहिल्या मंदिरों के खण्डित भग्नावशेषों और तीर्थों की पुरास्मृतियों पर सांस्कृतिक विजय के सुन्दरतम स्मारकों की शृंखला खड़ी करती चली जा रही थीं।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से चार काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, बैजनाथ, घृष्णेश्वर के वर्तमान मंदिर तो देवी अहिल्या के ही बनवाए हुए हैं। इसके अतिरिक्त सभी अन्य ज्योतिर्लिंगों में देवी अहिल्या ने मंदिर, धर्मशाला, घाट निर्माण व पूजा व्यवस्था हेतु प्रचुर दान दिया था। सप्तपुरियों अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिका व द्वारका के पुनरुद्धार हेतु देवी ने अपने राजकोष के द्वार खोल दिए थे। अयोध्या में राममंदिर, त्रेताराम मंदिर, भैरव मंदिर, नागेश्वरनाथ मंदिर, सरयू घाट आदि का निर्माण कराया। मथुरा में चैनबिहारी मंदिर, कालियादह घाट, चीरघाट व धर्मशाला बनवाई।
हरिद्वार मायापुरी में कुशावर्त घाट व धर्मशाला बनवाई। काशी में काशी विश्वनाथ निर्माण के अतिरिक्त तारकेश्वर महादेव मंदिर, गंगा मंदिर, मणिकर्णिका घाट, दशाश्वमेध घाट, छह निजी मंदिर, धर्मशालाएं, बगीचे व ब्रह्मपुरी की स्थापना की। कांची में वार्षिक गंगाजल की आपूर्ति जैसा दुर्लभ कार्य देवी ने किया था। उज्जैन में लीला पुरुषोत्तम मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, बालाजी मंदिर, चिंतामण गणपति आदि की स्थापना की थी व द्वारका में भी धर्मशाला बनाई थी।
हिन्दू धर्म के पवित्र चार धामों में उत्तर में बद्रीनाथ में केदारेश्वर मंदिर, श्रीहरि मंदिर, देवप्रयाग उद्यान,
तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज में उच्च समझी जाने वाली जातियों से न होकर भी एक साधारण पृष्ठभूमि की ग्रामीण बालिका से लेकर एक असाधारण साम्राज्ञी बनने तक की उनकी जीवन यात्रा, उनकी शुचिता, धर्मनिष्ठा, भक्तिभाव, शक्ति संचयन, अनुशासन, ज्ञान, परोपकार और दूरदर्शिता समग्र भारतीय समाज के लिए प्रेरणा का अजस्र स्रोत बने रहेंगे। हम सभी जनमानस की चलित भगवती को कृतज्ञता के साथ स्मरण करते हैं
तप्तकुण्ड, कुण्डचट्टी कुण्ड व पांच धर्मशालाएं बनवाईं व दक्षिण में रामेश्वरम में राधाकृष्ण मंदिर, कुएं व धर्मशाला बनवाई थी। पुरी में श्रीरामचन्द्र मंदिर, धर्मशाला व बगीचा बनवाया। पुरी में देवी के कार्यों से एक बहुत महत्वपूर्ण घटना जुड़ी है जो तत्कालीन शासक वर्ग में देवी अहिल्या के प्रति अगाध श्रद्धाभाव को दिखाती है।
जब देवी अहिल्याबाई ने अपने अधिकारी को मंदिर निर्माण हेतु भूमि क्रय हेतु 1,800 रुपए की धनराशि के साथ भेजा, तो ‘भूमि की कीमत’ का विषय खुलने पर राजा बिल्केश्वर देवराज ने महारानी से एक पाई भी लेने से इंकार करते हुए तुरंत लिखित रूप में भूमि अनुदान पारित कर दिया था। विभाजित हिंदू शासकों में देवी के कार्यों के प्रति गहन श्रद्धाभाव था, जिस कारण अन्य विषयों में मतभेद होने पर भी राजा उनसे मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित कर उनके सांस्कृतिक कार्यों को नियति निर्धारित राष्ट्रकार्य मानकर उसमें यथासंभव सहयोग करते थे। वे वास्तविक अर्थों में पूरे देश की राजमाता बन चुकी थीं।
एक प्रसिद्ध कथा है कि प्राचीनबर्हि नामक राजा ने इतने यज्ञ किए थे कि पूर्वाग्र कुशाओं से पूरी पृथ्वी ढ़क गई थी। देवी अहिल्या के बनाए मंदिरों को देख कर भी ऐसा ही लगता है मानो उनसे पूरा भारतवर्ष आच्छादित हो गया हो। प्रधान तीर्थों के अतिरिक्त पारली, मुंबई, कोल्हापुर, सतारा, पूना, पंढ़रपुर, नाशिक, एलोरा, रत्नागिरि (महाराष्ट्र), पुष्कर, भरतपुर, नाथद्वारा, कुम्हेर (राजस्थान), मथुरा, अयोध्या, नैमिषारण्य, प्रयागराज, सम्भल (उत्तरप्रदेश), टिहरी, बुरहानपुर, गया, वेरुल, कुरुक्षेत्र, महेश्वर, अमरकंटक, कर्मनाशा बंगाल आदि भारतवर्ष की चारों दिशाओं में भगवती अप्रतिहत रूप से अगणित मंदिर, मठों, धर्मशालाओं, बगीचों, घाटों, कुंओं, कुण्डों, पुलों का निर्माण व उनके लिए अगणित दान दक्षिणा करती चली जा रही थीं।
उनका राष्ट्रचिन्तन इतना सुदृढ़ था कि उन्होंने बारह ज्योतिर्लिंगों समेत देशभर के विभिन्न शहरों के 34 मुख्यतम शिव मंदिरों में महाशिवरात्रि की रात्रि पर गंगाजल से अभिषेक की व्यवस्था की थी तथा जब एक पवित्र स्थान पर एक कसाई ने दुकान खोली तो तुरंत उसे वहां से दुकान हटाने का आदेश पारित किया गया। अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति के प्रति आगाह करते हुए उन्होंने गठबंधन बनाकर अंग्रेजों को कुचल देने का सुझाव भी दिया था।
31 मई, 2024 से देवी अहिल्याबाई होल्कर का 300वां जयंती वर्ष आरम्भ हुआ है। तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज में उच्च समझी जाने वाली जातियों से न होकर भी एक साधारण पृष्ठभूमि की ग्रामीण बालिका से लेकर एक असाधारण साम्राज्ञी बनने तक की उनकी जीवन यात्रा, उनकी शुचिता, धर्मनिष्ठा, भक्तिभाव, शक्ति संचयन, अनुशासन, ज्ञान, परोपकार और दूरदर्शिता समग्र भारतीय समाज के लिए प्रेरणा का अजस्र स्रोत बने रहेंगे। हम सभी जनमानस की चलित भगवती को कृतज्ञता के साथ स्मरण करते हैं!
(लेखक सुपरिचित पत्रकार हैं)
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भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड एलनबरो ने प्रथम अफगान युद्ध के बाद महाराजा श्री हरिराव होलकर को लिखे पत्र में अहिल्याबाई की महानता का बड़े गौरवपूर्ण शब्दों में उल्लेख कर लिखा था कि वे एक सर्वश्रेष्ठ, आदर्श व महान शासिका थीं। देश में सर्वत्र उनके प्रति आदर भाव पाए जाते हैं।

