नारी शक्ति की जीवंत प्रतीक: अहिल्याबाई होल्कर

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     भारतीय इतिहास अनेक रानियों, महारानियों की अद्भुत शौर्य और पराक्रम की गाथा गाता है। ऐसे ही शिवत्व को प्राप्त दो शताब्दी पूर्व नारी शक्ति की जीवन्त प्रतीक देवी अहिल्याबाई होल्कर का नाम अग्रणीय है। आज भी महेश्वर के घाट नर्मदा और शिव के प्रति अहिल्याबाई होल्कर की श्रद्धा की कहानी कहते हैं। होल्कर राज्य को कठिन समय में सुयोग्य नेतृत्व, संरक्षण और स्थायित्व प्रदान करने वाली महारानी अहिल्या बाई होल्कर का नाम सिर्फ मराठों के ही नहीं बल्कि पूरे भारत के इतिहास का सुनहरा पन्ना है। अहिल्याबाई ने अपने शौर्य, विवेक, राजनैतिक समझ और परोपकार से अपना नाम विश्व की उन चंद महिला शासकों में दर्ज कराया, जिन्होंने न केवल अपना साम्राज्य चलाया बल्कि उस

अहिल्याबाई की धार्मिक चेतना ही उनकी वास्तविक शक्ति थी। उन्होंने धर्म को जीवन में धारण किया था। राजकाज व जीवन के अन्य कार्यों को वह भगवत पूजा का अंग मानती थी। उन्होंने घोषणा की थी कि यह राज्य मेरा नहीं है, भगवान शिव का है और उसे वह शिव को अर्पित कर उनके कार्यों को देखती हैं

समय को पितृसत्तात्मक कहे जाने वाले झूठे दृष्टिकोणों का खंडन करते हुए आधुनिक समाज के लिए ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किये जो भारत की महान नारी शक्ति, साहस, विवेक, और बुद्धिमत्ता से सर्वमान्य कीर्ति अर्जित की।

प्रसिद्ध कवि जोआना बेली ने अहिल्याबाई के लिए लिखा है—

‘’In latter days from Brahma came,
To rule our land, a noble dame
Kind was her heart and bright her fame,
Ahilya was her honoured name,’’

एक छोटे से गांव के साधारण से परिवार में जन्म लेने के बाद भी कैसे अहिल्याबाई राजमाता अहिल्याबाई होल्कर बन गई और पूजनीय हो गई। यह उनके बचपन के श्रेष्ठ संस्कारों के कारण ही सम्भव हो सका। अहिल्याबाई की धार्मिक चेतना ही उनकी वास्तविक शक्ति थी। उन्होंने धर्म को जीवन में धारण किया था। राजकाज व जीवन के अन्य कार्यों को वह भगवत पूजा का अंग मानती थी। उन्होंने घोषणा की थी कि यह राज्य मेरा नहीं है, भगवान शिव का है और उसे वह शिव को अर्पित कर उनके कार्यों को देखती हैं। अहिल्याबाई का जीवन कठिन संघर्षो से भरा रहा। उन्होंने अपने श्रेष्ठ, धार्मिक, सामाजिक कार्यों से सारे देश में प्रशस्ति प्राप्त की। उनकी जीवन-साधना धार्मिकता से ओतप्रोत थी। यही कारण हैं कि वह जन-जन के द्वारा देवी और मां के रूप में पूजी जाती रहीं।

कहते हैं कि बचपन के संस्कार ही आगे भविष्य का निर्माण करते हैं। अहिल्याबाई का जन्म 1725 में महाराष्ट्र के अहमदनगर के पास चौढी ग्राम के एक धर्मपरायण परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता भक्त हृदय और पूजा-पाठ में विश्वास करने वाले सरल व्यक्तित्व थे। अहिल्याबाई में सरलता, धर्मपरायणता के गुण बचपन से ही अपनी मां-पिता के द्वारा प्राप्त थी। अहिल्याबाई अपने माता-पिता की एक मात्र संतान के रूप में लाडली बेटी थी। उनके पिता मानकाजी शिंदे सहज, सरल स्वभाव के नेक इंसान थे और माता सुशीलाबाई अपनी बेटी को नित्य मंदिर ले जाती पूजा-अर्चना करती और कथा, भागवत और पुराण सुनाती थी। वहीं से उनमें श्रेष्ठ आचरण और व्यवहार के संस्कार पड़े।

एक बार अहिल्याबाई पूजा के लिए शिव मंदिर गई। संयोग से मालवा के सूबेदार मल्हार राव होल्कर भी वहां पहुंच गए। वे आठ वर्षीय कन्या अहिल्याबाई की एकाग्रता और भक्ति से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अहिल्याबाई को अपनी पुत्रवधू बनाने का निश्चय कर लिया। अहिल्याबाई का विवाह मल्हार राव के पुत्र खांडेराव के साथ हो गया और अहिल्याबाई गांव की साधारण कन्या से होल्कर राज्य की राजरानी बन गईं। लेकिन अहिल्याबाई का जीवन इतना सरल नहीं होने वाला था। आगे के जीवन में उनको कठिन संघर्षों और दु:खों का सामना करना था।

पिता के घर अहिल्याबाई को पढ़ने-लिखने की शिक्षा और धर्मग्रंथों के प्रति श्रद्धा और संस्कार प्राप्त था। ससुराल में आकर उन्होंने अपने मधुर व्यवहार से सभी लोगों का मन जीत लिया। इस बीच उन्हें एक पुत्र माले राव और पुत्री मुक्ताबाई भी हुईं। ससुर के प्रोत्साहन से उन्होंने राज कार्यों में भी कुशलता प्राप्त कर ली, अब वह राज कार्यों संबंधी पत्र भी अपने नाम से लिखने लगीं थी। वह राजकार्यों में अत्यंत दक्ष थी उनकी बुद्धि तथा कार्य कुशलता से मल्हाराव अत्यंत प्रभावित थे। वह अहिल्याबाई की सूझबूझ पर इतना विश्वास करते थे कि बाहर जाते समय राज्य का कार्यभार अहिल्याबाई पर ही छोड़ कर जाते थे। उस समय योग्य शासन प्रबंधन से प्रजा अत्यंत संतुष्ट और ख़ुश थी और अहिल्याबाई के सभी प्रशंसक थे।

1764 में कुम्भेर के युद्ध में रानी अहिल्याबाई के पति खांडेराव वीरगति को प्राप्त हो गये और इसके साथ ही रानी अहिल्याबाई के संघर्षों और दु:खों का चक्र प्रारम्भ हो गया। अहिल्याबाई पति के शव के साथ सती होना चाहती थी। मल्हार राव ने उन्हें समझाते हुए कहा, बेटी मैंने तुम्हें कभी पुत्र से कम नहीं समझा, तुम चली जाओगी तो मुझे कौन सम्हालेगा। मैंने तुमको राजकाज की शिक्षा दी है और कभी भी अपने पुत्र से कम नहीं माना। अब तुम्हें ही शासन की बागडोर संभालनी होगी। मैं समझूंगा अभी मेरा पुत्र जीवित है। अहिल्याबाई ने दत्तचित्त होकर प्रजा की सेवा करना प्रारंभ कर दिया। अभी वह पति की मृत्यु के दु:ख से उबर भी ना पाई थी कि ससुर मल्हारराव की भी मृत्यु हो गई।

मल्हारराव की मृत्यु के बाद अहिल्या व खान्डेराव का पुत्र मालेराव होलकर गद्दी पर बैठा, किंतु कुछ समय बाद ही अहिल्याबाई के पुत्र की भी मृत्यु हो गई। पुत्र वियोग से अहिल्याबाई को अत्यंत कष्ट हुआ फिर भी आंसू पोछकर अत्यंत धैर्य, साहस और हिम्मत के साथ वह राज्य की स्थिति संभालने में जुट गई। अहिल्याबाई ने राज्य की बागडोर अपने हाथ में लेने की घोषणा कर दी। इससे कुछ लोगों में बौखलाहट मच गई। मराठा पेशवा बालाजी राव के पुत्र रघुनाथ राव (राघोवा) ने अहिल्याबाई के पास संदेश भेजा कि शासन करने का अधिकार केवल पुरुषों को है आप राज्य हमें सौंप दें। अहिल्याबाई ने स्वाभिमानपूर्वक उत्तर दिया राज्य है कहां? राज्य तो मैं भगवान शिव के चरणों में अर्पित कर चुकी हूं। मैं तो केवल सेविका की भांति इस धरोहर की रक्षा कर रही हूं।

शत्रुओं से अपने राज्य की रक्षा करने के लिए उन्होंने महिलाओं की सेना भी तैयार की। महिला सैनिकों को उन्होंने स्वयं हथियार चलाना सिखाया तथा युद्ध एवं रण व्यूह का प्रशिक्षण दिया। अहिल्याबाई की

शत्रुओं से अपने राज्य की रक्षा करने के लिए उन्होंने महिलाओं की सेना भी तैयार की। महिला सैनिकों को उन्होंने स्वयं हथियार चलाना सिखाया तथा युद्ध एवं रण व्यूह का प्रशिक्षण दिया। अहिल्याबाई की सेना में अत्यंत उत्साह था

सेना में अत्यंत उत्साह था। जब दादा राघोबा राज हड़पने के लिए सेना सहित उज्जैन पहुंचे तब शिप्रा नदी के तट पर अहिल्याबाई की सेना की जोरदार युद्ध की तैयारी देखकर राघोबा के हौसले पस्त हो गए। अहिल्याबाई कुशल शासिका थी। एक मां की तरह वह अपनी प्रजा की सुख-दु:ख का ध्यान रखती थी और प्रजा की भलाई के लिए सदैव प्रयासरत रहती थीं। कोई भी व्यक्ति उनके पास जाकर अपना कष्ट कह सकता था। उनकी उदारता और स्नेह पूर्ण व्यवहार के कारण प्रजा उन्हें मां साहब कहती थी। अहिल्याबाई ने अनेक तीर्थ स्थान और मंदिरों के लिए मार्गों, कुओं और धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। उन्होंने गरीबों और अनाथों के भोजन का प्रबंध कराया। ऐसी उदार, धार्मिक, वीर और साहसी महिला का जीवन कष्टों से घिरा रहा। जिसके बीच वह निष्ठा और सूझबूझ के साथ राज्य का नेतृत्व करती रहीं।

राजमाता अहिल्याबाई ने अपने राज्य से डाकू, लुटेरों का संकट मिटा दिया। अहिल्याबाई ने अपने विवेक से जंगल में रहने वाली उन जनजातियों को, जो यात्रियों को लूट लिया करती थी, उन्हें ही उन मार्गों का संरक्षक बना दिया। इस तरह से यह जनजातियां अहिल्याबाई के राज्य में बहुत ही शांति से रहने लगीं। इनको राज्य के तरफ से संरक्षण भी दिया गया। सड़कों के दोनों तरफ छायादार वृक्ष लगाए गए, जगह-जगह पर कुओं का निर्माण कराया गया, यात्रियों के लिए प्रतीक्षा भवन स्थापित किया गया। कुछ समय बाद अहिल्याबाई इंदौर का राज्य छोड़कर तीर्थंस्थान माहेश्वर के एक साधारण घर में रहने लगी और नर्मदा के प्रति श्रद्धा होने के कारण उन्होंने माहेश्वर को ही अपनी राजधानी बना लिया। इस घर के दरवाजे दीन-दु:खियों और मुसीबत के मारे लोगों के लिए सदैव खुले रहते थे। वह सब की मां थी लोग अपनी सारी समस्या परेशानियां और दु:ख उनसे कहने आते थे। अहिल्याबाई भी परिवार की तरह उनकी बातों को ध्यान से सुनती थी और जहां तक हो सकता था लोगों के कष्ट दूर करने के उपाय किया करती थी। उनकी नई राजधानी महेश्वर कला, साहित्य, और सृजन का केंद्र बन गया था। कहते हैं उनके काल में कारीगरों के छीनी-हाथौड़ी की आवाज कभी बंद नहीं हुई। कारीगरों, दरबारियों को महारानी की तरफ से विशेष संरक्षण प्राप्त था। महारानी अहिल्याबाई ने यहां बुनकरों के लिए स्थायी व्यवसाय की भी स्थापना की, जो आज अपने महेश्वरी साड़ी के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। अहिल्याबाई की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि उनके राज्य में मालवा पर कोई भी आक्रमण नहीं कर पाया, जबकि उस समय सत्ता के लिए सभी के बीच में कड़ा संघर्ष चल रहा था। लेकिन राजमाता अहिल्याबाई के समय में मालवा स्थायित्व, सुख और शांति के प्रतीक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

अहिल्याबाई ने सिर्फ अपने ही राज्य की भलाई नहीं की, उन्होंने पूरे भारत के लिए परोपकार का कार्य किया। महारानी अहिल्याबाई धार्मिक कार्यों में बचपन से ही रुचि लेती थी। होल्कर राज्य को स्थायित्व देने के साथ ही वह धार्मिक क्षेत्र में दान-पुण्य भी करती थी। हिमालय से लेकर दक्षिण भारत तक के तीर्थ-स्थान पर उन्होंने यात्रियों के लिए विश्रामाश्रय का निर्माण कराया था। साथ ही, सड़कों, कुओं, छायादार वृक्षों की व्यवस्था की। इन स्थानों पर उन्होंने बहुत सारे सांस्कृतिक कार्यक्रम और धार्मिक आयोजनों को भी कराया। इसके साथ ही उन्होंने कई सारे मंदिरों का निर्माण व जीर्णोद्धार भी किया। बद्रीनाथ, द्वारका, ओंकारेश्वर से लेकर पुरी, गयाजी तथा बद्रीनाथ, द्वारका तक हर एक तीर्थ स्थान पर किसी न किसी रूप में अहिल्याबाई का योगदान रहा है। जिसमें सबसे ज्यादा याद किया जाने वाला है काशी का प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर जिसे उन्होंने पुनः निर्माण कराया था।

धर्म, पुण्य और परोपकार के कार्य करते हुए अंततः 1795 ई में अहिल्याबाई इस लोक से गोलोकवासी हो गई, लेकिन उनका कृतित्व और परोपकार जीवित रहा। 1795 को 70 साल की उम्र में इस योद्धा रानी का निधन हो गया। यह दु:खद समाचार तेजी से चारों ओर फैल गया। मालवा का हर व्यक्ति रुदन करने लगा था। मानों सभी को यह लगने लगा कि उनकी जन्मदात्री मां आज उन्हें छोड़ चली गई। आज कई शताब्दी बाद भी उनका कृतित्व अनगिनत मंदिरों और धर्मशालाओं में जिंदा है जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। अहिल्याबाई ने सबसे ज्यादा मंदिर, धर्मशाला और अभावग्रस्त लोगों के लिए भवन निर्माण कराया था। उनका 28 वर्ष लंबा राज्यप्रबंधन आज भी इफेक्टिव गवर्नमेंट के मॉडल के रूप में याद किया जाता है। अहिल्याबाई की कीर्ति केवल अपने देश के अंदर ही प्रसिद्ध नहीं थी उनको विश्व स्तर पर ग्रेट लीडर्स क्विन में उनकी गिनती की जाती है।

उनके बारे में यह उक्तियां सत्य ही हैं—

“अहिल्याबाई दूरदर्शिता व महानता में अद्वितीय हैं कोई भी इन बातों में उनकी बराबरी नहीं कर सकता है।” –नाना फडणवीस

“अहिल्याबाई का व्यक्तित्व ब्रज सा कठोर तथा फूलों सा कोमल था। संसार व्यक्ति की पूजा नहीं करता, अपितु उसके दृष्टिकोण व कार्य की पूजा करता है।” –आचार्य विनोबा भावे

अहिल्याबाई होल्कर ने अपनी राज्य की सीमाओं के बाहर पूरे भारत के लिए परोपकार के कार्य किया। जिसमें उन्होंने घाट, कुओं, बावड़ियों, मार्गों का निर्माण कराया। भूखों के लिए अन्न सत्र और प्याऊ बिठाये। मंदिरों में विद्वानों और शास्त्रों के मनन चिंतन, प्रवचन हेतु व्यवस्था कराई। विश्वप्रसिद्ध माहेश्वरी साड़ियों को अपने कार्यकाल के मंदिरों की किनारों के नक्काशी का आर्थिक और सांस्कृतिक विरासत दी। वो आत्मनिष्ठता के झूठे मोह का त्याग कर सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रही, जिससे लोग उनके जीवन काल में ही उन्हें देवी समझने लगे थे। अपने जीवन-काल की विकट परिस्थितियों में भी धैर्य के साथ जो राज्य प्रबंधन अहिल्याबाई ने किया वह अविस्मरणीय रहेगा। इंदौर में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी के दिन अहिल्योत्सव मनाकर वहां के लोग अपनी ‘मां साहब’ को जन-जन की सांस्कृतिक चेतना में जीवंत बनाये हुए हैं।

(लेखिका शासकीय शिक्षिका एवं नारीकल्याण अध्येता हैं)

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सुप्रसिद्ध विद्वान इतिहासज्ञ रायबहादुर चिन्तामणि विनायक वैद्य के अनुसार– ‘यह लोकोत्तर महिला अपने सद्गुणों के कारण महाराष्ट्र के लिए ही नहीं, बल्कि समूची मानव जाति के लिए भूषण रूप हुई है। उनकी बुद्धिमत्ता इतनी व्यापक थी कि वे प्रत्येक कार्य में होशियार व निपुण थीं। उनकी धार्मिकता इतनी उदार थी कि धर्म व नीति के हर क्षेत्र में उन्होंने अपना नाम अजर-अमर कर लिया। उनका दान-धर्म इतना प्रचंड था कि वैसा दान-धर्म आज तक हिंदुस्तान में किसी ने भी किया ही नहीं। उनका न्याय इतना सही होता था कि साहूकार और चोर दोनों उन्हें आशीर्वाद देते थे। वे किसी को भी अपनी प्रशंसा या चाटुकारिता करने ही नहीं देती थीं। उनकी धाक इतनी कड़ी थी कि उनकी आज्ञा के बिना किसी ने कभी कुछ किया हो या किसी ने उनका निरादर किया हो, ऐसा कभी हुआ ही नहीं। मराठा साम्राज्य की सत्ता के प्रति उनकी बुद्धि इतनी आदरयुक्त रही कि उन्होंने सदैव उसका समर्थन ही किया। बराबरी के सरदारों के प्रति उनका प्रेम सदैव इतना निर्मल था कि उन्होंने मंगल कामना ही की। उनका निर्लोभ मन इतना विशाल था कि उन्होंने न तो कभी दूसरों का राज्य हड़पने की इच्छा की और न कभी अपनी प्रजा या अधिकारियों से अन्याय के द्वारा कुछ लिया। जीवमात्र के प्रति उनकी दया इतनी व्यापक थी कि अपने नित्य के व्यवहार में उन्होंने पशु-पक्षियों तक को भी नहीं भुलाया। अपनी प्रजा पर उनका इतना प्रेम था कि वे उन्हें अपनी संतान ही मानती थीं ।… ’