18वीं शताब्दी के दौरान मध्य भारत में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर इस सच्चाई से अच्छी तरह से वाकिफ थीं कि न्याय के साथ कुशलतापूर्वक शासन करने और अपने राज्य व धर्म की हिफाजत करने के लिए कला, विज्ञान और दर्शन की ऊंचाइयों के साथ-साथ हाथों में तलवार भी होना आवश्यक है
प्राचीन यूनान के दो राज्यों, स्पार्टा और एथेंस, की जीवनशैली बिल्कुल अलग थी। स्पार्टा के लोग सैनिक जीवन को पसंद करते थे, जबकि एथेंस के लोग कला और विज्ञान की उन्नति में रत रहते थे। जब स्पार्टा ने एथेंस पर आक्रमण किया, तो एथेंस के पास स्पार्टा जैसी सैनिक शक्ति का मुकाबला करने का न तो हौसला था और न ही संसाधन। नतीजतन, एथेंस स्पार्टा के सामने धराशायी हो गया।
18वीं शताब्दी के दौरान मध्य भारत में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर इस सच्चाई से अच्छी तरह से वाकिफ थीं कि न्याय के साथ कुशलतापूर्वक शासन करने और अपने राज्य व धर्म की हिफाजत करने के लिए कला, विज्ञान और दर्शन की ऊंचाइयों के साथ-साथ हाथों में तलवार भी होना आवश्यक है। दर्शन के साथ-साथ वह सैन्य कला में भी निपुण थीं। उनके व्यक्तित्व में स्पार्टा जैसी सैनिक कौशल और उत्साह के साथ-साथ एथेंस की दार्शनिक चिंतन और जन कल्याण की भावना भी थी। सनातन धर्म के लिए उनके द्वारा किए गए सामाजिक और धार्मिक कार्य अतुलनीय हैं।
आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ‘अमृतकाल’ के एक नये दौर से गुजर रहा है। हिंदुओं के धार्मिक स्थलों का पुनरुत्थान हो रहा है। सनातन धर्म के उत्थान के लिए जो कार्य आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हो रहे हैं, उसकी जड़ें कहीं न कहीं महारानी अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी हुई हैं। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण काशी का श्री विश्वनाथ मंदिर है।
विश्व प्रसिद्ध श्री विश्वनाथ मंदिर को क्रूर और धर्मांध मुगल शासक औरंगजेब ने 1669 ई. में ध्वस्त करने की कोशिश की थी। मुगलों और उनके वंशजों ने इस मंदिर को नेस्तनाबूद करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि यह मंदिर फिर से बनकर तैयार हो गया। इस

अहिल्याबाई होल्कर ने काशी में मणिकर्णिका घाट का निर्माण भी करवाया था। दरअसल, उन्होंने मणिकर्णिका नामक कुंड बनवाया था और उसी कुंड के नाम पर इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा। यह घाट आज भी काशी की शोभा बढ़ा रहा है
नेक कार्य को पूरा किया महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने। उन्होंने 1777 ई. में मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रण लिया और अगले तीन साल में मिशन मोड में इसे पूरा कर दिया। यही वजह है कि काशी के लोग आज भी उन्हें देवी के रूप में पूजते हैं।
अहिल्याबाई होल्कर की एक मूर्ति श्री काशी विश्वनाथ धाम के प्रांगण में भी स्थापित की गई है। साथ में एक शिलापट्ट भी है, जिस पर इस मंदिर के पुनर्निर्माण में उनके योगदान की पूरी कहानी लिखी हुई है। काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अहिल्याबाई होल्कर के योगदान को याद करते हुए कहा था, “काशी पर औरंगजेब ने अत्याचार किया था, यहां मंदिर तोड़ा गया था, तो माता अहिल्याबाई होल्कर ने इसका निर्माण कराया। जैसे काशी अनंत है, वैसे ही उनका योगदान भी अनंत है
मंदिर के पुनर्निर्माण का क्रम आगे भी चलता रहा। बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने श्री विश्वनाथ मंदिर के शिखर पर सोने का छत्र बनवाया। अब काशी के नव-निर्माण की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कंधों पर ले रखी है। साथ में वह महारानी अहिल्याबाई होल्कर के अतुलनीय योगदान को हमेशा याद करते हैं।
अहिल्याबाई होल्कर की एक मूर्ति श्री काशी विश्वनाथ धाम के प्रांगण में भी स्थापित की गई है। साथ में एक शिलापट्ट भी है, जिस पर इस मंदिर के पुनर्निर्माण में उनके योगदान की पूरी कहानी लिखी हुई है। काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अहिल्याबाई होल्कर के योगदान को याद करते हुए कहा था, “काशी पर औरंगजेब ने अत्याचार किया था, यहां मंदिर तोड़ा गया था, तो माता अहिल्याबाई होल्कर ने इसका निर्माण कराया। जैसे काशी अनंत है, वैसे ही उनका योगदान भी अनंत है।’’
अहिल्याबाई होल्कर ने काशी में मणिकर्णिका घाट का निर्माण भी करवाया था। दरअसल, उन्होंने मणिकर्णिका नामक कुंड बनवाया था और उसी कुंड के नाम पर इस घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ा। यह घाट आज भी काशी की शोभा बढ़ा रहा है। लोग इस घाट पर आते हैं और अहिल्याबाई को श्रद्धा से नमन करते हैं।
अहिल्याबाई होल्कर ने 28 साल तक कुशलतापूर्वक न केवल मालवा साम्राज्य की कमान संभाली, बल्कि अपने राज्य को ज्ञान, विज्ञान और कला का केंद्र बनाते हुए एक सैनिक शक्ति में भी तब्दील कर दिया। उनके बेहतर प्रशासनिक कौशल और जनकल्याण की भावना ने उन्हें जनप्रिय बनाया।
अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई, 1725 को महाराष्ट्र के जामखेड़ के चोंडी गांव में मान्कोजी शिंदे के यहां हुआ था। भले ही उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, लेकिन नियति ने उनके लिए बड़ी भूमिका तय की थी। अहिल्याबाई की प्रतिभा को पहचानते हुए मालवा के राजा मल्हारराव होल्कर ने 1733 ई. में उनका विवाह अपने पुत्र खंडेराव होल्कर से करवा दिया।
शादी के 12 साल बाद ही उनके पति की मृत्यु हो गई, लेकिन अहिल्याबाई ने अपने ससुर मल्हारराव होल्कर के कहने पर सती होने का निर्णय त्याग दिया। बाद में, उन्होंने सैनिक और प्रशासनिक प्रशिक्षण प्राप्त किया और खुद को एक कुशल योद्धा और शासक के रूप में स्थापित किया।
1766 ई. में मल्हारराव होल्कर की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा का शासन संभाला और इसे एक समृद्ध एवं शक्तिशाली राज्य में तब्दील कर दिया। उनके शासन को हर दृष्टि से बेहतरीन माना जाता है। 1849 ई. में कवयित्री जोआना बैली ने उनके बारे में लिखा था, “बाद के दिनों में ब्रह्मा के यहां से हमारी भूमि पर शासन करने आई एक श्रेष्ठ महिला, जिनका हृदय दयालु था, जिनकी कीर्ति उज्ज्वल थी, नाम था उनका अहिल्याबाई।”
अहिल्याबाई होल्कर ने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनाथ, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी आदि प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों पर मंदिर बनवाये और धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। उनकी इस अद्वितीय सेवा के कारण उन्हें जीते जी लोग देवी के रूप में पूजने लगे थे।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री हैं)
मराठी के सुप्रसिद्ध कवि प्रभाकर व गायक अनन्तफन्दी ने भी उनके विषय में बड़ी श्रद्धा भक्ति से पूर्ण काव्यांजलि अर्पित की है। तत्कालीन सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ नाना फड़नवीस अहिल्याबाई की प्रतिभा व अलौकिक गुणों से परिचित थे। उन्होंने एक अवसर पर कहा था कि अहिल्याबाई पुरुषार्थ, दूरदर्शिता व महानता में अद्वितीय हैं। कोई भी इन बातों में उनकी बराबरी नहीं कर सकता।

