अहिल्याबाई को जनमानस ने दो रूपों में माना है, एक पक्ष अहिल्याबाई को देवी का अवतार मानता है। यह पक्ष यह मानने को तैयार ही नहीं है कि अहिल्याबाई मानव थी क्योंकि अहिल्याबाई का व्यक्तित्व इतना ज्यादा विशाल था जो सामान्य मानव से मेल ही नहीं खाता। इतना विशाल व्यक्तित्व अभी तक न देखा गया है न सुना गया है और असंभव है। दूसरा पक्ष अहिल्याबाई को एक ऐसी सूर्य किरण या प्रकाश-पुंज की तरह मानता है जो अंधेरे को चीरकर बाहर आती है, पर अंधेरा बार-बार उसे नष्ट करने का प्रयास करता है। भारत के गौरवमयी इतिहास में कई महिला शासकों के शौर्य, पराक्रम, राष्ट्रभक्ति की भूरी- भूरी प्रशंसा की गई है। महिला शासकों की शासन-व्यवस्था का विस्तृत वर्णन भी कई इतिहासकारों ने किया है। अहिल्याबाई होल्कर का न्याय शासन अपने आप में अनूठा था। अहिल्याबाई
मुगलों से राज्य को बचाने का अहिल्याबाई ने भरसक प्रयास किया। सेना के साथ स्वयं भी युद्ध में भाग लेती थी। अहिल्याबाई गुणी, संस्कारित योग्य व न्यायप्रिय तो थी हीं, जिसके कारण आम जनता में देवी की अवतार मानी जाती थीं
का शासन एक सीमित क्षेत्र में था बहुत बड़ा राज्य नहीं था, पर उनके कार्य बहुत बड़े थे। मात्र 10-12 वर्ष की आयु में विवाह सूबेदार मल्हारराव होल्कर के पुत्र खण्डेराव होल्कर के साथ हुआ और 29 वर्ष की आयु में विधवा हो गईं। मात्र 29 वर्ष की आयु में पति के देहांत का दु:ख सहना पड़ा, फिर 43 वर्ष की आयु में पुत्र मालेराव का भी देहांत सहना पड़ा। 66 वर्ष की आयु में दामाद यशवंत राव फणसे की मृत्यु और पुत्री मुक्ताबाई का सती होना। क्या-क्या नहीं सहा। अहिल्याबाई का व्यक्तिगत जीवन कष्टों दु:खों व वियोग से भरा हुआ था। व्यक्तिगत दु:खों व कष्टों से ऊपर उठकर मानव सेवा में अपना जीवन समर्पण करनेवाली अहिल्याबाई के पति की मृत्यु के 12 वर्ष बाद ससुर की मृत्यु फिर उसके एक वर्ष बाद 11 दिसंबर, 1767 को अहिल्याबाई को शासन की बागडोर सौंपी गई। अहिल्याबाई इंदौर से अपनी राजधानी नर्मदा जी के किनारे महेश्वर ले गईं। अहिल्याबाई का जन्म मुगल सल्तनत के अंतिम दौर व मराठाओं के सशक्त होने के काल में हुआ था। इस दौर में बालिकाओं को औपचारिक शिक्षा के लिए नहीं भेजा जाता था। पर पिता श्री मंकोजी राव शिंदे की दूरदर्शिता ही थी जो उन्होंने अहिल्याबाई के विद्या अध्ययन के लिए घर पर ही व्यवस्था जमाई।
विवाह का किस्सा भी बहुत रोचक है। मल्हार गुणी योग्य बहू की तलाश में थे। भगवान की आरती में अहिल्याबाई प्रभु की स्तुति कर रही थी। स्तुति गान को सुनकर मल्हार ने अहिल्याबाई की बहुत प्रशंसा की और अहिल्याबाई को अपनी बहू के रूप में चुन लिया। इस प्रकार अहिल्याबाई गांव से राज परिवार की बहू बन गईं।
युद्ध के दौरान घायल पति की मृत्यु हो जाने पर अहिल्याबाई बहुत आहत हो गई थीं और अंदर से टूट भी गई थीं। उन्होंने पति के साथ सती होने का निर्णय किया, पर परिवार के वरिष्ठों की सलाह पर सती होने के निर्णय को बदला। आहत अंदर से टूटी हुई अहिल्याबाई ने परिस्थितियों से लड़के अपने आप को संभाला। हिम्मत से काम लिया। साहस व संघर्ष करके न केवल स्वयं को संभाला बल्कि अपनी जनता का भी नेतृत्व किया।
मुगलों से राज्य को बचाने का अहिल्याबाई ने भरसक प्रयास किया। सेना के साथ स्वयं भी युद्ध में भाग लेती थी। अहिल्याबाई गुणी, संस्कारित योग्य व न्यायप्रिय तो थी हीं, जिसके कारण आम जनता में देवी की अवतार मानी जाती थीं। धर्म के प्रचार प्रसार व धार्मिक स्थलों का निर्माण पुर्ननिर्माण भी करवाने में अहिल्याबाई ने काफी योगदान दिया। काशी में गंगा घाट को अहिल्याबाई घाट के नाम से जाना जाता है। काशी विश्वनाथ का मंदिर, सोमनाथ का मंदिर, विश्व प्रसिद्ध उज्जैन मंदिर, द्वारका जी का मंदिर, महेश्वर का मंदिर; ऐसे कई धार्मिक स्थलों का निर्माण अहिल्याबाई ने करवाया। इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यह सारे निर्माण उस दौर में कराए गए जब मुगल हिंदू मंदिरों को लूटने व ध्वस्त करने में लगे थे। हिंदू धर्म के विद्वानों का सम्मान भी अहिल्याबाई का प्रमुख कार्य था।
मुगलों के आतंक के दौर में 28 वर्षों तक अपनी प्रजा की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, धर्म की स्थापना, देशभर में धार्मिक स्थलों का पुनर्निर्माण, सुख-शांति व समृद्धि, न्यायप्रियता व न्यायप्रियता भी इतनी कि गाय के बछड़े के बेटे के रथ से कुचल जाने पर बेटे को भी मृत्यु दंड का आदेश देने में कोई हिचक नहीं। इसलिए अहिल्याबाई लोकमाता कहलाईं।
शिव की भक्ति तो इतनी ज्यादा थी कि ओंकारेश्वर के पास महेश्वर, यहां नर्मदा जी भी हैं, नर्मदा जी व ओंकारेश्वर के कारण राजधानी इंदौर से महेश्वर चली गई। शिव भक्ति में अहिल्याबाई की आस्था इतनी ज्यादा थी कि अहिल्याबाई का आदेश शिवजी का आदेश माना जाता था।
विचित्र व अद्वितीय प्रतिभाओं से संपन्न अहिल्याबाई ने शांति के लिए कई प्रयास किये। पड़ोसी राज्यों के राजाओं को राखी भेजकर राज्य की सुरक्षा के लिए कूटनीतिक प्रयास किया, पर युद्ध की स्थिति में अपनी सेना का नेतृत्व भी स्वयं किया। महिला सैनिकों की टुकड़ी बनाई। उन्हें प्रशिक्षित किया और जब राघोबा ने जिसे अहिल्याबाई राखी भेजा करती थी, ने क्षिप्रा के तट पर अहिल्याबाई का राज हड़पने के
छोटे से राज्य पर शासन के बाद भी वह पूरे भारत को एक दृष्टि से देखती थीं। अहिल्याबाई की वीरता सूझबूझ व साहसपूर्ण जीवन के सामने हिमालय भी छोटा लगता है। दूसरे राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने में अहिल्याबाई का कोई तोड़ नहीं है
लिए डेरा डालकर अपने आप को राजा घोषित कर दिया था, तब अहिल्याबाई ने महिला सैनिकों के साथ राघोबा से लोहा लेने का निर्णय किया। जिसका संदेश स्वयं अहिल्याबाई ने राघोबा को भेजा तथा युद्ध के परिणामों से भी अवगत कराया। राघोबा ने युद्ध का निर्णय छोड़कर अहिल्याबाई का आतिथ्य स्वीकार कर लिया। संभावित युद्ध को टालकर राघोबा से मित्रता अहिल्याबाई के अद्भुत राजनीतिक व कूटनीतिक क्षमताओं को दर्शाता है। अहिल्याबाई का राज्य एक तरफ डाकुओं के आतंक से प्रभावित था। दूसरी तरफ अहिल्याबाई को अबला समझकर राज्य को हड़पने के लिए तैयार राजा। इतनी कठिन परिस्थितियों में भी राज्य को खुशहाली व समृद्धि की तरफ ले जाना यह काम केवल अहिल्याबाई ही कर सकती हैं।
साधारण से गांव के सामान्य परिवार में जन्म लेकर असाधारण प्रतिभाओं से संपन्न होना अहिल्याबाई के कठोर अनुशासन आत्म नियंत्रण व संस्कारों का प्रतीक तो है ही, साथ ही साथ असाधारण जिम्मेदारियां को देखकर घबराकर भाग जाना या समर्पण कर देना उनके कल्पना में भी नहीं था। कई इतिहासकारों नें अहिल्याबाई के बारे में काफी कुछ लिखा है, पर किसी ने भी उनके लिए समर्पण या भाग जाना जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। बालिका शिक्षा के लिए अदभुत प्रयास किये, विधवाओं की मदद की।
उस समय के प्रचलन में था कि अगर कोई महिला विधवा हो जाए और उसका पुत्र ना हो तो ऐसी महिला की सारी संपत्ति को राजकोष में जमा करना पड़ता था। विधवा महिला एक तो पति के वियोग में अत्यंत दु:खी और फिर संपत्ति से भी बाहर। अहिल्याबाई को यह मंजूर नहीं था। उन्होंने विधवा महिला के दुख दर्द को समझा और विधवा महिला को पति की संपत्ति से बेदखल करने वाले कानून को बदलकर पति की संपत्ति पर विधवा महिला के पक्ष में निर्णय लिया। पति की संपत्ति विधवा महिला को ही मिलेगी।
अहिल्याबाई की जनमानस पर गहरी छाप पड़ी है। जनमानस में अहिल्याबाई का बहुत सम्मान है और विशिष्ट स्थान भी है। इंदौर में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी को अहिल्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। भारत सरकार द्वारा अहिल्याबाई के कार्यों की याद व सम्मान में 1996 में डाक टिकट जारी किया था। अहिल्याबाई के सम्मान में महाराष्ट्र की सरकार ने अहमदनगर का नाम बदलकर अहिल्या नगर कर दिया है। जो अहिल्याबाई का जन्म स्थान भी है। अहिल्याबाई के शासन के दौरान शांति खुशहाली व जनता में निश्चिंत्ता तो थी ही साथ-साथ महेश्वर व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में स्थापित हुआ।
महिलाओं की उन्नति के लिए अहिल्याबाई ने एक ऐसी साड़ी बनाने की प्रेरणा दी जो पहनने में महिलाओं को सुविधाजनक लगे तथा पहनने के पश्चात् महिला अपने आप को गौरान्वित महसूस करें। आज यही साड़ी माहेश्वरी साड़ियों के नाम से बनाई जाती हैं। जिनकी देश में ही नहीं विदेशों में भी भारी मांग रहती है। राज्य में कलाप्रेमियों का विशेष ध्यान रखा जाता था तथा समय-समय पर उन्हें सम्मानित व पुरस्कृत भी किया जाता था। छोटे से राज्य पर शासन के बाद भी वह पूरे भारत को एक दृष्टि से देखती थीं।
अहिल्याबाई की वीरता सूझबूझ व साहसपूर्ण जीवन के सामने हिमालय भी छोटा लगता है। दूसरे राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने में अहिल्याबाई का कोई तोड़ नहीं है। सभी राज्यों के राजाओं को रक्षाबंधन के पर्व पर अहिल्याबाई राखी भेजा करती थीं। नेपाल नरेश को भेजी राखी में उपहार मिला 11 पत्ती वाला बिल्पपत्र का पेड़ आज भी महेश्वर के किले में मौजूद है तथा अहिल्याबाई के गौरवशाली शासन की याद दिलाता है। देश के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों पर महाशिवरात्रि पर प्रथम पूजन का अधिकार होलकर राजवंश के पास है। इसमें हैदराबाद निजाम के राज्य में आने वाले दो ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन व घृष्णेश्वर भी शामिल हैं। यह अधिकार अहिल्याबाई की सौम्यता व राजनीतिक दूरदृष्टि राजनीतिक इच्छा शक्ति का
अहिल्याबाई के जीवन को देखें तो कई बार अहिल्याबाई कर्मयोगी के अवतार में मिलेंगी। कई बार वीरांगना अहिल्याबाई मिलेंगी। अनन्य शिवभक्त अहिल्याबाई मिलेंगी। स्त्री अहिल्याबाई के रूप में मिलेंगी। मां अहिल्याबाई के रूप में मिलेंगी। चतुर राजनीतिक हस्ती के रूप में मिलेंगी। न्याय सर्वोपरि को माननेवाली अहिल्याबाई मिलेंगी। मृदुभाषी अहिल्याबाई मिलेंगी। धर्मरक्षक व धर्म स्थापना में लगी अहिल्याबाई मिलेंगी। अत्यंत सफल कूटनीतिज्ञ अहिल्याबाई मिलेंगी। महारानी होने के बाद भी साधु संतों या साध्वी की तरह जीवन व्यतीत करनेवाली रानी के रूप में मिलेंगी
परिणाम हैं। राखी भेजकर सभी राज्यों में मित्रता बढ़ाकर न केवल महेश्वर या मालवा की रक्षा की बल्कि महेश्वर व मालवा में राजनीतिक स्थिरता लाने के प्रयासों में सफलता पाई। इतिहास में महिलाओं के हितों की रक्षा व शिक्षा के लिए अहिल्याबाई का योगदान अमूल्य है। यही अहिल्याबाई हैं जिनके शासनकाल में मंदिरों में शास्त्रों के ज्ञान के विस्तार व जन-जन तक पहुंचाने के लिए योग्य विशेषज्ञों को काम पर लगाया गया था। सुशासन खुशहाली व जनता के दिलों में इज्जत व कुशल प्रबंधन अहिल्याबाई के शासन की पहचान थे। राज्य की जनता को डाकुओं ने परेशान कर रखा था। अहिल्याबाई ने घोषणा की कि जो व्यक्ति डाकुओं को पकड़वाने में मदद करेगा उससे वह अपनी बेटी मुक्ताबाई का विवाह करेंगी। जनता के दर्द को कम करने में सहायक से अपनी बेटी का विवाह? जनता के दर्द से दु:ख भरी इतना ज्यादा कि डाकुओं से मुक्ति दिलावाने वाले से अपनी बेटी का विवाह? यह काम केवल अहिल्याबाई जैसी महारानी ही कर सकती थीं और अपने वचनों के अनुसार अहिल्याबाई ने यशवंत राव फणसे से अपनी बेटी मुक्ताबाई का विवाह भी कर दिया, पर डाकुओं को भी मृत्यु दंड न देकर काम पर लगाया।
इंदौर को एक छोटे से गांव से कुशल समृद्ध शहर बनाने में अहिल्याबाई का योगदान महत्वपूर्ण है। मालवा व निमाड़ क्षेत्र में जिस शासक को सबसे सम्मानपूर्वक याद किया जाता है, उसे अहिल्याबाई कहते हैं। पेड़ काटने को ईश्वर के प्रति अपराध समझने वाली रानी अहिल्याबाई है। सोचिए आज से 200 वर्ष से अधिक समय पूर्व भी अहिल्याबाई पर्यावरण की रक्षा के लिए कितनी सजग थीं। उन्होंने किसानों को अपने मेड़ पर 15-20 पेड़ लगाने का आदेश भी दिया था।
अहिल्याबाई के जीवन को देखें तो कई बार अहिल्याबाई कर्मयोगी के अवतार में मिलेंगी। कई बार वीरांगना अहिल्याबाई मिलेंगी। अनन्य शिवभक्त अहिल्याबाई मिलेंगी। स्त्री अहिल्याबाई के रूप में मिलेंगी। मां अहिल्याबाई के रूप में मिलेंगी। चतुर राजनीतिक हस्ती के रूप में मिलेंगी। न्याय सर्वोपरि को माननेवाली अहिल्याबाई मिलेंगी। मृदुभाषी अहिल्याबाई मिलेंगी। धर्मरक्षक व धर्म स्थापना में लगी अहिल्याबाई मिलेंगी। अत्यंत सफल कूटनीतिज्ञ अहिल्याबाई मिलेंगी। महारानी होने के बाद भी साधु संतों या साध्वी की तरह जीवन व्यतीत करनेवाली रानी के रूप में मिलेंगी। अहिल्याबाई का पूरा जीवन प्रेरणादायक तो है ही तथा शासन व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए मार्गदर्शक भी है। अहिल्याबाई का देहांत 1795 में हो गया पर अपने उत्कृष्ट विचारों व किए गए कार्यों के कारण वह सदैव भारतीय जनमानस के दिल वा दिमाग में मौजूद रहेंगी।
(लेखक पंडित दीनदयाल विचार प्रकाशन, भोपाल (म.प्र.) के संपादकीय विभाग के प्रमुख हैं )
प्रसिद्ध इतिहासकार श्री जदुनाथ सरकार ने तथ्यों के आधार पर देवी को इतिहास की एक महान महिला माना है। वे लिखते हैं- ‘अहिल्याबाई के प्रति मेरा आदर बढ़ गया है। अभी तक केवल एक शासिका, सत्ता व संपत्ति की स्वामिनी होते हुए भी सरल सात्विक जीवन बिताने वाली माता के रूप में मैं उन्हें आदर देता था। उन्होंने कई मंदिर बनवाए, घाट बनवाए, बहुत-सा धन दान-धर्म में दिया। भूमि व गांव इनाम में दिए। पर अब उनका एक दूसरा ही स्वरूप मेरे सामने आया है। मूल कागज-पत्रों से यह सिद्ध होता है कि वे प्रथम श्रेणी की राजनीतिज्ञ थीं और इसलिए उन्होंने इतनी तत्परता से महादजी का सहयोग दिया। यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि अहिल्याबाई के आश्रय के बिना उत्तर भारत की राजनीति में महादजी को इतना श्रेष्ठत्व कदापि नहीं मिलता।’

