ऑपरेशन सिंदूर कहानी, सफलता और सीख

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      भारत की अचंभित करने वाली शानदार सैन्य अभियान, ऑपरेशन सिंदूर, जिसे आतंकवादी पाकिस्तान को दंडित करने के लिए अंजाम दिया गया, रक्षा बलों द्वारा सिर्फ़ दो हफ्तों में अत्यंत सटीकता और आत्मविश्वास के साथ योजनाबद्ध और क्रियान्वित किया गया था। मगर इस ज़बरदस्त अभियान को कुछ ही हफ्तों में पूरा करने की क्षमता वर्षों की कठिन मेहनत, हर तरह की रुकावटों और आंतरिक व बाहरी विरोध के बावजूद, धीरे-धीरे विकसित की गयी थी।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रक्षा अवसंरचना को नॉन-कॉन्टैक्ट वॉर मॉडल में बदलने की जो पहल की गई थी, वही शानदार ऑपरेशन सिंदूर की नींव बनी। यह परिवर्तन पहले के पारंपरिक युद्ध मॉडल पर आधारित उरी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हवाई हमले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली साबित हुआ।

श्री मोदी ने यह समझ लिया था कि पुराना मॉडल भविष्य में कारगर नहीं होगा। यह मॉडल पाकिस्तान के भीतर गहराई तक हमला करने में सक्षम नहीं था और जब तक ऐसा नहीं होता, भारत आतंकवादी संगठनों को उनकी जड़ में नष्ट नहीं कर सकता। इसी वजह से श्री मोदी ने युद्ध के तरीके को बदलकर नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर अपनाया, जिसका नतीजा ऑपरेशन सिंदूर और उसकी शानदार कामयाबी के रूप में सामने आया।

तमाम सैन्य अवसंरचना और तैयारियों के बावजूद ऑपरेशन सिंदूर को इतनी आसानी से अंजाम देना संभव नहीं होता, यदि श्री मोदी के 10 वर्षों के शासन में भारत के पक्ष में भू-राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक माहौल को नाटकीय रूप से बदलने वाले कई सहायक कारक न होते। इसी अवधि में पाकिस्तान की सापेक्षिक गिरावट ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफ़ेयर/ गैर-संपर्क युद्ध

नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर क्या है और श्री मोदी ने भारत को इसकी ओर कैसे अग्रसर किया? पाकिस्तान डिफेंस वेबसाइट ने 8 जुलाई, 2020 को इस बारे में लिखा था कि भारत किस तरह नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वेबसाइट के मुताबिक़, लंबी दूरी की मिसाइलों, अत्याधुनिक सटीक हथियारों, मानव रहित प्रणालियों, रोबोट्स और उपग्रहों को सेना में शामिल करना, जो ख़ासकर तकनीक पर आधारित हैं और जिनका उद्देश्य दूर से ही विध्वंसक शक्ति पहुंचाकर तेज़ और निर्णायक जीत हासिल करना है इसी को ‘नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर’ या ‘गैर-संपर्क युद्ध’ कहा जाता है। पाकिस्तानी वेबसाइट ने आगे लिखा, “यह अवधारणा हाल ही में भारतीय रणनीतिक समुदाय में लोकप्रिय हुई है।” इसमें आगे जोड़ा गया, “बालाकोट हमले और इससे पहले [भारत द्वारा] किए गए कथित सर्जिकल स्ट्राइक के दावों से यह साफ़ होता है कि भारत बिना किसी हताहत के मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करना चाहता है, और साथ ही हिंसा की बढ़ोतरी से भी बचना चाहता है। जनवरी, 2015 में भी भारतीय थलसेना प्रमुख ने दोहराया था कि नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर ‘महत्वपूर्ण’ है और भारतीय सेना के पुनर्गठन की योजना में यह एक ‘प्रमुख विचार’ है।” 2020 की अपनी पोस्ट में पाकिस्तानी वेबसाइट ने भारतीय सेना प्रमुख द्वारा 2015 में ‘नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफ़ेयर/गैर-संपर्क युद्ध’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए उसे ‘हाल ही में’ कही गई बात के रूप में प्रस्तुत किया!

ऑपरेशन सिन्दूर — गैर-संपर्क युद्ध मॉडल

ऑपरेशन सिंदूर की नींव पांच अत्याधुनिक सुपरटेक नॉन-कॉन्टैक्ट युद्ध उपकरणों पर टिकी थी, जिनकी मदद से ज़मीनी सेना या पारंपरिक हवाई हमलों की ज़रूरत नहीं पड़ी। ये पांच हैं— पहला, राफेल लड़ाकू विमान, दूसरा— स्कैल्प मिसाइल, तीसरा— हैमर मिसाइल,चौथा— इजरायली सहयोग से विकसित कामिकाज़े लूटिरिंग ड्रोन और पांचवां—घातक ब्रह्मोस मिसाइल। ये सभी उपकरण नॉन-कॉन्टैक्ट और स्वायत्त हैं; एक बार छोड़े जाने के बाद ये अपने लक्ष्य को ख़ुद ही खोजकर निशाना बनाते हैं।

भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम देने के लिए राफेल लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया। भारत को अपने राफेल विमानों पर अत्याधुनिक हथियार प्रणालियां प्रायः स्कैल्प और हैमर मिल गई थीं। इन मिसाइलों के संयोजन से बहुत अंदर तक हमला करना और सटीक निशाना साधना संभव हो गया। स्कैल्प मिसाइल चुपचाप उड़कर 500 किलोमीटर दूर स्थित बंकरों और कमांड सेंटर्स जैसे मज़बूत और दूरस्थ लक्ष्यों को अपना निशाना बना सकती है। हैमर एक एयर-टू-ग्राउंड हथियार है, जो चलते-फिरते लक्ष्यों को भी सटीकता से मार गिराने में महारत रखती है।

ऑपरेशन सिंदूर में हैमर मिसाइलों ने स्कैल्प मिसाइलों की मदद की। कामिकाज़े ड्रोन ‘करो या मरो’ किस्म के ड्रोन हैं, जिन्हें इंसान दूर से नियंत्रित करता है। और आख़िरी में घातक ब्रह्मोस मिसाइल, जो स्वदेशी सीकर उपकरण से सुसज्जित है जो इसे लक्ष्य तक पहुंचाती है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर में आतंकवादियों के ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया। 6-7 मई की रात को भयंकर भारतीय हमले के बाद 7 से 9 मई की रात तक पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइल हमलों को नाकाम बनाने वाली सबसे महत्वपूर्ण वायु रक्षा उपकरण रूसी एस-400 मिसाइल रोधी रक्षा प्रणाली थी।

नॉन-कॉन्टैक्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर: श्री मोदी की योजना

श्री मोदी ने फ्रांस से राफेल और हैमर मिसाइलें, इंग्लैंड से स्कैल्प मिसाइल, इज़रायल से हेरॉन Mk2 यूएवी और हारोप ड्रोन की तकनीक, रूस से S-400 मिसाइल इंटरसेप्टर, अमेरिका से AH-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर और AGM-114 हेलफायर मिसाइलें हासिल कीं। मोदी सरकार ने इसके अलावा कई अन्य तकनीकों और उपकरणों की भी गुप्त रूप से ख़रीदारी की।

श्री मोदी ने जिन दो उपकरणों को तमाम मुश्किलों और विरोध के बावजूद खरीदा, वो राफेल लड़ाकू विमान और रूसी S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम था। राफेल लड़ाकू विमानों के बिना ऑपरेशन सिंदूर के तहत नॉन-कॉन्टैक्ट युद्ध के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। वहीं, रूसी S-400 सिस्टम के बिना भारत 7, 8 और 9 मई को पाकिस्तान द्वारा भारतीय रक्षा और वायु ठिकानों पर किए गए लगातार ड्रोन और मिसाइल हमलों को नाकाम नहीं कर पाता। इन दिनों में पाकिस्तानी मिसाइलों को आसमान में पक्षियों की तरह मार गिराया गया।

श्री मोदी ने अमेरिका को नज़रअंदाज़ किया, राहुल की कांग्रेस का डटकर सामना किया
राफेल लड़ाकू विमान और रूसी S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम— इन दोनों प्रमुख रक्षा संपत्तियों की खरीद के लिए श्री मोदी को भारी विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन इन्हीं ने ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद की सफलता को ऐतिहासिक बना दिया। ऐसा लगता था मानो देश के खिलाफ कोई साजिश रची जा रही हो, क्योंकि कांग्रेस ने राफेल जेट की खरीद का जबरदस्त विरोध किया और भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उसे रोकने की कोशिश की।

सौभाग्यवश, सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और राफेल सौदे को मंजूरी दी। 2019 के चुनाव नज़दीक आने के बावजूद श्री मोदी ने राफेल ख़रीदने का सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाया, जिसने आज भारत को सुरक्षित किया। अगर राफेल नहीं होते, तो हमारी रक्षा सेनाएं बिना सीमा पार किए, 250 किलोमीटर दूर आतंकवादी शिविरों को निशाना बनाकर नेस्तनाबूद करने के लिए स्वायत्त ड्रोन और मिसाइलें दागने में सक्षम नहीं होतीं जो नॉन-कॉन्टैक्ट वॉरफेयर का असली सार है।

अगर राहुल गांधी राफेल सौदे को रोकने पर अड़े थे, तो अमेरिका भारत को रूस से S-400 खरीदने से रोकने के लिए पूरी तरह से दृढ़ था। अमेरिका ने धमकी दी थी कि अगर भारत ने रूस के साथ S-400 सौदा किया, तो उस पर तकनीकी प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे। लेकिन श्री मोदी ने अपने दोस्त ट्रंप की धमकियों के आगे झुकने के बजाय 2018 में S-400 खरीदने का फैसला लिया। इन्हीं S-400 सिस्टम ने जब तीनों सेनाओं ने नौ आतंकी ठिकानों पर हमला किया, उसके बाद पाकिस्तान द्वारा दागे गए सैकड़ों मिसाइलों और ड्रोन को हमारी सीमा में न घुसने देकर तबाह कर दिया। अगर श्री मोदी ने चुनाव से पहले कांग्रेस के दबाव में आकर राफेल लड़ाकू विमान नहीं खरीदे होते, या ट्रंप की धमकी के आगे झुककर S-400 एंटी-मिसाइल सिस्टम की खरीद रद्द कर दी होती, तो भारत ऑपरेशन सिंदूर के बारे में सोच भी नहीं सकता था।

श्री मोदी के आत्मनिर्भरता से कामिकेज़ ड्रोन मिले

यह कहानी तब तक पूरी नहीं होती जब तक श्री मोदी की महत्वाकांक्षी आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत रक्षा उत्पादन को स्वदेशी बनाने के उनके प्रयासों की सराहना न की जाए। श्री मोदी ने केवल बेहतरीन उपकरणों का आयात करने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि देश में ही नई तकनीकों के विकास को भी प्रोत्साहित किया। हमारा देश, जो 2014 में अपनी ज़रूरतों का 32% उत्पादन करता था, अब 88% उत्पादन करता है।

कामिकेज़ ड्रोन के बारे में दो शब्द

इज़रायली तकनीक को स्वदेशी कामिकाज़े ड्रोन के रूप में विकसित किया गया और पिछले साल अप्रैल में भारत के 78वें स्वतंत्रता दिवस से पहले रक्षा बलों में शामिल किया गया। नेशनल एयरोस्पेस लैबोरेटरीज (NAL) ने इस स्वदेशी कामिकाज़े ड्रोन का निर्माण किया, जो भारत की रक्षा तकनीक में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। ये ‘करो या मरो’ प्रकार के मानव रहित हवाई वाहन, घरेलू निर्मित इंजन से लैस, 1,000 किलोमीटर तक उड़ान भर सकते हैं और नौ घंटे तक लक्ष्य क्षेत्र में घूमाकर निगरानी कर सकते हैं। स्वदेशी कामिकाज़े ड्रोन ने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी पहली भूमिका निभाई।

श्री मोदी और भारत का भू-राजनीतिक उदय

भारत के लिए सीमा पार कर पाकिस्तान पर हमला करना सिर्फ सैन्य तैयारियों से संभव नहीं था। जब श्री मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला, तब उन्हें देश में अपने विरोधियों द्वारा फैलाए गए नकारात्मक प्रचार और उनके विदेशी उदारवादी समर्थकों के सक्रिय सहयोग से बनी गलत छवि का सामना करना पड़ा। उन्होंने उस उदारवादी दुनिया से मुकाबला करने की कसम खाई, जो उनसे लगभग नफरत करती थी।
कोई और व्यक्ति ऐसी प्रतिकूल राय का सामना करता तो शायद वैश्विक पीआर एजेंसी की मदद लेता और भारी खर्च करता, ताकि अपने खिलाफ बनी नकारात्मक छवि को कुछ हद तक सुधार सके। लेकिन श्री मोदी ने यह तय किया कि वे अपने बारे में फैली गलत धारणाओं को खुद अपने प्रयासों से बदलेंगे, और वह भी सबसे अनोखे तरीके से। उन्होंने किसी भी नेता की तुलना में सबसे अधिक विदेश यात्राएं कीं। दस वर्षों में उन्होंने 73 देशों का दौरा किया। उन्होंने इज़राइल की यात्रा की, जो सात दशकों तक भारत के लिए एक उपेक्षित राष्ट्र रहा था और जिसे पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने नहीं देखा था। आज, इज़राइल भारत का सबसे करीबी सहयोगी बन गया है।

इंदिरा गांधी के बाद ऑस्ट्रेलिया जाने वाले वे पहले प्रधानमंत्री थे। अब यह पश्चिमी देशों से निपटने के लिए भारत का एक बड़ा सहयोगी है। मई 2025 तक श्री मोदी ने 41 देशों की एक-एक बार यात्रा की है, 14 देशों में दो बार गए हैं। ब्रिटेन और सऊदी अरब सहित आठ देशों में तीन बार, श्रीलंका में चार बार, चीन सहित तीन देशों में पांच बार, जर्मनी में छह बार, जापान, रूस और यूएई में सात बार, फ्रांस में आठ बार और अमेरिका में दस बार यात्रा की हैं। ये यात्राएं केवल औपचारिक कूटनीतिक दौरे नहीं थीं, बल्कि उन्होंने हर देश के साथ मजबूत और व्यक्तिगत संबंध बनाए।

उनकी लगन और व्यक्तिगत कूटनीतिक पहल ने उन्हें अधिकांश देशों से परिचित कराया और वे दुनिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं और सुदूर देशों के भी दोस्त बन गए। कई बड़े वैश्विक नेता उनके प्रशंसक बन गए। कुछ उदाहरण ये हैं, पूर्व इज़रायली प्रधानमंत्री बेनेट ने कहा कि श्री मोदी इज़रायल में सबसे लोकप्रिय व्यक्ति हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने श्री मोदी को शानदार, बेहतरीन और ‘टोटल किलर’ बताया। ट्रंप के पूर्ववर्ती जो बाइडेन ने कहा कि उन्हें ‘मोदी का ऑटोग्राफ लेने का मन करता है।’ रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने कहा, ‘मोदी एक बुद्धिमान व्यक्ति हैं।’

उन्हें फैसले लेने के लिए डराया या दबाया नहीं जा सकता। मैं तो यहां तक हैरान हूं कि वे भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कितनी सख्त स्थिति अपनाते हैं।” इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने कहा, “मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता हैं।” ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री अल्बानीज ने उन्हें ‘बॉस’ कहा। ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपनी किताब ‘Unleashed’ में लिखा कि मोदी बदलाव लाने वाले नेता हैं और पहली मुलाकात के दौरान उन्होंने मोदी के भीतर एक अनोखी ऊर्जा महसूस की थी।

श्री मोदी को 21 देशों द्वारा उनके सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया, जिनमें सऊदी अरब, अफगानिस्तान, यूएई, बहरीन, मिस्र, कुवैत (ये सभी मुस्लिम देश हैं), अमेरिका, फ्रांस, रूस और ग्रीस शामिल हैं। इतनी बड़ी संख्या में देशों द्वारा किसी भी अन्य विश्व नेता को यह सम्मान नहीं मिला।
2019 से अमेरिका की मॉर्निंग कंसल्ट सर्वे में श्री मोदी लगातार हर तिमाही दुनिया के सबसे प्रशंसित नेता बने रहे, जिनकी स्वीकृति रेटिंग 70% से भी अधिक रही।

जब श्री मोदी विदेश यात्राओं के जरिए भारत की छवि को मजबूत बनाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे थे, तब कांग्रेस पार्टी ने उन्हें ‘नॉन-रेजिडेंट प्राइम मिनिस्टर’ कहकर तंज कसना शुरू कर दिया। इसके विपरीत, राहुल गांधी ने चार सालों में ख़ामोशी से 247 बार विदेश यात्रा की। यहां तक कि उनकी पार्टी को भी कई बार पता नहीं होता था कि वे कहां हैं और भारत में हैं भी या नहीं।

श्री मोदी का उदय और भारत का उत्थान एक-दूसरे के पूरक थे। उनकी यात्राओं और उनके द्वारा अर्जित की गई प्रसिद्धि ने भारत को ऐसी तकनीक, व्यापारिक निवेश और सैन्य उपकरण दिलाए, जो उनकी अभूतपूर्व वैश्विक पहुंच के बिना आसानी से उपलब्ध नहीं हो सकते थे।

एक वैश्विक नेता के रूप में श्री मोदी का भू-राजनीतिक उत्थान ही वह कारण बना, जिसने भारत को पाकिस्तान के ऊपर खड़ा कर दिया, जबकि पाकिस्तान श्री मोदी और भारत के उत्थान के सामने बौना साबित हुआ। जब श्री मोदी के नेतृत्व में बालाकोट पर गुप्त हवाई हमला किया गया था, तब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन सीमित और विरोध भी खुलकर सामने आया था, लेकिन इस बार उन्होंने खुलेआम ऑपरेशन सिंदूर की घोषणा की और सीमा पार कर पाकिस्तान पर जबरदस्त हमला बोला।
मगर तुर्की को छोड़कर किसी भी मुस्लिम देश ने पाकिस्तान का साथ नहीं दिया। कतर, जो अब तक पाकिस्तान के साथ था, उसने भी इस बार भारत का साथ दिया। भारत वैश्विक समर्थन के बिना ऑपरेशन सिंदूर नहीं चला सकता था।

भारत का फ्रैजाइल 5 से सुपर 4 तक का सफर, पाकिस्तान 10 पायदान पीछे
श्री मोदी के शासनकाल में भारत का उत्थान इतना प्रभावशाली रहा कि पाकिस्तान वैश्विक मंच पर लगभग अप्रासंगिक हो गया और इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भी भारत के पक्ष में बदल गई। जब श्री मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला था, तब भारत को दुनिया की ‘फ्रैजाइल 5’ अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता था। आज भारत दुनिया की शीर्ष चार अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और उसकी विकास दर सबसे अधिक है। 2024 में भारत की जीडीपी 3.88 ट्रिलियन डॉलर थी। पाकिस्तान 0.37 ट्रिलियन डॉलर पर पीछे है, भारत से 10 कदम नीचे। श्री मोदी के शासन के दौरान भारत ने अपनी जीडीपी दोगुनी कर ली। लंबे समय से चल रहे मैक्रोइकोनॉमिक संकट में फंसे पाकिस्तान की स्थिति भी इससे कहीं बेहतर नहीं है। 2024 में भारत ने 8.2% की वृद्धि दर्ज की जो पाकिस्तान के 2.4% से तीन गुना ज़्यादा है। पिछले दशक में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी में 74% की वृद्धि हुई, जबकि पाकिस्तान की वृद्धि दर धीमी रही। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 676 बिलियन डॉलर है, जबकि पाकिस्तान का सिर्फ़ 9 बिलियन डॉलर है। भारत सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है।

इसके विपरीत, पाकिस्तान 1980 के बाद से अब तक 20 से अधिक बार IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) के दरवाजे पर आर्थिक मदद के लिए पहुंच चुका है। हाल ही में पाकिस्तान को मिला 7 अरब डॉलर का IMF बेलआउट उसकी इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक राहतों में से एक है। ये राहत पैकेज आर्थिक स्थिरता के लिए दिए जाते हैं, लेकिन अक्सर इनका इस्तेमाल उसकी सेना द्वारा किया जाता है, जो आतंकवाद के साथ जुड़ी रही है। इन तुलनात्मक आंकड़ों का ही असर था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान विभिन्न देशों का भारत के प्रति रुख सकारात्मक रहा।

ऑपरेशन सिंदूर— मुख्य बातें अथवा निष्कर्ष

ऑपरेशन सिंदूर ने भारत को भारत-पाकिस्तान सीमा पर नियम निर्धारित करने वाला प्रमुख शक्ति केंद्र बना दिया। इसके कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं। पहला, भारत ने पहलगाम नरसंहार का बदला नौ आतंकवादी ठिकानों पर बड़े पैमाने पर मिसाइल हमलों के जरिए लिया, जिन्हें पाकिस्तान रोक नहीं सका और इस बार इन हमलों को स्वीकार करना पड़ा, जबकि पहले वह हमेशा इनकार करता था।
दूसरा, पाकिस्तान, जिसने भारत के आतंकवाद पर हमले के बाद युद्ध शुरू किया, अपनी मिसाइलों के जरिए भारत की वायु रक्षा प्रणाली को भेद नहीं पाया। तीसरा, भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणालियों को तबाह कर दिया और साथ ही उसके एयरबेसों पर भी निर्भीक होकर हमला किया और भारी-भरकम नुकसान पहुंचाया। चौथा, जब पूरी तरह से पराजित पाकिस्तान ने परमाणु हमले की धमकी दी, तो भारत ने उसका मजाक उड़ाया और पाकिस्तान को अपने सैन्य संचालन महानिदेशक के माध्यम से युद्धविराम की भीख मांगनी पड़ी। पांचवां, भारत ने खुलकर घोषणा की कि भविष्य में अगर कोई आतंकी हमला होता है, तो वह उसे युद्ध की घोषणा मानेगा और पाकिस्तान के भीतर जाकर आतंकवादी संगठनों का पीछा करेगा। छठा, पाकिस्तान के सैन्य कमांडरों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वांछित आतंकवादियों के अंतिम संस्कार में शामिल होकर उन्हें श्रद्धांजलि देना, इस बात का ठोस सबूत है कि उसकी सेना और आतंकवाद के बीच गहरा संबंध है। सातवां, प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में पाकिस्तान और दुनिया को स्पष्ट संदेश दिया कि ‘आतंक और वार्ता’ तथा ‘व्यापार और वार्ता’ साथ-साथ नहीं चल सकते। आठवां, प्रधानमंत्री ने यह भी साफ कर दिया कि अब पाकिस्तान से कोई भी बातचीत केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) पर ही होगी। नौवां, प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’, यानी सिंधु नदी का जल प्रवाह अब पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद छोड़ने से जुड़ा रहेगा। दसवां, श्री मोदी ने पाकिस्तान को चेतावनी दी कि जब तक वह आतंकवाद का समर्थन नहीं छोड़ता, तब तक वह खुद आतंकवाद से तबाह हो जाएगा और आखिर में श्री मोदी ने साफ कर दिया कि भारत अब परमाणु धमकी को बर्दाश्त नहीं करेगा, जिससे संकेत मिलता है कि भारत अपनी पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति पर पुनर्विचार कर सकता है।

संक्षेप में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने भारत-पाकिस्तान संबंधों को चाहे युद्ध हो या शांति दोनों ही संदर्भों में पुनर्परिभाषित कर दिया है।

(लेखक ‘तुगलक’ तमिल पत्रिका के संपादक और
विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन स्ट्रेटेजिक
थिंक टैंक के अध्यक्ष हैं)