पुण्यश्लोक अहिल्याबाई: आर्थिक एवं राजनीतिक सुशासन

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महारानी अहिल्याबाई का जीवन भारतीय इतिहास का एक ऐसा स्वर्णिम पर्व रहा है, जिसने एक ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले सामान्य परिवार की बालिका से लेकर असाधारण शासक तक की जीवनयात्रा को 75 वर्षाें तक पूर्ण किया, जो आज भारतीय महिलाओं के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है

     यदि हम विश्व के प्रमुख प्राचीन देशों के इतिहास पर दृष्टि डालें तो हमें ज्ञात होगा कि विश्व स्तर पर बहुत कम महिलाएं ऐसी हैं, जिनका उस देश के इतिहास और जनमानस पर शानदार प्रभाव रहा हो। लेकिन यही दृष्टिकोण भारत के बारे में उचित नहीं हैं, क्योंकि भारत में ऐसी कई महिलाएं रही हैं जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। ऐसी ही प्रातःस्मरणीय महिलाओं में से एक नाम है

बाहरी आक्रमणों के कारण जब चारों ओर गड़बड़ी मची हुई थी। प्रजाजन, साधारण गृहस्थ, किसान, मजदूर, अत्यंत हीन अवस्था में आ गये थे। धर्म-अन्धविश्वास, भय-त्रास और रूढ़ियों में भारत फंसा जा रहा था, तब रानी अहिल्याबाई ने अपनी प्रजा को इस गर्त से बाहर निकाला, जिसके कारण उनके जीवन काल में ही लोगों ने देवी’ की उपाधि दी

तत्कालीन महेश्वर की महारानी पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर, जिन्हें भारत के अंदर इतिहास की पुस्तकों से लगभग गायब ही कर दिया गया।

महारानी अहिल्याबाई का जीवन भारतीय इतिहास का एक ऐसा स्वर्णिम पर्व रहा है, जिसने एक ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले सामान्य परिवार की बालिका से लेकर असाधारण शासक तक की जीवनयात्रा को 75 वर्षाें तक पूर्ण किया, जो आज भारतीय महिलाओं के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है। रानी अहिल्याबाई कर्तृत्व, सादगी, धर्म समर्पण, प्रशासनिक कुशलता, दूरदृष्टि एवं उज्ज्वल चारित्र्य से परिपूर्ण एक अद्वितीय आदर्श व्यक्तित्व थीं। ‘श्री शंकर आज्ञेवरुन’ (श्री शंकर जी की आज्ञानुसार) राजमुद्रा से चलने वाला उनका शासन हमेशा भगवान् शंकर के प्रतिनिधि के रूप में ही काम करता रहा। शायद यही वह कारण रहा है कि संपूर्ण देशभर में महेश्वर राज्य की इस शासिका ने भगवान शंकर के सभी स्वरूपों तक पहुंचकर मंदिरों, देवालयों का भव्य पुनर्निर्माण कराया।

उत्तर-मध्यकालीन भारत में जब स्त्रियों का स्थान गौण था और रीतिकालीन काल के कवि स्त्रियों का नख-शिख वर्णन कर रहे थे। भारत में यह वह काल था जब बाह्य ताकतें भारत की सवर्णशिखा को लूटने के लिए आक्रमण कर रही थीं, जिसके कारण तत्कालीन समय में स्त्रियों को पर्दे में रखा जाता था कि सूर्य की किरणें भी उन्हे छू न सकें।

ऐसे समय में अहिल्याबाई होल्कर के लिए मालवा के इन्दौर में शासक बनकर राजसत्ता का संचालन करना एक चुनौती भरा कार्य था, जिसको उन्होंने कुशलतापूर्वक अट्ठाइस वर्ष तक किया। इसीलिए उनको भारत के इतिहास में न केवल अपने साहस के लिए जाना गया, बल्कि महिला सशक्तीकरण, समाज सुधारक और कई क्रान्तिकारी कदमों के लिए याद किया गया है। वे अपने साहस के साथ सेवाभाव और बुद्धिमानी के लिए भी जानी जाती हैं।

बाहरी आक्रमणों के कारण जब चारों ओर गड़बड़ी मची हुई थी। प्रजाजन, साधारण गृहस्थ, किसान, मजदूर, अत्यंत हीन अवस्था में आ गये थे। धर्म-अन्धविश्वास, भय-त्रास और रूढ़ियों में भारत फंसा जा रहा था, तब रानी अहिल्याबाई ने अपनी प्रजा को इस गर्त से बाहर निकाला, जिसके कारण उनके जीवन काल में ही लोगों ने ‘देवी’ की उपाधि दी क्योंकि उनकी न्याय, व्यवस्था, प्रेम और उनके व्यक्तित्व को जनता ने निकट से देखा था। वे बेहद स्पष्ट, सख्त एवं निष्पक्ष भी थीं। शासन-व्यवस्था पर जबर्दस्त पकड़ थी, लेकिन वह बहुत साधारण जीवन जीती थीं। यह सब कुछ उन्होंने अपने कुशल शिक्षक और श्वसुर मल्हार राव के संरक्षण व मार्गनिर्देशन में एक शिष्या, एक पुत्रवधू अहिल्याबाई बनकर प्राप्त किया था जो बाद में राजकाज को कुशलता से संपन्न बनाने में काम आया। अहिल्याबाई के श्वसुर मल्हार राव ने अपने जीते जी ही पुत्रवधू को देश-दुनिया की भौगोलिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति से परिचित कराया था।

देवी अहिल्याबाई की राजधानी बनने के बाद महेश्वर ने विकास के कई नये अध्याय देखे। सामाजिक, धार्मिक, भौतिक, सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ देवी अहिल्या ने अपनी राजधानी को औद्योगिक रूप से समृद्ध करने के लिये यहां वस्त्र-निर्माण प्रारंभ की योजना बनाई।

उस समय वस्त्र निर्माण और हथकरघा में हैदराबादी बुनकरों का एकछत्र राज था। उन्होंने हैदराबाद के बुनकरों को अपने राज्य में आमंत्रित किया और अपने पुश्तैनी कार्य महेश्वर में रहकर करने को कहा। इन बुनकरों से अहिल्याबाई का विशेष आग्रह होता था कि वे इन साड़ियों तथा अन्य वस्त्रों पर महेश्वर किले की दीवार पर बनाई गई डिजाइनें बनाएं। वे वैसा ही करने लगे। आज भी साड़ियों के किनारियों पर महेश्वर किले की दीवारों के शिल्प वाली डिजाइनें मिलती हैं। इन्दौर के अंतिम महाराजा यशवंत होल्कर के पुत्र युवराज रिचर्ड ने ‘रेवा सोसाइटी’ नामक एक संस्था का निर्माण किया जो आज भी महेश्वर किले में ही महेश्वर साड़ियों का निर्माण करती है।

अहिल्याबाई इतनी दूरदर्शी थीं कि उन्होंने हर क्षेत्र के विकास के लिए काम किया, लेकिन साड़ी के इस उद्योग को स्थापित करने और बढ़ावा देना का भी काम किया। उन्होंने सभी हाथों को काम देने के लिए

रानी के शासनकाल के समय राज्य में भारी मात्रा में अनाज उत्पन्न होता था। रानी ने कृषि और कृषकों की भलाई के लिए बहुत सारे कार्य किए। भूमि पर लगान कम कर दिया था। कृषकों से भूमिकर उनकी उपज का एक चौथाई लिया जाता था। एक बीघा कृषि भूमि पर लगान एक रुपया था

वस्त्र निर्माण को 1767 में 250 वर्ष पहले कुटीर उद्योग के रूप में स्थापित किया। आंध्रप्रदेश, गुजरात तथा भारत के अन्य शहरों के बुनकर परिवारों को अपने यहां लाकर बसाया। उन्हें घर, व्यापार आदि की सुविधाएं दीं। पहले यहां केवल सूती साड़ियां ही बनाई जाती थीं, परंतु बाद में उच्च गुणवत्ता वाली रेशम तथा सोना व चांदी के धागों से बनी साड़ियां बनाई जाने लगीं।

रानी अहिल्याबाई के शासनकाल में उनके राज्य में चारों ओर सुख शान्ति थी। उनके लोकप्रिय शासन में प्रजा सुखी थी। राज्य की आर्थिक दशा अच्छी थी। अनाज बहुतायत में पैदा होता था। राज्य का पूरा व्यापार और व्यवसाय उन्नत था। राज्य की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ थी। आम लोगों के ऊपर कर बहुत कम था। राज्य को भूमिकर, दंड एवं चुगी से आमदनी होती थी। उनके शासनकाल में आर्थिक व्यवस्था के दो भाग थे। प्रथम खासगी सम्पत्ति और द्वितीय सरकारी सम्पत्ति।

खासगी सम्पत्ति शासक की स्वयं की कमाई हुई सम्पत्ति थी, जिसका उपयोग शासक अपने निजी कार्यों, दान-पुण्य में करते थे। होल्करों को सबसे अधिक आय उस सम्पत्ति से होती थी जिसको पूना के पेशवाओं द्वारा खासगी सम्पत्ति के रूप में दिए गये परगने थे, जिससे होल्कर परिवार को सालाना 3 लाख की आमदनी होती थी। इस पर राज्य या पेशवा का कोई अधिकार नहीं था। स्वयं अहिल्याबाई को महाराजा मल्हारराव से 15 करोड़ की खासगी सम्पत्ति मिली थी। जिस पर अहिल्याबाई का पूर्ण अधिकार था। रानी अहिल्याबाई अपनी इस सम्पत्ति का उपयोग पूजा-पाठ में करतीं थीं और उसी से दान-दक्षिणा देती थीं। देशभर में घाट-मंदिर बनवाती थीं। गरीबों की सहायता करती थीं। रानी की दूरदर्शी व्यवस्था को उनको खासगी सम्पत्ति से सालाना 15 लाख की आय होने लगी थी।

राज्य को भूमिकर, दंड और चुंगी से भारी आय होती थी। मल्हारराव के समय राज्य को इससे 74 लाख रुपये की सालाना आय होती थी, जबकि अहिल्याबाई के शासन काल में यह आमदनी बढ़कर 1 करोड़ 15 लाख रुपये सालाना हो गई थी। राज्य के अंदर वसूली और खर्च करने के नियम बहुत कठिन थे। किसी तरह की फिजूलखर्ची प्रतिबंधित थी। इस खर्च की देखभाल स्वयं रानी द्वारा किया जाता था। सेना को समय पर वेतन मिलता था। जनकल्याण के कार्य किये जाते थे। रोजगार के लिए विभिन्न तरह के निर्माण कार्य किये जाते थे। लेकिन प्रत्येक तरह का व्यय रानी की स्वीकृति से होता था। राज्य में कर वसूली की विधि आसान थी। राज्य के कर अधिकारी निर्धारित कर ही लेते थे। आय-व्यय का पूरा हिसाब रखा जाता था। कोई कर्मचारी खजाने में किसी तरह की गड़बड़ी करता तो उसको कठोर दंड दिया जाता था।

रानी अहिल्याबाई ने चांदी और तांबे के सिक्के ढलवाए थे, जिसमें एक आना, दो आना, चार आना, एक रुपया चांदी के थे। धेला (आधा पैसा) आधा आना (दो पैसा) तांबे के थे। सिक्के ढालने की टकसाल महेश्वर और मल्हारगढ़ में थी। चांदी के सिक्कों पर शिवलिंग, जलधारी व बेल-पत्र बने थे। कुछ वर्षो के बाद इन्दौर में भी टकसाल स्थापित की गई। राज्य के व्यापारी और साहूकार अपनी ओर से टकसाल में चांदी देकर सिक्के ढलवा लिया करते थे और ढलाई के लिए वे निर्धारित धनराशि टकसाल को देते थे। टकसाल पर पूरी तरह से राज्य का नियंत्रण था। टकसाल के अपने अधिकारी और कर्मचारी थे।

रानी के शासनकाल के समय राज्य में भारी मात्रा में अनाज उत्पन्न होता था। रानी ने कृषि और कृषकों की भलाई के लिए बहुत सारे कार्य किए। भूमि पर लगान कम कर दिया था। कृषकों से भूमिकर उनकी उपज का एक चौथाई लिया जाता था। एक बीघा कृषि भूमि पर लगान एक रुपया था। लगान की वसूली के लिए राज्य को उत्तरी, मध्य और दक्षिणी तीन भागों में विभाजित किया गया था। राज्य के उत्तरी भाग में इन्दौर, मध्य में माहेश्वर और दक्षिण में सुतपुड़ा पहाड़ी का क्षेत्र आता था। जब कभी राज्य के वर्षा न होने से अथवा अकाल की स्थिति में लगान नहीं लिया जाता था या उसमें छूट मिलती थी। किसी तरह की सैन्य कार्यवाही में खेती को नुकसान होता तब उसकी भरपाई राज्य की ओर से किया जाता था।

अहिल्याबाई के शासनकाल में राज्य का व्यापार परिपूर्ण था। वस्त्र, अन्न, खिलौने एवं लघु उद्योगों पर कम कर लिया जाता था। राज्य में हर वस्तु के लिए कर निश्चित था। राज्य की आय का एक बड़ा साधन चुंगीकर था। चुंगीकर राज्य की सीमा पर, नगर सीमा में प्रवेश करने पर और नदी घाटों पर कर लेने की व्यवस्था थी। वस्तुओं के लेन-देन के लिए नाम और तौल के निर्धारित पैमाने थे। व्यापारियों को कई तरह की सुविधाएं मिली हुईं थीं। राजधानी महेश्वर व्यापार का सबसे बड़ा केन्द्र था। होल्कर राज्य भारत के मध्य में था। उत्तर, दक्षिण के लिए यह आने-जाने का मार्ग था। इसी मार्ग से व्यापारिक माल का आना-जाना होता था। इसके कारण होल्कर साम्राज्य को चुंगीकर से बहुत आय होती थी।

अहिल्याबाई नियम-कानूनों की पक्की थीं। राज्य में जब जमीन-विवाद आने लगे तो उन्होंने ‘खसरा नियम’ बनाया। आवेदकों से जमीन की लंबाई में सात फलदार पेड़ और चौड़ाई में बारह फलदार पेड़ लगाने को कहा। इस तरह बराबर विभाजन हुआ। सात पेड़ों के फलों से होने वाली कमाई का वार्षिक टैक्स के रूप में राजकोष में जमा करने का आदेश दिया और बारह पेड़ों के फलों से होने वाली कमाई को अपनी आजीविका के लिए रखने के लिए कहा। आज भी महाराष्ट्र राज्य का राजस्व विभाग इसके जरिए भूमि का रिकार्ड रखता है।

उस समय राज्य में पंचायती व्यवस्था को रानी अहिल्याबाई ने लागू किया था। इससे लोगों को सहज और सस्ता न्याय मिलता था। विवादित विषयों को स्वयं रानी द्वारा निपटाया जाता था। कई लोग घरेलू विवादों को निपटारा भी राज्य की रानी से करवाने के लिए आते थे। मल्हाराव के समय राज्य में नियम था कि यदि कोई व्यक्ति निःसन्तान मर जाता था तब राज्य उसकी पूरी संपत्ति को जब्त कर लेता था। उसकी विधवा किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकती थी। अहिल्याबाई ने अपने शासनकाल में इस नियम को बदल दिया। विधवाओं को गोद लेने का अधिकार दिया। इससे प्रजा में खुशहाली आयी।

अहिल्याबाई के प्रशासन की विशेषता लोक कल्याण के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता थी, जिसमें सुशासन को सामाजिक सुधारों के साथ जोड़ा गया था। उनकी नीतियां समावेशी थीं, जिनका लक्ष्य भूमिहीन किसानों, आदिवासी समुदायों और विधवाओं सहित समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों का उत्थान करना था। उनके सामाजिक न्याय और कल्याण प्रयास अग्रणी थे, जो सभी के लिए सद्भाव, न्याय और समृद्धि को बढ़ावा दे रहे थे।

अहिल्याबाई के प्रशासन की विशेषता लोक कल्याण के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता थी, जिसमें सुशासन को सामाजिक सुधारों के साथ जोड़ा गया था। उनकी नीतियां समावेशी थीं, जिनका लक्ष्य भूमिहीन किसानों, आदिवासी समुदायों और विधवाओं सहित समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों का उत्थान करना था

उनकी सहानुभूति-उन्मुख शासन व्यवस्था उनके प्रशासन में सामने आती है, जिसने अहिल्याबाई को अपने लोगों का प्रिय बना दिया। उन्होंने निष्पक्ष और त्वरित न्याय पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपना शासन धर्म और धार्मिकता के सिद्धांतों पर आधारित किया। परिणामस्वरूप, कोई उनके प्रशासन को करुणा और दक्षता के मिश्रण के रूप में देखता है, जो उनके युग में शासन के लिए उच्च मानक स्थापित करता है।

अपने ससुर की मृत्यु के बाद होल्कर परिवार के उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने सामाजिक सुधार के उद्देश्य से कई परियोजनाएं शुरू कीं, विशेष रूप से कृषि विकास, जल प्रबंधन और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। मंदिरों, घाटों, कुओं और शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण सहित उनके कई धर्मार्थ कार्य पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हुए थे।

इसके अलावा, सड़कों का निर्माण और व्यापार मार्गों में सुधार जैसी बुनियादी ढांचागत पहल उसके शासनकाल के महत्वपूर्ण परिणाम थे। ऐसे प्रयास महेश्वर (1766 से 1818 तक होल्कर साम्राज्य की राजधानी) को व्यापार और उद्योग के केंद्र में बदलने में सक्षम हुए।

(लेखक भाजपा उत्तर प्रदेश की पत्रिका कमल ज्योति के संपादक हैं एवं भाजपा उत्तर प्रदेश चुनाव प्रबंधन, रिसर्च के प्रदेश संयोजक हैं)